Skip to main content

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम...आजकल वो इस तरफ देखता है कम...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 83

साहिर लुधियानवी एक ऐसे गीतकार रहे हैं कि उन्होने जो भी गाने लिखे वो आम जनता के होठों की शान बन गये। उन्होने अपनी शायरी और नग़मों में ऐसे ऐसे ख़यालात पेश किये हैं कि जिसने भी इन्हे पढ़ा या सुना इनके असर से बच न सके। असंतुलित बचपन और जवानी के असफल प्रेम ने उन्हे ऐसे झटके दिये थे कि उनकी ये तमाम दर्द उनकी शायरी में फूट पड़े थे और वो बन बैठे थे एक विद्रोही शायर। लेकिन सिर्फ़ प्रेम और प्रेम की नाकामियाँ लिखने तक ही उनकी शायरी सीमित नहीं रही, बल्कि समाज में चल रही समस्यायों पर भी उनकी कलम के बाण चलाये है उसी असरदार तरीक़े से। प्रेम और विरह जैसी विषयों से परे उठकर आम जनता की दैनन्दिन समस्यायों को अपना निशाना बनाया है साहिर ने एक बार नहीं बल्कि कई कई बार। भूख, बेरोज़गारी, नारी की इज़्ज़त और ग़रीबों की तमाम दुख तकलीफ़ों पर सीधा वार उनके कलम ने बहुत बार किये हैं। एक फ़िल्मी गीतकार के दायरे सीमाओं से घिरे होते हैं और बहुत ज़्यादा अलग तरह का कुछ लिखना मुमकिन नहीं होता। लेकिन जब भी मौका हाथ लगा साहिर ने ज़िन्दगी के किसी न किसी ज्वलन्त मुद्दे को व्यक्त किया है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म 'फिर सुबह होगी' में मुकेश की आवाज़ में उनका लिखा गीत "आसमाँ पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम, आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम" एक व्यंग-बाण है आज की सामाजिक व्यवस्था की तरफ़। चारों तरफ़ अन्याय, अत्याचार, शोषण पनप रहा है, क्या भगवान की नज़र इस दुनिया से उठ चुकी है! आख़िर आज भगवान इतना उदासीन क्यों है! आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में यही चिंतन पेश हो रहा है इस गीत के ज़रिए।

फ़िल्म 'फिर सुबह होगी' बनी थी १९५८ में 'पारिजात पिक्चर्स' के बैनर तले, जिसका निर्देशन किया था रमेश सहगल ने। राज कपूर, माला सिन्हा और रहमान अभिनीत यह फ़िल्म फ़िल्मी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। संगीतकार ख़य्याम ने इस फ़िल्म में पहली बार साहिर लुधियानवी के साथ काम किया था। उन दिनों राज कपूर की फ़िल्मों में संगीत दिया करते थे शंकर जयकिशन। पर इस फ़िल्म में मौका मिला ख़य्याम को और उन्होने यह चुनौती बड़ी ही कामयाबी से निभायी। ख़य्याम के संगीतकार चुने जाने के पीछे भी एक कहानी है। कहा जाता है कि साहिर साहब ने फ़िल्म के निर्माता को पूछा कि इस फ़िल्म के संगीतकार कौन बनने वाले हैं। जब निर्माता महोदय ने बताया कि क्योंकि यह राज कपूर की फ़िल्म है तो यक़ीनन शंकर जयकिशन ही संगीत तैयार करेंगे, तो इस पर साहिर बोले कि क्योंकि यह फ़िल्म फ्योडोर डोस्तोएव्स्की की मशहूर रूसी उपन्यास 'क्राइम ऐंड पनिशमेंट' पर आधारित है, इसलिए इस फ़िल्म के संगीत के लिए एक ऐसे संगीतकार को चुना जाए जिसने यह उपन्यास पढ़ रखा हो। बस, फिर क्या था, ख़य्याम साहब ने यह उपन्यास पढ़ रखा था और उन्हे यह फ़िल्म मिल गयी। यह बात ख़ुद ख़य्याम साहब ने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहा था। तो दोस्तों, लीजिए पेश है मुकेश, साहिर और ख़य्याम साहब को समर्पित आज का यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. गीता दत्त और लता की आवाजों में छेड़ छाड़ और मस्ती से भरा ये गीत.
२. इस फिल्म का एक दोगाना पहले भी ओल्ड इस गोल्ड में आ चुका है.
३. मुखड़े में है -"जादू टोना".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी लौटे हैं एक बार फिर विजेता बन कर...बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Comments

Parag said…
स्वर्गीय मुकेश जी की आवाज़ में यह मधुर गीत सुनाने के लिए धन्यवाद. साहिर साहब की कलम की जादूगरी है इस गीत में.

पहेली का जवाब है "अँखिया भूल गयी हैं सोना, दिल पे हुआ है जादू टोना"

आभारी
पराग
manu said…
एक दम सही,,,,
शहनाई वाले तेरी शहनाई रे करेजवा को चीर गयी ,
चीर गयी ,,,,,,,,,,,,,,
चीर गयी,,,,,,,,,,
rachana said…
आप दोना ने ही उत्तेर दे दिया यही गाना है .अँखियाँ भूल गई हैं सोना दिल पे हुआ है जादू टोना
मनु जी तेरे लिए तालियाँ बजाने का शुक्रिया
सादर
रचना
RAJ SINH said…
भयी शैलेश ,

काफ़ी दिनों से सुजय को बधयी देना चह्ता था जम कर . मौका ही नहीन पा रहा था . सुजाय आप के आलेख और गीत की प्रस्तुति का जबाब नहीन .गीत और उस्के पीचे छुपे इतिहास को बताने का धन्ग और प्रस्तुति बेजोड होते हैन.

व्यस्तता के चलते अक्सर देर हो जया कर्ती है सो पहेली पर भी देर से पहुन्च पाता हून . जितने का चान्स ही नहीन लगता . फ़िर भी बहुत ही खुशी होती है कि नयी पीधी भी उस ’ स्वर्ण ’ युग से खूब परिचित है !

सजीव आप्के और शैलेश के इन प्रयसोन की जितनी तारीफ़ की जये कम ही होगी .

आप सभी को बहुत ही बधायी !
Playback said…
bahut shukriya Raj Sinh ji.

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

बिलावल थाट के राग : SWARGOSHTHI – 215 : BILAWAL THAAT

स्वरगोष्ठी – 215 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 2 : बिलावल थाट 'तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...'   ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। व