Skip to main content

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (4)

दोस्तों, यादें बहुत अजीब होती हैं, अक्सर हम हंसते हैं उन दिनों को याद कर जब साथ रोये थे, और रोते हैं उन पलों को याद कर जब साथ हँसे थे. इसी तरह किसी पुराने गीत से गुजरना यादों की उन्हीं खट्टी मीठी कड़ियों को सहेजना है. यदि आप २५ से ४० की उम्र-समूह में हैं तो हो सकता है आज का ये एपिसोड आपको फिर से जवानी के उन दिनों में ले जाये जब पहली पहली बार दिल पर चोट लगी थी.

बात १९९१ के आस पास की है, भारतीय फिल्म संगीत एक बुरे दशक से गुजरने के बाद फिर से "मेलोडी" की तरफ लौटने की कोशिश कर रहा था. सुनहरे दौर की एक खासियत ये थी कि लगभग हर फिल्म में कम से कम एक दर्द भरा नग्मा अवश्य होता था, और मुकेश, रफी, किशोर जैसी गायकों की आवाज़ में ढल कर वो एक मिसाल बन जाता था. मारधाड़ से भरी फिल्मों के दौर में दर्दीले नग्में लगभग खो से चुके थे तो जाहिर है उन दिनों दिल के मारों के लिए उन पुराने नग्मों की तरफ लौंटने के सिवा कोई चारा भी नहीं था. ऐसे में सरहद पार से आई एक ऐसी सदा जिसने न सिर्फ इस कमी को पूरा कर दिया बल्कि टूटे दिलों के खालीपन को कुछ इस तरह से भर दिया, कि सदायें लबालब हो उठी.

जी हाँ हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के मशहूर लोक गायक और शायर अताउल्लाह खान की. गुलशन कुमार अपनी टी सीरीज़ के माध्यम से संगीत जगत में बदलाव का डंका बजा चुके थे. उन्होंने ही सबसे पहले अत्ता की ग़ज़लों की भारत में उतरा. पहली दो अल्बम्स की साधारण सफलता के बाद आई वो अल्बम जिसने पूरे भारत में धूम मचा दी. "बेदर्दी से प्यार" था इसका शीर्षक और "अच्छा सिला दिया", "मुझको दफना कर" और "ये धोखे प्यार के" जैसी ग़ज़लें हर खासो आम की जुबान पर चढ़ गए. सच पूछा जाए तो टी सीरीज़ का साम्राज्य इन्हीं अलबमों की नींव पर खडा हुआ और आगे चलकर गुलशन ने अताउल्लाह खान के कवर वर्ज़न गवा कर सोनू निगम, अभिजीत और नितिन मुकेश जैसे गायकों को स्थापित किया.

उस बेहद सफल अल्बम के साथ एक कहानी भी आई सरहद पार से. अत्ता के प्यार की कहानी. बात फ़ैल गयी कि अत्ता को इश्क में अपनी महबूबा से धोखे मिले और गुस्से में उन्होंने अपनी माशूका का ही कत्ल कर दिया, जेल में बैठकर उन्होंने "बेवफा सनम" की याद में ग़ज़लें लिखी, जिन्हें बाद में उनकी आवाज़ में रिकॉर्ड कर बाज़ार में पहुँचाया गया. पता नहीं कहानी कितनी सच्ची है कितनी झूठी. पर लगभग ३५ संस्करण के बाद अचानक अत्ता की आवाज़ गायब हो गयी और तब लोगों ने कहना शुरू किया कि अत्ता अब नहीं रहे, उन्हें फांसी हो गयी. कहते हैं गुलशन कुमार कृत "बेवफा सनम" फिल्म अताउल्लाह खान के जीवन पर ही आधारित थी. इन सब किस्सों ने अत्ता की ग़ज़लों को लोकप्रिय बनाने में जम कर सहयोग दिया, और उसके बाद आई उनकी हर अल्बम ने कामियाबी के फलक को छुआ.

समय के साथ अत्ता की ग़ज़लें भुला दी गयी. कुछ लोगों ने उन्हें बाजारू और सस्ता कह कर खारिज कर दिया. उनकी आवाज़ में कोई मिठास नहीं थी न ही कोई विविधता. हर ग़ज़ल का मूड भी लगभग एक सा ही होता था, पर कुछ तो था उस दर्द भरी आवाज़ में जिसने करोडों को रुलाया. उनके बाद उनकी नक़ल की कोई भी कोशिश उनकी सफलता की दूर दूर तक बराबरी न कर पायी.

रोता है दिल उसे याद करके
वो तो चला गया मुझे बर्बाद करके

या फिर
आदमी लाख संभल कर भी चले पर "सादिक",
हादसे होते ही रहते हैं ये होने वाले....

कितनी सरल शायरी है पर इन्हीं शब्दों ने एक ज़माने में आम आदमी के सीने में छुपे दर्द को झकझोरा था. पता नहीं अत्ता आज जिन्दा है या नहीं, अगर हैं तो आज भी वो गाते हैं या नहीं. उनके बारे में सुनी गयी उन कहानियों में कितनी सच्चाई है मुझे आज तक नहीं पता. पर इतने जानता हूँ, कि आज भी उनकी आवाज़ में उन ग़ज़लों को सुनना एक अलग ही तरह का अनुभव है मेरे लिए. यादों के कई झरोखे खुल जाते हैं जेहन में. उनके कुछ लाइव कार्यक्रम भी हुए हैं जिनकी कुछ क्लिप्पिंग्स अंतरजाल पर उपलब्ध हैं. तो दोस्तों इस रविवार सुबह की कॉफी पेश है अताउल्लाह खान की दर्द भरी ग़ज़लों के साथ.

अच्छा सिला दिया....


कमीज तेरी काली....


ये थेवा मुंदरी दा...


तुझे भूलना तो चाहा...


बेदर्दी से प्यार का....


मुझको दफना कर वो जब....


ओ दिल तोड़ के ...


अल्लाह हू अल्लाह हू...


यदि आपमें से किसी श्रोता के पास अताउल्लाह खान साहब के बारे में अधिक जानकारी हों तो कृपया हमारे साथ बाँटें, वैसे उनकी ढेरों ग़ज़लें हमारे संकलन में उपलब्ध हैं यदि आप पसंद करें तो फिर किसी रविवार को कुछ और अत्ता की ग़ज़लों लेकर हम ज़रूर उपस्थित हो जायेंगें. फिलहाल के लिए इजाज़त.

आलेख - सजीव सारथी


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.



Comments

Yogesh said…
Bahut badhia geet !!!

Loved them...
मुझे भी अपने पुराने दिन याद आ गये। मैं उस समय कक्षा 5 का विद्यार्थी था। गाँव में वो चाहे किसी का घर हो या खेत-खलिहान ये ही गीत सुनाई पड़ते थे।
छोटा तो मैं भी था.. अता-उल्लाह खान के कईं गीत सुने हैं.. पुराने दिन याद आ गये.. धन्यवाद सजीव जी। मुझे भी बस इतना ही पता है जितना कि आपको..
क्या बात है! वह आवाज़ भी याद आ गयी और वह दिन भी जब झाडोदा कलां से नोइडा तक दिल्ली की प्राइवेट बसों में सिर्फ यही आवाज़ सुनाई देती थी.
अताउल्ला के कैसेट वाकई समाज के निचले तबके पे राज्य कर रहे थे. हर बस में, पानवालों के टपरे पर, होटलों में यही बजते थे. ये आंधी की तरह आये और तूफ़ान की तरह गायब हो गए. आज इनका नाम लेनेवाला भी नहीं मिलता. टी सीरीज को बढ़ने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी. बाकी किस्सा भी सर्वविदित था, सच या...भगवन जाने. आपने एक भुलाई याद ताज़ा करदी.
वाह बहुत बढि़या

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT

स्वरगोष्ठी – 214 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया