Tuesday, March 17, 2009

एक मंजिल राही दो, फिर प्यार न कैसे हो....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 25

दोस्तों,'ओल्ड इस गोल्ड' की एक और कडी के साथ हम हाज़िर हैं. हमें बेहद खुशी है कि आप इस शृंखला को पसंद कर रहे हैं. और यकीन मानिए, आपके लिए इन गीतों को खोजने में और इन गीतों से जुडी जानकारियाँ इकट्टा करने में भी हमें उतना ही आनंद आ रहा है. इस शृंखला के स्वरूप के बारे में अगर आप कोई भी सुझाव देना चाहते हैं, या किसी तरह का कोई बदलाव चाहते हैं तो हमें बे-झिझक बताईएगा. अगर आप किसी ख़ास गीत को इस शृंखला में सुनना चाहते हैं तो भी हमें बता सकते हैं. और अगर फिल्म संगीत के सुनहरे दौर के किसी गीत से जुडी कोई दिलचस्प बात आप जानते हैं तो भी हमें ज़रूर बताएँ, हमें बेहद खुशी होगी आपकी दी हुई जानकारी को यहाँ पर शामिल करते हुए. तो आइए अब ज़िक्र छेडा जाए आज के गीत का. आज का गीत लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ों में एक बेहद खूबसूरत युगल गीत है जिसमें यह बताया जारहा है कि अगर मंज़िल एक है, तो फिर ऐसे मंज़िल को तय करनेवाले दो राही के दिलों में प्यार कैसे ना पनपे. अब इसके आगे शायद मुझे और कुछ बताने की ज़रूरत नहीं, आप ने गीत का अंदाज़ा ज़रूर लगा लिया होगा!

जी हाँ, 1961 में बनी फिल्म "संजोग" के इस गीत को लिखा था राजेंदर कृष्ण ने और संगीत में पिरोया था मदन मोहन साहब ने. प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित इस फिल्म में प्रदीप कुमार और अनीता गुहा ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई. यह गीत मदन मोहन के स्वरबद्ध दूसरे गीतों से बहुत अलग हट्के है. आम तौर पर उनके गीतों में साज़ों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होता था. लेकिन इस गीत में उन्होने अच्छे ख़ासे 'ऑर्केस्ट्रेशन' का प्रयोग किया. कई साज़ प्रयोग में लाए गये. शायद खुश-मिज़ाज और खुश-रंग इस गीत की यही ज़रूरत थी. पहले और तीसरे 'इंटरल्यूड' में 'सॅक्सफोन' का खूबसूरत प्रयोग हुया है, तो दूसरे 'इंटरल्यूड' में 'वोइलिन' और 'अकॉर्डियन' इस्तेमाल में लाया गया है. कुल मिलाकर इस गीत का संगीत संयोजन बेहद सुरीला और चमकदार है जिसे सुनकर दिल खुश हो जाता है. तो अब आप भी खुश हो जाइए और सुनिए यह गीत.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. रफी साहब का एक बेहद यादगार नग्मा.
२. मजरूह के बोल और एस डी बर्मन साहब का बेमिसाल संगीत.
३. पहला अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"देखा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
अभिषेक जी, एकदम सही जवाब. नीरज जी, धन्येवाद सहित बधाई, पी एन जी एकदम आसान हुई तो पहेली का मज़ा क्या :) प्रेमेन्द्र जी, स्वागत आपका.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




4 comments:

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

गीत मधुर...संगीत मधुर...फिर प्यार न कैसे हो...

Neeraj Rohilla said...

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये,
देखा किये तुम्हे हम बनके दीवाना,
उतरा जो नशा तो हमने ये जाना....

वाह वाह, इसको तो हम नींद में भी बता देते।

manu said...

waah waah,,,
shaandaar ghazal ,,,kaalaapani film se,,,

शोभा said...

वाह वाह बहुत सुन्दर गीत।

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