बुधवार, 4 जनवरी 2012

छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से - 'एक गीत सौ कहानियाँ' की पहली कड़ी में यादें पंचम के इस कालजयी गीत की


गुलज़ार हमेशा कहते थे कि पिक्चराइज़ करने के लिए उन्हें उस वक़्त कम्पोज़र के साथ बैठना बहुत ज़रूरी है जब गाना कम्पोज़ हो रहा हो वरना वो पिक्चराइज़ नहीं कर पाते। उन्हें इमेजेस मिलते हैं जब गाना कम्पोज़ हो रहा होता है। पर पंचम नें चाल चली और गुलज़ार के साथ बैठ कर इस गीत को कम्पोज़ करने से इन्कार कर दिया।


'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सफल प्रयास के बाद सुजॉय चटर्जी अब लेके आए हैं साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज ४ जनवरी, संगीतकार राहुल देव बर्मन की पूण्यतिथि पर उन्हीं के रचे एक गीत से जुड़ी कहानियों से शुरुआत करते हैं इस स्तंभ की।

एक गीत सौ कहानियाँ # 1

फ़िल्म संगीत के आकाश में यूं तो बहुत से संगीतकार चमके हैं, पर उनमें कुछ ही संगीतकार ऐसे हुए जो बेहद प्रयोगधर्मी रहे, या फ़िल्म संगीत की प्रचलित धारा को मोड़ने का सफल प्रयास किया। फ़िल्म संगीत के इतिहास में जिन पाँच संगीतकारों को क्रान्तिकारी संगीतकार के रूप में चिन्हित किया जाता है, उनमें एक नाम पंचम यानी राहुल देव बर्मन का भी है। बाक़ी के चार नाम हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर और ए. आर. रहमान। ग़ौर करें तो पाएंगे कि ये सभी पाँच संगीतकारों नें समकालीन संगीतकारों से कुछ अलग हट कर किया, और अपने घोड़े को भीड़ से निकाल कर ऐसी दौड़ लगाई कि बहुत आगे निकल गए।

पंचम के नवीन प्रयोगों की बात करें तो उनमें से एक प्रयोग था सुपरिम्पोज़िंग् का। फ़िल्म 'बहारों के सपने' के लता मंगेशकर के गाए गीत "क्या जानू सजन होती है क्या ग़म की शाम" के अन्तरों में बोलों के पार्श्व में एक दूसरी आवाज़ भी आलाप लेती सुनाई पड़ती है। कई लोगों की धारणा थी कि वह दूसरी आवाज़ उषा मंगेशकर की थी, पर हक़ीक़त जब सामने आई तो लोग ताज्जुब रह गए। दरअसल पंचम नें लता जी की ही आवाज़ को सुपरिम्पोज़ किया था उस गीत में। आज के दौर में शायद यह बड़ी बात न हो, पर ६० के उस दशक में यह निश्चित रूप से बड़ी बात थी। आगे चलकर पंचम नें यही प्रयोग कई बार किया, फ़िल्म 'इजाज़त' के कम से कम दो गीतों में यह प्रयोग हमे सुनने को मिला, जिनमें एक था "कतरा कतरा मिलती है" और दूसरा गीत था "छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से"। आइए इस दूसरे गीत पर ज़रा क़रीब से नज़र डाली जाए। गुलज़ार के लिखे इस गीत को गाया था आशा भोसले नें। आशा जी नें एक बार इस गीत को सम्बोधित करते हुए कहा था, "गानें हम रोज़ गाते हैं, रोज़ सुनते भी हैं, दूसरों के गाने। पर अपनी ख़ासी पसन्द होती है, जो अपने मन को अच्छा लगता है, जो अपने जीवन के किसी याद से जुड़ा होता है, सुर अच्छे होते हैं, या पिक्चराइज़ बहुत अच्छा किया होता है, जो अपने मन में हमेशा के लिए वह रह जाता है"।

अब आते हैं इस गीत के बनने की कहानी पर। गुलज़ार और पंचम बहुत अच्छे दोस्त भी थे। हुआ यूं था कि एक फ्रेज़ पंचम नें गुलज़ार को सुनाया था और उसे एलाबोरेट करवाते हुए पंचम नें गुलज़ार से पूरा गाना लिखवा लिया। पर मीटर लेने के बाद पंचम नें गाना बनाया मगर गुलज़ार को सुनाया नहीं कि क्या बनाया है। गुलज़ार हमेशा कहते थे कि पिक्चराइज़ करने के लिए उन्हें उस वक़्त कम्पोज़र के साथ बैठना बहुत ज़रूरी है जब गाना कम्पोज़ हो रहा हो वरना वो पिक्चराइज़ नहीं कर पाते। उन्हें इमेजेस मिलते हैं जब गाना कम्पोज़ हो रहा होता है। पर पंचम नें चाल चली और गुलज़ार के साथ बैठ कर इस गीत को कम्पोज़ करने से इन्कार कर दिया। सीधे सीधे इन्कार तो नहीं किया पर बात को टालते गए। कहने लगे कि पता नहीं मैं कब कम्पोज़ करूंगा, कब म्युज़िक पे बैठूंगा, और अन्त में तो जब गुलज़ार ज़्यादा ज़िद करने लगे तो पंचम नें साफ़ कह दिया कि रेकॉर्डिंग् थिएटर में आके मिलना, वहाँ पर बताएंगे। पंचम से भला कौन जीत सकता था! आख़िरकार रेकॉर्डिंग् रूम में जाकर ही गुलज़ार को पता लगा कि उनके लिखे गीत का क्या हश्र हुआ है। गुलज़ार नें पाया कि गाना रेकॉर्ड तो हो रहा है पर ट्रैक के जगह छोड़-छोड़ कर गाया जा रहा है, यानी एक अन्तरे में एक लाइन छोड़ दी, फिर दूसरे अन्तरे में दूसरी लाइन छोड़ दी, फिर दूसरे ट्रैक पे ले गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है! पंचम नें उनकी बेचैनी को शान्त करते हुए कहा कि पहले हो जाने दो, फिर बताएंगे। आख़िर में पंचम गुलज़ार के पास गए और कहा कि अब इसे पिक्चराइज़ करके बताइए।

गुलज़ार ने पंचम की चुनौती को स्वीकारा और ऐसा पिक्चराइज़ किया कि आशा जी तक वाह-वाह कर उठे; आशा जी नें कहा, "लोग कश्मीर जाते हैं, फ़ॉरेन लोकेशन्स पे जाते हैं गानें फ़िल्माने के लिए, और आप गुलज़ार साहब, आपने तो खण्डाला में ही कमाल कर दिखाया, और जिस तरह बारिश को और पहाड़ों को लिया है, यह सुपर्ब है, बहुत सुन्दर है"। गुलज़ार साहब नें भी पिक्चराइज़ हो जाने के बाद स्वीकार किया कि पंचम के चुनौती को उन्होंने एक स्पोट के रूप में लिया, और एक ज़िद बैठ गयी थी उनके दिल में कि इस चुनौती को पार ज़रूर करना है। और इस हेल्दी कम्पीटिशन का ही परिणाम है कि इतना अच्छा एक गीत बन गया। यूं तो इस गीत की अवधि ७ मिनट और १६ सेकण्ड्स की है, पर अफ़सोस की बात ही हम कहेंगे कि फ़िल्म में इस गीत को नामावलि के दौरान पार्श्व-संगीत के रूप में इस्तमाल किया गया है और केवल मुखड़ा और पहला अन्तरा ही सुनने को मिलता है। इस तरह से फ़िल्म में यह गीत केवल ३ मिनट का ही है। पूरा गीत केवल ऑडियो के रूप में कैसेट्स और सीडीज़ पर उपलब्ध है, फ़िल्म के पर्दे पर नहीं।

'इजाज़त' फ़िल्म के इस गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर पे क्लिक करें।



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में। अब मुझे, यानी सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार!

3 टिप्‍पणियां:

Sajeev ने कहा…

मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में से एक, इस तिकड़ी के क्या कहने

कृष्णमोहन ने कहा…

नए स्तम्भ का प्रारूप लुभावना है। मैं स्तम्भ के लोकप्रिय होने की कामना करता हूँ। शुरुआती दौर में कुछ ऐसे भी संगीतकार हुए हैं, जिन्होने संसाधन न होते हुए भी चमत्कारपूर्ण संगीत रचे हैं। भविष्य में ऐसे गीतों की रचना प्रक्रिया पढ़ने और सुनने की इच्छा है।

Reetesh Khare ने कहा…

नए स्तंभ की शुरुआत गुलज़ार साहब और पंचम दा के गीत से हुई है..अपने आप में बड़ी मधुर बात है. जानने भी मिला जो ताना बाना था इस गीत को बनने में...नए वर्ष में इस मनोहर प्रस्तुति के लिए धन्यवाद! शुभकामनायें!

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ