बुधवार, 25 जनवरी 2012

"ऐ मेरे वतन के लोगों" - इस कालजयी देशभक्ति गीत को न गा पाने का मलाल आशा भोसले को आज भी है


कालजयी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" के साथ केवल पंडित नेहरू की यादें ही नहीं जुड़ी हुई हैं, बल्कि इस गीत के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। आज गणतन्त्र दिवस की पूर्वसंध्या पर इसी गीत से जुड़ी कहानियाँ सुजॉय चटर्जी के साथ 'एक गीत सौ कहानियाँ' की चौथी कड़ी में...


एक गीत सौ कहानियाँ # 4

देशभक्ति गीतों की बात चलती है तो कुछ गीत ऐसे हैं जो सबसे पहले याद आ जाते हैं, चाहे वो फ़िल्मी हों या ग़ैर-फ़िल्मी। लता मंगेशकर की आवाज़ में एक ऐसी ही कालजयी रचना है "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा करो क़ुर्बानी"। कवि प्रदीप के लिखे और सी. रामचन्द्र द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को जब भी सुनें, रोंगटे खड़े हुए बिना नहीं रहते, आँखें नम हुए बिना नहीं रहतीं, हमारे वीर शहीदों के आगे नतमस्तक हुए बिना हम नहीं रह पाते। इस गीत को १९६२ के भारत-चीन युद्ध के शहीदों को समर्पित किया गया था। कहते हैं कि रेज़ांग् ला के प्रथम युद्ध में १३ - कुमाऊं रेजिमेण्ट, सी-कंपनी के आख़िरी मोर्चे में परमवीर मेजर शैतान सिंह भाटी के दुस्साहस और बलिदान से प्रभावित होकर कवि प्रदीप नें इस गीत की रचना की थी। २६ जनवरी १९६३ के दिन नई दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित गणतन्त्र दिवस समारोह में गायिका लता मंगेशकर नें इस गीत को पहली बार प्रस्तुत कर मौजूद जनता को मन्त्रमुग्ध कर दिया था। गीत का ऐसा असर हुआ था कि वहाँ पर मौजूद जनता बिल्कुल शान्त, हर एक की आँखें नम, यहाँ तक कि पण्डित नेहरू गीत के समाप्त होने पर मंच में आकर अपनी आँखें पोंछते हुए लता से कहा, "बेटी, तूने मुझे रुला दिया"। उसी समारोह में इस गीत की एक प्रति (साउण्डट्रैक स्पूल) पं नेहरू को भेंट में दी गई थी। प्रसिद्ध फ़िल्म पत्रिका 'स्क्रीन' में प्रकाशित लेख में इस गीत के बारे में लिखा गया था - "The lyrics of the song not only reflected Kavi Pradeep's sentiments but his nationalistic thinking of the country at large. With singer Lata Mangeshkar and composer C Ramchandra, he brought tears to every eye including Nehru's."

सुनने में आता है कि इस गीत से जुड़े हर कलाकार - गायक-वृंद, म्युज़िशियन्स, संगीतकार, रेकॉर्डिंग् स्टुडियो, साउण्ड रेकॉर्डिस्ट - सभी ने इस गीत से मिलने वाली रॉयल्टी का एक-एक अंश 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करवा दी थी। जहाँ इस गीत के लिए गायिका लता मंगेशकर नें अपार शोहरत हासिल की, कवि प्रदीप की तरफ़ लोगों का ध्यान कम ही गया। वैसे कवि प्रदीप को इस गीत के रॉयल्टी संबंधी कई ऑफ़र मिले, पर इस सच्चे देशभक्त नें इस गीत से कभी पैसा कमाना नहीं चाहा। यह तो उनकी एक श्रद्धांजली थी इस देश के वीर सपूतों के नाम, फिर इस गीत के लिए पैसे कैसे ले सकते थे? अत: उन्होंने इस गीत से मिलने वाली पूरी रॉयल्टी 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने के लिए Saregama HMV को लिखित निर्देश दिया। पर अफ़सोस की बात कि इस कंपनी नें रॉयल्टी की इस राशि को 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में कभी जमा नहीं करवाया। बरसों बरस बाद, २५ अगस्त २००५ के दिन, बॉम्बे हाइ कोर्ट नें HMV को सख़्त निर्देश दिया १० लाख रुपये ऐरीयर के रूप में 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने का। उधर लता मंगेशकर नें आज से कुछ ही वर्ष पहले एक कॉन्सर्ट में सार्वजनिक रूप से कवि प्रदीप का इस गीत के लिए आभार प्रकट किया, और उन्होंने भी यह कबूल किया कि जिस गीत नें उन्हें अपार शोहरत दिलाई, उसके गीतकार को नज़रन्दाज़ कर दिया गया। कवि प्रदीप का सम्मान करते हुए लता जी नें उन्हें १ लाख रुपये की राशी प्रदान की। उस समय के प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपयी नें भी कवि प्रदीप को मुंबई के मलाड में आयोजित एक कार्यक्रम में सम्मानित किया।

अब आते हैं इस गीत के बनने की कहानी पर जो विवादों से घिरी रही। उन दिनों किसी मनमुटाव या व्यक्तिगत कारणों से लता मंगेशकर और सी. रामचन्द्र साथ में काम नहीं कर रहे थे। ऐसे में जब कवि प्रदीप नें "ऐ मेरे वतन..." की रचना की और सी. रामचन्द्र को सुनाया, तो अन्ना नें इस गीत का रिहर्सल आशा भोसले से करवानी शुरु कर दी। प्रदीप को इस बात का पता नहीं था। अब यहाँ से इस कहानी के दो रुख़ सुनने में आते हैं। पहली धारणा यह है कि जब कवि प्रदीप को पता चला कि अन्ना गाने का रिहर्सल आशा से करवा रहे हैं, तब उन्होंने यह साफ़ कह दिया कि वो यह गाना तभी देंगे अगर लता गायेंगी तो (यह बात लता नें साक्षात्कार में भी बताया है)। और दूसरी धारणा यह कहती है कि जब लता को पता चला कि दिल्ली में पंडित नेहरू के सामने गाये जाने वाले गीत को आशा गा रही है, तो सी. रामचन्द्र से अपनी अन-बन को भुला कर प्रदीप के ज़रिये उन्हें ख़बर भिजवाया कि इस गीत को वो गाना चाहती हैं। और क्योंकि प्रदीप भी यही चाहते थे और अन्ना भी मन ही मन लता को ही पसन्द करते थे, इस तरह से लता इस गीत से जुड़ गईं। अब इन दोनों धारणाओं को एक कर दिया जाये तो निश्कर्ष यही निकलता है कि लता के लिए "ऐ मेरे वतन..." का मार्ग खुलने लगा। क्योंकि आशा को इस गीत का ऑफ़र दिया जा चुका था और वो इसका रिहर्सल भी कर रही थीं, प्रदीप और अन्ना नें यह तय किया कि इसे लता और आशा, दोनों की युगल आवाज़ों में प्रस्तुत किया जाए। लेकिन रहस्यमय तरीक़े से आशा का पत्ता साफ़ कर दिया गया और यह गीत लता का एकल गीत बन गया। आशा को दरकिनार करने के पीछे किसका हाथ था, यह जाने बिना यहाँ टिप्पणी करना सही नहीं, पर समझदारों के लिए इसका अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं। जो भी हुआ आशा के साथ, अच्छा नहीं हुआ। यह आशा भोसले की महानता ही कहेंगे कि उन्होंने इस गीत को न गा पाने का मलाल अपने दिल में दबाये तो रखा पर कभी किसी के ख़िलाफ़ उंगली भी नहीं उठाई। पारिवारिक कारणों से वो मंगेशकर परिवार से अलग-थलग तो हो ही चुकी थीं, इस घटना के बाद आशा अपनी बड़ी बहन से और भी ज़्यादा दूर चली गईं।

"ऐ मेरे वतन के लोगों" के बनने की कहानी जितनी विवादास्पद रही, आगे चलकर भी विवाद ख़त्म नहीं हुआ। ७० के दशक में बम्बई के ब्रेबोर्ण स्टेडियम में आयोजित एक शो में लता मंगेशकर इस गीत को गाने वाली थीं। उन्हें और इस गीत की भूमिका देने के लिए मंच पर मौजूद थे दिलीप कुमार। अपनी ड्रामाई अंदाज़ में उन्होंणे इस गीत के बारे में बताना शुरु किया। हालाँकि यह गीत किसी तारूफ़ का मोहताज नहीं, फिर भी दिलीप साहब नें इस गीत के बनने की कहानी, कवि प्रदीप के बारे में, पंडित नेहरू के रोने के बारे में बताया जहाँ वो ख़ुद भी मौजूद थे १९६३ के उस जलसे में। उन्होंने इस गीत के बारे में सबकुछ बताया सिवाय इसके संगीतकार सी. रामचन्द्र के बारे में। दिलीप कुमार की परिचित कूटनीति का यह एक उदाहरण था। बैकस्टेज पर जब वो आये तो वहाँ सी. रामचन्द्र खड़े थे और उन्होंने ग़ुस्से से पूछा कि उन्होंने उनका नाम क्यों नहीं लिया? दिलीप कुमार अपनी मासूमियत बरक़रार रखते हुए कहा कि उन्हें यह मालूम ही नहीं था कि अन्ना नें इस गीत की धुन बनाई है। अन्ना नें कहा, "झूठ मत बोलो यूसुफ़! तुम्हे अच्छी तरह पता है कि मैंने इस गीत को कम्पोज़ किया है। तुम्हे ज़रूर उस औरत (लता) नें कहा होगा!" दिलीप कुमार का जवाब था, "कोई भी दिलीप कुमार को टर्म्स डिक्टेट नहीं कर सकता"। अन्ना का तुरन्त जवाब था, "वो दिन गए यूसुफ़। एक समय था जब सी. रामचन्द्र को भी टर्म्स डिक्टेट करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता था। अब दोनों को ही डिक्टेट करते हैं।"

चाहे इस गीत के साथ कितनी भी विवाद, कितने भी मनमुटाव जुड़े रहे हों, सच्चाई यही है कि यह भारत के सर्वश्रेष्ठ १० देशभक्ति गीतों में एक है, और आज भी इसे सुनते हैं तो कलेजा चीर के रख देता है।


"ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, आपको यह स्तंभ कैसा लग रहा है, ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में, और अगर किसी ख़ास गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तो हमें ज़रूर सूचित कीजिएगा। अब अनुमति दीजिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, फिर मुलाक़ात होगी अगले सप्ताह, नमस्कार!

4 टिप्‍पणियां:

अनाम ने कहा…

wakai...ajeeb hai, asha ke saath jo bhi hua durbhagpoorn tha....par in kahaniyon se hum andaaza laga sakte hain ki film industry men kis had tak pakshpaat hota hai...

Sujoy Chatterjee ने कहा…

sahi kahaa aapne

Sujoy

कृष्णमोहन ने कहा…

गीत से जुड़े तथ्य बेहद रोचक हैं।

इन्दु पुरी ने कहा…

बेशक गाना अच्छा है और यह किस्सा हम बचपन से सुन रहे हैं जरूर सच रहा होगा.
रोंगटे खड़े कर देता है यह गाना.आज भी लेडीज़ क्लब के इन दो खास दिनों के सेलिब्रेशन मे मैं यह गाना जरूर गाती हूँ यानी साल मे कम से कम दो बार.

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