Skip to main content

छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम...

वन्देमातरम्गीत के रचनाकार 
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय 

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में बलिदानी क्रान्तिकारियों और आन्दोलनकारियों के हम सदैव ऋणी रहेंगे, परन्तु  इस दौर में कलम के सिपाहियों का योगदान भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम कुछ ऐसे कवियों और शायरों का स्मरण करने जा रहे हैं, जिनकी कलम ने तलवार का रूप धारण कर ब्रिटिश हुकूमत के छक्के छुड़ा दिये। इन गीतों के उग्र तेवर से भयभीत होकर तत्कालीन सरकार ने इन्हें प्रतिबन्धित तक कर दिया।




स्वरगोष्ठी – ५४ में आज – गणतन्त्र दिवस विशेषांक

स्वतन्त्रता संग्राम के प्रतिबन्धित गीतों पर एक चर्चा

आज गणतन्त्र दिवस के अवसर पर ‘स्वरगोष्ठी’ के इस विशेष अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके बीच उपस्थित हूँ। मित्रों, आज हम आपसे किसी फिल्म संगीत, राग, ताल या किसी वरिष्ठ कलासाधक पर चर्चा नहीं, बल्कि कुछ ऐसे दुर्लभ गीतों पर चर्चा करेंगे, जिन्हें भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान लिखे और गाये गए। इन गीतों के रचनाकारों ने कलम को तलवार बना कर गीतों से जनमानस को उद्वेलित कर दिया। आज की गोष्ठी में हम ऐसे ही कुछ गीतों पर चर्चा करेंगे।

वर्ष १९९७ में पूरे देश में स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती मनाई गई थी। इस विशेष अवसर के लिए राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगठन ‘संस्कार भारती’ ने मुझे स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान जब्तशुदा,प्रतिबन्धित गीतों पर शोध का दायित्व सौंपा था। लगभग एक वर्ष के दौरान मैंने ऐसे साढ़े तीन सौ कविताओं और गीतों का संग्रह किया था। इनमें से अधिकतर कविता के रूप में हैं। लगभग ७०-७५ रचनाएँ लोकगीत के रूप में और लगभग ५० गीत विधिवत छन्दबद्ध हैं। इस संकलन में एक ऐसा भी गीत है जिसकी रचना १८५७ में की गई थी। १८५७ के प्रथम क्रान्ति के सेनानियों में एक प्रमुख नाम अज़ीमुल्ला खाँ का है। ये अज़ीमुल्ला खाँ नाना साहब पेशवा के वकील थे। इस क्रान्ति की पूरी योजना इन्हीं की बनाई हुई थी। १८५७ क्रान्ति के दौरान अज़ीमुल्ला खाँ ने ‘पयाम-ए-आज़ादी’ नामक पत्र निकाला। इस पत्र में उन्हीं का रचा एक झण्डा गीत प्रकाशित हुआ था, जिसकी आरम्भिक पंक्तियाँ हैं- ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा...’। क्रान्तिकारी अखबार में यह गीत प्रकाशित होते ही स्वतन्त्रता सेनानियों को एक नया हथियार मिल गया और अंग्रेजों की नींद हराम हो गई। इस गीत में एक ओर जहाँ जनचेतना जगाने की शक्ति थी, वहीं अंग्रेजों को दी गई सीधी चुनौती भी। भयभीत होकर तत्कालीन हुकूमत ने गीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया। जिसके पास इस अखबार की प्रति मिलती या जो कोई भी इस गीत को गाते-गुनगुनाते पाया जाता उसे कठोर यातनाएँ दी जाती थी। आइए, आज हम आपको स्वतन्त्रता संग्राम का यही प्रतिबन्धित गीत सुनवाते हैं।

प्रतिबन्धित गीत : ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा...’ : रचना – क्रान्तिवीर अज़ीमुल्ला खाँ


उन्नीसवीं शताब्दी का एक और बेहद लोकप्रिय किन्तु प्रतिबन्धित गीत रहा है, ‘वन्देमातरम्’। इस कालजयी गीत की रचना १८७५ में सुप्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने की थी। १८८२ में जब उनके उपन्यास ‘आनन्दमठ’ का प्रकाशन हुआ, तब यह गीत उसमें शामिल किया गया था। यह उपन्यास अंग्रेज़ शासकों के शोषण और अकाल जैसे प्रकृतिक प्रकोप से मर रही जनता को जागृत करने के लिए अचानक उठ खड़े संन्यासी विद्रोह पर आधारित है।‘आनन्दमठ’ उपन्यास में यह गीत भवानन्द नामक संन्यासी ने गाया है। ‘वन्देमातरम्’ गीत के प्रकाशन के बाद बंगाल में आयोजित होने वाले स्वतन्त्रता आन्दोलनों में गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया कि तत्कालीन सरकार भयभीत हो उठी। १८९६ में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया, जिसे यदुनाथ भट्टाचार्य ने संगीतबद्ध किया था। १९०१ में कलकत्ता में ही हुए एक अन्य अधिवेशन में चरणदास ने और १९०५ के बनारस अधिवेशन में सरलादेवी चौधरानी ने यह गीत गाया। अब तक ‘वन्देमातरम्’गीत मात्र एक नारा नहीं बल्कि मंत्र बन चुका था। इसका उच्चारण करते हुए स्वतन्त्रता सेनानी लाठी, गोली सह लेते। इस मंत्र का उच्चारण करते हुए अनेक बलिदानी हँसते हुए फाँसी पर झूल गए। इस गीत की शक्ति से घबरा कर ब्रिटिश सरकार ने अन्ततः इसे प्रतिबन्धित कर दिया। प्रतिबन्ध लगते ही कवियों और गीतकारों ने गीत को जीवित रखने का एक दूसरा रास्ता अपनाया। इन्होने ‘वन्देमातरम्’ की प्रशस्ति में एक छन्द विशेष में गीत-रचना शुरू कर दिया। १९२९ में देहारादून के अभय प्रेस से ‘चिंगारी’ नामक गीत संग्रह प्रकाशित हुआ था, जिसमें विश्वनाथ शर्मा का गीत ‘कौम के खादिम की है जागीर वन्देमातरम...’ शामिल था। इससे पूर्व इसी छन्द में पण्डित कन्हैयालाल दीक्षित ‘इन्द्र’ ने ‘वन्देमातरम्’ पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के बाद गीत लिखा था- ‘छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्...’। इसके अलावा शोध के दौरान मुझे इसी छन्द में कुछ ऐसे गीत मिले थे, जिनके रचनाकारों के नाम अज्ञात रहे। आगे चल कर ये सभी गीत भी प्रतिबन्धित हुए। अब आप सुनिए, ‘वन्देमातरम्’ गीत की प्रशस्ति में रचे गएप्रतिबन्धित गीतों में से एक-एक अन्तरे को मिला कर प्रस्तुत यह गीत-

गीत - ‘छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्...’ : रचना - विश्वनाथ शर्मा,कन्हैयालाल दीक्षित एवं दो अज्ञात गीतकार


तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद बंकिम बाबू की यह कालजयी रचना क्रान्तिकारियों के साथ-साथ अहिंसक आन्दोलनकारियों का भी मंत्र बना हुआ था। इस मंत्र का प्रयोग विभिन्न आन्दोलनों के अलावा अन्य महत्त्वपूर्ण अवसरों पर भी किया जाता रहा। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस अखबार का प्रकाशन आरम्भ किया था, उसका नाम ‘वन्देमातरम्’ रखा गया। अंग्रेजों की गोली से घायल होकर दम तोड़ने वाली मातंगिनी हाज़रा ने मरते समय ‘वन्देमातरम्’ का ही उदघोष किया था। १९०७ में मैडम भीखाजी कामा ने स्टुट्गार्ट, जर्मनी में जो तिरंगा झण्डा फहराया,उसके मध्य में ‘वन्देमातरम्’ शब्द अंकित था। आर्य प्रिंटिंग प्रेस, लाहौर और भारतीय प्रेस,देहरादून से १९२९ में प्रकाशित पुस्तक ‘क्रान्ति गीतांजलि’ का पहला गीत ‘वन्देमातरम्’ था, जिसेब्रिटिश सरकार ने प्रतिबन्धित कर दिया था।

आज़ादी के बाद बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय रचित ‘वन्देमातरम्’ गीत के प्रारम्भिक दो अन्तरों को संविधान सभा ने राष्ट्रगान ‘जन गण मन...’ के समतुल्य मान्यता दी। २४जनवरी, १९५० को डॉ.राजेन्द्रप्रसाद ने संविधान सभा में निम्नलिखित प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था। The composition consisting of words and music known as ‘Jan Gana Mana…’ is the Natonal Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song ‘Vandemataram…’, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with ‘Jan Gana Mana…’ and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)
1907 में मैडम भीखाजी कामा द्वारा
स्टुट्गार्ट
, जर्मनी में फहराया गया झण्डा

हमारे संविधान ने आज हमें ‘वन्देमातरम्’ गीत गाने की आज़ादी दी है। विधानसभा और लोकसभा के सत्रों का आरम्भ ‘वन्देमातरम्’ गायन से ही होता है। आकाशवाणी केन्द्रों की पहली सभा का आरम्भ इसी गीत से होता है। १५अगस्त, १९४७ को देश के रेडियो केन्द्रो का आरम्भ सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में प्रस्तुत ‘वन्देमातरम्’ के स्वर में किये गए सजीव प्रसारण से हुआ था। पण्डित जी ने गीत के सभी अन्तरे राग ‘देस’ में निबद्ध कर प्रस्तुत किया था। लीजिये आप भी सुनिए ‘वन्देमातरम्’ गीत का यह दुर्लभ संस्करण- और इसी के साथ अब हम आज के इस विशेष अंक को यहीं विराम देते हैं।

‘वन्देमातरम...’ : स्वर – पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर : राग – देस


आपकी बात
‘स्वरगोष्ठी’ में संस्कार गीत श्रृंखला पर हमारे एक पाठक Shri Dockhem Singh ने अपने २२ दिसम्बर के सन्देश में लिखा है- Can you give live, if possible from Aladin langa, Noor mohamad langa sumer mohamad langa presentation. I used to hear in childhood on akashvani, jodhpur, now missing , thanks. श्री सिंह की फरमाइश का सम्मान करते हुए हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि स्वरगोष्ठी के भावी किसी अंक में राजस्थान के लंगा जाति की इस लोक संगीत शैली को अवश्य प्रस्तुत करेंगे।
इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सब के बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं। अगले रविवार को हमारी-आपकी सांगीतिक बैठक पुनः आयोजित होगी।

झरोखा अगले अंक का
१९६३ में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ का एक गीत है- ‘पुछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...’, जिसे मन्ना डे के स्वर में अपार लोकप्रियता मिली थी। यह गीत जिस राग पर आधारित है, अगले अंक में हम उसी राग पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही विख्यात वायलिन वादक पण्डित वी.जी. जोग के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी चर्चा करेंगे, जिनकी पुण्यतिथि ३१ जनवरी को है।


एक सवाल आपसे
यदि आप फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ के गीत- ‘पुछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...’,का राग पहचान कर हमें उसका नाम लिख भेजेंगे तो अगले अंक में हम आपको विजेता घोषित करेंगे। राग का नाम हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर लिख भेजें। 

कृष्णमोहन मिश्र 

Comments

Sajeev said…
अनमोल प्रस्तुति, बहुत आभार
vandan gupta said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति ……रस्म निभाने को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ।
Smart Indian said…
बहुत सुन्दर! आभार!

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT

स्वरगोष्ठी – 214 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया