मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

कैसे कोई जिये, ज़हर है ज़िंदगी... कुछ और ही रंग होता है गीता दत्त की आवाज़ में छुपे दर्द का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 291

गीता दत्त और शैलेन्द्र को समर्पित दो लघु शृंखलाओं के बाद आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को चौथी बार के लिए दे रहे हैं फ़रमाइशी रंग। यानी कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड पहेली प्रतियोगिता' के चौथे विजेयता पराग सांकला जी के फ़रमाइशी गीतों को सुनने का वक़्त आख़िर आ ही गया है। तो आज से अगले पाँच दिनों तक इस महफ़िल को रोशन करेंगे पराग जी के पाँच मनचाहे गीत। हम सभी जानते हैं कि पराग जी गीता दत्त जी के परम भक्त हैं, और गीता जी के गीतों और उनसे जुड़ी बातों के प्रचार प्रसार में उन्होने एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और लगातार उस ओर उनका प्रयास जारी है। तो ऐसे में अगर हम उनके पसंद का पहला गाना गीता जी की आवाज़ में न सुनवाएँ तो ग़लत बात हो जाएगी। तो चलिए आज सुना जाए गीता जी की आवाज़ में एक और दर्द भरा नग़मा। पता नहीं क्यों जब भी हम गीता जी के गाए ये दर्द भरे और ग़मगीन गानें सुनते हैं तो अक्सर उन गीतों के साथ हम उनकी निजी ज़िंदगी को भी जोड़ देते हैं। उनकी व्यक्तिगत जीवन में जो ग़मों और तक़लीफ़ों के तूफ़ान आए थे, वो उनके गाए तमाम गीतों में भी झलकते हैं। और सब से ज़्यादा दुखद बात यह है कि जब उन्होने इन गीतों को गाया था, उस वक़्त उनकी ज़िंदगी में ग़म का कोई साया भी नहीं था। लेकिन बाद में ऐसा लगा कि जैसे ज़िंदगी एक एक कर उनके गाए तमाम दुख भरे गीतों को उन्ही के उपर लागू करने के लिए जी जान कोशिश में जुटी हुई है। गीता जी के जीवन में जो ज़हर घुला, उसी ज़हर की करवाहट है आज के प्रस्तुत गीत में जो है "कैसे कोई जिये, ज़हर है ज़िंदगी"। १९५५ की फ़िल्म 'बादबान' का यह गीत लिखा था इंदीवर ने और संगीतकार थे तिमिर बरन और एस. के. पाल।

बॊम्बे टॊकीज़, जिसकी छत्रछाया में ३० और ४० के दशकों में एक से एक लाजवाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ, फ़िल्म 'बादबान' से इसने अपनी अंतिम सांस ली। यानी कि 'बादबान' बॊम्बे टॊकीज़ की अंतिम फ़िल्म थी। दादामुनि अशोक कुमार ने बहुत कोशिशें की इस कंपनी को आर्थिक संकट से बचाने की, लेकिन उनकी सारी कोशिशें नाकामयाब रही कंपनी में चल रही अंदरुनी राजनीतियों की वजह से। जहाँ किसी समय बॊम्बे टॊकीज़ हुआ करती थी, मलाड का वह इलाका आज एक औद्योगिक इलाका बन गया है। ख़ैर, 'बादबान' का निर्देशन किया था फणी मजुमदार ने और मुख्य भूमिकाओं में थे अशोक कुमार, लीला चिटनिस और देव आनंद। इस फ़िल्म के संगीतकार तिमिर बरन और एस. के. पाल, दोनों ही फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। तिमिर बरन के संगीत में सहगल साहब की आवाज़ में फ़िल्म 'देवदास' के गानों के तो क्या कहने! आज के इस प्रस्तुत गीत का एक और वर्ज़न है जिसे हेमन्त कुमार ने गाया है। फ़िल्मकार शक्ति सामंत, जिनके लिए फ़िल्म 'अमानुष' में इंदीवर साहब ने गानें लिखे थे, शक्ति दा ने एक बार बताया था कि इंदीवर साहब का लिखा हुआ जो गीत उन्हे सब से ज़्यादा पसंद है, वह है फ़िल्म 'बादबान' का यह गीत। और क्यों ना हो, इस गीत में है ही कुछ ऐसी ख़ास बात जो बिल्कुल दिल को छू कर जाता है। गीता जी वाले इस वर्ज़न में साज़ों की अगर बात करें तो पियानो ही मुख्य रूप से सुनाई देता है। जितना दर्दीला है सुर, उतना ही मीठा भी। और उस पर गीता जी की कलेजे को चीर कर रख देने वाली गायकी। कुल मिला कर फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने की एक बेशकीमती मोती है यह गीत। तो आइए हम और आप, सभी मिलकर सुनते हैं पराग जी के पसंद का यह पहला गीत!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक सस्पेंस थ्रिल्लर फिल्म का है ये गीत.
२. इस फिल्म में नायिका के लिए लता ने पार्श्वगायन किया तो अभिनेत्री विजयलक्ष्मी के लिए गीत की गायिका ने.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"सर".

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह इंदु जी एकदम सही जवाब....अवध जी पाबला जी और निर्मला जी....आभार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

2 टिप्‍पणियां:

indu puri ने कहा…

ghabaraa ke jo hm sr ko tkraaye to achchha ho
singer Rajkumari
film-- Mahal
ashok kumar ,madhubala

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

सुजोय, इस खूबसूरत गीत के लिए आभार!

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