Saturday, November 13, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - जब खान साहब ने की हमारी हौंसला अफजाई

नमस्कार दोस्तों! स्वागत है एक बार फिर आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साप्ताहिक विशेषांक 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में। यह एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम वही छापते हैं जो आप हमें ईमेल के माध्यम से लिख भेजते हैं। आप में से कुछ अपने फ़रमाइशी नग़में हमें लिख भेजते हैं तो कुछ किसी गीत से जुड़ी अपनी यादें। कुछ हमरे दोस्त ऐसे भी हैं जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' और 'आवाज़' की प्रस्तुतियों से इतने प्रभावित हैं कि 'हिंदयुग्म' के इस प्रयास को बढ़ावा देने हेतु अंशदान भी करने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं। हम आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। जिस किसी तरह से भी आप हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते हैं, हम उसे अपना सौभाग्य समाझते हैं। आप में से कुछ दोस्त हमारी लघु शृंखलाओं की भी समय समय पर तारीफ़ करते हैं, जिससे यकीन मानिए, हमें और अच्छे और अनूठे शृंखलाओं को प्रस्तुत करने की उर्जा मिलती रहती है। ऐसे ही एक हमारे नियमित पाठक व श्रोता हैं ख़ानसाब ख़ान। ख़ान साहब अक्सर हमें ईमेल के द्वारा इन शृंखलाओं के बारे में अपने विचार लिख भेजते हैं। पिछले दिनों ख़ान साहब ने लता जी के गाए दुर्लभ गीतों की शृंखला पर अपने विचार प्रस्तुत किए एक ईमेल के बहाने, आइए आज उन्हीं का वह ईमेल पेश किया जाए, और उसके बाद हम लता जी का गाया एक और दुर्लभ गीत आपको सुनवाएँगे। ये रहा ख़ान साहब का ईमेल...


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आदाब,
लता जी के दुर्लभ दस गीतों में बहुत जान थी, भले ही वक़्त ने इनमें साँसें सलामत ना रखी हो। लता जी के इन शुरुआती नग़मों से हम बिल्कुल ही अंजान थे। मगर आपके साथ इन गीतों को हमने केवल सुना और पढ़ा ही नहीं, बल्कि इन गीतों को और उस दौर को हमने जीया भी है। आप अपनी प्रस्तुति इस तरह देते हैं कि हमको ऐसा लगता है कि मानो हम उस दौर में चले गये हैं और उन लम्हों को जाने जी रहे हैं। गीतों के साथ जुड़ी जानकारियाँ पढ़कर ही गीत सुनने का मज़ा चार गुणा बढ़ जाता है। आपके इस प्रयासों का हम जितना भी शुक्रिया अदा करें, हमारा दिल नहीं भरता है। क्योंकि हमें लगता है कि आपके लिए 'थैंक्स' लफ़्ज़ बहुत ही छोटा है।

और साथ में श्री अजय देशपाण्डे जी का भी बहुत बहुत धन्यवाद जिनके सहयोग से यह सफ़र शुरु होकर अपने मुकाम तक पहुँचा। और आपने बिल्कुल सही कहा था कि लता जी की तारीफ़ में अब और कुछ कहना वक़्त की बरबादी ही होगी, क्योंकि लता जी वक़्त से बहुत बहुत आगे निकल गईं हैं। वाक़ई मैं उस दौर के बेहतरीन नग़मों की वजह से ही हिंदुस्तानी संगीत की नीव इतनी मज़बूत हो गई है। आज भी जो लोग हिंदुस्तानी संगीत को पसंद करते हैं और इसको सुनते हैं, उनमें से ज़्यादातर उस बीते दौर के ही संगीत को सुनना पसंद करते हैं, क्योंकि उस संगीत में एक सुकून है, दिल का आराम है, रातों का चैन है, दिन का क़रार है, हज़ारों जज़्बात हैं, लाखों अहसास हैं, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि उस दौर का हर गीत आज भी हर एक आम आदमी को ख़ुद से जुड़ा हुआ महसूस होता है।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद!
ख़ुदा हाफ़िज़!

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ख़ान साहब, आपके इस ईमेल के जवाब में हम भी अगर 'शुक्रिया' कहेंगे तो वह बहुत ही छोटा सुनाई देगा। आपने पुराने दौर के गीत-संगीत की शान में जो कुछ भी लिखा है, उसका एक एक शब्द सही है। क्योंकि आपके ईमेल में 'लता के दुर्लभ दस' शृंखला का ज़िक्र है, तो क्यों ना आज यहाँ पर लता जी का ही एक और दुर्लभ गीत सुना और सुनवाया जाए। १९४८ में अनिल बिस्वास के संगीत से सजी एक फ़िल्म आई थी 'अनोखा प्यार'। दिलीप कुमार, नरगिस और नलिनी जयवंत फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे। अनिल दा ने मुकेश की आवाज़ चुनी दिलीप साहब के लिए, जब कि नरगिस के लिए मीना कपूर और नलिनी जयवंत के लिए लता मंगेशकर को चुना। जैसा कि आप जानते हैं कि उस ज़माने में गीत दो बार रेकॊर्ड होते थे, एक बार फ़िल्म के लिए और दूसरी बार ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड के लिए, तो इस फ़िल्म के साथ हुआ युं तो फ़िल्म के पर्दे पर तो नरगिस के लिए मीना कपूर की ही आवाज़ सुनाई दी, लेकिन ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड पर सारे गानें लता जी की आवाज़ में उतारे गये। ऐसा कहा जाता है कि मीना कपूर बीमार हो गईं थीं जब ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड के लिए गानें रेकॊर्ड होने थे, इसलिए अनिल दा ने लता जी से गवा लिया। इस फ़िल्म में एक फ़ीमेल डुएट था जिसे पर्दे पर लता और मीना कपूर ने गाया था। लेकिन जैसा कि हमने कहा, मीना कपूर के बीमार हो जाने की वजह से, ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड के लिए यह गीत लता जी के साथ ईरा नागरथ से गवा लिया गया। गीत के बोल हैं "ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है, मैं मर रही हूँ जिन पर उनको ख़बर नहीं है"।

दोस्तों, ये वहीं ईरा नागरथ हैं जो पहले गायिका ईरा मोइत्र थीं। संगीतकार रोशन से शादी के बाद ये ईरा नागरथ बन गईं। यानी कि राकेश और राजेश रोशन की माँ, और ॠतिक रोशन की दादी हैं गायिका ईरा नागरथ। तो आइए इस दुर्लभ फ़ीमेल डुएट को सुना जाए जिसे लिखा है शम्स अज़ीमाबादी ने।
पहले फ़िल्म वाला वर्ज़न सुनिए लता और मीना कपूर से....

गीत - ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है (लता, मीना कपूर - फ़िल्म वर्ज़न)



और अब सुनिए इस गीत का ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड वर्ज़न लता और ईरा नागरथ की आवाज़ों में...

गीत - ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है (लता, ईरा नागरथ - ग्रामोफ़ोन वर्ज़न)



दोस्तों, हमें आशा है कि इस भूले बिसरे गीत को बहुत अरसे के बाद सुन कर आपको अच्छा लगा होगा। लता जी की आवाज़ के साथ साथ मीना कपूर और ईरा नागरथ जैसी कमचर्चित गायिकाओं की आवाज़ों को सुन कर एक अलग ही अनुभव हुआ होगा। तो आज के लिए बस इतना ही, रविवार की शाम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमीत कड़ी में आप सभी से फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए आज्ञा दीजिए, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

2 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मजा आ गया...

AVADH said...

बहुत अच्छे. वाकई मज़ा आ गया.
आपके बताने पर सुनाने में सचमुच मीना कपूर जी की आवाज़ में कुछ कमजोरी (बीमारी) की झलक लगी.
ज्ञातव्य है कि मीना कपूर जी अनिल दा की धर्मपत्नी थीं.
अवध लाल

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