Sunday, November 14, 2010

अम्बर की एक पाक सुराही....अमृता प्रीतम की कलम का जादू और आशा के स्वरों की खुशबू

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 526/2010/226

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज रविवार की शाम, यानी कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई सप्ताह का शुभारंभ। पिछले हफ़्ते हमने शुरु की थी लघु शृंखला 'दिल की कलम से', जिसके तहत हिंदी साहित्यकारों द्वारा लिखे फ़िल्मी गीत हम आपको सुनवा रहे हैं। अब तक हमने इस शृंखला में जिन साहित्यकारों को शामिल किया है, वो हैं पंडित नरेन्द्र शर्मा, वीरेन्द्र मिश्र, गोपालसिंह नेपाली, बालकवि बैरागी, और गोपालदास नीरज। आज हम जिस साहित्यकार की बात करने जा रहे हैं, वो हैं मशहूर लेखिका व कवयित्री अमृता प्रीतम। मानव मन की जो अभिव्यक्ति होती है, उन्हें वर्णन करना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन अमृता प्रीतम द्वारा लिखे साहित्य को अगर हम ध्यान से पढ़ें तो पायेंगे कि किस सहजता से उन्होंने बड़ी से बड़ी बात कह डाली है, जिन्हें हम केवल महसूस ही कर सकते हैं। उनकी लेखनी तो जैसे फूल पर ठहरी हुई ओस की बूंदें हैं। ३१ अगस्त १९१९ को जन्मीं अमृता प्रीतम पंजाब की पहली मशहूर कवयित्री और लेखिका हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वो पहली महिला हैं और राष्ट्रपति से पद्मश्री प्राप्त करने वालीं प्रथम पंजाबी लेखिका। युं तो उन्होंने पंजाबी में ही अधिकतर लिखा है, पर हिंदी साहित्य में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई हैं। १९३५ में अमृता कौर ने प्रीतम सिंह से विवाह किया, जो लाहोर के विख्यात अनारकली बाज़ार के एक नामी व्यापारी थे। १९६० में अमृता प्रीतम अपने पति को छोड़ कर साहिर लुधियानवी के पास चली गईं। उनकी साहिर के साथ इस प्रेम कहानी को उन्होंने अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में व्यक्त की हैं। जब साहिर साहब की ज़िंदगी में एक दूसरी औरत ने प्रवेश कर लिया, तब अमृता साहिर को छोड़ नामचीन आर्टिस्ट और लेखक इमरोज़ के पास चली गईं। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी ४० साल वो इमरोज़ के साथ गुज़ारीं, जिन्होंने अमृता के ज़्यादातर किताबों के कवर डिज़ाइन किए। अमृता प्रीतम और इमरोज़ का युगल-जीवन एक किताब का विषय भी बना, अमृता इमरोज़: ए लव स्टोरी। अमृता प्रीतम ३१ अक्तुबर २००५ को एक लम्बी बीमारी के बाद इस दुनिया से चल बसीं।

हिंदी फ़िल्म 'कादम्बरी' में अमृता प्रीतम ने एक गीत लिखा था, "अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठाकर"। कहते हैं सौ सुन्हार की, और एक लुहार की, यही बात हम अमृता प्रीतम के लिए भी कह सकते हैं। बस उनका लिखा यह एक गीत दूसरे गीतकारों के लिखे कई कई गीतों पर साफ़ साफ़ भारी पड़ता है। आज हम इसी ख़ूबसूरत गीत को सुनेंगे, और बार बार सुनेंगे। 'कादम्बरी' १९७६ की एक समानांतर फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था मधुसुदन कुमार ने और निर्देशक थे एच. के. वर्मा। फ़िल्म में शबाना आज़्मी, विजय अरोड़ा, चांद उस्मानी, जीत उपेन्द्र, अपर्णा चौधरी प्रमुख ने अभिनय किया था। फ़िल्म में संगीत दिया था शास्त्रीय संगीत की मशहूर हस्ती उस्ताद विलायत ख़ान ने। इस फ़िल्म में आशा भोसले के अलावा अजीत सिंह ने भी गीत गाए हैं। 'कादम्बरी' तो व्यावसायिक दृष्टि से चली नहीं, लेकिन आज इस गीत की वजह से इस फ़िल्म का नाम लोगों के ज़हन में बाक़ी है। दोस्तों, जो गीत मुझे बेहद बेहद पसंद होते हैं, उनके बोलों को टंकित करने में मुझे अलग ही आनंद आता है। ऐसा करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं उस गीत को एक अलग ही अंदाज़ में जी रहा हूँ। लीजिए इस गीत के बोल ये लिख रहा हूँ -

अम्बर की एक पाक़ सुराही,
बादल का एक जाम उठाकर,
घूंट चांदनी पी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

कैसे इसका कर्ज़ चुकाएँ,
माँग के अपनी मौत के हाथों,
उमर की सूली सी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

अपना इसमें कुछ भी नहीं है,
दो दिल जलते उसकी अमानत,
उसको वही तो दी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

आशा भोसले ने क्या ख़ूब गाया है इस गीत को। इस आलेख को लिखते हुए जब मैं यह गीत सुन रहा हूँ तो आलेख के ख़त्म होने तक ध्यान आया कि इस गीत को मैं पिछले २० मिनट में ६ बार सुन चुका हूँ, फिर भी दिल नही भर रहा। आख़िर क्या ख़ास बात है इस गीत में? मुझे तो समझ नहीं आया। अगर आप बता सकें तो बताइएगा ज़रूर...



क्या आप जानते हैं...
कि उस्ताद विलायत ख़ान ने १९५१ की फ़िल्म 'मदहोश' का बैकग्राउण्ड म्युज़िक तैयार किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०७ /शृंखला ०३
ये है गीत का आरंभिक शेर-


अतिरिक्त सूत्र - रफ़ी साहब की आवाज़ है गीत में

सवाल १ - गीतकार कवि कौन है यहाँ - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्यामकान्त जी, अमित जी और बिट्टू जी आप तीनों को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

5 comments:

शरद तैलंग said...

kavi Pradeep

अल्पना वर्मा said...

सवाल ३ -answer- फिल्म का नाम - Jagriti (1954)

ShyamKant said...

Music Director- Hemant Kumar

RAJ SINH said...

kabhee kuchh bacha rahta hai hamare aane tak ?

ham laye hain...........

AVADH said...

जब हम खुद बाल्यावस्था में थे तब से आज तक लगभग ५५ वर्ष बाद भी ऐसा कभी नहीं हुआ कि गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस आदि विशेष दिनों पर यह गीत न बजा हो.
यह कालजयी गीत आज बाल दिवस के अवसर पर याद करने के लिए धन्यवाद.
आवाज़ की महफ़िल का हर सदस्य आज की पहेली में गलती नहीं कर सकता. सब उत्तर देनेवालों को बधाई.
अवध लाल

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