मंगलवार, 16 नवंबर 2010

जी जान से खेले सोहेल सेन आशुतोष के लिए इस बार और साथ मिला जावेद साहब की अनुभवी कलम का

ताज़ा सुर ताल 45/2010

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सजीव जी, आपको भी।

सजीव - आप सभी को मेरा भी नमस्कार और सुजॊय, तुम्हे भी। आज हम एक पीरियड फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं। आशुतोष गोवारिकर एक ऐसे फ़िल्मकार हैं जो पीरियड फ़िल्मों के निर्माण के लिए जाने जाते हैं। 'लगान' और 'जोधा अकबर' इस जौनर में आते हैं। और 'स्वदेस' में उन्होंने बहुत अच्छा संदेश पहुँचाया था इस देश के युवाओं को। और अब वो लेकर आ रहे हैं 'खेलें हम जी जान से'। आज इसी फ़िल्म और इसके गीत संगीत का ज़िक्र।

सुजॊय - मैंने सुना है कि इस फ़िल्म का पार्श्व बंगाल की सरज़मीन है और यह कहानी है आज़ादी के पहले की, आज़ादी के लड़ाई की। 'खेलें हम जी जान से' में मुख्य कलाकार हैं अभिषेक बच्चन, दीपिका पादुकोण, सिकंदर खेर, विशाखा सिंह, सम्राट मुखर्जी, मनिंदर सिंह, फ़ीरोज़ वाहिद ख़ान, श्रेयस पण्डित, अमीन ग़ाज़ी, आदि। जावेद अख़्तर के लिखे गीतों को धुनों में इस बार ए. आर. रहमान ने नहीं, बल्कि सोहैल सेन ने पिरोया है। जी हाँ, वही सोहैल सेन, जिन्होंने आशुतोष की पिछली फ़िल्म 'व्हाट्स योर राशी' में संगीत दिया था।

सजीव - हाँ, और आशुतोष साहब को इस बात के लिए दाद देनी ही पड़ेगी कि 'व्हाट्स योर राशी' के गीतों के ज़्यादा ना चलने के बावजूद सोहैल को इस फ़िल्म में संगीत देने का मौका दिया है। अभी कुछ ही देर में शायद हमें इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि आशुतोष का यह निर्णय कितना सही था। तो आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं सोहैल सेन की ही आवाज़ में।

गीत - ये देस है मेरा


सुजॊय - वाह! आशुतोष ने जैसे 'स्वदेस' के रहमान के "ये जो देस है तेरा" का ही पार्ट-२ बनाया है। लेकिन एक अलग ही अंदाज़ में और गायक - संगीतकार सोहैल सेन ने पूरी पूरी मौलिकता कायम रखा है।

सजीव - सचमुच एक सुरीली शुरुआत इस ऐल्बम की हुई है इस देशभक्ति गीत से। 'स्वदेस' के गीत में था "ये जो देस है तेरा", इसमें है "ये देस है मेरा"। केवल संगीत के लिहाज़ से ही नहीं, एक गायक के रूप में भी सोहैल ने इस गीत को बहुत ही अच्छा निभाया है। वैसे थोड़ा सा रहमान का स्टाइल नज़र आ तो रहा है। हो सकता है कि यह रहमान का नहीं बल्कि आशुतोष का स्टाइल हो, क्या पता! गीत के बोलों की बात की जाए तो जावेद साहब से हम ये तो उम्मीद रख ही सकते हैं। इस गीत के बोल, जैसे कि हमने सुना, हमारे देश के सारे अंधकार दूर करने के करता है, आज़ादी और ख़ुशियों की रोशनी इस देश में वापस आये।

सुजॊय - चलिए इस देशभक्ति के जस्बे को अपने अंदर समाहित कर हम अब बढ़ते हैं ऐल्बम के दूसरे गीत की तरफ़। यह है पामेला जैन और रंजिनी जोसे की युगल आवाज़ों में एक फ़ीमेल डुएट "नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता, कोई तो है मन में तेरे हमसे सखी ना छुपा"।

गीत - नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता


सुजॊय - वाह वाह वाह! मुझे इस गीत को सुनते हुए जितनी ख़ुशी हुई, उससे भी अधिक ताज्जुब हुआ यह देख कर कि बंगाल के लोकसंगीत का किस ख़ूबसूरती से इस्तेमाल इस नटखट चंचल गीत में हुआ है! यह धुन बंगाल के बाउल लोक संगीत की धुन है। एक तो संगीत संयोजन का कमाल, और उस धुन पर जावेद साहब ने किस ख़ूबसूरती से अपने शब्दों के मोतियों को पिरोया है! मैं बाक़ी के गीतों को सुने बग़ैर ही कह सकता हूँ कि यह गीत मेरा इस ऐल्बम का सबसे पसंदीदा गीत बना रहेगा।

सजीव - वाक़ई, बहुत दिनों के बाद इस तरह के बंगला के लोकशैली का गीत सुनने को मिला है। बस एक बात जो थोड़ी सी खटकती है, वह यह कि पामिला जैन और रंजिनी की आवाज़ों में ज़्यादा कॊन्ट्रस्ट नहीं है, जिसकी वजह से साफ़ साफ़ पता नहीं चलता कि कौन सी आवाज़ किसकी है, मेरा यह मानना है कि अगर दो आवाज़ें अलग क़िस्म के चुने जाते तो गीत का इम्पैक्ट और भी कई गुणा बढ़ जाता। लेकिन जो भी है, वाक़ई बहुत ही मीठा, सुरीला गीत है।

सुजॊय - इन दो गीतों को सुनने के बाद मेरी तो उम्मीदें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं इस ऐल्बम से, आइए जल्दी जल्दी तीसरा गाना सुनते हैं, मुझसे तो सब्र नहीं हो रहा।

गीत - खेलें हम जी जान से


सजीव - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना, और अब कि बार एक ऐसा गीत जो फ़िल्म के शीर्षक को सार्थक करे, फ़िल्म की कहानी को सार्थक करे, पूरी जोश के साथ 'सुरेश वाडकर आजीवासन म्युज़िक अकादमी' के बच्चों द्वारा गाये इस समूह गीत में हम 'लगान' के "बार बार हाँ, बोलो यार हाँ" गीत के साथ बहुत कुछ मिलता जुलता अनुभव कर सकते हैं।

सुजॊय - एक अलग तरह का गीत, पहले के दो गीतों से बिल्कुल अलग, कोरस और साज़ों का अच्छा तालमेल। संगीत संयोजन में भी सोहैल ने स्तरीय काम किया है। आइए अब एक नर्मो नाज़ुक रुमानीयत से लवरेज़ युगल गीत सुनते हैं सोहैल सेन और पामिला जैन की आवाज़ों में।

गीत - सपने सलौने


सजीव - इस गीत के अरेंजमेण्ट में भी हम बंगाल के संगीत की झलक पा सकते हैं। गीत के शब्द भी बहुत अच्छे हैं, जिसमें एक प्रेमी कह रहा है कि वो अपने प्यार के सपने और वादे पूरे करेगा लेकिन पहले अपनी देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही। और यही बात इस रोमांटिक डुएट की खासियत है।

सुजॊय - मुझे भी यह गीत पसंद आया, लेकिन मास लेवेल पर कितना कामयाब हो पाएगा कह नहीं सकते। ख़ैर, अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, अब कि बार "वंदेमातरम"। इसे भी एक ग्रूप ने गाया है, 'सिने सिंगर्स ऐसोसिएशन ग्रूप कोरस'। न जाने क्यों ए. आर. रहमान की थो़ड़ी बहुत छाप नज़र आती है इस गीत में भी।

गीत - वंदेमातरम


सजीव - इस "वंदेमातरम" की खासियत है कि संस्कृत के मूल गीत को हिंदी में अनुवाद कर इसे लिखा व रचा गया है। एक और देशभक्ति गीत इस तरह से फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध किया। और फ़िल्म के ट्रेलरों में इसी गीत को दिखाया जा रहा है। और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि फ़िल्म में इसे पार्श्वसंगीत के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा, जो कहानी या सीन को और भी ज़्यादा असरदार या भावुक बनाएगा।

सुजॊय - इस फ़िल्म में बस इतने ही गानें हैं, बाक़ी कुछ इन्स्ट्रुमेण्टल वर्ज़न हैं इन्हीं गीतों के, जैसे कि Long Live Chittagong, The Teenager's Whistle, Surjya's Sorrow, Vande Mataram, The Escape, तथा Revolutionary Comrades. आइए इनमें से कम से कम एक यहाँ पर सुन लेते है।

धुन - Revolutionary Comrades


सुजॊय - मज़ा आ गया आज सजीव जी। बहुत दिनों के बाद एक अच्छा ऐल्बम सुनने को मिला जिसे सुनकर दिल को बहुत ही सुकून और शांति मिली है। और जैसा कि मैंने पहले कहा था, अब भी मैं अपने उसी बात पर बरकरार रहते हुए यह ऐलान करता हूँ कि "नैन तेरे झुके झुके" ही मेरा फ़ेवरीट नंबर है इस फ़िल्म का। आशुतोष गिवारिकर, सोहैल सेन और जावेद अख़्तर को मेरी तरफ़ से "थम्प्स अप"!!! आपके क्या विचार हैं सजीव जी?

सजीव - देखिये सुजॉय, अक्सर हम कहते हैं कि पुराना संगीत बहुत अच्छा था, बात में सच्चाई भी नज़र आती है क्योंकि आज इतने सालों के बाद भी वो हमें मधुर लगते हैं, जानते हैं वजह क्या है ?....उन गीतों को, गीतकार, संगीतकार, निर्देशक, गायक और जितने भी साजिन्दे उससे जुड़े हुए हैं उन सब का भरपूर स्नेह मिलता था मतलब हर गीत को एक शिशु की तरह संवार कर सबके सामने लाया जाता था. अब मेकिंग में वो प्यार नहीं रहा सब कुछ आनन् फानन में होता है....मगर जब भी कोई काम दिल से होता है वो दिल तक अवश्य पहुँचता है, अभी हाल में गुज़ारिश के गीत भी इसी श्रेणी में आते हैं और अब इस फिल्म के गीतों को देखिये, इन्हें सुनकर पता लगता है कि इन पर कितनी मेहनत की गयी, इन्हें प्यार से संवारा गया है, दिल से संजोया गया है तभी तो देखिये दिल को छू पा रहे हैं, आशुतोष, सोहेल और जावेद भाई को इस शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई. मुझे तो सभी गीत बेहद पसंद आये पर शीर्षक गीत बेहद खास लगा उसके कोरस के चलते. इसे सुनकर सचमुच ४० वें दशक की एक युवा टीम सामने साकार हो जाती है.

सुजॊय - और आज की इस प्रस्तुति को समाप्त करने से पहले मैं 'ताज़ा सुर ताल' के अपने दोस्तों को यह बता दूँ कि अगले हफ़्ते से मैं इस स्तंभ का हिस्सा नहीं रहूँगा, कम से कम अगले कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए, लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हमारी मुलाक़ात युंही होती रहेगी। 'ताज़ा सुर ताल' के महफ़िल की शमा सजीव और विश्वदीपक युंही जलाते रहेंगे। इसी बात पर अब हमें आज के इस अंक को समाप्त करने की इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

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