Skip to main content

सजनवा बैरी हो गए हमार....शैलेन्द्र का दर्द पी गयी मुकेश की आवाज़, और चेहरा था राज कपूर का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 290

दोस्तों, यह शृंखला जो इन दिनों आप सुन रहे हैं वह है "शैलेन्द्र- आर.के.फ़िल्म्स के इतर भी"। यानी कि राज कपूर फ़िल्म्स के बाहर बनी फ़िल्मों में शैलेन्द्र जी के लिखे हुए गानें। लेकिन दोस्तों, जो हक़ीक़त है वह तो हक़ीक़त है, उसे ना हम झुटला सकते हैं और ना ही आप बदल सकते हैं। और हक़ीक़त यही है कि राज कपूर और शैलेन्द्र दो ऐसे नाम हैं जिन्हे एक दूसरे से जुदा नहीं किया जा सकता। सिर्फ़ कर्मक्षेत्र में ही नहीं, बल्कि यह आश्चर्य की ही बात है कि एक की पुण्यतिथि ही दूसरे का जन्म दिवस है। आज १४ दिसंबर, यानी कि शैलेन्द्र जी की पुण्य तिथि। १४ दिसंबर १९६६ के दिन शैलेन्द्र जी इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिए अलविदा कह गए थे, और १४ दिसंबर ही है राज कपूर साहब का जनमदिन। इसलिए आज इस विशेष शृंखला का समापन हम एक ऐसे गीत से कर रहे हैं जो आर.के.फ़िल्म्स की तो नहीं है, लेकिन इस फ़िल्म के साथ शैलेन्द्र और राज कपूर दोनों ही इस क़दर जुड़े हैं कि आज के दिन के लिए इससे बेहतर गीत नहीं हो सकता। और ख़ास कर इस फ़िल्म के जिस गीत को हमने चुना है वह तो बिल्कुल सटीक है आज के लिए। "सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग न बाँचे कोई, करमवा बैरी हो गए हमार"। 'तीसरी क़सम' शैलेन्द्र का एक सपना था, जिसे वो जीते थे। इस फ़िल्म को सेलुलॊयड पर लिखी हुई कविता कहा जाता है। इस फ़िल्म से जुड़ी तमाम बातें हम अपको पहले बता ही चुके हैं। ऐसा कहा जाता है कि शैलेन्द्र राज कपूर को एक अच्छे अभिनेता के रूप में ज़्यादा सम्मान करते थे, ना कि निर्देशक के रूप में। शायद इसीलिए उन्होने अपनी फ़िल्म 'तीसरी क़सम' के निर्देशन का भार बासु भट्टाचार्य को सौंपा। वैसे यह भी कहा जाता है कि बासु दा तो बस नाम के वास्ते निर्देशक रहे, यह फ़िल्म पूरी तरह से शैलेन्द्र की ही फ़िल्म थी। इस फ़िल्म ने अव्यवसायिक चरित्र वाले शैलेन्द्र को माली नुकसान करवाया, और राज कपूर के प्रस्ताव को भी उन्होने नहीं स्वीकारा कि फ़िल्म को आर.के.फ़िल्म्स के बैनर तले रिलीज़ की जाए। लेकिन कुछ तो ऐसी बात थी कि यहाँ तक कि विविध भारती के एक कार्यक्रम में भी यह कहा गया था कि "कुछ ऐसे लोग जिन पर उन्हे बहुत भरोसा था, उनको पहुँचाया भारी नुकसान"। अब ये किनके संदर्भ में कहा गया है इसकी पुष्टि तो मैं नहीं कर सकता। लेकिन इस वजह से यह गीत आज के इस अंक के लिए बहुत ही सार्थक बन पड़ा है। शंकर जयकिशन के संगीत में मुकेश की दर्दभरी आवाज़। सरोद और सितार की ध्वनियों से गीत और भी ज़्यादा मर्मस्पर्शी बन पड़ा है।

आज शैलेन्द्र की पुण्यथिथि पर हम आप तक पहुँचा रहे हैं उन्ही की सुपुत्री आमला मजुमदार के उद्‍गार जो उन्होने कहे थे दुबई स्थित १०४.४ आवाज़ एफ़.एम रेडियो पर और जिसका प्रसारण हुआ था ३० अगस्त २००६ के दिन, यानी कि शैलेन्द्र जी के जनमदिन के अवसर पर। आमला जी कहती हैं, "हम बहुत छोटे थे जब बाबा गुज़र गए और अचानक एक, जैसे overnight एक void सा, एक ख़ालीपन सा जैसे छा गया था हमारी ज़िंदगी के उपर। बाबा के गुज़र जाने के बाद we were determined that not to let that void eat us up और I think it was also in a way we realised that baba never left us. Through his songs, उनके गानों के ज़रिए उन्होने हमें एक राह दिखाई और उस राह पर चलते हम आज यहाँ तक पहुँच गए हैं। और हम बहुत ही proud होके, बहुत ही फ़क्र के साथ कह सकते हैं कि बाबा ने हमें छोड़ा नहीं, बाबा हमारे साथ थे, हैं, और उनके गानों के ज़रिए उनके जो message जो हमारे साथ हैं उससे हमारा character shape हुआ है और आज हम जो भी हैं I thank baba and ofcourse my mother, that we are what we are today because of them and because of his songs definitely।" दोस्तों, अब इससे आगे शायद कुछ और कहने की ज़रूरत नहीं, बस शैलेन्द जी और राज कपूर साहब को स्मृति सुमन अर्पित करते हुए आज का यह गीत सुनते हैं, और इस विशेष शृंखला को समाप्त करने की दीजिए हमें इजाज़त, कल फिर मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की फ़रमाइशी महफ़िल में। शुभ रात्री!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१.कल हम सुनेंगे हमारे विजेता पराग सांकला की पसंद का पहला गीत, जाहिर है ये उनकी सबसे पसंदीदा गायिका का गाया हुआ है.
२. इन्दीवर की कलम से निकला है ये गीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"जहर".

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह पाबला जी एक और सही जवाब...बधाई....आज के गीत का एक कवर वर्ज़न हमें शरद जी भी गाकर भेजा था. पर हमने सोचा कि उसे हम अपने ३०० वें एपिसोड में शामिल करेंगें जैसा कि हम अपने हर लैंड मार्क एपिसोड में करते हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Comments

indu puri said…
kaise koi jiye jahar hai zindagi
indeewarji ka likha geet hai film ...? baad me
indu puri said…
kaise koi jiye jahar hai zindagi
indeewarji ka likha geet hai film ...? baad me
2 lata ji ka ek gana aur hai
'tera jaadu na chlega o sapere
isme bhi jahar shbd aaya hai
dekh na tu mujhko hath laga......jahar bhar dungi ,o kahin tadpe na sanjh savere
parag ji ki pasandeeda female singer ? answer yahi hona chahiye
thahriye PABLA JI KO BULATI HUN
बी एस पाबला said…
इंदु जी को बधाई!
गीत वही है

कैसे कोई जिये
ज़हर है ज़िंदगी
उठा तूफ़ान वो
उठा तूफ़ान नाच के
सब बुझ गये दिये
कैसे कोई जिये

पराग जी की पसंदीदा गायिका -गीता दत

लौट कर आता हूँ :-) (हो सका तो)

बी एस पाबला
मैने तो सुबह भी इस पर कमेन्ट दिया था पता नहीं क्यों नहीं छपा बस आपकी पसंद बहुत अच्छी है उसे ही सुनने आती हूँ । पहली बूझने मे अस्मर्थ हूँ यादाश्त इतनी नहीं है धन्यवाद्
AVADH said…
फिल्म बादबान. शायद यह उन बिरली फिल्मों में सी थी जिसमें दादा मोनी अशोक कुमार जी और एवरग्रीन देव आनंद साहेब एक साथ परदे पर नज़र आये थे. कम से कम नुझे तो इसके अतिरिक्त केवल 'जुएलथीफ' का नाम मालूम है.
वैसे मैं समझता था कि मुखड़े में है " उठा तूफ़ान बुझ गए सब आस के दिए".
अवध लाल
Anonymous said…
aapke aalekhon ka standard bahut ooncha hai.

ROHIT RAJPUT

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT

स्वरगोष्ठी – 214 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया