मंगलवार, 22 सितंबर 2009

ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं....."बख्शी" साहब और "अनवर" की अनोखी जुगलबंदी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४७

मूमन तीन या चार कड़ियों से हमारी प्रश्न-पहेली का हाल एक-सा है। तीन प्रतिभागी (नाम तो सभी जानते हैं) अपने जवाबों के साथ इस पहेली का हिस्सा बनते हैं, उनमें से हर बार "सीमा" जी प्रथम आती हैं और बाकी दो स्थानों के लिए शामिख जी और शरद जी में होड़ लगी होती है। भाईयों बस दूसरे या तीसरे स्थान के लिए हीं होड़ क्यों है, पहले पर भी तो नज़र गड़ाईये। इस तरह तो बड़े हीं आराम से सीमा जी न जाने कितने मतों (यहाँ अंकों) के साथ विजयी हो जाएँगी और आपको बस दूसरे स्थान से हीं संतोष करना होगा। अभी भी ४ कड़ियाँ बाकी हैं (आज को जोड़कर),इसलिए पूरी ताकत लगा दीजिए। इस उम्मीद के साथ कि आज की पहेली में काँटे की टक्कर देखने को मिलेगी, हम पिछली कड़ी के अंकों का खुलासा करते हैं: सीमा जी: ४ अंक, शामिख जी: २ अंक और शरद जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की, तो कमर कस लीजिए। ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) एक शायर जिसने अपने एक मित्र के लिए कहा था "आज तेरी एक नज़्म पढी"। जवाब में उस मित्र ने भी उस शायर से अपना पहचान जन्मों का बताया और कहा "कहीं पहले मिले हैं हम"। शायर के साथ-साथ उसके मित्र का भी नाम बताएँ।
२) एक गायिका जिसके साथ ८ जुलाई १९९० को कुछ ऐसा हुआ कि उसने गायकी से तौबा कर ली। उस गायिका का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि हमने उसकी जो गज़ल सुनवाई थी(साथ में एक और गायक थे), उसे किसने लिखा था?


आज हम जिस गज़ल को लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं, उस गज़ल के गायक को पहचानने में कई बार लोग गलती कर जाते हैं। ज्यादातर लोगों का यह मानना है कि इस गज़ल को मोहम्मद रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ से सजाया है और लोगों का यह मानना इसलिए भी जायज है क्योंकि एक तो आई०एम०डी०बी० पर उन्हीं का नाम दर्ज है और फिर इस गज़ल के गायक की आवाज़ मोहम्म्द रफ़ी साहब से हुबहू नहीं भी तो कमोबेश तो जरूर मिलती है। वैसे बता दें कि यह गज़ल जिस फ़िल्म (हाँ यह गैर-फ़िल्मी रचना नहीं है, लेकिन चूँकि यह गज़ल इतनी खुबसूरत है कि हमें इसे अपनी महफ़िल में शामिल करने का फ़ैसला करना पड़ा) से ली गई है वह रीलिज़ हुई थी १९८४ में और रफ़ी साहब १९८० में सुपूर्द-ए-खाक हो गए थे, इसलिए इस गज़ल के साथ उनका नाम जोड़ना इस तरह भी बेमानी साबित होता है। तो चलिए, हम इतना तो जान गए कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं गाया तो फिर कौन है इसका असली गायक? आप लोगों ने फिल्म "नसीब" का "ज़िंदगी इम्तिहान लेती है" या फिर "अर्पण" का "मोहब्बत अब तिज़ारत बन गई है" तो ज़रूर हीं सुना होगा...तो इस गज़ल को भी उन्होंने हीं गाया है जिन्होने उन गीतों में अपनी आवाज़ की जान डाली थी यानि कि अनवर (पूरा नाम: अनवर हुसैन)। "मेरे ख्यालों की रहगुजर से" - इस गज़ल को लिखा है हिन्दी फिल्मी गीतों के बेताज़ बादशाह "आनंद बख्शी" ने तो संगीत से सजाया है उस दौर की जानी मानी संगीतकार जोड़ी "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" ने। एल०-पी० के बारे में "ओल्ड इज गोल्ड" पर तो बातें होती हीं रहती हैं, इसलिए उनके बारे में हम यहाँ कुछ भी नया नहीं कह पाएँगे। बक्शी साहब के बारे में हम पिछली दो कड़ियों में बहुत कुछ कह चुके हैं। हमें मालूम है कि उतना पर्याप्त नहीं है,लेकिन चूँकि अनवर हमारे लिए नए हैं, इसलिए आज हम इन्हें मौका दे रहे हैं। अनवर का जन्म १९४९ में मुंबई में हुआ था। उनके पिता जी संगीत निर्देशक "गुलाम हैदर" के सहायक हुआ करते थे। अनवर बहुत सारे कंसर्ट्स में गाया करते थे। ऐसे हीं एक कंसर्ट में जनाब "कमल राजस्थानी" ने उन्हें सुना और उन्हें फिल्म "मेरे ग़रीब नवाज़" के लिए "कसमें हम अपनी जान की" गाने का अवसर दिया। कहते हैं कि इस गाने को सुनकर रफ़ी साहब ने कहा था कि "मेरे बाद मेरी जगह लेने वाला आ गया है"। अनवर ने इसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता, हीर-राँझा, विधाता, प्रेम-रोग, चमेली की शादी जैसी फ़िल्मों के लिए गाने गाए। यह सच है कि अनवर के नाम पर बहुत सारे सफ़ल गाने दर्ज हैं लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि रफ़ी साहब की बात सच न हो सकी।

कहा जाता है कि जनता हवलदार और अर्पण के गीतों से मिली अपार लोकप्रियता ने उन्हें न केवल घमंडी बना दिया था, बल्कि वे नशे के आदी भी हो गए थे, इसलिए म्यूजिक डायरेक्टरों ने उनसे किनारा करना शुरू कर दिया। हालांकि अनवर इन आरोपों को सिरे से नकारते हैं। इस बारे में वे कहते हैं(सौजन्य: जागरण): न तो कामयाबी ने मुझे मगरूर बनाया, न ही मैं नशे का आदी हुआ! इसे मेरी बदकिस्मती कह सकते हैं कि तमाम सुरीले गीत गाने के बावजूद प्लेबैक में मेरा करियर बहुत लंबा नहीं खिंच सका! जहां तक मेरे घमंडी और शराबी होने की बात है, तो इसके लिए मैं एक अखबार नवीस को जिम्मेदार ठहराता हूँ। हुआ ये कि एक बार एक मित्र ने हमारा परिचय एक फिल्म पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार से कराया। उसके काफी समय बाद सॅलून में उस पत्रकार से मेरी मुलाकात हुई, तो उन्हें मैं नहीं पहचान सका। बस, इसी बात का उन्हें बुरा लग गया और उन्होंने अपनी पत्रिका में मेरे बारे में अनाप-शनाप लिखना शुरू कर दिया। चूंकि उस दौर में उस पत्रिका का काफी नाम था, इसलिए उस लेख के प्रकाशन के बाद लोगों के बीच मेरी खराब इमेज बन गई। सच बताऊं, तो काफी हद तक उस पत्रकार महोदय ने भी मेरा काफी नुकसान किया। मेरे कैरियर में उतार-चढ़ाव के लिए इन अफवाहों के साथ म्यूजिक इंडस्ट्री में आया बदलाव भी एक हद तक जिम्मेदार है। महेश भट्ट की फिल्म आशिकी ने फिल्म म्यूजिक को एक अलग दिशा दी, लेकिन उसके बाद कॉपी वर्जन गाने वाले गायकों को इंडस्ट्री सिर पर बिठाने लगी और इसीलिए मौलिक गायक हाशिये पर चले गए। ऐसे में मुझे भी काम मिलने में दिक्कत हो रही थी। अच्छे गीत नहीं मिल रहे थे, जबकि विदेशों में शो के मेरे पास कई ऑफर थे। कुछ अलग करने के इरादे से ही मैं कैलीफोर्निया (अमेरिका) चला गया और वहां शो करने लगा। वहां के लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं वहीं का हो गया। मैं व्यवसाय के कारण भले ही अमेरिका में रहता हूं, लेकिन दिल हमेशा अपने देश में ही रहता है। ऐसे में जब यहां के लोग कुछ अलग और नए की फरमाइश करते हैं, तो मन मारकर रह जाता हूं। म्यूजिक कंसर्ट और शो में ही काफी बिजी रहने के कारण मेरी रुचि अब प्लेबैक में नहीं रही। हालांकि अच्छे ऑफर मिलने पर मैं प्लेबैक से इंकार नहीं करूँगा, लेकिन खुद इसके लिए पहल मैं कतई नहीं करने वाला। पहले भी काम मांगने किसी के पास नहीं गया था और आज भी मैं उस पर कायम हूं। हां, यदि पहले की तरह अच्छे गीत मिलें और म्यूजिक डायरेक्टर मेरे साथ काम करना चाहें, तो उन्हें निराश नहीं करूंगा। तो इस तरह हम वाकिफ़ हुए उन घटनाओं से जिस कारण अनवर को फिल्मों में गायकी से मुँह मोड़ना पड़ा। चलिए अब हम आगे बढते हैं आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं। उससे पहले "आनंद बख्शी" का लिखा एक बड़ा हीं खुबसूरत शेर पेश-ए-खिदमत है:

ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है,
तू जो चाहे तो दिन निकलता है तू जो चाहे तो रात होती है।


और यह रही आज़ की गज़ल:

मेरे ख़यालों की रहगुज़र से वो देखिए वो गुज़र रहे हैं,
मेरी निगाहों के आसमाँ से ज़मीन-ए-दिल पर उतर रहे हैं।

ये कैसे मुमकिन है हमनशीनो कि दिल को दिल की ख़बर न पहुंचे,
उन्हें भी हम याद आते होंगे कि जिन को हम याद कर रहे हैं।

तुम्हारे ही दम क़दम से थी जिन की मौत और ज़िंदगी अबारत,
बिछड़ के तुम से वो नामुराद अब न जी रहे हैं न मर रहे हैं।

इसी मोहब्बत की रोज़-ओ-शब हम सुनाया करते थे दास्तानें,
इसी मोहब्बत का नाम लेते हुए भी हम आज डर रहे हैं।

चले हैं थोड़े ही दूर तक बस वो साथ मेरे 'सलीम' फिर भी,
ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं।


इस गज़ल के "मकते" में तखल्लुस के रूप में "सलीम" को पढकर कई लोग इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि इस गज़ल को किसी "सलींम" नाम के शायर ने लिखा है। लेकिन सच ये है कि "ये इश्क़ नहीं आसान" फिल्म में "ऋषि कपूर" का नाम "सलींम अहमद सलीम" था। अब चूँकि नायक शायर की भूमिका में था, इसलिए उसकी कही गई गज़ल में उसके नाम को "तखल्लुस" के रूप में रखा गया है। यह बात अच्छी तो लगती है, लेकिन हमारे अनुसार ऐसा और कहीं नहीं हुआ। यह तो "बख्शी" साहब का बड़प्पन है कि उन्होंने ऐसा करना स्वीकार किया। क्या कहते हैं आप?



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

वो मेरा ___ है मैं उसकी परछाई हूँ,
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन....


आपके विकल्प हैं -
a) अक्स, b) सरमाया, c) हमसाया, d) आईना

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "इम्तिहाँ" और शेर कुछ यूं था -

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही,
इम्तिहाँ और भी बाकी हो तो ये भी न सही..

जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर को सबसे पहले सही पकड़ा सीमा जी ने। सीमा जी ने ग़ालिब के शेरों से महफ़िल को खुशगवार बना दिया, लगता है कि आप कई दिनों से ग़ालिब का हीं इंतज़ार कर रहीं थीं। ये रहे आपके पेश किए शेर:

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में यारब
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना (ग़ालिब )

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यों हो (ग़ालिब )

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं (मोहम्मद इक़बाल) यह तो बड़ा हीं मशहूर शेर है...शुक्रिया कि आपने इसे यहाँ रखा।

सीमा जी के बाद महफ़िल में इंट्री हुई शामिख जी की। आपने भी कुछ लुभावने शेर पेश किए। ये रही बानगी:

थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ
दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी (श्रद्धा जी..मतलब कि हमारी दीदी)

इम्तिहाँ से गुज़र के क्या देखा
इक नया इम्तिहान बाक़ी है (राजेश रेड्डी)

यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

इनके बाद महफ़िल में एक तरतीब में हाज़िर हुए शरद जी, शन्नो जी और मंजु जी। आप तीनों के नाम हम एक साथ इसलिए लिखते हैं क्योंकि जब भी स्वरचित शेरों की बात आती है तो आपका हीं नाम आता है। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर(क्रम से):

किसी राह चलती को छेडो न यारो
अभी इस के आगे जहाँ और भी हैं
ये जूतों की बारिश तो है पहली मन्ज़िल
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं । (क्या बात है!! )

कितने ही इम्तहान ले चुकी है जिन्दगी
खुदा जाने और भी कितने बाकी हैं.

जीवन इम्तहाँ का है नाम,
कोई होता फ़ेल तो कोई पास।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

21 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

निदा फ़ाज़ली
मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन ।



सदियों-सदियों वही तमाशा
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं
खो जाता है जाने कौन ।



जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन ।



मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन ।



किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन ।

regards

seema gupta ने कहा…

This post has been removed by the author.

seema gupta ने कहा…

1)दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई..... महफ़िल-ए-बेइख्तियार और "गुलज़ार"
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३६
गुलज़ार
"मंसूरा अहमद

regards

seema gupta ने कहा…

2)तुम बोलो कुछ तो बात बने....जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश और महफ़िल-ए-बंदिश
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०९
चित्रा सिंह"
शमिम करबानी" साहब

regards

seema gupta ने कहा…

आईना क्यूँ न दूँ के तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ के तुझसा कहें जिसे
दिल से उठा लुत्फ-ए-जल्वाहा-ए-म'आनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है

ग़ालिब
यही कहा था मेरे हाथ में है आईना
तो मुझपे टूट पड़ा सारा शहर नाबीना
अहमद फ़राज़
हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो|
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो|
राहत इन्दौरी
आईना देखके निकला था मैं घर से बाहर
आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा
निदा फ़ाज़ली
क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है
शहरयार
regards

शरद तैलंग ने कहा…

१) कडी ३६/गुलज़ार/मंसूर अहमद
२) कडी ०९/चित्रा सिंह/ शमिम करवानी

शरद तैलंग ने कहा…

शे’र पेश है :(स्वरचित)
पुराने आइने में शक्ल कुछ ऐसी नज़र आई
कभी तिरछी नज़र आई कभी सीधी नज़र आई
लुटी जब आबरु उसकी तो मैं भी चुप लगा बैठा
मग़र फिर ख्वाब में अपनी बहन बेटी नज़र आई।

Shamikh Faraz ने कहा…

सही लफ्ज़ आईना है.

मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन ।

निदा फाज़ली.

Shamikh Faraz ने कहा…

पहले सवाल का जवाब.
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३६
शायर का नाम गुलज़ार
मित्र का नाम "मंसूर अहमद"

Shamikh Faraz ने कहा…

दुसरे सवाल का जवाब.

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०९
गायका का नाम "चित्रा सिंह"
ग़ज़ल लिखने वाले शायर का नाम. शमीम करबानी

Shamikh Faraz ने कहा…

आसमाँ, राह-गुज़र, शीशा-ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग

कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आइना है

अब जो आये हो तो ठहरो के कोई रंग, कोई रुत, कोई शय
एक जगह पर ठहरे
फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो है
आसमाँ हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय

faiz ahmad faiz

Shamikh Faraz ने कहा…

बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे

kunwar bechain

Shamikh Faraz ने कहा…

अब मोहब्बत की जगह दिल में ग़मे-दौरां है
आइना टूट गया तेरी नज़र होने तक

krishna bihari noor

Shamikh Faraz ने कहा…

मुझे शे'र के लफ्ज़ ठीक तरह से ध्यान नहीं है लेकिन शायद कुछ इस तरह से हैं

वो देखते हैं आईने में खुद को
और देखते हैं कि कोई देखता न हो.

anaam

Shamikh Faraz ने कहा…

उम्र ढलते ही बनेगा कौन मेरा आइना

हो न पाया मैं कभी उससे इसी डर से अलग।

Shamikh Faraz ने कहा…

tanha ji aaj net sahi waqt pe connect na ho pane ki wajas se sabse akhir me aaya.

Shamikh Faraz ने कहा…

चाहे कहूँ सत आइना, सो जग बैरी होय

kabeer das

Shamikh Faraz ने कहा…

ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है,
तू जो चाहे तो दिन निकलता है तू जो चाहे तो रात होती है।


आनंदी बख्शी साहब के लिखे इस शे'र को पढ़कर फनी बदयूनी साहब का एक शे'र याद आ गया.

ज़िक्र जब क़यामत का छिडा तो
बात तेरी जवानी तक पहुंची.

Manju Gupta ने कहा…

जवाब - आईना
स्वरचित शेर -

चेहरा है आईना जिन्दगी का ,
सच है बतलाता जिन्दगी का .

AVADH ने कहा…

आइना देख अपना सा मुंह ले कर रह गए.
साहेब को दिल न देने पे कितना गुरूर था.

तनहा साहेब, कृपया यह बताने का कष्ट करें कि क्या पार्श्व गायक अनवर ७०/८० के दशक की लोकप्रिय कलाकार आशा सचदेव के सम्बन्धी थे?

मैंने कहीं पढ़ा था कि वोह उनके भाई थे.
अवध लाल

ram ने कहा…

Har saans uske khayal ko mehka deti hai;
Dil k aaine me wo dhadkan b k rehti hai|

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