गुरुवार, 3 सितंबर 2009

"जी" पीढी का 'जागो मोहन प्यारे...' है "यो" पीढी में 'वेक अप सिद...'

ताजा सुर ताल (19)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए शंकर एहसान लॉय और जावेद अख्तर का रचा ताज़ा तरीन गीत

सजीव- सुजॉय, जब भी हमें किसी नई फ़िल्म के लिए पता चलता है कि उसके संगीतकार शंकर एहसान लॉय होंगे, तो हम कम से कम इतना ज़रूर उम्मीद करते हैं कि उस संगीत में ज़रूर कुछ नया होगा, कोई नया प्रयोग सुनने को मिलेगा। तुम्हारे क्या विचार हैं इस बारे में?

सुजॉय - जी हाँ बिल्कुल, मैं आप से सहमत हूँ। पिछले दो चार सालों में उनकी हर फ़िल्म हिट रही है। और आजकल चर्चा में है 'वेक अप सिद' का म्युज़िक।

सजीव- मैं बस उसी पर आ रहा था कि तुमने मेरी मुँह की बात छीन ली। तो आज हम बात कर रहे हैं शंकर एहसान लॉय के तिकड़ी की और साथ ही उनकी नई फ़िल्म 'वेक अप सिद' की। लेकिन सुजॉय, मुझे इस फ़िल्म के गीतों को सुनकर ऐसा लगा कि इस फ़िल्म के गीतों में बहुत ज़्यादा नयापन ये लोग नहीं ला पाए हैं।

सुजॉय - सची बात है। पिछले साल 'रॊक ऒन' में जिस तरह का औफ़ बीट म्युज़िक इस तिकड़ी ने दिया था, इस फ़िल्म के गानें भी कुछ कुछ उसी अंदाज़ के हैं।

सजीव- हो सकता है कि इस फ़िल्म में नायक सिद के व्यक्तित्व को इसी तरह के गीतों की ज़रूरत हो! इस फ़िल्म का शीर्षक गीत, जिसे शंकर महादेवन ने गाया है, आज हम अपने श्रोताओं को सुनवा रहे हैं। इस गीत में जावेद अख़तर ने उस कश्मकश, युवावस्था की परेशानियाँ और 'आइडेन्टिटी क्राइसिस' को उभारने की कोशिश की है जिनसे हर युवक आज की दौर में गुज़रता है। पर न तो जावेद साहब ही यहाँ कोई करिश्मा कर पाए हैं न ही संगीतकार तिकडी ने ही कोई चमत्कारिक तत्व डाला है गीत में...

सुजॉय - इस शीर्षक गीत का एक रॉक वर्ज़न भी बनाया गया है जो गीत से ज़्यादा एक 'अलार्म' घड़ी ज़्यादा प्रतीत होती है। लेकिन अच्छी रीमिक्स का नमूना पेश किया है इस संगीतकार तिकड़ी ने। एक बार फिर 'रॉक ऑन' की याद दिलाता है यह गीत। सजीव, इस फ़िल्म के दूसरे गीतों के बारे में आपका क्या ख़याल है?

सजीव- शंकर का ही गाया एक और गीत है इस फ़िल्म में "आज कल ज़िंदगी", जो तुम्हे 'दिल चाहता है' के "कैसी है ये रुत के जिसमें फूल बन के दिल खिले" गीत की याद ज़रूर दिलाएगा।

सुजॉय - वाक़ई?

सजीव- हाँ, "लाइफ़ इज़ क्रेज़ी" गीत पेप्पी है जिसे शंकर ने उदय बेनेगल के साथ गाया है रॉक शैली में। कविता सेठ और अमिताभ भट्टाचार्य का गाया "इकतारा" भी कर्णप्रिय है। पर इस गीत को शंकर एहसान लॉय ने नहीं बल्कि अमित त्रिवेदी ने स्वरबद्ध किया है. मुझे लगता है ये इस फिल्म का एक और ऐसा गीत है जिसे इस शृंखला का हिस्सा बनना चाहिए

सुजॉय - ये वही अमित त्रिवेदी वही हैं न जिन्होने 'देव-डी' में संगीत देकर काफ़ी नाम कमाया था?

सजीव- बिल्कुल वही। एक और उल्लेखनीय गीत इस फ़िल्म का है क्लिन्टन सेरेजो का गाया हुआ "क्या करूँ"। क्लिन्टन की आवाज़ हम ने अक्सर पार्श्व में सुना है शंकर एहसान लॉय के गीतों में। यह भी एक पेप्पी गीत है, जिसके साथ सेरेजो ने पूरा न्याय किया है।

सुजॉय- सजीव, मुझे तो लगता है 'वेक अप सिद' की कहानी कुछ अलग हट के होगी क्योंकि इस फ़िल्म में रणबीर कपूर की नायिका बनी हैं कोनकोना सेन शर्मा, जो ज़्यादातर कलात्मक और पैरलेल सिनेमा के लिए जानी जाती है। मेरा ख़याल है निर्माता करण जोहर और नवोदित निर्देशक अयान मुखर्जी से कुछ नए और अच्छे की उम्मीद की जा सकती है।

सजीव - बिलकुल कोंकण मेरी सबसे पसंदीदा अभिनेत्रियों में हैं और वो इस फिल्म में तो मुझे इस फिल्म का बेसर्ब्री से इंतज़ार है. प्रोमोस देख कर बिलकुल लगता है कि फिल्म काफी युवा है. पर उस हिसाब से मुझे इस फिल्म का संगीत एक "लेट डाउन" ही लगा. और हाँ अयान मुखर्जी से याद आया कि इस उभरते निर्देशक ने इससे पहले बतौर सहायक निर्देशक आशुतोश गोवारिकर के साथ 'स्वदेस' में और करण जोहर के साथ 'कभी अलविदा ना कहना' में काम किया है। सुजॉय, शंकर- अहसान और लॉय के बारे में कुछ बताओ हमारे पाठकों को।

सुजॉय - सब से पहले तो यही कहूँगा कि एहसान का पूरा नाम है एहसान नूरानी और लॉय का पूरा नाम है लॉय मेन्डोन्सा; शंकर का पूरा नाम तो आप जानते ही हैं। आम तौर पर लोगों को लगता है कि शंकर-एहसान-लॉय ही फ़िल्म संगीत जगत की पहली संगीतकार तिकड़ी है।

सजीव- मैं भी तो यही मानता हूँ।

सुजॉय - नहीं, बहुत कम लोगों को यह पता है कि गुज़रे दौर में एक बहुत ही कमचर्चित संगीतकार तिकड़ी रही है लाला-असर-सत्तार। सुनने में लाला असर सत्तार एक ही आदमी का नाम प्रतीत होता है, लेकिन हक़ीक़त में ये तीन अलग अलग शख़्स थे।

सजीव- अच्छा हाँ नाम तो कुछ सुना हुआ सा लग रहा है, पर वाकई एक ही आदमी का नाम लगता है.

सुजॉय- शंकर अपने करीयर की शुरुआती दिनों में विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाया करते थे जब कि अहसान नूरानी की-बोर्ड वादक थे और लॉय संगीत संयोजक का काम किया करते थे। उन्ही विज्ञापनों के दिनों में इन तीनो की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि साथ साथ काम करने का निश्चय कर लिया।

सजीव- बतौर संगीतकार शकर अहसान लॊय की पहली फ़िल्म थी मुकुल एस. आनंद की फ़िल्म 'दस', जिसमें सलमान ख़ान और संजय दत्त थे। "सुनो ग़ौर से दुनियावालों बुरी नज़र ना हम पे डालो" गीत बेहद मशहूर हुआ था। लेकिन मुकुल एस. आनंद की असमय निधन से फ़िल्म पूरी ना हो सकी लेकिन म्युज़िक रिलीज़ कर दिया गया। उसके बाद 'मिशन कश्मीर', 'दिल चाहता है', 'कल हो ना हो', 'लक्ष्य', 'अरमान', 'क्यों हो गया ना!', 'फिर मिलेंगे', 'रुद्राक्ष', 'एक और एक ग्यारह', 'कभी अल्विदा ना कहना', 'झूम बराबर झूम', 'बण्टी और बबली', 'रॉक ऑन' जैसी फ़िल्मों ने इस तिकड़ी को बेहद लोकप्रिय संगीतकारों की कतार में शामिल कर लिया।

सुजॉय - तो सजीव, शकर एहसान और लॉय को 'वेक अप सिद' के संगीत की कामयाबी के लिए हम शुभकामनाएँ देते हैं और अपने श्रोताओं को सुनवाते हैं फ़िल्म 'वेक अप सिद' का टाइटल ट्रैक ख़ुद शंकर महादेवन की ही आवाज़ में।

सजीव- ज़रूर...आवाज़ की टीम ने इस गीत को दिए हैं २.५ अंक ५ में से....अब श्रोता फैसला करें कि उनकी नज़र में इस गीत को कितने अंक मिलने चाहिए....गीत के बोल इस तरह हैं -

सुनो तो ज़रा हमको है ये कहना,
वक़्त है क्या तुमको पता है न,
सो गयी रात जागे दिन है अब जागना,
आँखें मसलता है सारा ये समां,
आवाजें भी लेती है अंगडायियाँ....
वेक अप सिद....सारे पल कहें,
वेक अप सिद....चल कहीं चलें...
वेक अप सिद....सब दिशाओं से आ रही है सदा
सुन सको अगर सुनों...
वेक अप....

ये जो कहें वो जो कहें सुन लो,
अब जो सही दिल लगे चुन लो,
करना है क्या तुम्हें ये तुम्हीं करो फैसला,
ये सोच लो तुमको जाना है कहाँ,
तुम ही मुसाफिर तुम्हीं ही तो हो कारवां....
वेक अप सिद....

आज ये देखो कल जैसा ही न हो,
आज भी यूं न तुम सोते न रहो,
इतने क्यों सुस्त हो कुछ कहो कुछ सुनो,
कुछ न कुछ करो,
रो पडो या हंसो,
जिंदगी में कोई न कोई रंग भरो....
वेक अप सिद....


और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 2.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.आज के दौर का एक सफल संगीतकार/गायक जिसने शुरुआत एक धारावाहिक निर्माता के रूप में की थी. १९९८ में सलमान खान अभिनीत फिल्म में उन्होंने पहली बार संगीत निर्देशन किया था. पहचानिये इस फनकार को और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब एक बार दिया तनहा जी ने, बधाई जनाब...विनोद कुमार जी, शमिख फ़राज़ जी, मंजू गुप्ता जी, और रोहित जी आप सब ने अपनी राय रखी जिसके लिए आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

5 टिप्‍पणियां:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

अच्छी पेशकश ..बधाई..आवाज़ और हिंद युग्म को भी बधाई

seema gupta ने कहा…

This post has been removed by the author.

seema gupta ने कहा…

हिमेश रेशमिया फिल्म बंधन 1998.

regards

Manju Gupta ने कहा…

गीत -संगीत की नई -नई पेशकश सुनने को मिल रही है ,रेटिंग ३ \५ दूंगी ,

Shamikh Faraz ने कहा…

मैं भी २.५/५ दूंगा.

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