Monday, April 13, 2009

महफ़िल-ए-गज़ल एक नए अंदाज़ में ....संग है गुलाम अली की आवाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०४

न् ८३ में पैशन्स(passions) नाम की गज़लों की एक एलबम आई थी। उस एलबम में एक से बढकर एक नौ गज़लें थी। मज़े की बात है कि इन नौ गज़लों के लिए आठ अलग-अलग गज़लगो थे:  प्रेम वरबरतनी, एस एम सादिक, अहमौम फ़राज़, हसन रिज़वी, मोहसिन नक़्वी, चौधरी बशीर, जावेद कुरैशी और मुस्तफा ज़ैदी। और इन सारे गज़लगो की गज़लों को जिस फ़नकार या कहिए गुलूकार ने अपनी आवाज़ और साज़ से सजाया था  आज यह महफिल उन्हीं को नज़र है।  उम्मीद है कि आप समझ गए होंगे। जी हाँ, हम आज पटियाला घराना के मशहूर पाकिस्तानी फ़नकार "गुलाम अली" की बात कर रहे हैं।

गुलाम अली साहब, जो कि बड़े गुलाम अली साहब के शागिर्द हैं और जिनके नाम पर इनका नामकरण हुआ है, गज़लों में रागों का बड़ा हीं बढिया प्रयोग करते हैं। बेशक हीं ये घराना-गायकी से संबंध रखते हैं,लेकिन घरानाओं (विशेषकर पटियाला घराना) की गायकी को किस तरह गज़लों में पिरोया जाए, इन्हें बखूबी आता है। गुलाम अली साहब की आवाज़ में वो मीठापन और वो पुरकशिश ताजगी है, जो किसी को भी अपना दीवाना बना दे। अपनी इसी बात की मिसाल रखने के लिए हम आपको पैसन्स एलबम से एक गज़ल सुनाते हैं, जिसे लिखा है "जावेद कुरैशी" ने। हाँ, सुनते-सुनते आप मचल न पड़े तो कहिएगा।

अच्छा रूकिये, सुनने से पहले थोड़ा माहौल बनाना भी तो जरूरी है। अरे भाई, गज़ल ऎसी चीज है जो इश्क के बिना अधूरी है और इश्क एक ऎसा शय है जो अगर आँखों से न झलके तो कितने भी लफ़्ज क्यों न कुर्बान किए जाए, सामने वाले पर कोई असर नहीं होता। इसलिए आशिकी में लफ़्ज परोसने से पहले जरूरी है कि बाकी सारी कवायदें पूरी कर ली जाएँ। और अगर आशिक आँखों की भाषा न समझे तो सारी आशिकी फिजूल है। मज़ा तो तब आता है जब आपका हबीब लबों से तबस्सुम छिरके और आँखों से सारा वाक्या कह दे। इसी बात पर मुझे अपना एक पुरा्ना शेर याद आ रहा है:

दबे लब से मोहब्बत की गुजारिश हो जो महफिल में,
न होंगे कमगुमां हम ही, न होंगे वो हीं मुश्किल में।


यह तो हुआ मेरा शेर, अब हम उस गज़ल की ओर बढते हैं जिसके लिए यह महफ़िल सजी है। वह गज़ल और उसके बोल आप सबके सामने पेशे-खिदमत है:

निगाहों से हमें समझा रहे हैं
नवाज़िश है करम फ़रमा रहे हैं

मैं जितना पास आना चाहता हूँ
वो उतना दूर होते जा रहे हैं

मैं क्या कहता किसी से बीती बातें
वो ख़ुद ही दास्ताँ दोहरा रहे हैं

फ़साना शौक़ का ऐसे सुना है
तबस्सुम ज़ेर-ए-लब फ़रमा रहे हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

नाखुदा को खुदा कहा है अगर,
डूब जाओ खुदा खुदा न करो...

इरशाद ....


पिछली महफ़िल के साथी-

इन्तजार का मज़ा बेताब होकर ही तो आता है
जुनून हद से निकल जाए तो कहर आ जाता है.
वाह शन्नो जी...बहुत बढ़िया...

जो रहा बेताब वो आगे बढ़ा है।
जो नहीं बेताब वो पीछे खड़ा है।
आचार्य जी किसकी तरफ है इशारा :)

बहुत बेताब देखा 'बे-तखल्लुस' आज फिर हमने,
के जैसे खुद से हो बेजार ढूंढें फासला कोई.
मनु जी बहुत खूब... बेताबियाँ बनाये रखिये...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

9 comments:

Playback said...

Khuda Ne Socha Tha Ke Rahenge Sab Insaan Pyaar Se,
Zameen Pe Dekha To Armaan Lut’te Nazar Aate Hain

Kuch To Rahaim Kiya Hota Khuda Pe Khudgarz Insaano,
Hathon Me Talwaar Liye Sare-Aam Nazar Aate Hain

Ehmiyat Nahi Hai Aaj Insaan Ko Khuda Ke Paigamo Ki,
Duniya Me Har Jagah Aaj Rishte Badnaam Nazar Aate Hain

Poet: Shivani Kapoor

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

खुदा बनने था चला, इंसां न बन पाया 'सलिल'.
खुदाया अब आप ही, इंसान बन दिखलाइये.

सजीव सारथी said...

ग़ालिब का शेर पेश है -
ग़ालिब शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता दे जहाँ खुदा नहीं...

neelam said...

खुदा,खुदी और तू ,
सबमे शामिल है तेरी जुस्तजू

shanno said...

सिर पर 'खुदा' खुदा लेने से कोई असल में खुदा नहीं हो जाता
किसी को जुदा करने से कोई दिल दिल से जुदा नहीं हो जाता. ~शन्नो

न गलती वह करते कभी खुदा बनने की न उनसे फिर कोई खौफ होता
इंसान ही रहने देते अपने को तो यह दिल आज उनकी ही जागीर होता. ~शन्नो

खुदा समझ कर वह अपने को हमको तमीज सिखाने चले हैं
खुद तो तमीज आती नहीं है पर मुझको वह सिखाने चले हैं. ~शन्नो

बहकने लगे इतना कि खुदा होने की ग़लतफ़हमी कर बैठे वह
इंसान हैं वह खुदा नहीं हैं जब अहसास दिलाया तो ऐंठे हुए हैं. ~शन्नो

Kamalpreet Singh said...

unkee aankhon mein vo suroor-e- ibadat hai-
Ki qafir bhee utha le allah ka halaf
Composed by-Kamalpreet Singh

neelam said...

shanno ji

teesra sher bilkul nahi bhaaya ,
ab khuda ki ibbadat ,sijda to sunna

achcha lagta hai magar ye tameej waali baat kuch jami nahi

shanno said...

अरे नीलम जी, आप कहाँ थीं? अच्छा हुआ कि आपने मेरे तीसरे शेर पर कम्मेंट किया. Actually मुझे भी नहीं अच्छा लग रहा है वह. जल्दी-जल्दी शेरों को लिख कर पोस्ट कर दिया था. फिर दोबारा निगाह डाली तबसे दांतों से उंगली दबाये अपने को कोसे जा रही हूँ. उस शेर को अगर मार दिया जाये मेरा मतलब है कि उसे वहां से हटा लिया जाये तो मैं तन्हा जी की बहुत शुक्रगुजार रहूंगी. वर्ना उसे देखकर मुझे बड़ी तकलीफ होती रहेगी.....खुदा की कसम. आप बिलकुल सही हैं, मैं बिलकुल सहमत हूँ आपसे. आगे से आप बिना किसी तकल्लुफ या कंजूसी किये मुझे मेरी गलतियों का अहसास दिलाती रहें तो आप की मुझ पर बड़ी मेहरबानी होगी. शुक्रिया!

shanno said...

मेरे खुदा अब तू ही बता कैसे अदा करें हम तेरा शुक्रिया
जब भी मुश्किल पड़ी तभी बचाने कोई मसीहा आ गया.

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