Saturday, September 27, 2008

स्वर कोकिला लता मंगेशकर के लिये एक अदभुत कविता-तुम स्वर हो,स्वर का स्वर हो

माया गोविंद देश की जानी मानी काव्य हस्ताक्षर हैं.हिन्दी गीत परम्परा को मंच पर स्थापित करने में मायाजी ने करिश्माई रचनाएँ सिरजीं हैं.आवाज़ पर भाई संजय पटेल के माध्यम से हमेशा नई – नई सामग्री मिलती रही है.लता दीदी के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले आवाज़ पर प्रस्तुत है समर्थ कवयित्री माया गोविंद की यह भावपूर्ण रचना.


तुम स्वर हो, तुम स्वर का स्वर हो
सरल-सहज हो, पर दुष्कर हो।
हो प्रभात की सरस "भैरवी'
तुम "बिहाग' का निर्झर हो।

चरण तुम्हारे "मंद्र सप्तकी'
"मध्य सप्तकी' उर तेरा।
मस्तक "तार-स्वरों' में झंकृत
गौरवान्वित देश मेरा।
तुमसे जीवन, जीवन पाए
तुम्हीं सत्य-शिव-सुंदर हो।
हो प्रभात की...

"मेघ मल्हार' केश में बॉंधे
भृकुटी ज्यों "केदार' "सारंग'।
नयन फागुनी "काफ़ी' डोले
अधर "बसंत-बहार' सुसंग।
कंठ शारदा की "वीणा' सा
सप्त स्वरों का सागर हो।
हो प्रभात की...

सोलह कला पूर्ण गांधर्वी
लगती हो "त्रिताल' जैसी।
दोनों कर जैसे "दो ताली'
"सम' जैसा है भाल सखी।
माथे की बिंदिया "ख़ाली' सी
"द्रुत लय" हो, गति मंथर हो।
हो प्रभात की...

"राग' मित्र, "रागिनियॉं'सखियॉं
"ध्रुपद-धमार' तेरे संबंधी।
"ख़याल-तराने' तेरे सहोदर
"तान' तेरी बहनें बहुरंगी।
"भजन' पिता, जननी "गीतांजलि'
बस स्वर ही तेरा वर हो।
हो प्रभात की...

ये संसार वृक्ष "श्रुतियों' का
तुम सरगम की "लता' सरीखी।
"कोमल' "शुद्ध' "तीव्र' पुष्पों की
छंद डोर में स्वर माला सी।
तेरे गान वंदना जैसे

4 comments:

सजीव सारथी said...

संजय भाई बेहद सुंदर कविता चुन कर लाये हैं आप, माया गोविन्द ने कविता में संगीत के सारे रत्न चुन कर लता जी के मुकुट पर सजा दिए जैसे -
"मेघ मल्हार' केश में बॉंधे
भृकुटी ज्यों "केदार' "सारंग'।
नयन फागुनी "काफ़ी' डोले
अधर "बसंत-बहार' सुसंग।
कंठ शारदा की "वीणा' सा
सप्त स्वरों का सागर हो।
सोलह कला पूर्ण गन्धर्वी को इससे बेहतर शब्द भेंट क्या होगी -
"राग' मित्र, "रागिनियॉं'सखियॉं
"ध्रुपद-धमार' तेरे संबंधी।
"ख़याल-तराने' तेरे सहोदर
"तान' तेरी बहनें बहुरंगी।
"भजन' पिता, जननी "गीतांजलि'
बस स्वर ही तेरा वर हो।

वाह बहुत सुंदर

शैलेश भारतवासी said...

लता मंगेशकर के लिए प्रयुक्त हरेक विशेषण सच हैं। सच है, वे एक देवी हैं।

दीपाली said...

ये संसार वृक्ष "श्रुतियों' का
तुम सरगम की "लता' सरीखी।
"कोमल' "शुद्ध' "तीव्र' पुष्पों की
छंद डोर में स्वर माला सी।
तेरे गान वंदना जैसे
माया गोविन्द जी अपने बहुत सुंदर लिखा है..

shama said...

Pehlee baar is blogpe aayee aur kya padhun kya chhodun aisee duvidhame pad gayee...Latajee to mera daivat hain...Unkee jab baat suntee hun, to kaan aur kuchh nahee sunna chahte, padhtee hun to garvse sir uth jaata hai...na bhooto na bhavishyati, aisee aawaazki dhani...unpe kavya rachana kitna mushkil!!Par ye kavita itnee sahaj sundar lagee ki bata nahee saktee...iski panktiya mukhodgat karna chahungee!!
Lata ke baareme likhneke liye, unhe sunaneke liye behad shukr guzar...!

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