मंगलवार, 31 जुलाई 2012

बाल मन की कवितायेँ -चाक से बच्चों की जुबान पर


शब्दों की चाक पर - एपिसोड 09

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 




1. रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी ...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

आज की कड़ी में शैफाली गुप्ता और अभिषेक ओझा के साथ ढेरों नन्हें नन्हें मेहमान भी हैं, टोरंटो से अदीति, और देहरादून से कुहू हैं तो दिल्ली से स्टीवन और क्रिस्टिन के साथ हैं औरंगाबाद से उम्र में बड़ी पर मन से बच्ची सुनीता यादव भी. स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की, संचालन रश्मि प्रभा का, प्रस्तुति है अनुराग शर्मा और सजीव सारथी का. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)

या फिर यहाँ से डाउनलोड करें  सूचना - इस हफ्ते हम कवितायेँ स्वीकार करेंगें भाई बहिन के अनूठे रिश्ते, और प्रेम की पहचान त्यौहार रक्षा बंधन पर. अपनी रचनाएँ आप उपर दिए रश्मि जी के पते पर भेज सकते हैं. गुरूवार शाम तक प्राप्त कवितायेँ ही स्वीकार की जायेंगीं.

सोमवार, 30 जुलाई 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (9) क्या सुपर कूल हैं हम और आपकी बात

संगीत समीक्षा - क्या सुपर कूल हैं हम



छोटे परदे की बेहद सफल निर्मात्री एकता कपूर ने जब फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा तो वहाँ भी सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किये, बहुत ही अलग अलग अंदाज़ की फ़िल्में वो दर्शकों के लिए लेकर आयीं हैं, जिनमें हास्य, सस्पेंस, ड्रामा सभी तरह के जोनर शामिल हैं. 

अपने भाई तुषार कपूर को लेकर उन्होंने क्या कूल हैं हम बनायीं थी जिसने दर्शकों को भरपूर हँसाया, इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए वो लायीं है अब क्या सुपर कूल हैं हम जिसमें तुषार कपूर के साथ है रितेश देशमुख. फिल्म हंसी का पिटारा है या नहीं ये तो दर्शकों को फिल्म देखने के बाद ही पता लग पायेगा, पर आईये हम जान लेते हैं कि फिल्म का संगीत कैसा है.

उभरते हुए संगीतकार जोड़ी सचिन जिगर के टेक्नो रिदम से लहराके उठता है दिल गार्डन गार्डन गीत. मयूर पूरी के बे सर पैर सरीखे शब्द गीत को एक अलग ही तडका देते हैं. जहाँ रिदम गीत की जान है वहीँ विशाल ददलानी की उर्जात्मक आवाज़ जोश से भरपूर है. गीत को सुनते हुए न सिर्फ आपके कदम थिरकेंगें बल्कि शब्दों की उटपटांग हरकतें आपके चेहरे पर एक मुस्कान भी ले आएगी...अगर आपने गीत का फिल्मांकन देखा होगा तो गौर किया होगा, सेट से लेकर पहनावे तक हर चीज को एक रेट्रो लुक से सराबोर किया हुआ है जो बेहद लुभावना लगता है, यक़ीनन ये गीत आप आने वाले समय में बहुत बहुत बार सुनने वाले हैं

इस तरह की फिल्म जिसमें कोमेडी का होना पागलपन की हद तक सुनिश्चित हो वहाँ कोई मेलोडिअस गीत की उम्मीद शायद ही कोई करेगा. पर इस अलबम में श्रोताओं के लिए एक बेहद ही मीठा सरप्रयिस है. गीत शर्ट का बट्टन दो अलग अलग संस्करणों में है, जहाँ सोनू की सुरीली आवाज़ में ये एक आउट एंड आउट रोमांटिक गीत बनकर उभरता है वहीँ कैलाश खेर और साथियों वाला संस्करण सूफी रोमंसिसिम को हलके फुल्के अंदाज़ में समेटता है. दोनों गीतों के बोल और धुन एक होने के बावजूद भी संगीत संयोजन और आवाजों के मुक्तलिफ़ अंदाजों के चलते दो अलग अलग गीत से सुनाई पड़ते हैं, और दोनों ही आपके दिल को छू जाते हैं, काफी समय से एक अच्छे ब्रेक की तलाश में चल रहे गीतकार कुमार के लिए इससे बेहतर प्लेटफोर्म नहीं हो सकता था और उन्होंने चालू शायरी के पुट में यक़ीनन अच्छी खासी गरिमा भरी है, दोस्तों यकीन मानिये इस तरफ के गीत लिखने में एक गीतकार को खासी मेहनत करनी पड़ती है. आधुनिक नारी के श्रृंगार प्रसाधनों को एक तार में पिरोता ये गीत बेहद ही खूबसूरत है. और साल के बेहतरीन गीतों में एक है. संगीतकार मीत ब्रोस अनजान और गीतकार कुमार को खासी बधाई. कहने की जरुरत नहीं कि सोनू की ठहराव से भरी गायिकी और कैलाश का लोक अंदाज़ गीत का बोनस है.

कई साल पहले आई फिल्म शूल के लिए शंकर एहसान लॉय ने एक आइटम गीत रचा यु पी बिहार लूटने जो शिल्प शेट्टी पर फिल्माया गया था, उसी धमाकेदार गीत को मीत ब्रोस ने एक बार फिर एक नए अंदाज़ में उभारा है और इसे किसी अभिनेत्री पर नहीं बल्कि फिल्म के दो नायकों पर फिल्माया गया है. जहाँ सुखविंदर और दलेर प्राजी की दमदार आवाज़ के साथ महरास्त्रियन लावनी का फ्लेवर जमाया खुद रितेश देशमुख ने अपनी आवाज़ के जरिये. ये मस्त मस्त गीत खुल कर नाचने के लिए है बस.

अल्बम का अंतिम गीत वोल्यूम हाई करले बहुत मजेदार नहीं बन पाया है, और अल्बम के अन्य गीतों के मुकाबले कम इन्नोवेटिव भी है...पर फिर भी दिल गार्डन शर्ट का बट्टन और केपेचिनो गीत काफी है इस अल्बम को ४.१ की रेटिंग देने के लिए. एक बार शर्ट का बट्टन के लिए बधाई जो शायद इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण होने वाला है.   

 
और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

दस सप्ताह के घमासान के बाद क्षिति तिवारी और प्रकाश गोविंद बने हैं 'सिने पहेली' के तीसरे सेगमेण्ट के संयुक्त विजेता


सिने-पहेली # परिणाम विशेषांक (30 जुलाई, 2012) 

नमस्कार दोस्तों! पिछले दस सप्ताहों से 'सिने पहेली' के तीसरे सेगमेण्ट का जो घमासान चल रहा था, वह अब अपने अंजाम तक पहुँच चुका है। गत सोमवार को 'सिने पहेली' की तीसवीं कड़ी में पूछे गए सवालों के जवाब और पूरे सेगमेण्ट के आँकड़ों के साथ मैं, आपका ई-दोस्त, सुजॉय चटर्जी, हाज़िर हूँ इस परिणाम विशेषांक के साथ। आज सबसे पहले मैं स्वागत करना चाहूँगा पिट्सबर्ग के डॉ. महेश बसंतनी का, जो इस सप्ताह 'सिने पहेली' से जुड़े हैं, और प्रतियोगिता में भाग लेते हुए 90 अंक भी बटोरे हैं। महेश जी पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के एन्डोक्राइनोलोजी विभाग में पोस्ट-डॉकटरल ऐसोसिएट के पद पर कार्य कर रहे हैं। दोस्तों, ब्लॉगर के आँकड़ों के हिसाब से 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' के लगभग 50% पाठक/श्रोता भारत में स्थित हैं, जबकि बाकी के 50% विश्व के अलग-अलग देशों से ताल्लुख रखते हैं जिनमें अमरीका, इंगलैण्ड, रूस, संयुक्त अरब अमीरात, ब्राज़िल, पाकिस्तान, कनाडा, फ़्रान्स, नेदरलैण्ड्स, ताइवान, ट्यूनिशिया और जर्मनी मुख्य रूप से शामिल हैं। दुनिया के कोने-कोने से आप 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' के वेबसाइट पर पधार रहे हैं, यह हमारे लिए बेहद ख़ुशी की बात है, और इसके लिए हम आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं।


आइए सबसे पहले आपको बताएँ 'सिने-पहेली-30' में पूछे गए सवालों के सही जवाब।

'सिने पहेली - 30' के सही जवाब


सिने पहेली का पिछला अंक समर्पित था राजेश खन्ना की स्मृति को। उन पर पूछे गए दस सवालों के जवाब ये रहे....

1. "यूं ही तुम मुझसे बात करती हो" (सच्चा झूठा)

2. "और कुछ देर ठहर" (आख़िरी ख़त)

3. श्रीदेवी (मक्सद, मास्टरजी, नज़राना, नया कदम)

4. "आधी रोटी सारा कबाब, बोल मेरे मुर्गी कूक-ड़ू-कू" (जनता हवलदार)। इस गीत में राजेश खन्ना और हेमा मालिनी हैं, जबकि फ़िल्म में राजेश खन्ना की नायिका हैं योगिता बाली।

इस प्रश्न के जवाब में अधिकतर खिलाड़ियों ने "बागों में बहार है" गीत लिखा है जो ग़लत है क्योंकि न तो इसमें पहेलियों की लड़ाई है (महज़ सवाल जवाब हैं) और न ही राजेश खन्ना नायिका के अलावा किसी अन्य अभिनेत्री के साथ हैं। इस गीत में फ़रीदा जलाल हैं जो राजेश खन्ना के उस चरित्र की नायिका भी हैं।

5. 'महबूबा' और 'कुदरत'

6. "जवानी ओ दीवानी तू ज़िंदाबाद" (आन मिलो सजना)

7. 'डोली'

8. 'अनुरोध'

9. 'बावर्ची'

10. "जय गोविंदम जय गोपालम..... इत्तेफ़ाकम राजेश खन्नाम" (आँसू और मुस्कान), "सातों जनम तुझको पाते..... जो तू होती डिम्पल कपाडिया हम भी तो काका होते" (हीरो नंबर वन)। इन दो गीतों के अलावा 1974 की फ़िल्म 'राजा काका' में एक गीत था "काका हूँ मैं राजा काका"। यह फ़िल्म अपने आप में राजेश खन्ना को समर्पित थी। फ़िल्म के नायक किरण कुमार ने राजेश खन्ना के अंदाज़ में ही अभिनय किया था। फ़िल्म 'रब ने बना दी जोड़ी' के गीत "हम हैं राही प्यार के, फिर मिलेंगे चलते चलते" में राजेश खन्ना के नाम का उल्लेख तो नहीं है, पर फ़िल्मांकन में ज़रूर है।

'सिने पहेली - 30' का परिणाम


1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 100 अंक

2. क्षिति तिवारी, जबलपुर --- 100 अंक

3. अल्पना वर्मा, अल-आइन, यू.ए.ई --- 90 अंक

4. तरुशिखा सुरजन, नई दिल्ली --- 90 अंक

5. महेश बसंतनी, पिट्सबर्ग, यू.एस.ए --- 90 अंक

6. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 90 अंक

7. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 90 अंक

8. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 90 -अंक

9. रीतेश खरे, मुंबई --- 80 अंक

10. नीरजा श्रीवास्तव, सोनभद्र, यू.पी --- 80 अंक

11. शुभ्रा शर्मा, नई दिल्ली --- 80 अंक

12. मनु बेतख़ल्लुस, नई दिल्ली --- 70 अंक

13. चन्द्रकांत दीक्षित, लखनऊ --- 70 अंक

14. अदिति चौहान, देहरादून --- 60 अंक


और अब 'सिने पहेली' के तीसरे सेगमेण्ट के प्रथम तीन स्थान पाने वाले खिलाड़ी ये रहे....

प्रथम स्थान


क्षिति तिवारी व प्रकाश गोविंद


द्वितीय स्थान


गौतम केवलिया


तृतीय स्थान


रीतेश खरे


'सिने पहेली' प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोर-कार्ड यह रहा...



क्षिति तिवारी, प्रकाश गोविंद, गौतम केवलिया और रीतेश खरे को हार्दिक बधाई। आप चारों को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में अंक प्राप्त हो रहे हैं। अब तक का 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



पंकज मुकेश, विजय कुमार व्यास, अल्पना वर्मा, शुभ्रा शर्मा, चन्द्रकान्त दीक्षित, तरुशिखा सुरजन और सलमन ख़ान को भी बधाई और अगले सेगमेण्ट के लिए शुभकामनाएँ। वैसे सलमन भाई ने पिछली कड़ी में भाग न लेकर हमें बड़ा हतोत्साहित किया, और वो प्रथम स्थान से लुढ़क कर सीधे नौवे स्थान पर आ गए। आपकी क्या मजबूरी रही होगी ज़रूर बताइएगा ईमेल के द्वारा। 

'सिने पहेली- 30' में कुल 26 खिलाड़ियों ने भाग लिया, जिनमें से केवल पाँच खिलाड़ी ऐसे हैं जिन्होंने इस सेगमेण्ट का एक भी एपिसोड मिस नहीं किया। और देखिए, ये ही पाँच खिलाड़ी आज स्कोरकार्ड में सबसे उपर बिराजमान हैं। अत: हम सभी खिलाड़ियों से यही निवेदन करना चाहते हैं कि अगले सेगमेण्ट से आप नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लें, इधर आपने एक एपिसोड मिस किया कि बाकी खिलाड़ी आपसे चार कदम आगे निकल गए। 

तो दोस्तों, आज बस इतना ही। 'सिने पहेली' के चौथे सेगमेण्ट की पहली कड़ी, यानी कि 'सिने पहेली' की 31वीं कड़ी के साथ मैं पुन: उपस्थित हो‍ऊँगा इसी सप्ताह शनिवार की सुबह, अर्थात्‍ 4 अगस्त को, और हम सब फिर से जुट जायेंगे चौथे सेगमेण्ट की लड़ाई में। नए खिलाड़ियों के लिए इस प्रतियोगिता के नियम हम अगले अंक में दुबारा बतायेंगे। तो ज़रूर पधारिएगा इस मज़ेदार प्रतियोगिता में। एक बार फिर से सभी विजेताओं और सभी खिलाड़ियों को बधाई और शुभकामना देते हुए आज मैं आपसे विदा लेता हूँ, फिर मिलेंगे, नमस्कार!

'सिने पहेली' की अगली कड़ी इसी शनिवार 4 अगस्त सुबह 9:30 बजे पोस्ट होगी, भाग लेना न भूलें...

रविवार, 29 जुलाई 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग- 4


स्वरगोष्ठी – ८१ में आज

रामदासी और सूर मल्हार के स्वरों से भीगी रचनाएँ



बाहर पावस की रिमझिम फुहार और आपकी ‘स्वरगोष्ठी’ में मल्हार अंग के रागों की स्वर-वर्षा जारी है। ऐसे ही सुहाने परिवेश में ‘वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग’ श्रृंखला की चौथी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करते हुए, आज प्रस्तुत कर रहा हूँ- मल्हार अंग के दो रागों- रामदासी और सूरदासी अथवा सूर मल्हार के स्वरों से अनुगूँजित कुछ चुनी हुई संगीत-रचनाएँ। दोनों रागों के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इनका नामकरण संगीत के मनीषियों के नामों पर हुआ है। पहले हम राग रामदासी मल्हार के बारे में आपसे चर्चा करेंगे।

रामदासी मल्हार

काफी ठाट के अन्तर्गत माना जाने वाला राग रामदासी मल्हार, दोनों गान्धार (शुद्ध और कोमल) तथा दोनों निषाद से युक्त होता है। इसकी जाति वक्र रूप से सम्पूर्ण होती है। अवरोह में दोनों गान्धार का प्रयोग वक्र रूप से करने पर राग का सौन्दर्य निखरता है। इसका वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राग वर्षा ऋतु के परिवेश का सजीव चित्रण करने में समर्थ होता है, इसलिए इस ऋतु में रामदासी मल्हार का गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। आइए, अब हम आपको किराना घराने के सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में राग रामदासी मल्हार का तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं।

रामदासी मल्हार : ‘छाए बदरा कारे कारे...’ : उस्ताद अमीर खाँ



राग रामदासी मल्हार के बारे में हमें विशेष जानकारी देते हुए लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय के गायन-शिक्षक श्री विकास तैलंग ने बताया कि इस राग की रचना ग्वालियर के विद्वान नायक रामदास ने की थी। इस तथ्य का समर्थन विख्यात संगीतज्ञ मल्लिकार्जुन मंसूर भी करते हैं। उनके मतानुसार नायक रामदास मुगल बादशाह अकबर से भी पूर्व काल में थे। श्री तैलंग के अनुसार राग रामदासी मल्हार में शुद्ध गान्धार के उपयोग से उसका स्वरूप मल्हार अंग से अलग व्यक्त होता है। राग का प्रस्तार वक्र गति से किया जाता है, जैसे- सा रे प ग म, प ध नि ध प, म प ग म, प ग(कोमल) म रे सा...। आजकल यह राग अधिक प्रचलन में नहीं है। इस राग का स्वरूप अत्यन्त मधुर होता है। मल्हार के म रे और रे प का स्वरविन्यास इस राग में बहुत लिया जाता है। इस राग के गायन-वादन में राग शहाना और गौड़ का आभास भी होता है। अब हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है, राग रामदासी मल्हार का गमक से परिपूर्ण वाद्य सरोद पर वादन। वादक हैं, विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अली अकबर खाँ

रामदासी मल्हार : सरोद पर आलाप और गत : उस्ताद अली अकबर खाँ



सूरदासी अथवा सूर मल्हार

मल्हार अंग के रागों की श्रृंखला का एक और उल्लेखनीय राग है- सूर मल्हार। ऐसी मान्यता है कि इस राग की रचना हिन्दी के भक्त कवि सूरदास ने की थी। इस ऋतु प्रधान राग में निबद्ध रचनाओं में पावस के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, नायिका के विरह के भाव को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। राग सूर मल्हार काफी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औडव-षाडव होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है।

इस राग की कुछ अन्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक श्री श्रीकुमार मिश्र ने बताया कि सूर मल्हार का मुख्य अंग है- सा [म]रे प म, नी(कोमल) म प, नी(कोमल)ध प, म रे सा होता है। राग के गायन-वादन में यदि सारंग झलकने लगे तो नी(कोमल) ध s म प नी(कोमल) ध s प स्वरों का प्रयोग करने से सारंग तिरोहित हो जाता है। श्री मिश्र के अनुसार सारंग के भाव में मेघ मल्हारांश उद्वेग के चपल और गम्भीर ओज से युक्त भाव में देसान्श के विरह भाव के मिश्रण से कसक-युक्त उल्लास में वेदना के मिश्रण से नये रस-भाव का सृजन होता है। अब आप पण्डित भीमसेन जोशी से सुनिए, राग सूर मल्हार में दो मनमोहक रचनाएँ। मध्यलय का खयाल- ‘बादरवा गरजत आए...’ एकताल में और द्रुतलय की रचना- ‘बादरवा बरसन लागे...’ तीनताल में निबद्ध है।

सूर मल्हार : ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागे...’ : पण्डित भीमसेन जोशी



फिल्मी संगीतकारों ने वर्षा ऋतु के इन दोनों रागों- रामदासी और सूर मल्हार, पर आधारित एकाध गीत ही रचे हैं। रामदासी मल्हार पर आधारित एक भी ऐसा गीत नहीं मिला, जिसमें वर्षा ऋतु के अनुकूल भावों की अभिव्यक्ति हो। हाँ, सूर मल्हार पर आधारित, बसन्त देसाई का संगीतबद्ध किया एक कर्णप्रिय गीत अवश्य उपलब्ध हुआ। अब हम आपको वही गीत सुनवा रहे है। १९६७ में प्रदर्शित फिल्म रामराज्य का यह गीत भरत व्यास ने लिखा, बसन्त देसाई ने संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

फिल्म रामराज्य : ‘डर लागे गरजे बदरवा...’ : लता मंगेशकर



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ में जारी संगीत-पहेली का आज से आरम्भ हो रहा है चौथा और एक नया सेगमेंट। आप जानते ही हैं कि ५१वें अंक से हमने संगीत पहेली को दस-दस अंकों की श्रृंखलाओं (सेगमेंट) में बाँटा था। पाँचवें सेगमेंट अर्थात १००वें अंक तक जो प्रतियोगी सर्वाधिक सेगमेंट का विजेता होगा, वही ‘महाविजेता’ के रूप में पुरस्कृत किया जाएगा। ७९वें अंक तक की पहेली के उत्तर हमें प्राप्त हो चुके हैं और ८०वें अंक की पहेली के उत्तर भेजने की अवधि अभी बीती नही है, अतः आज के अंक में हम सभी प्रतियोगियों के ७९वें अंक तक के कुल प्राप्तांक की घोषणा कर रहे हैं। अगले अंक में तीसरे सेगमेंट के विजेता के नाम की घोषणा, ८०वें अंक की पहेली के प्राप्तांक जोड़ कर करेंगे।

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, कण्ठ-संगीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी चौथी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि उत्तर भारतीय संगीत की यह परम्परागत शैली किस नाम से जानी जाती है?

२ – इस गीत के गायक कौन हैं?


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८३वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७९वें अंक में हमने आपको द्रुत तीनताल में निबद्ध खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गौड़ मल्हार और दूसरे का उत्तर है- गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। वाराणसी के अभिषेक मिश्रा ने राग का नाम तो सही पहचाना किन्तु गायिका को पहचानने में भूल की। उन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। सभी विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई। ७९वें अंक तक पहेली के सभी प्रतिभागियों के अंकों का योग इस प्रकार है-

१– क्षिति तिवारी, जबलपुर – १८

२- डॉ. पी.के. त्रिपाठी, मीरजापुर – १२

३– अर्चना टण्डन, पटना – ९

४– प्रकाश गोविन्द, लखनऊ – ६

५- अभिषेक मिश्रा, वाराणसी – २

५– अखिलेश दीक्षित, मुम्बई – २

५– दीपक मशाल, बेलफास्ट (यू.के.) – २

झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ में इन दिनों सप्त-स्वरों की रस-वर्षा जारी है। अगले अंक में ऋतु प्रधान मल्हार अंग के रागों से थोड़ा अलग हट कर आपसे चर्चा करेंगे। परन्तु वह वर्षा ऋतु का ही संगीत होगा। इसके साथ ही अगले अंक में संगीत-पहेली के तीसरे सेगमेंट के विजेता की घोषणा भी करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९=३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।


कृष्णमोहन मिश्र

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल -7


मैंने देखी पहली फिल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में सुनीता शानू की देखी पहली फिल्म के संस्मरण के साझीदार रहे। आज का संस्मरण रेडियो प्लेबैक इण्डिया के नियमित पाठक बैंगलुरु के पंकज मुकेश का है। यह भी प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्ठि है।

‘मैं ना भूलूँगा...’

मेरे जीवन की पहली फिल्म, जो सिनेमाघर में देखी, वो है- ‘हमसे है मुक़ाबला’। प्रभुदेवा और नगमा अभिनीत इस फिल्म में ए.आर. रहमान का संगीत था। रहमान हिन्दी फिल्मी दुनिया में उस समय नये-नये आए थे, अपनी 2-3 सफल फिल्मों (रोजा, बाम्बे आदि) के बाद। संगीत के साथ-साथ प्रभुदेवा का डांस वाकई कमाल का था। हिन्दी डबिंग के गीतकार पी.के. मिश्रा के गाने भी बहुत मक़बूल हुए थे। ये फिल्म मैंने अपने स्कूल के 2-4 दोस्तों के साथ बिना किसी इच्छा के, देखने गया था। बात उस समय की है जब यह फिल्म पहली बार परदे पर प्रदर्शित हुई और अपने शहर बनारस (वाराणसी) में लगी थी। टेलीविजन पर लगभग हर फिल्मों से सम्बन्धित कार्यक्रम जैसे-चित्रहार, countdaown शो इत्यादि में ‘हमसे है मुकाबला’ के गीत खूब प्रसारित होते थे। यह सब देख कर मन तो जरूर करता था की फिल्म देखी जाए, मगर सिनेमाघर में जा कर फिल्म देखना मेरे जैसे दसवीं कक्षा का विद्यार्थी होने तथा एक अध्यापक का पुत्र होने के नाते खुद को रोकना भी पड़ता था। कारण, कहीं पापा को बुरा न लगे। उस समय बच्चों का फ़िल्में देखना अच्छा नहीं माना जाता था और आज भी यही होता है।

२-३ महीनों बात एक अवसर मिला। वह १४अगस्त का दिन था। अगले दिन स्वतंत्रता दिवस के कारण जल्दी छुट्टी होनी थी। उस दिन हम सभी छात्र स्कूल जाते, कुछ कार्यक्रम होते, कुछ में भाग लेते, तिरंगा फहराते और फिर छुट्टी। मेरे कुछ सहपाठी लोग फिल्म देखने की योजना बना रहे थे। तभी किसी ने मुझसे पूछा- ‘क्या तुम हमारे साथ फिल्म देखने चलोगे’? मेरे लिए एक असमंजस की बात थी। आज तक कभी गया नहीं, मगर सुझाव बुरा भी नहीं था, फिर भी कहा- ‘पापा से पूछ कर बताऊंगा’। दोस्तों ने कहा- ‘ठीक है अगर चलना हो तो सारे कार्यक्रम के बाद हमारे साथ चलना, १२ से ३ वाला शो देखेंगे’। पूरा दिन बीत गया कि कैसे पापा से अनुमति मांगूं, फिल्म देखने की? क्या सोचेंगे? बच्चा कहीं बिगड़ तो नहीं रहा, कोई देशभक्ति फिल्म भी तो नहीं लगी है इस समय, जो अनुमति मांगने में मेरी मदद करे। कैसे कहूँ? फिर मैंने सोचा, कल ही तुरंत स्कूल में सारे कार्यक्रम समाप्त होते ही पापा को बता दूंगा। अगर हाँ कहेंगे, तो जाऊंगा। पापा मेरे उसी स्कूल में अध्यापक भी थे, तो कोई परेशानी भी नहीं हुई। जब पापा से कहा तो बोले- ‘कैसे जाओगे? मैंने सब कुछ सही सही बता दिया और पापा ने कहा- ‘जाओ मगर संभल कर जाना, और साथ में कुछ पैसे भी दिए। शायद पापा को लगा होगा कि बेटा कभी फिल्म देखने नहीं गया और आज पहली बार अनुरोध किया तो मना करना ठीक नहीं होगा। मैं बहुत खुश हुआ था। हम सभी लोग अपनी अपनी साइकल से अपने स्कूल के ड्रेस- सफ़ेद रंग के शर्ट, पैंट, पी.टी.शू वाले सफ़ेद जूते मोज़े और शर्ट की जेब पर लगे प्लास्टिक के एक तिरंगे प्रतीक समेत सिनेमाघर की ओर चल पड़े। १०:३० बजे स्कूल से रवाना हुए और बीच में इधर उधर घूमते-रुकते ११:३० बजे मलदहिया स्थित आनंद मंदिर सिनेमाघर। उन दिनों टिकट-दर ८, १०, और बालकनी का १२ रुपये हुआ करता था।

फिल्म शुरु होने से पहले हम सभी के मन में दो बातें उत्सुकतावश घर कर गई थी। पहली, ये कि फिल्म "हम से है मुकाबला" एक तमिल फिल्म "कादलन" का हिंदी रूपांतरण था, इस तरह से हिंदी में संवाद रूपान्तरण के कारण सभी पात्रों के होंठों के हिलने में अंतर मिलेगा, क्योंकि संवाद मूलतः तमिल भाषा में थे और अगर हिंदी में सभी संवाद बनाये गए होंगे तो किस तरह से तमिलभाषी लोग हिंदी बोल पा रहे हैं। दूसरी बात यह थी की इस फिल्म के दो गीत "उर्वशी उर्वशी..." तथा "मुक्काला मुकाबला होगा..." में प्रभुदेवा की नृत्य गति बहुत तेज़ थी और ऐसा हम लोग सोचते थे कि पहले इन दोनों गानों का पूरा डांस देखेंगे फिर सोचेंगे की ऐसा डांस हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार गोविंदा कर पायेंगे या नहीं, क्योंकि टेलीविजन पर केवल बेस्ट सीन ही दिखाते। फिल्म पूरी देखने के बाद यकीन हुआ कि प्रभुदेवा का "फास्ट डांस" में कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

लीजिए, पंकज मुकेश की देखी पहली फिल्म ‘हमसे है मुक़ाबला’ से एक बेहद लोकप्रिय गीत- "उर्वशी उर्वशी..."

आपको पंकज मुकेश जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे swargoshthi@gmail.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

परिवर्तन - एक बोझ या सहज चलन जीवन का

शब्दों की चाक पर - एपिसोड 08

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

चलिए अब लौटते हैं अभिषेक ओझा और शैफाली गुप्ता की तरफ जो आज आपके लिए लेकर आये हैं परिवर्तन और परिवर्तन के परिणामस्वरूप उपजे बोझ पर एक काव्यात्मक चर्चा जिसमें भाग ले रहे हैं १८ कवि. आज के कार्यक्रम की स्क्रिप्ट लिखी है हमारे प्लेबैक इंडिया के प्यारे सदस्य विश्व दीपक ने. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)





या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 

सोमवार, 23 जुलाई 2012

"आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं...", आज की 'सिने पहेली' समर्पित है राजेश खन्ना की पुण्य स्मृति को


सिने-पहेली # 30 (23 जुलाई, 2012) 


रेडियो प्लेबैक इण्डिया के साप्ताहिक स्तंभ 'सिने पहेली' के सभी पाठकों और प्रतियोगियों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! आज की यह कड़ी समर्पित है हिंदी फ़िल्म जगत के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना की पुण्य स्मृति को। एक साधारण कद-काठी के इंसान और अत्यंत साधारण चेहरे के धनी होने के बावजूद अपनी अभिनय क्षमता, अपने मैनरिज़्म और मनभावन मुस्कान की वजह से राजेश खन्ना बने इस देश का पहला-पहला सुपरस्टार। वैसे देखा जाए तो राजेश खन्ना के सफलतम फ़िल्मों का समयकाल बहुत अधिक लम्बा नहीं है। उनकी सुपरहिट फ़िल्मों का दौर 1967 से लेकर 1977 तक चला। लेकिन इस छोटे से समयकाल में उनकी इतनी सारी कामयाब फ़िल्में बनीं और उन्होंने सर्वसाधारण के दिलों पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि महज़ अभिनेता से वो एक लीजेंड बन गए। आज उनके जाने के बाद बार-बार उनकी अमर फ़िल्म 'आनंद' का वही अंतिम दृश्य आँखों के सामने उमड़ रहा है, जिसे याद करते हुए आँखें नम हो रही हैं। आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं।

आइए आज 'सिने पहेली' में आपसे पूछें बॉलीवूड के काका, राजेश खन्ना से जुड़े कुछ सवाल, उनकी फ़िल्मों और गीतों से जुड़ी कुछ पहेलियाँ। देखते हैं आप कितना जानते हैं काका को! जैसा कि पिछली कड़ी में हमने सूचित किया था, आज की कड़ी में हम पूछेंगे 10 सवाल, और हर सवाल के होंगे 10 अंक। अर्थात् आज की कड़ी के कुल अंक हैं पूरे 100। तो शुरू करें?


पहेली-1: बूझो तो जाने


राजेश खन्ना पर फ़िल्माया हुआ एक सुपरहिट गीत है जिसके मुखड़े और अंतरों में निम्नलिखित शब्द मौजूद हैं जो हिंदी फ़िल्मों के शीर्षक भी हैं।

ख़ुशबू, दिल, करम, मर्यादा, प्यार, वफ़ा, बेताब, जवानी, ज़िंदगी 

क्या आप इस गीत को पहचान सकते हैं?


पहेली-2: गान पहचान


राजेश खन्ना पर फ़िल्माया हुआ मोहम्मद रफ़ी का गाया एक मशहूर गीत है जिसके तीन अंतरों का अंग्रेज़ी में अनुवाद इस तरह से है।

"Night is yet to pass. There are still many moments left in the night. Even after achieving you, the passion to achieve you is still left."

"If your body's colour will scatter in the seasons, your beauty will brighten than before. The world is very jealous but not so much. If you come in my hug, time will stop." 

"I'll offer my life at your feet now. Oh, beauty, I'll make you divine."


बताइये यह किस गीत के अंतरों का अनुवाद है।


पहेली-3: पहचान कौन!


राजेश खन्ना ने जिन तीन अभिनेत्रियों के साथ सर्वाधिक सफल काम किया है, वो हैं शर्मीला टैगोर, आशा पारेख और मुमताज़। लेकिन कई और अभिनेत्रियों के साथ भी उनकी बहुत सारी फ़िल्में बनीं हैं। नीचे चित्र को ध्यान से देखिये और बताइए कि यह किस अभिनेत्री के बाल्यकाल की तसवीर है और एक ऐसी फ़िल्म का नाम बताइए जिसमें राजेश खन्ना ने इस अभिनेत्री के साथ काम किया है। 



पहेली-4: पहेली में पहेली


राजेश खन्ना पर फ़िल्माये इस गीत में पहेलियों की लड़ाई चल रही है। इस गीत में राजेश खन्ना जिस अभिनेत्री के साथ पहेलियों की लड़ाई लड़ रहे हैं, वो इस फ़िल्म में उनकी नायिका नहीं हैं। बताइए यह किस गीत की बात हो रही है? 

पहेली-5: मिलते-जुलते


१. इन दोनों फ़िल्मों में राजेश खन्ना नायक हैं और नायिका भी एक ही अभिनेत्री हैं।
२. दोनों फ़िल्मों के संगीतकार एक हैं।
३. दोनों फ़िल्मों की कहानी का पार्श्व या मूल मुद्दा एक जैसा है।
४. दोनों फ़िल्मों में किसी एक गीत के दो संस्करण हैं, एक पुरुष कंठ में और एक महिला कंठ में।

बताइए राजेश खन्ना अभिनीत किन दो फ़िल्मों की बात हो रही है?


पहेली-6: सुनिए तो...


नीचे प्लेयर पे क्लिक करके सुनिए राजेश खन्ना पर फ़िल्माए हुए एक गीत का शुरुआती संगीत, और पहचानिए गीत को।




पहेली-7: खोज-बीन


नीचे दिखाए गए वर्ग पहेली जैसे चित्र में राजेश खन्ना अभिनीत एक फ़िल्म का नाम छुपा हुआ है। यह नाम उपर से नीचे या बायें से दायें हो सकता है। क्या आप उस फ़िल्म शीर्षक को खोज सकते हैं?




पहेली-8: फटा पोस्टर निकला हीरो


नीचे दिया हुआ चित्र राजेश खन्ना की एक फ़िल्म का पोस्टर है, जिसमें फ़िल्म का नाम हमने छुपा दिया है। आपको बताना है कि यह किस फ़िल्म का पोस्टर है?



पहेली-9: क्या डायलॉग है!


राजेश खन्ना का एक मशहूर संवाद है जो अंग्रेज़ी में है, और जिसका भाव कुछ इस तरह का है - "सादगी को अपना कर कितनी आसानी से ख़ुश रहा जा सकता है, पर सादगी को अपनाना कितना कठिन है"। क्या आप बता सकते हैं कि अंग्रेज़ी का मूल संवाद राजेश खन्ना के किस फ़िल्म का है?

पहेली-10: आख़िरी सवाल!


चलते चलते बस एक और सवाल काका के नाम। एक ऐसा फ़िल्मी गीत बताइए जिसमें राजेश खन्ना का ज़िक्र है।


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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

२. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 30" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम व स्थान लिखें।

३. आपका ईमेल हमें शनिवार 28 जुलाई शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद की प्रविष्टियों को शामिल कर पाना हमारे लिए संभव न होगा। 

४. आप अपने जवाब एक ही ईमेल में लिखें। किसी प्रतियोगी का पहला ईमेल ही मान्य होगा। इसलिए सारे जवाब प्राप्त हो जाने के बाद ही अपना ईमेल भेजें।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। महाविजेता बन कर 5000 रुपये के नकद इनाम पर लगाइए अपने नाम का मोहर!


'सिने पहेली - 29' के सही जवाब


१. कौन हूँ मैं क्या नाम है मेरा, मैं कहाँ से आई हूँ, मैं परियों की शहज़ादी मैं आसमाँ से आई हूँ (दर्द का रिश्ता)

२. एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा (1942 - A Love Story)

३. झील रखूँ कंवल रखूँ कि जाम रखूँ, तेरी आँखों का क्या नाम रखूँ (तीसरा किनारा)

४. रे मामा रे मामा रे (अंदाज़)


'सिने पहेली - 29' का परिणाम


इस सप्ताह 'सिने परिवार' से तीन नई खिलाड़ी जुड़ी हैं - सोनभद्र, यू.पी से नीरजा श्रीवास्तव, नई दिल्ली से तरुशिखा सुरजन और देहरादून से अदिति चौहान। आप सभी का हार्दोदिक स्वागत है इस प्रतियोगिता में।  सवालों के जवाब देते हुए अदिति जी लिखती हैं, "मुझे तो सिर्फ़ पार्टिसिपेट करने का ही शौक है। वैसे भी जहाँ गोविंद सर और अल्पना मैडम जैसे जीनीयस हों तो हम जैसे कहाँ? हम अब इस पहेली में लगातार पार्टिसिपेट करेंगे।" अदिति जी, आपके इस स्पोर्टस्मैन स्पिरिट देख कर बहुत अच्छा लगा, और गोविंद सर और अल्पना मैडम, आप दोनों ने ग़ौर किया अदिति जी की टिप्पणी पर? ख़ैर, ये रहे इस सप्ताह के परिणाम...

1. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 16 अंक

2. अल्पना वर्मा, अल-आइन, यू.ए.ई --- 16 अंक

3. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 16 अंक

4. रीतेश खरे, मुंबई --- 16 अंक

5. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 16 अंक

6. नीरजा श्रीवास्तव, सोनभद्र (यू.पी) --- 16 अंक

7. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 16 अंक

8. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 16 अंक

9. तरुशिखा सुरजन, नई दिल्ली --- 12 अंक

10. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 12 अंक

11. अदिति चौहान, देहरादून --- 8 अंक

सभी प्रतियोगियों को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। 

'सिने पहेली' प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेण्ट में अब तक का सम्मिलित स्कोर-कार्ड यह रहा...



विजय कुमार व्यास जी लगातार उपर चढ़ते जा रहे हैं। इस सेगमेण्ट की चौथी कड़ी से शुरुआत करने के बावजूद वो आज पहुँच चुके हैं छठे पायदान पर। हमें पूरी उम्मीद है कि विजय जी अगले सेगमेण्ट में अन्य खिलाड़ियों को कड़ी चुनौती देंगे।

तो आज बस इतना ही। अगले सोमवार (30 जुलाई) को तीसरे सेगमेण्ट के फ़ाइनल परिणाम लेकर हम फिर उपस्थित होंगे, पर 'सिने पहेली' का 31-वाँ अंक प्रस्तुत होगा शनिवार 4 अगस्त के दिन। 'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, आपकी और मेरी दोबारा मुलाक़ात होगी अगले सोमवार इसी स्तंभ में। स्वर्गीय राजेश खन्ना को पुन: श्रद्धांजली अर्पित करते हुए मैं आप से विदा ले रहा हूँ, नमस्कार!

प्लेबैक इंडिया वाणी (8) फ्रॉम सिडनी विद लव, तमस और आपकी बात

संगीत समीक्षा - फ्रॉम सिडनी विद लव



आने वाले दिनों में एक नयी फिल्म आने वाली है फ्रॉम सिडनी विद लव. बहुत सारे नवोदित कलाकार इसमें दिखाई देंगे. 

इस फिल्म की स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक तक अपनी पहली पारी की शुरुआत  करने जा रहे हैं. इस फिल्म का संगीत दिया है मेरे ब्रदर की दुल्हन से चर्चित हुए सोहेल सेन और  थोर पेट्रिज और नबीन लस्कर ने. 

इस एल्बम का पहला गाना फीलिंग लव इन सिडनी, इलेक्ट्रॉनिक साउंड के साथ हिप होप फीलिंग देता है.गाने का संगीत मधुर है. कानों को सुनने में अच्छा लगता है. पार्टियों में आने वाले दिनों में बहुत बजेगा ये.

अगला गाना हो जायेगा , मोहित चौहान और मोनल ठाकुर की आवाज में है. आपको इस गाने में ज्यादा धूम धडाका नही मिलेगा जो आजकल के गानों में रहता है.

अगला गाना भांगडा स्टाइल का गाना है. खटका खटका गाने को मीका सिंह ने अपने आवाज से मस्ती में झूमने वाला बना दिया है. इस गाने में इस्तेमाल हुई ढोल की बीट्स और इलेक्ट्रॉनिक साउंड आपको नाचने के लिए मजबूर कर देंगी.

बंगाली शब्दों के साथ  पलक  नैनो ने गाने की शुरुआत करती हैं. मोहम्मद सलामत ने उनके साथ बखूबी निभाया है. गाना बहुत मधुर है. इस एल्बम का मुझे ये सबसे मधुर गाना लगा है. एक परफेक्ट गाना है जिसे सुनकर आप अपने साथी के साथ मानसून क स्वागत कर सकते हैं.

अगला गाना आइटम ये हाय फाय नीरज श्रीधर  की आवाज में है. गाना ठीक ठाक है. ये गाना भी एक डांस सोंग है.

अंत में गाना है प्यारी प्यारी. ब्रुकलीन शांती ने इसमें केलिप्सो का टेस्ट दिया है, जो एफ्रो केरेबियन स्टाइल का संगीत है जिसकी उत्पत्ति हुई त्रिनिडाड और टोबैगो में.


कुल मिलाकर इस फिल्म का संगीत सुनने लायक है. रेडियो प्लेबैक इंडिया इसे देता है ३.५ के रेटिंग.   

 
तमस   
'सुनते हैं सुअर मारना बड़ा कठिन काम है. हमारे बस का नहीं होगा हुजूर. खाल-बाल उतारने का काम तो कर दें. मारने का काम तो पिगरी वाले ही करते हैं.' पिगरी वालों से करवाना हो तो तुमसे क्यों कहते?'यह काम तुम्ही करोगे.'' और मुराद अली ने पाँच रुपए का चरमराता नोट निकाल कर जेब में से निकाल कर नत्थू के जुड़े हाथों के पीछे उसकपी जेब में ढूँस दिया था.'
'प्रकाशो की आँखें क्षण भर के लिए अल्लाह रक्खा के चेहरे पर ठिठकी रहीं, फिर उसने धीरे से मिठाई का टुकड़ा उठाया. टुकड़े को हाथ में ले लेने पर भी वह उससे उठ नहीं रहा था. प्रकाशो का चेहरा पीला पड़ गया था और हाथ काँपने लगा था मानो उसे सहसा बोध हुआ कि वह क्या कर रही है और उसका माँ-बाप को पता चले तो वे क्या कहेंगे. पर उसी वक्त आग्रह और उन्माद से भरी अल्लाह रक्खा की आँखों ने उसकी ओर देखा और प्रकाशो का हाथ अल्लाहरखा के मुँह तक जा पहुँचा.'
ये अंश हैं १९७५ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उपन्यास तमस से. तमस भीष्म साहनी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है. वे इस उपन्यास से साहित्य जगत में बहुत लोकप्रिय हुए थे. १९८६ में गोविंद निहलानी ने दूरदर्शन धारावाहिक तथा एक फ़िल्म भी बनाई थी.
इस उपन्यास में आजादी के ठीक पहले भारत में हुए साम्प्रदायिकता के नग्न नर्तन का अंतरंग चित्रण है. 'तमस' केवल पाँच दिनों की कहानी है. वहशत में डूबे हुए पाँच दिनों की कहानी को भीष्म साहनी ने इतनी कुशलता से बुना है कि सांप्रदायिकता का हर पहलू तार-तार उद्घाटित हो जाता है और हर पाठक एक साँस में सारा उपन्यास पढ़ने के लिए बाध्य हो जाता है. उपन्यास में जो प्रसंग संदर्भ और निष्कर्ष उभरते हैं, उससे यह पांच दिवस की कथा न होकर बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के अब तक के लगभग सौ वर्षो की कथा हो जाती है. आजादी के ठीक पहले सांप्रदायिकता की बैसाखियाँ लगाकर पाशविकता का जो नंगा नाच इस देश में नाचा गया था, उसका अंतरग चित्रण भीष्म साहनी ने इस उपन्यास में किया है.
भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एक युग पुरानी है और इसके दानवी पंजों से अभी तक इस देश की मुक्ति नहीं हुई है. आजादी से पहले विदेशी शासकों ने यहाँ की जमीन पर अपने पाँव मजबूत करने के लिए इस समस्या को हथकंडा बनाया था और आजादी के बाद हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल इसका घृणित उपयोग कर रहे हैं. और इस सारी प्रक्रिया में जो तबाही हुई है उसका शिकार बनते रहे हैं वे निर्दोष और गरीब लोग जो न हिन्दू हैं, न मुसलमान बल्कि सिर्फ इन्सान हैं, और हैं भारतीय नागरिक. भीष्म साहनी ने आजादी से पहले हुए साम्प्रदायिक दंगों को आधार बनाकर इस समस्या का सूक्ष्म विश्लेषण किया है और उन मनोवृत्तियों को उघाड़कर सामने रखा है जो अपनी विकृतियों का परिणाम जनसाधारण को भोगने के लिए विवश करती हैं
राजकमल प्रकाशन ने इस उपन्यास को प्रकाशित करा है. आपकी अपनी लायब्रेरी के लिए यह एक एतिहासिक संग्रह है.  
 
  और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

रविवार, 22 जुलाई 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग- 3


स्वरगोष्ठी – ८० में आज

गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’

‘स्वरगोष्ठी’ के एक और सुहाने, हरियाले और रिमझिम फुहारों से युक्त अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र उपस्थित हूँ। मल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। आज के अंक में हम आपको ऐसे ही भावों से युक्त कुछ मोहक रचनाएँ सुनवाएँगे। साथ ही राग गौड़ मल्हार के स्वरूप के बारे में संक्षिप्त जानकारी भी आपसे बाँटेंगे। परन्तु आगे बढ़ने से पहले आइए, राग गौड़ मल्हार की एक पारम्परिक बन्दिश- ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ का आनन्द लेते है। यह बन्दिश पहले आप विदुषी मालविका कानन के स्वरों में सुनिए।

राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालविका कानन



राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो कुछ इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। अभी आपने विदुषी मालविका कानन के स्वरों में आपने जिस बन्दिश का रसास्वादन किया है वह भी विलावल थाट के अन्तर्गत है। आइए अब हम आपको यही बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में थोड़ी बढ़ी हुई लय में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।

राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर



राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको युवा सितार-वादक अभीक मुखर्जी का बजाया राग गौड़ मल्हार में संक्षिप्त आलाप और उसके बाद तीनताल में निबद्ध एक बन्दिश सुनवाते हैं।

सितार पर राग गौड़ मल्हार : आलाप और तीनताल की बन्दिश : अभीक मुखर्जी



फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने १९५१ में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की उसी बन्दिश का चुनाव किया, जिसे ऊपर आपने दो प्रख्यात गायिकाओं से आपने अभी सुना है। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। इस बार फिल्म और उसका संगीत, दोनों सफल सिद्ध हुआ। आइए अब आपको फिल्म ‘बरसात की रात’ का वही गीत सुनवाते हैं, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म- बरसात की रात : ‘गरजत बरसत सावन आयो...’ : सुमन कल्याणपुर और कमल बारोट



आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, राग आधारित एक फिल्मी गीत का अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत के संगीतकार कौन है?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८२वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के उत्तर

‘स्वरगोष्ठी’ के ७८वें अंक की पहेली में हमने आपको १९९८ की फिल्म ‘साज’ का एक गीत सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार और दूसरे का सही उत्तर है- गायिका कविता कृष्णमूर्ति। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। इन दोनों प्रतिभागियों को दो-दो अंक दिये जा रहे हैं। मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग की पहचान करने में भूल की, परन्तु गायिका कविता कृष्णमूर्ति के स्वरों को ठीक पहचाना। इसलिए श्री त्रिपाठी को एक अंक प्रदान किया जा रहा है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

भूल सुधार

पिछले सप्ताह ७७वें अंक की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा करने में हमसे एक चूक हो गई थी। इस पहेली के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर देकर बेलफास्ट (यू.के.) के दीपक मशाल ने भी दो अंक अर्जित किये हैं। विजेताओं की सूची में दीपक जी को शामिल करते हुए इस भूल के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक से हमने मल्हार के एक और प्रकार का आनन्द लिया। अगले अंक में भी हम यह सिलसिला जारी रखते हुए मल्हार के एक अन्य प्रकार की चर्चा करेंगे। वर्षा ऋतु से सम्बन्धित कोई राग अथवा रचना आपको प्रिय हो और आप उसे सुनना चाहते हों तो आज ही अपनी फरमाइश हमें मेल कर दें। इसके साथ ही यदि आप इनसे सम्बन्धित आडियो ‘स्वरगोष्ठी’ के माध्यम से संगीत-प्रेमियों के बीच साझा करना चाहते हों तो अपना आडियो क्लिप MP3 रूप में भेज दें। हम आपकी फरमाइश को और आपके भेजे आडियो क्लिप को ‘स्वरगोष्ठी’ आगामी किसी अंक में शामिल करने का हर-सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए।

कृष्णमोहन मिश्र

शनिवार, 21 जुलाई 2012

पार्श्वगायक मुकेश के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति


सावन का महीना और मुकेश का अवतरण


हिन्दी फिल्मों में १९४१ से १९७६ तक सक्रिय रहने वाले मशहूर पार्श्वगायक स्वर्गीय मुकेश फिल्म-संगीत-क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ठ स्तर की गायकी के लिए हमेशा याद किये जाते रहे हैं। हिन्दी फिल्मों में उन्हें सर्वाधिक ख्याति उनके गाये दर्द भरे नगमों से मिली। इसके अलावा उन्होने कई ऐसे गीत भी गाये हैं, जो राग आधारित गीतों की श्रेणी में आते हैं। २२ जुलाई, २०१२ को मुकेश जी का ८८-वां सालगिरह है। आज उनके जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर रेडियो प्लेबैक इंडिया के नियमित पाठक और मुकेश के अनन्य भक्त पंकज मुकेश, इस विशेष आलेख के माध्यम से मुकेश के गाये गीतों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही आपको सुनवा रहे हैं उनके गाये कुछ सुमधुर गीत।


मित्रों, मानसून के आने से ऋतुओं की रानी वर्षा, अपने पूरे चरम पर विराजमान है। दरअसल सावन के महीने और पार्श्वगायक मुकेश के बीच सम्बन्ध बहुत ही गहरा है। मुकेश जी की बहन चाँद रानी के अनुसार २२जुलाई, १९२३ को रविवार का दिन था, धूप खिली थी और मुकेश के जन्म के साथ ही अचानक सावन की रिमझिम बूँदें बरस पड़ीं और पूरा माहौल खुशनुमा हो गया। आइये शुरुआत करते हैं उन्हीं के गाये एक गीत से जो अक्सर घर पर किसी बच्चे के जन्म पर गया जाता है और हर माता-पिता अपने नवजात शिशु से ऐसी ही आशाएं लगाते होंगे जो इस गीत में विद्यमान है।

फिल्म ‘मन मन्दिर’ : "ऐ मेरे आँखों के पहले सपने..." : सहगायिका लता मंगेशकर 


आज पूरे भारतवर्ष में मुकेश को "दर्द भरे गीतों का जादूगर" कहा जाता है मगर राग आधारित गीतों से भी उनका लगाव रहा है। जब किसी एक साक्षात्कार में मुकेश जी से पूछा गया कि- "आप ने यूं तो सैकड़ों गाने गाये हैं मगर आप को किस तरह के गीत सबसे ज्यादा पसंद हैं?" इस पर उनका जवाब था- "अगर मुझे दस लाइट सॉंग (हलके फुल्के गाने) मिले और एक सैड (दर्द भरा गीत) मिले तो मैं दस लाइट छोड़कर एक सैड पसंद करूँगा और अगर मुझे दस सैड गाने मिले और एक क्लासिकल (शास्त्रीय), तो मैं दस सैड छोड़ कर एक क्लासिकल पसंद करूँगा!" तो आइये उन्ही का गाया एक राग आधारित गीत सुनवाते हैं। १९४८ में नौशाद के संगीत निर्देशन की एक फिल्म थी ‘अनोखी अदा’। इस फिल्म में मुकेश ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित एक बेहद सुरीला गाना गाया था- ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’। इस राग पर आधारित जो भी स्तरीय गीत अब तक बने हैं, उनमें यह गीत भी शामिल है। फिल्म में मुकेश के गाये इस गीत का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसे शमशाद बेगम ने गाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि गीत के दोनों संस्करण में दरबारी के सुर स्पष्ट उभर कर आते हैं।

फिल्म ‘अनोखी अदा’ : ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’ : राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित



यह भी एक विचित्र संयोग है कि मुकेश ने राग तिलक कामोद पर आधारित लगभग ७-८ गाने गाये हैं और ये सभी गाने बहुत लोकप्रिय हुए है। अब आइये आपको सुनवाते हैं, राग तिलक कामोद पर आधारित उनके प्रारंभिक दौर का एक सुमधुर गीत, जो उनके जीवन का पहला हिट गीत- "दिल जलता है तो जलने दे" (पहली नज़र) के आने से कुछ महीने पहले का है। फ़िल्म 'मूर्ति' का यह गीत राग तिलक कामोद पर आधारित है और इस गीत में उनकी सह-गायिकाएँ है- खुर्शीद और हमीदा बानो। संगीत बुलो सी रानी का है।

फिल्म ‘मूर्ति’ : "बदरिया बरस गई उस पार..." : राग तिलक कामोद पर आधारित



दोस्तों, समय सावन के महीने का है और मुकेश जी का जन्म भी इसी महीने में हुआ था, तो क्यूँ न सावन के मौसम पर उनका कोई गीत सुन लें। ऐसे अवसर के लिए सबसे पहला गीत जो हर किसी संगीत-प्रेमी या मुकेश-प्रेमी के मन में आता होगा, वह है फ़िल्म 'मिलन' का गीत "सावन का महीना पवन करे सोर..."। इस गीत के शुरुआत में आपने मुकेश और लता के बीच का संवाद जरूर पसंद किया होगा। कितने आश्चर्य की बात है कि लता जी "शोर" शब्द का सही उच्चारण कर रही हैं, मगर मुकेश हैं कि उन्हें "शोर" के बजाय "सोर" कहने के लिए आग्रह कर रहे हैं। दरअसल फिल्म की कहानी के अनुसार ही ऐसा संवाद रखा गया है, जिसमें नायक गाँव का एक भोला-भाला, अनपढ़ इंसान है जो नायिका को गाने की शिक्षा दे रहा है, और पूरे उत्तर भारत के गाँवों के लोग 'श' को 'स' उच्चारण करते है, जिसको परदे पर और परदे के पीछे बखूबी प्रस्तुत किया गया है। इस गीत से जुड़ी परदे के पीछे की एक और बात मैं आप सब को बताना चाहता हूँ। हमारे साथी राजीव श्रीवास्तव (लेखक, कवि, गीतकार और फिल्मकार) जब संगीतकार-जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के प्यारेलाल जी से पूछा तो पता चला कि जब ये गीत रिकॉर्ड होना था, उसी दौरान मुकेश जी को दिल का दौरा पड़ गया। अस्पताल से उपचार के बाद गाना रिकॉर्ड होना था, सभी तैयारियां हो गई। लता और मुकेश दोनों ने अभ्यास कर लिया। मगर आज हम इस गीत को जिस प्रकार सुनते हैं, शायद उसका प्रारूप ऐसा न होता, अगर मुकेश जी न होते। असल में जब नायक, नायिका को गाने का अभ्यास करा रहा था, उस समय आलाप, नायक को अर्थात्‍ मुकेश जी को लेना था। मगर उनकी बीमारी को ध्यान में रखते हुए संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी में यह हिम्मत नहीं हुई कि आलाप के लिए उनसे आग्रह करें, जो मुकेश के लिए कष्टदायक हो सकता था। मगर मुकेश जी संगीत के प्रति समर्पित जीवट के गायक थे। वो इस बात को भली-भांति जान गए और अभ्यास के दौरान लता से शर्त भी रख ली कि अगर मेरा आलाप उपयुक्त नहीं हुआ तो वो लता को १०० रुपये देंगे, नहीं तो लता देंगी। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी को इस बात की बिलकुल भनक भी नहीं हुई कि कुछ बदलाव भी होने वाला है। गाना रिकॉर्ड होने से ठीक पहले वायदे के मुताबिक मुकेश जी ने अपने बटुवे से १०० रुपये का एक नोट निकाल कर, लता को चुपके से इशारा करते हुए शर्ट की जेब में डाल लिया। गाना शुरू हुआ, दोनों लोग गाने लगे, पहला अंतरा अपने अनुसार हुआ मगर जैसे ही दूसरा अंतरा पूरा हुआ, मुकेश जी ने आलाप लेना शुरू कर दिया। यह निश्चित किया गया था कि आलाप के स्थान पर वाद्य यंत्रों से भर दिया जाएगा। मुकेश के आलाप करते ही सब चौंक गए, किन्तु रेकार्डिंग जारी रहा। गाने की रेकॉर्डिंग समाप्त होने पर पता चला कि संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल यही चाहते भी थे। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत आप भी सुनिए।

फिल्म ‘मिलन’ : "सावन का महीना पवन करे सोर..." राग पहाड़ी पर आधारित

दोस्तों, मुकेश जी को जहाँ हम दर्द भरे गीतों का गायक मानते हैं, वहीँ संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी उन्हें "अपने गीतों का सही गवैया" मानते हैं। जब फिल्म सरस्वती चन्द्र का गीत "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड होना तय हुआ तो किसी शास्त्रीय गायक ने कल्याणजी से कहा- "हम जैसे सुरों के साधक बसों में धक्के खाते फिरते है और मुकेश एक फिल्मी पार्श्वगायक होकर मर्सिडीज़ में कैसे चलते हैं? उस वक्त तो कल्याणजी चुप रहे, मगर गाना रिकॉर्ड होने के बाद जब उन्हें सुनाया तो बोले "अब समझ में आया मुकेश मर्सिडीज़ में क्यों चलते हैं”? मुकेश बिना किसी ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) के राग आधारित गीत खूब गा लेते थे। दरअसल ये मुकेश जी का शास्त्रीय संगीत के प्रति लगाव ही था जो ऐसे गीत उनके होंठ लगते ही सुसज्जित हो उठते हैं। गायन की जो कुछ भी शिक्षा उन्होंने पायी, वो शुरुआती दिनों (१९४०-१९४५) में पंडित जगन्नाथ जी से मिली। अब आपको जो गीत सुनाया जा रहा है, वह राग कल्याण पर आधारित है।

फिल्म ‘सरस्वती चन्द्र’ : "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." : राग कल्याण पर आधारित



संगीतकार रोशन और गायक मुकेश न केवल फ़िल्मी दुनिया में एक दूसरे के व्यावसायिक तौर पर मित्र थे अपितु दोनों बचपन में एक ही विद्यालय के सहपाठी भी थे। जब भी कभी कोई विद्यालय में संगीत, नाटक इत्यादि कार्यक्रम का आयोजन होता, दोनों लोग ज़रूर शरीक होते। जहाँ मुकेश गीत गाते वहीँ रोशन संगीत की बागडोर सँभालते, उनका बखूबी साथ निभाते थे। तो आइये क्यूँ न एक बहुत ही लोकप्रिय गीत सुना जाये जो इन दो कलाकारों द्वारा सृजित किया गया है। इस गीत के बनने का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है। इन्दीवर के लिखे इस गीत के लिए रोशन ने कुछ धुन तैयार की थी मगर उन्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा था। यूँ लगता था मानो कुछ कमी है, कुछ नया होना चाहिए जो उस समय के माझी, नाव, नदी आदि गीतों की धुनों से अलग हो। करीब पूरा महीना बीत गया मगर कुछ बात नहीं बनी। ऐसे में अचानक एक दिन रोशन, मुकेश और इन्दीवर के साथ अपना हारमोनियम लेकर कार से सैर पर निकले। एक जगह तालाब दिखा तो बैठ कर कुछ क्षण बिताने का मन हुआ। रोशन ने जैसे ही अपना पांव तालाब के शीतल जल में डाला, अचानक दोनों साथियों से बोल पड़े- "धुन बन रही है", जल्दी से कार से हारमोनियम लाये और वहीँ बैठे तीनों ने मिल कर गीत के संगीत की रचना कर डाली। अगले ही दिन स्टूडियो में जाकर यह गीत रिकॉर्ड हो गया। यह गीत लोक-धुन की सोंधी खुशबू से सराबोर है।

फिल्म ‘अनोखी रात’ : “ओह रे ताल मिले नदी के जल में..." : लोक संगीत पर आधारित

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मुकेश के गाये गीतों में राग-आधारित अनेक गीत लोकप्रिय हुए। इन गीतों में राग भैरवी और तिलक कामोद के स्वरों में गाये गीतों की संख्या अधिक हैं। ये दोनों राग उनकी आवाज़ में बहुत अच्छे भी लगते हैं। अब चलते-चलते राग भैरवी के सुरों पर आधारित एक प्यारा सा गीत आपको सुनाते हैं। यह गीत 1966 की फिल्म तीसरी कसम का है, जिसे मुकेश ने अपना स्वर दिया था। बीच-बीच में राज कपूर की आवाज भी है। इस गीत में लोक संगीत का स्पर्श है और भैरवी के स्वर भी मौजूद हैं।

फिल्म ‘तीसरी कसम’ : “दुनिया बनाने वाले..." : राग भैरवी पर आधारित

शोध व आलेख- पंकज मुकेश

इसी गीत के साथ हम सब गायक मुकेश को अपनी भावांजलि अर्पित करते है। अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए radioplaybackindia@live.com पर मेल भेजें।

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