रविवार, 18 मार्च 2012

चैत्र मास और चैती का रंग

स्वरगोष्ठी – ६२ में आज

‘सेजिया से सइयाँ रूठि गइलें हो रामा.....’

भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में पूरे उत्तर भारत में चैती-गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मंदिरों में चैती के स्वर गूँजने लगते हैं।

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। मित्रों, भारतीय संगीत के अक्षय भण्डार में ऋतु-प्रधान गीत-संगीत का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बसन्त ऋतु से आरम्भ होकर पावस ऋतु की समाप्ति तक देश के हर क्षेत्र और हर आंचलिक बोलियों में, प्रकृति के हर बदलाव को रेखांकित करते ग्राम्य-गीतों का खजाना है। होलिका-दहन के अगले दिन से ही भारतीय पंचांग का चैत्र मास आरम्भ हो जाता है। प्रकृति में ग्रीष्म का प्रभाव बढ़ने लगता है और खेतों में कृषक का श्रम सार्थक नज़र आने लगता है। ऐसे परिवेश में जनजीवन उल्लास से परिपूर्ण होकर गा उठता है। उत्तर भारत में इस गीत को चैती, चैता या घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक-गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच भी समान रूप लोकप्रिय है। आइए, सबसे पहले आपको सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र के स्वरों में एक परम्परागत चैती सुनवाते है, जिसमें आपको संगीत की दोनों शैलियों का परिचय मिलेगा। पण्डित जी ने चैती गायन के साथ-साथ इन गीतों की विशेषताओं पर चर्चा भी की है।

चैती : ‘सेजिया से सइयाँ रूठि गइलें हो रामा...’ : स्वर – पण्डित छन्नूलाल मिश्र

चैती गीतों का मूल स्रोत तो लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत में भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य-विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति-रस की प्रधानता भी होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में राम-जन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। आइए, अब हम आपको सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे की शिष्या धनाश्री घैसस के स्वरों में बनारसी अंदाज़ की एक मोहक चैती सुनवाते हैं।

चैती : ‘नैहर से केहु नाहीं अइले हो रामा...’ : स्वर - धनाश्री घैसस



चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती-धुन के स्वरों और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती-गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ १४ मात्रा के दीपचंदी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। आइए, अब वाद्य-संगीत के माध्यम से चैती का आनन्द प्राप्त किया जाए। हम आपको वाद्य संगीत के दो दिग्गज कलासाधकों- उस्ताद विलायत खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा सितार और शहनाई पर की गई जुगलबंदी सुनवाते है। कहरवा ताल के लोच के साथ सितार और शहनाई पर बजाई गई इस मोहक चैती का आप आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में भी हम चैती गीतों पर चर्चा जारी रखेंगे।

चैती धुन : सितार-शहनाई जुगलबंदी : उस्ताद विलायत खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, लगभग आधी शताब्दी पहले की एक हिन्दी फिल्म ‘गोदान’ से लिये गए गीत का अंश, जिसकी संगीत-रचना एक विश्वविख्यात संगीतज्ञ ने की थी। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – किस संगीतकार ने इस गीत की धुन बनाई है? संगीतकार का नाम बताइए।

२ – यह गीत किस राग पर आधारित है? राग का नाम बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६४वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६०वें अंक में हमने आपको ठुमरी अंग में एक फिल्मी गीत का अंश सुनवाया था और आपसे गीत की गायिका का नाम तथा राग का नाम पूछा था, जिस पर यह गीत आधारित है। दोनों प्रश्नों के क्रमशः सही उत्तर हैं- गायिका आरती अंकलीकर और राग पीलू। दोनों पश्नों का सही उत्तर देने वाले पाठक हैं- बैंगलुरु के पंकज मुकेश और इन्दौर की क्षिति तिवारी। इन पाठकों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई। संगीत-प्रेमी राधाकिशन, लेखक और संगीत समीक्षक मुकेश गर्ग और नृत्यांगना स्वाति वांग्नू तिवारी ने इस अंक की सराहना की है। इनके साथ-साथ फेसबुक के उन सभी पाठकों/श्रोताओं का भी हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को पसन्द किया।

‘संगीत-पहेली’ की प्रथम श्रृंखला के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ५१वें से लेकर ६०वें अंक तक की पहेली में सर्वाधिक ११ अंक अर्जित कर इन्दौर की क्षिति तिवारी प्रथम श्रृंखला की विजेता बन गईं हैं। ५ अंक पाकर बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने दूसरा और ४-४ अंक लेकर पटना की अर्चना टण्डन व मीरजापुर, उत्तरप्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने संयुक्त रूप से तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।
झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। अगले अंक में हम चैती गीतों के कुछ और उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। साथ ही चैती गीतों के साहित्य पर भी हम आपसे चर्चा करेंगे। पूर्व की भाँति रविवार की सुबह ९-३० बजे हम आपसे यहीं मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

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