Sunday, March 4, 2012

राग काफी और होली के इन्द्रधनुषी रंग

SWARGOSHTHI – 60

स्वरगोष्ठी – ६० में आज

‘होरी खेलत नन्दलाल बिरज में...’


भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ किया गया है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। आइए, इन्हीं भावों को साथ लेकर हम सब शामिल होते हैं, इस रंगोत्सव में।

बीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच ‘स्वरगोष्ठी’ के साठवें अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आपकी संगोष्ठी में पुनः उपस्थित हूँ। आज के अंक में और अगले अंक में भी हम फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर होंगे। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाएँगे। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। इस श्रृंखला में हमने संगीत की इन सभी शैलियों में से रचनाएँ चुनी हैं।

हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। राग काफी पर चर्चा हम बाद में करेंगे, उससे पहले आपको सुनवाते है एक फिल्मी गीत। १९६३ में एक फिल्म- ‘गोदान’ प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी यह फिल्म, जिसके संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म- ‘गोदान’ के इस होली गीत का-

फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : संगीत – पं. रविशंकर


होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी-

काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : स्वर – गिरिजा देवी


अभी आपने जो होरी सुनी, वह स्पष्ट रूप से राग काफी में निबद्ध थी। आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गांधार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गांधार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गांधार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए-

तराना – राग काफी : स्वर – मालिनी राजुरकर : द्रुत तीनताल


गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वाद्य संगीत में तो सार्थक या निरर्थक, शब्द होते ही नहीं, किन्तु कुशल वादक ऐसा रागानुकूल परिवेश रच देते हैं कि जहाँ शब्द महत्त्वहीन हो जाते हैं। अब हम आपको सरोद पर राग काफी का वादन सुनवाते हैं। उस्ताद अली अकबर खाँ, भारतीय संगीत के जाने-माने सरोद वादक रहे हैं। उनका बजाया राग काफी का एक अत्यन्त मोहक रिकार्ड है, जिसमें तबला संगति उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने की है। अपनी आज की संगीत-बैठक का समापन हम इसी रिकार्ड के प्रथम भाग के साथ करेंगे। इस वादन में राग काफी के स्वर तो हैं, किन्तु शब्द नहीं हैं। आप सरोद पर राग काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए और ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।

राग – काफी : सरोद वादक – उस्ताद अली अकबर खाँ : तबला - उस्ताद ज़ाकिर हुसेन


आज की पहेली


अभी हमने आपको ठुमरी अंग में एक फिल्मी गीत का अंश सुनवाया है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।

१ – गीत की पंक्तियों को ध्यान से सुनिए और बताइए कि कौन हैं यह गायिका?

२ – किस राग पर आधारित है यह गीत? राग का नाम बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६२वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५८वें अंक में हमने आपको एक भोजपुरी लोकगीत का अंश सुनवाया था और आपसे गायिका का नाम और गीत प्रस्तुत किये जाने का अवसर पूछा था। दोनों प्रश्नों के क्रमशः सही उत्तर है- गायिका शारदा सिन्हा और कन्या पक्ष द्वारा वर को लग्न चढ़ाने हेतु प्रस्थान का अवसर। दोनों प्रश्न का सही उत्तर एकमात्र पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। मीरजापुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी केवल पहले प्रश्न का ही उत्तर दे सके। दोनों पाठकों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई।
मध्यप्रदेश की उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत कला अकादमी के सेवानिवृत्त निदेशक अरुण पलनीतकर और वाराणसी से अभिषेक मिश्र ने सामान्य पाठकों और श्रोताओं को सरल ढंग से रागों की पहचान कराने के हमारे प्रयास की सराहना की है। झारखण्ड के एक पाठक यू.पी. ओझा ने लोक-कला-गौरव भिखारी ठाकुर के गीतों को सुनवाने का आग्रह किया है। ओझा जी के साथ सभी पाठकों को विश्वास दिलाते हैं कि निकट भविष्य में हम इस विषय पर ‘स्वरगोष्ठी’ का पूरा एक अंक समर्पित करेंगे। इन पाठकों/श्रोताओं के साथ-साथ फेसबुक के सभी मित्रों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द किया।

झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने संगीत की विविध शैलियों में राग काफी के माध्यम से कुछ फागुनी रंग बिखेरने का प्रयास किया है। अगले अंक में भी हम उमंग और उल्लास के इस परिवेश को जारी रखेंगे। अगले अंक में राग काफी के अलावा अन्य रागों में भी होली की सतरंगी छटा का दर्शन करेंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।



कृष्णमोहन मिश्र

3 comments:

Sajeev said...

बहुत ही बढ़िया पोस्ट

Dr. P.k.Tripathi said...

Shrimati Girija Devi ki awaz men holi sun kar holi se pehle hi mahaul ban gaya. bahut sundar lekh aur sangit. ap sabko holi ki badhai.

Smart Indian said...

होली पर इस संगीतमय प्रस्तुति के लिये आभार और होली की शुभकामनायें!

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