Thursday, September 20, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 15


भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपका स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में प्रत्येक मास के पहले और तीसरे गुरुवार को हम आपके लिए लेकर आते हैं, मूक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर के कुछ रोचक तथ्य और आलेख के दूसरे हिस्से में सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर की कोई उल्लेखनीय संगीत रचना और रचनाकार का परिचय। आज के अंक में हम आपसे इस युग के कुछ रोचक तथ्य साझा करने जा रहे हैं।

भारतीय सिनेमा-इतिहास का दूसरा अध्याय ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से शुरू हुआ

भारत में सिनेमा के इतिहास का आरम्भ 7जुलाई, 1896 से हुआ था, जब बम्बई (अब मुम्बई) के वाटसन होटल में लुईस और ऑगस्ट लुमियरे नामक फ्रांसीसी बन्धुओं की बनाई मूक फिल्म- ‘मारवेल ऑफ दि सेंचुरी’ का प्रदर्शन हुआ था। यह भारत में प्रदर्शित प्रथम विदेशी फिल्म थी, बाद में 14जुलाई, 1896 से मुम्बई के नावेल्टी थियेटर में इस फिल्म का नियमित प्रदर्शन हुआ। इसी फिल्म प्रदर्शन के बाद ही भारतीय फिल्मकारों ने भारत में फिल्म निर्माण के प्रयास आरम्भ कर दिये। उस शुरुआती दौर में उपकरण तो विदेशी थे किन्तु चिन्तन विशुद्ध भारतीय था। इस दौर में अनेक प्रयोग हुए, नए मुहावरे गढ़े गए और वृत्तचित्र, कथाचित्र व विज्ञापन फिल्मों का वर्गीकरण भी किया गया। यह सिलसिला 18मई, 1912 में बनी फिल्म ‘पुण्डलीक’ तक जारी रहा। इस स्तम्भ के पिछले अंकों में 1896 से लेकर 1912 तक की अवधि में भारत में फिल्म निर्माण और प्रदर्शन के क्षेत्र में किये गए प्रयासों की हमने विस्तृत चर्चा की है।

भारतीय सिनेमा के इतिहास का पहला अध्याय जहाँ प्रयोग और मानक स्थापित करने में व्यतीत हुआ वहीं दूसरे अध्याय का आरम्भ ढुंडिराज गोविन्द फालके, उपाख्य दादा साहेब फालके द्वारा निर्मित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से हुआ। इस फिल्म को भारत के प्रथम कथा-चलचित्र का सम्मान प्राप्त है। इस चलचित्र का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव, मुम्बई स्थित तत्कालीन कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। भारत में और भारतीयों द्वारा निर्मित यह प्रथम मूक और पूर्णकालिक कथा-फिल्म थी। इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक आदि सब कुछ दादा फालके ही थे। अयोध्या के राजा सत्यवादी हरिश्चन्द्र की लोकप्रिय पौराणिक कथा पर आधारित तत्कालीन गुजराती नाटककार रणछोड़ भाई उदयराम का नाटक उन दिनों रंगमंच पर बेहद सफल हुआ था। फालके ने इसी नाटक को अपनी फिल्म की पटकथा के रूप में विकसित किया था। फिल्म ‘पुण्डलीक’ की भाँति मंच-नाटक के रूप में इसका फिल्मांकन नहीं किया गया। चालीस मिनट की इस फिल्म में राजा हरिश्चन्द्र की भूमिका दत्तात्रेय दामोदर दुबके, महारानी तारामती की भूमिका पुरुष अभिनेता सालुके और विश्वामित्र की भूमिका जी.वी. साने ने निभाई थी। उन दिनों नाटकों में नारी चरित्रों का निर्वहन पुरुष कलाकार ही किया करते थे। जब नाटकों में महिला कलाकारों का पदार्पण सामाजिक दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता था, तो भला फिल्मों के लिए महिला कलाकार कहाँ से उपलब्ध होतीं।

फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के चरित्रों की वेषभूषा और भंगिमाओं पर तत्कालीन विश्वविख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा द्वारा सृजित पौराणिक चरित्रों के चित्रांकन का गहरा प्रभाव था। 40 मिनट की इस फिल्म की कुल लम्बाई लगभग 3700 फीट थी। फिल्म तैयार हो जाने के बाद 21 अप्रैल, 1913 को मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) के ग्राण्टरोड स्थित ओलम्पिया थियेटर में इसका प्रीमियर शो हुआ। फिल्म का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव स्थित कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। परदे पर चलती-फिरती तस्वीरों को देखना दर्शकों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। ‘राजा हरिश्चन्द्र’के इस प्रदर्शन से भारत में फिल्म निर्माण के द्वार खुल गए।

अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती सवाक फिल्म ‘अछूत कन्या’

शोक कुमार और देविका रानी अभिनीत ‘अछूत कन्या’ ने लोकप्रियता के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, और इस जोड़ी की लोकप्रियता सर चढ़ कर बोलने लगी। यह वह दौर था जब महात्मा गाँधी अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे थे और ग्रामीण इलाकों के विकास के लिए कार्य कर रहे थे। निरंजन पाल की कहानी पर आधारित ‘अछूत कन्या’ ने अस्पृश्यता से घिरे घिनौने समाज पर प्रकाश डाला। कहते हैं कि पण्डित जवाहरलाल नेहरू और सरोजिनी नायडू ने इस फ़िल्म को बॉम्बे टॉकीज़ में बैठ कर देखा था। ‘अछूत कन्या’ को प्रथम सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों वाली फ़िल्म माना जाता रहा है। इस फ़िल्म के गानों के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स भी बने और केवल इस देश के घरों और गलियों में ही नहीं, बल्कि इंग्लैण्ड तक पहुँचे। कहते हैं कि सरस्वती देवी घंटों अशोक कुमार और देविका रानी के साथ समय बिताया करतीं और उन्हें उसी प्रकार गीत सिखातीं ठीक जिस तरह से एक स्कूल टीचर बच्चों को नर्सरी राइम सिखाती हैं। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था “मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूँ रे, मैं बन का पंछी बन के संग संग डोलूँ रे...” जिसे अशोक कुमार और देविका रानी ने गाया था। इस गीत ने लोकप्रियता के पैमाने पर पिछले सभी गीतों का रेकॉर्ड तोड़ दिया । आज भी जब इस गीत को सुनते हैं तो पेड़ की टहनी पर बैठीं देविका रानी और पीछे खड़े अशोक कुमार का वह सीन याद आ जाता है। थिएटर संगीत से कोसों दूर, इस गीत का संगीत आधुनिक लोकप्रिय फ़िल्म-संगीत की शुरुआत की सूचना सरीखी थी। गीत में केवल एक ही अन्तरा था, पर गीत को 3 मिनट 10 सेकण्ड्स तक खींचा गया था, मुखड़े के बोलों और वाद्य संगीत को बार-बार दोहराकर। क्योंकि आधुनिक ऑरकेस्ट्रेशन की बस शुरुआत ही हुई थी, ऐसा लगता है जैसे सरस्वती देवी का ध्यान बोलों से ज़्यादा ऑरकेस्ट्रेशन पर था। पर जो कुछ भी हो, यह तो स्वीकारना ही पड़ेगा कि यह उस ज़माने का सुपर-डुपर हिट गीत सिद्ध हुआ, जिसे लोगों ने आज तक याद रखा है।

फिल्म अछूत कन्या : “मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूँ रे...” : अशोक कुमार और देविका रानी


अशोक कुमार की आवाज़ में दार्शनिक रंग लिए “किसे करता मूरख प्यार तेरा कौन है...” का संगीत और ऑरकेस्ट्रेशन भी करीब-करीब पहले गीत की तरह का ही था। शास्त्रीयता लिए हुए “उड़ी हवा में जाती है गाती चिड़िया...” देविका रानी की आवाज़ में थी जिसे सुन कर आभास होता है कि सरस्वती देवी ने किस लगन से देविका रानी को शास्त्रीय संगीत सिखाया होगा। सरस्वती देवी ने ख़ुद भी एक गीत गाया था “कित गए हो खेवनहार...”। दरअसल यह गीत पर्दे पर चंद्रप्रभा पर फ़िल्माया जाना था। लेकिन शूटिंग के दिन चंद्रप्रभा के गले में ख़राश आ गई और वो गाने की स्थिति में नहीं थीं। ऐसे में अपनी छोटी बहन के लिए सरस्वती देवी ने गीत को गाया जिस पर चंद्रप्रभा ने केवल होंठ ही हिलाये। और इस गीत के साथ बम्बई में पार्श्वगायन की परम्परा शुरु हुई।

फिल्म अछूत कन्या : “कित गए हो खेवनहार...” : सरस्वती देवी


दरअसल पार्श्वगायन की परम्परा को इस फिल्म में दुहराया गया था। पार्श्वगायन की शुरुआत आर.सी. बोराल और पंकज मल्लिक न्यू थिएटर्स में 1935 में कर चुके थे। ‘अछूत कन्या’ के अन्य गीतों में अशोक कुमार और देविका रानी का गाया युगल गीत “खेत की मूली, बाग का आम...” भी हल्के फुल्के अंदाज़ में बनाया गया था। “किसे करता मूरख प्यार...” और “पीर पीर क्या करता रे, तेरी पीर न जाने कोय...” जैसे अशोक कुमार के एकल गीत के अलावा मुमताज़ अली व सुनीता देवी की युगल स्वरों में “चूड़ी मैं लाया अनमोल रे...” तथा कुसुम कुमारी व साथियों के गाई “धीरे बहो नदिया, धीरे बहो...” भी इस फ़िल्म के अन्य गीतों में से थे।

फिल्म अछूत कन्या : “चूड़ी मैं लाया अनमोल रे...” : मुमताज़ अली और सुनीता देवी


फिल्म अछूत कन्या : “धीरे बहो नदिया, धीरे बहो...” : कुसुम कुमारी और साथी


फ़िल्म के गीतकार थे, जे.एस. कश्यप थे। विविध भारती के ‘जयमाला’ कार्यक्रम में दादामुनि अशोक कुमार ने फ़िल्मों के उस शुरुआती दौर को याद करते हुए कुछ इस तरह से कहा था- दरअसल जब मैं फ़िल्मों में आया था सन्‍ 1934-35 के आसपास, उस समय गायक-अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होंने फ़िल्मी गानों को एक शकल दी और मेरा ख़याल है, उन्ही की वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्हीं की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानि ‘बॉक्स ऑफ़िस सक्सेस’ के लिए गानों को सबसे ऊँची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक तकनीक की तैयारियाँ हो ही रही थीं। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आए नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गाने सीधे-सीधे और सरल बंदिश में बनाये जाते थे ताकि हम जैसे गाने वाले आसानी से गा सके। सच तो यही है कि ‘अछूत कन्या’ अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ आवाज़ थी और ब्रिटिश राज की परतंत्रता के दौर में राष्ट्र-सेवा का एक साधन भी।

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का चौथा गुरुवार होगा और इस सप्ताह हम प्रस्तुत करेंगे एक बेहद रोचक संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।

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