Skip to main content

१६ फरवरी - आज का गाना


गाना: पांच रुपैया बारा आना






चित्रपट:चलती का नाम गाड़ी
संगीतकार:सचिन देव बर्मन
गीतकार:मजरूह सुलतान पुरी
गायक:किशोर कुमार




मैं सितारों का तराना, मैं बहारों का फ़साना
लेके इक अंगड़ाई मुझ पे, डाल नज़र बन जा दीवाना

रूप का तुम हो खज़ाना, तुम हो मेरी जाँ ये माना
लेकिन पहले दे दो मेरा, पांच रुपैया बारा आना
पाँच रुपैया, बारा आना\-आआ ...
मारेगा भैया, ना ना ना ना\-आआ ...

माल ज़र, भूलकर, दिल जिगर हमसे निशानी माँगो ना
दिलरुबा, क्या कहा, दिल जिगर क्या है जवानी माँगो ना
तेरे लिये मजनू बन सकता हूँ
लैला लैला कर सकता हूँ
चाहे नमूना देख लो \-\- हाय
खून\-ए\-दिल पीने को और लक़्त\-ए\-जिगर खाने को
ये गिज़ा मिलती है लैला \- (२)
तेरे दीवाने को \- (२)

ओ हो हो जोश\-ए\-उल्फ़त का ज़माना, लागे है कैसा सुहाना
लेके इक अंगड़ाई मुझ पे, डाल नज़र बन जा दीवाना

मानता हूँ है सुहाना, जोश\-ए\-उल्फ़त का ज़माना
लेकिन पहले दे दो मेरा, पाँच रुपैया बारा आना

ग़म भुला, साज उठा, राग मेरे रूप के तू गाये जा
ऐ दिलरुबा, होय दिलरुबा, हाँ इसी अंदाज़ से फ़रमाये जा
गीत सुना सकता हूँ दादरा
गिनकर पूरे बारा मातरा
चाहे नमूना देख लो \-\- हाय
धीरे से जाना बगियन में, धीरे से जाना बगियन में
रे भँवरा, धीरे से जाना बगियन में
होय लल्ला ढींग लल्ला \- (२)

ओ हो हो तू कला का है दीवाना कम है क्या तुझको बहाना
लेके इक अंगड़ाई मुझ पे, डाल नज़र बन जा दीवाना

हाँ ये अच्छा है बहाना मैं कला का हूँ दीवाना
लेकिन पहले दे दो मेरा, पाँच रुपैय्या बारा आना

बेखबर, प्यार कर, धन की दुनिया क्या है ढलती छाया है
हाय हाय हाय दिलरुबा, सच कहा साँच तेरा प्यार बाकी माया है
तेरे लिये जोगी बन सकता हूँ
जंगल जंगल फिर सकता हूँ
चाहे नमूना देख लो \-\- हाय
बममुकच ए बिन बममुकच ए बिन बममुकच ए बिन बममुकच
(तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर
जाग ज़रा तू जाग ज़रा ) \- (२)

ओ हो हो मैं हूँ तेरी जान\-ए\-जाना आ मुझी से लव लगाना
लेके इक अंगड़ाई मुझ पे, डाल नज़र बन जा दीवाना

जै गुरू मैने ये माना तू है मेरि जान\-ए\-जाना
लेकिन पहले दे दो मेरा \- यक दुइ तीन चार पांच
पाँच रुपैया बारा आना ...



Comments

Smart Indian said…
मस्त गाना.

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

‘बरसन लागी बदरिया रूमझूम के...’ : SWARGOSHTHI – 180 : KAJARI

स्वरगोष्ठी – 180 में आज वर्षा ऋतु के राग और रंग – 6 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय रूप   उपशास्त्रीय रंग में रँगी कजरी - ‘घिर आई है कारी बदरिया, राधे बिन लागे न मोरा जिया...’ ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले गीत, संगीत, रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग और धुन के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी सुन रहे हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक से हम वर्षा ऋतु...

राग चन्द्रकौंस : SWARGOSHTHI – 358 : RAG CHANDRAKAUNS

स्वरगोष्ठी – 358 में आज पाँच स्वर के राग – 6 : “सन सनन सनन जा री ओ पवन…” प्रभा अत्रे से राग चन्द्रकौंस की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए डॉ. प्रभा अत्रे लता मंगेशकर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स...