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ब्लोग्गर्स चोईस में हैं रश्मि प्रभा के साथ "भला बुरा" समझने वाले शिवम मिश्रा

आज की महफ़िल में अपरोक्ष गुनगुनाते शिवम् मिश्रा जी हैं. इन ५ गानों की सौगात लेने शिवम् जी के पास पहुंची तो पहले एक सवाल का तीर चला, "ये क्यूँ ?" मैंने भी शरारत से कहा - "क्यूँ बताऊँ !" दीदी कहते हैं तो मुस्कान में मायूसी के भाव लाते हुए बोले, "अपनी पसंद को ५ सिर्फ ५ गाने कैसे बताऊँ ???" बताना था ही हर हाल में तो थमा दी लिस्ट ये कहते हुए कि इनको सुनना मेरा सुकून है, बस - तो इनके सुकून के लिए सुनते हैं इनके साथ हम भी इनकी पसंद ...



तू मेरे रूबरू है - फिल्म मकबूल ; संगीत - विशाल ; गायक - दलेर महेंदी, राम शंकर और साथी


छोड़ आये हम वो गलियां - फिल्म माचिस ; संगीत - विशाल ; गायक - सुरेश वाडेकर , के के, हरीहरण और साथी


साँसों की माला पर सिमरु मैं पी का नाम - सूफी ; गायक - उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान और साथी


उम्र जलवो में बसर हो यह जरुरी तो नहीं - ग़ज़ल ; गायक :- जगजीत सिंह साहब


न ले के जाओ ... मेरे दोस्त का जनाजा है - फिल्म - फिजा ; संगीत :- अनु मालिक ; गायिका - जसपिंदर नरूला

Comments

vandana gupta said…
शिवम जी की पसन्द बहुत सुन्दर है। इसमे कुछ मेरी पसन्द के गाने भी शामिल हैं।
शिवम जी की पसंद के सभी गाने बहुत अच्छे हैं।

सादर
चलो एक बार फिर गीतों की गलियों में चलें.फिर प्रश्नोत्तरी रखे.फिर सबसे पहले जवाब देने की होड़ करें. बहुत अच्छा लग रहा है आज मुझे. :)
शिवम् की पसंद के गीत और ग़ज़ल बहुत अच्छे लगे. ले जा रही हूँ :) क्या करूं?ऐसीच हूँ मैं तो :P

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महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

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