Wednesday, July 29, 2009

लोग उन्हें "गाने वाली" कहकर चिढ़ाते थे, धीरे धीरे ये उनका उपनाम हो गया....

दुनिया में कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिनके जाने के बाद भी उनकी मधुर स्मृतियाँ हमें प्रेरित करती हैं. सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती हैं. इसी श्रेणी में एक नाम और दर्ज हुआ है, वो है शास्त्रीय संगीत की मल्लिका गंगूबाई का. गीता में कहा है कि 'शरीर मरता है आत्मा नही'. गंगूबाई शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं. आज वो नहीं रहीं लेकिन उनकी संगीत शैली आत्मा के रुप में हमारे बीच विराजमान है.

यूँ तो आज गंगूबाई संगीत के शिखर पर विराजित थीं लेकिन उस शिखर तक पहुँचने का रास्ता उन्होंने बहुत ही कठिनाईयों से तय किया था. गंगूबाई का जन्म १९१३ में धारवाड़ में हुआ था. देवदासी कुल में जन्म लेने वाली गंगूबाई ने छुटपन से संगीत की शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी. अक्सर उन्हें जातीय टिप्पणी का सामना करना पड़ता और उनकी गायन कला को लेकर लोग मजाक बनाया करते थे. उस समय गायन को अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए लोग उन्हें 'गाने वाली' कहकर चिढ़ाते थे. धीरे-धीरे यह उनका उपनाम हो गया.

गंगूबाई कर्नाटक के दूरस्थ इलाके हंगल में रहती थीं. इसी से उनकी पहचान बनी और उनके नाम के साथ गाँव का नाम हंगल जुड़ गया. गंगूबाई हंगल की माँ कर्नाटक शैली की गायिका थीं लेकिन गंगूबाई ने हिन्दुस्तानी शैली का गायन सीखने का फैसला किया. अपने गुरु सवाई गंधर्व से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखने के लिये गंगूबाई कुडगोल जाया करती थीं. गंगूबाई ने कई बाधाओं को पार कर शास्त्रीय संगीत को एक मुकाम तक पहुँचाया. गंगूबाई ने गुरु-शिष्य परम्परा को बरकरार रखा. उन्होंने अपने गुरु सवाई गंधर्व की शिक्षाओं के बारे में एक बार कहा था कि -'मेरे गुरु जी ने मुझे सिखाया है कि जिस तरह एक कंजूस अपने पैसों के साथ व्यवहार करता है उसी तरह सुर का इस्तेमाल करो ताकि श्रोता राग की हर बारीकी को समझ सके'.

गंगूबाई ने भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ संगीत शिक्षा ली थी. किराना घराने की परम्परा को बरकरार रखने वाली गंगूबाई ने कभी भी इससे जुड़ी शैली की शुद्धता के साथ समझौता नहीं किया. गंगूबाई को 'भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पुरिया, धनश्री, मारवा, केदार और चन्द्रकौंस' रागों की गायिकी के लिये अधिक सम्मान मिला. उनका कहना था कि 'मैं रागों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की हिमायती हूँ, इससे श्रोता की उत्सुकता बनी रहती है और उसमें अगले चरण को जानने की इच्छा बढ़ती है'. एक बार फ़िल्म मेकर विजया मूले से बात करते हुए गंगूबाई ने कहा था कि 'पुरुष संगीतकार अगर मुसलमान हो तो उस्ताद कहलाने लगता है, हिन्दु हो तो पंडित हो जाता है, लेकिन केसरबाई, हीराबाई और मो्गाबाई जैसी गायिकायें बाई ही रह जाती हैं उनके व्यक्तित्व में जीवन से और स्त्री होने से मिले दुखों की झलक साफ नजर आती थी. उनकी आवाज में दर्द था लेकिन उसे भी उन्होंने मधुरता से सजाया. ईश्वर के प्रति श्रद्धा होने के कारण गंगूबाई ने भक्ति संगीत को भी नई ऊँचाईयों तक पहुँचाया.

गंगूबाई एक महान गायिका थीं. उन्हें पद्म विभूषण, तानसेन पुरुस्कार, संगीत नृत्य अकादमी पुरुस्कार और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरुस्कारों से नवाजा गया. गंगूबाई हंगल ने हर तरह का वक्त देखा था. गंगूबाई को नौ प्रधानमंत्रियों और पाँच राष्ट्रपतियों द्वार सम्मान प्राप्त हुआ जो अपने आप में एक उपलब्धि है. उन्होंने भारत में दो सौ से अधिक स्कूलों मे भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिये कार्यक्रम किये साथ ही देश के बाहर भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को पहुँचाया.

यह सच है कि पद्म भूषण गंगूबाई हंगल नहीं रहीं लेकिन उनकी आँखे आज भी दुनिया देखेंगी. गंगूबाई हंगल अपनी आँखे दान कर गयीं हैं. कहते हैं कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति कभी नहीं मरता है उसकी उपस्थिति उसके अनगिनत महान कार्यों से दुनिया में रहती है. गंगूबाई हंगल भी अपने संगीत और आँखों द्वारा इस दुनिया में रहेंगी. गंगूबाई हंगल एक ऐसी गायिका थीं जिन्होने अपने शास्त्रीय गायन में कभी कोई मिलावट नहीं की. उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया. ऐसी महान शास्त्रीय गायिका को हम श्रद्धाजंली देते हैं और सुनते हैं उनकी आवाज़ में आज राग दुर्गा, प्ले का बटन दबाईये, ऑंखें बंद कीजिये और महसूस कीजिये आवाज़ के इस तिलस्मी अहसास को-



आलेख - दीपाली तिवारी "दिशा"

7 comments:

Disha said...

हिन्दयुग्म का धन्यवाद

शैलेश भारतवासी said...

दिशा जी,

बहुत बढ़िया जानकारी दी आपने। आपने एक तरह की सच्ची श्रद्धाँजलि दी है।

Disha said...

धन्यवाद शैलेश जी

निखिल आनन्द गिरि said...

आवाज़ से ऐसी ही उम्मीद थी.....दिशा जी का आभार

Manju Gupta said...

दिशा जी नयी जानकारी हम तक पहुचाई .बधाई .

Shamikh Faraz said...

दिशा जी मैंने भी ऐसे लोगों के लिए एक ब्लॉग बनाया हुआ है जो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं. अगर आपको कभी वक़्त मिले तो ज़रूर देखें.

www.salaamzindadili.blogspot.com


साथ ही आपका शुक्रगुजार जो आपने यह खबर हम तक पहुंचाई.

Shamikh Faraz said...

चलते चलते एक शे'र गंगूबाई के लिए.

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी को रोती है
तब जाके होता है चमन में एक दीदावर पैदा.

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