Tuesday, July 14, 2009

कोई जुगनू न आया......"सुरेश" की दिल्लगी और महफ़िल-ए-ताजगी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२९

लीजिए देखते-देखते हम अपनी महफ़िल को उस मुकाम तक ले आएँ, जहाँ पहला पड़ाव खत्म होता है और दूसरे पड़ाव की तैयारी जोर-शोर से शुरू की जाती है। आज महफ़िल-ए-गज़ल की २९वीं कड़ी है और २५वीं कड़ी में सवालों का जो दौर हमने शुरू किया था, उस दौर उस मुहिम का आज अंत होने वाला है। अब तक बीती चार कड़ियों में हमने बहुत कुछ पाया हीं है और खुशी की बात यह है कि हमने कुछ भी नहीं खोया। बहुत सारे नए हमसफ़र मिले जो आज तक बस "ओल्ड इज गोल्ड" के सुहाने सफ़र तक हीं अपने आप को सीमित रखे हुए थे। हमने हर बार हीं यह प्रयास किया कि सवाल ऐसे पूछे जाएँ जो थोड़े रोचक हों तो थोड़े मुश्किल भी, जिनके जवाब अगर आसानी से मिल जाएँ तो भी पढने वाले को पिछली कड़ियों का एक चक्कर तो ज़रूर लगाना पड़े। शायद हम अपने इस प्रयास में सफ़ल हुए। वैसे अभी तक तो सवालों का बस तीन हीं लोगों ने जवाब दिया है, जिनमें से दो हीं लोगों ने अपनी सक्रियता दिखाई है। अब चूँकि आज इस मुहिम का अंतिम सोपान है, इसलिए यकीनन नहीं कह सकता कि गुजारिश का कितना असर होगा, फिर भी लोगों से यही दरख्वास्त है कि कम से कम आज की कड़ी के प्रश्नों पर माथापच्ची कर लें। वैसे कहते भी हैं कि "अंत भला तो सब भला।" चलिए, आगे बढने से पहले पिछली कड़ी का हिसाब-किताब करते हैं। दिशा जी ने एक बार फिर से सबसे पहले सही जवाब दिया और उनके जवाब के बाद शरद जी भी अपने जवाब के साथ हाजिर हुए। इस तरह दिशा जी को मिले ४ अंक और शरद जी को ३ अंक। इस तरह अंकों का माज़रा कुछ इस तरह बनता है: शरद जी: १३ अंक, दिशा जी: १२ अंक, कुलदीप जी: १ अंक। अंकों का यह अंकगणित अगर इसी तरह चलता रहा तो अगली कड़ी आते-आते शरद जी और दिशा जी १६ अंकों के साथ शीर्ष पर विराजमान हो जाएँगे। शरद जी तभी अकेले विजयी हो सकते हैं, जब आज की कड़ी का जवाब वे दिशा जी से पहले दे दें। देखते हैं क्या होता है! हम आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब आज के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इस तरह, पाँचों कड़ियों को मिलाकर जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) एक ऐसे सूफ़ी संत जिनके गुरू यूँ तो पेशे से माली थे, लेकिन उन्होंने "दस्तूर-उल-अमल", "इस्लाह-उल-अमल", "लताइफ़-इ-ग़ैब्या", "इशरतुल तालिबिन" जैसी पुस्तकों की रचना की थी। इस महान संत के पूर्वज बरसों पहले "सुरख-बुखारा" से "मुल्तान" आए थे।
२) संगीत की एक विधा, जिसकी शुरूआत "ली स्क्रैच पेरी" और "किंग टैबी" जैसे संगीत के निर्माताओं ने की थी और "अगस्तस पाब्लो" और "माइकी ड्रेड" जैसे महानुभावों ने इसका प्रचार-प्रसार किया था। २००७ में इसी संगीत की रूमानियत से सनी "कव्वालियों" की एक एलबम रीलिज हुई थी।


हिंदी संगीत उद्योग ने यूँ तो कई सारे फ़नकारों को ज़र्रे से उठाकर अर्श तक पहुँचाया है, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि अच्छे खासे गुणी लोग उतना रूतबा,उतना सम्मान न पा सके, जिनके वे हक़दार थे। ऐसे हीं फ़नकारों में से एक हैं स्वर-कोकिला लता मंगेशकर के बेहद अज़ीज़ श्री "सुरेश वाडेकर" साहब। न जाने कितनी हीं कालजयी रचनाओं को इन्होंने स्वर-बद्ध किया है। इनकी वाणी में इतनी मिठास है कि सुनने वाला एक बार इनकी तरफ़ कान करे तो तब तक नहीं हिलता जब तक इनके कंठों से आ रही ध्वनि विश्राम करने के लिए कहीं ठहर न जाए। हमने पिछली दो कड़ियों में मुजफ़्फ़र अली की फिल्म "गमन" की बातें की थी, जिसके गीतों को संगीत से सजाया था जयदेव ने। "सुरेश वाडेकर" की संगीत यात्रा की शुरूआत एक तरह से "गमन" से हीं हुई थी। १९७६ में आयोजित "सुर श्रृंगार" प्रतियोगिता, जिसके कई सारे निर्णयकर्त्ताओं में जयदेव भी एक थे को जितने के बाद इन्हें जयदेव की तरफ़ से गायकी का निमंत्रण मिला। "सीने में जलन" अगर इनका पहला गीत न भी हुआ तो भी शुरूआती दिनों के सदाबहार गाने में इसे ज़रूर हीं गिना जा सकता है। लता दीदी इनकी आवाज़ से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल","खय्याम","कल्याण जी-आनंद जी" जैसे संगीतकारों से इनकी सिफ़ारिश कर डाली। अब अगर आवाज़ में दम हो और सिफ़ारिश लता दीदी की हो तो किस संगीतकार में इतना माद्दा है कि प्रतिभा को उभरने से रोक सके। सो, इनकी गाड़ी चल निकली। वैसे प्रसिद्धि का सही स्वाद इन्होंने तब चखा जब राज कपूर की फिल्म "प्रेम रोग" में "संतोष आनंद","नरेंद्र शर्मा" और "अमिर क़ज़लबश" जैसे धुरंधरों के लिखे और "एल-पी" के संगीत से सजे गानों को गाने का इन्हें अवसर मिला। उस पर से किस्मत ये कि दोगानों में इनका साथ दिया स्वयं लता मंगेशकर ने। "प्रेम रोग" के अलावा "क्रोधी", "हम पाँच", "प्यासा सावन","मासूम", "सदमा", "बेमिसाल", "राम तेरी गंगा मैली", "ओंकारा" जैसी फिल्मों में भी इन्होंने सदाबहार गाने गाए हैं। इनकी मखमली आवाज़ का हीं जादू है कि २००७ में महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें "महाराष्ट्र प्राईड अवार्ड" से सम्मानित किया है।

यूँ तो फ़नकार के लिए यही खुशी की बात होती है कि उनके फ़न को दुनिया मे पहचान मिले,लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इस फ़न को लोगों में बाँटना चाहते हैं, ताकि आने वाले दिनों में उन जैसे कई और महारथी मैदान में उतर सकें। "सुरेश वाडेकर" साहब भी कुछ ऐसा हीं कर रहे हैं। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को सुधिजनों तक पहुँचाने के लिए "संगीत प्रशिक्षण संस्थान" की स्थापना की है। इस बारे में अपना अनुभव बाँटते हुए वे कहते हैं:- "मेरे पास अपना क्या है? हमने पूज्य गुरु से जो सीखा है, उसे आने वाली पीढ़ी को और बच्चों को दे रहा हूँ। आखिर उसे छाती पर बाँधकर कहाँ ले जाएँगे। विद्या को जितना बाँटेंगे, मस्तिष्क उतना ही जागृत और परिष्कृत होगा। गाना सिखाने से आपका अपना रियाज तो होगा ही, आपकी सूझबूझ और खयाल विस्तृत होगा। जो आदमी खुद की आत्मसात विद्या को छाती पर बाँधकर ले जाता है, वह दुनिया का सबसे बड़ा स्वार्थी व कंजूस व्यक्ति है। विद्या बाँटने से बढ़ती है, न घटती है और न ही कम होती है।" "वाडेकर" साहब में नाम-मात्र का भी दंभ नहीं है। यह बात उनके इन वक्तव्यों से ज़ाहिर होती है: "मैं बहुत भाग्यशाली रहा कि जब-जब भी अच्छे और कुछ अलग किस्म के गाने बने तो मुझे बुलाया गया। हमारा बड़ा भाग्य रहा कि पूरी इंडस्ट्री में जब अनेक नामचीन और स्थापित गायक कार्यरत थे तो रवीन्द्र जैनजी ने मुझे अवसर दिया। यह मामूली बात नहीं है कि जब फिल्म इंडस्ट्री में पैर रखना मुश्किल होता था तो मुझ जैसे नए कलाकार के हिस्से में इतनी मुश्किल तर्जे आई और गाने को मिली। आज उन्हीं सब बुजुर्गों, गुरुजनों और सुनने वालों के आशीर्वाद से मैं ३३ साल से गाने की कोशिश कर रहा हूँ।" इन महानुभाव के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी फिर कभी। अब आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल हमने ली है "आप की दिल्लगी" नामक एलबम से। वैसे हमारी यह बदकिस्मती है कि लाख कोशिशों के बावजूद आज की गज़ल के गज़लगो और संगीतकार के बारे में हम जानकारी हासिल नहीं कर पाए। सुकून इस बात का है कि इसी एलबम की एक और गज़ल "क्या ये भी ज़िंदगी" है के बारे में कुछ मालूमात हासिल हुए हैं। जैसे कि उस गज़ल की रचना की है स्वर्गीय "कृष्णमोहन जी" ने और संगीत से सजाया है "मधुरेश पाइ" ने। हो सकता है कि आज की गज़ल के रचनाकार भी यही दोनो हो। "मधुरेश पाइ" "सुरेश वाडेकर" जी के शिष्य हैं और उन्हीं के "संगीत विद्यालय" से प्रशिक्षित हुए हैं। ये ज्यादातर मराठी गीतों, गज़लों और भक्ति-संगीत पर काम करते हैं। वैसे इनकी प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण है स्वर-कोकिला लता मंगेशकर के साथ इनका तैयार किया हुआ एलबम "सादगी"। कभी समय मिले तो इस एलबम की गज़लों को ज़रूर सुनिएगा। आखिर कुछ तो बात है इस इंसान में और इसके संगीत में कि लता दीदी १७ सालों बाद किसी एलबम पर काम करने को राजी हो गईं। कभी "सादगी" और इससे १७ साल पहले रीलिज हुए "सज़दा" के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगे, अभी इन दो मिसरों पर गौर फरमाईयेगा। बड़े दिनों बाद कुछ लिखा है मैने:

खुदा मेरी खुदी का जो तलबगार हो गया,
बिना कहे कोई मेरा मददगार हो गया।


यकीनन बड़ी देर हो गई। वक्त को अब ज्यादा थामे रहना मुनासिब न होगा। तो लीजिए पेश है आज की गज़ल:

कोई जुगनू न आया खेलता-हँसता अंधेरे में,
मैं कितनी देर तक बैठा रहा तन्हा अंधेरे में।

तुम्हारे साथ क्यों सुलगी तुम्हारे घर की दीवारें,
बुझा दो रोशनी कि सोचते रहना अंधेरे में।

अगर अंदर की थोड़ी रोशनी बाहर न आ जाती,
मैं अपने आप से टकरा गया होता अंधेरे में।

अगर खुद जल गया होता तो शायद सुबह हो जाती,
मैं सूरज की दुआ क्यों माँगने बैठा अंधेरे में।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में ____ नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया...

आपके विकल्प हैं -
a) दहशत, b) वहशत, c) बरकत, d) गुरबत

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"मिजाज़" और सबसे पहले इसे पहचाना अदा जी ने, सही शेर कुछ यूं था -

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला कीजिये...

जी हाँ, बशीर साहब का लिखा हुआ शेर है ये, बशीर बद्र साहब के कुछ और शेर याद दिलाये कुलदीप अंजुम साहब ने -

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलने में

फाख्ता की मजबूरी कि ये भी तो कह नहीं सकती
कि कौन सांप रखता है उसके आशियाने में

वाह साहब....अंजुम साहब ने मिजाज़ शब्द पर भी कुछ शेर सुनाये -

वो ही मिजाज़ वो ही चाल है ज़माने की ,
हमें भी हो गयी आदत फरेब खाने की !

विजेता अदा जी के शेर का भी जिक्र करें -

मिज़ाज-ए-गरामी,दुआ है आपकी
बड़ी ख़ूबसूरत अदा है आपकी...

क्या बात है अदा जी...दिशा जी ने कुछ यूं फ़रमाया अपना मिजाज़ -

सुना है मौसम ने अपना मिज़ाज बदला है
तभी तो कहीं पे बाढ़ और कहीं पे सूखा है...

आज के हालत पर सही कटाक्ष...मंजू गुप्ता जी लगता है जहाँ रहती है वहां मानसून आ चुका है तभी तो कह रही हैं -

मौसम का मिजाज़ आशिकाना है .
मेघा सन्देश पिया को दे आना...

शरद जी ने अपने मित्र की एक ग़ज़ल पेश की. कुछ उसकी झलक पेश है -

शहरे-वफ़ा का आज ये कैसा रिवाज है
मतलबपरस्त अपनों का ख़ालिस मिजा़ज है ।
फुटपाथ पर ग़रीबी ये कहती है चीख कर
क्यूँ भूख और प्यास का मुझ पर ही राज है ।
जलती रहेंगीं बेटियाँ यूँ ही दहेज पर
क़ानून में सुबूत का जब तक रिवाज है ।
शायद इसी का नाम तरक्की है दोस्तो,
नंगी सड़क पे हर बहू-बेटी की लाज है ।

गज़लकार चाँद "शेरी" को हमारा भी सलाम कहियेगा....शमिख फ़राज़, अम्बरीश श्रीवास्तव, और राज भाटिया जी, हमारी भी यही दुआ है कि आप इस महफिल में आयें तो कभी वापस न जायें. अर्श जी आप तो खुद भी अच्छे गुलुकार हैं और बिना कुछ कहे सुने चले गए, बुरी बात....चलिए अब दीजिये इजाज़त अगली महफिल तक. खुदा हाफिज़.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

7 comments:

Disha said...

१) बाबा बुल्ले शाह कड़ी(२३)
२) विधा का नाम "डब"
एल्बम-"डब कव्वाली" कडी़(१४)

Disha said...

१) अब्दुल्लाह शाह" या फिर "मीर बुल्ले
शाह क़ादिरी शतरी"
बाबा बुल्ले शाह कड़ी(२३)
२) विधा का नाम "डब" एल्बम "डब कव्वाली"
कडी़(१४)

Disha said...

सही शब्द है "वहशत"
शेर अर्ज है(स्वरचित)
वहशत इस कदर इंसा पर छायी है
कि जर्रे जर्रे में दहशत समायी है
कहाँ से लाऊँ अब मैं अमन का पानी
ये मुसीबत खुद ही तो बुलायी है

शरद तैलंग said...

सही शब्द है वहशत
शे’र अर्ज़ है :
ग़म मुझे, हसरत मुझे, वहशत मुझे , सौदा मुझे,
एक दिल देके खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे ।
प्रश्नो का जवाब :
(1) बुल्ले शाह -(२३)
(2) डब -(१४)
दिशा जी के आगे निकलना संभव नहीं दिख रहा है जैसा कि मैनें बताया था पावर कट होने के कारण सुबह 9 से 12 बजे तक बिजली बन्द रहती है इसलिए ही देर से कम्प्यूटर खोल पाता हूँ । आज भी जवाब तो आ ही गया था किन्तु 3 अंकों को ही प्राप्त कर दिशा जी की बराबरी पर आने का लोभ नहीं छोड़ पाया ।

Shamikh Faraz said...

सही लफ्ज़ है वहशत और ये धेअर साहिर लुध्यान्वी साहब की नज़्म का है.ये नज़्म मैंने "परछाइयाँ" में पढ़ी थी.


वे लमहे कितने दिलकश थे वे घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,

वे सहरे कितने नाज़ुक थे वे लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं


बस्ती को हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोया

हर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोया


नागाह लहकते खेतों से टापों की सदायें आने लगीं

बारूद की बोझल बू लेकर पच्छम से हवायें आने लगीं


तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया

हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया


मग़रिब के मुहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ खाकी वर्दी-पोश आये

इठलाते हुए मग़रूर आये, लहराते हुए मदहोश आये


खामोश ज़मीं के सीने में, खैमों की तनाबें गड़ने लगीं

मक्खन-सी मुलायम राहों पर बूटों की खराशें पड़ने लगीं


फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं

जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं


इनसान की कीमत गिरने लगी, अजनास के भाओ चढ़ने लगे

चौपाल की रौनक घटने लगी, भरती के दफ़ातर बढ़ने लगे


बस्ती के सजीले शोख जवाँ, बन-बन के सिपाही जाने लगे

जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे


इन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई, बरनाई भी

माओं के जवां बेटे भी गये बहनों के चहेते भाई भी


बस्ती पे उदासी छाने लगी, मेलों की बहारें ख़त्म हुई

आमों की लचकती शाखों से झूलों की कतारें ख़त्म हुई


धूल उड़ने लगी बाज़ारों में, भूख उगने लगी खलियानों में

हर चीज़ दुकानों से उठकर, रूपोश हुई तहखानों में


बदहाल घरों की बदहाली, बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी

महँगाई बढ़कर काल बनी, सारी बस्ती कंगाल बनी


चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं, पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं

कितनी ही कंवारी अबलायें, माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं


इफ़लास-ज़दा दहकानों के हल-बैल बिके, खलियान बिके

जीने की तमन्ना के हाथों, जीने ही के सब सामान बिके

कुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगी

ख़लवत में भी जो ममनूअ थी वह जलवत में जसारत होने लगी

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

Manju Gupta said...

जबाव- वहशत जवाब- १.'बुल्लेशाह '-(२३)२.' डब '(१४)

स्व रचित कविता-
लिखने की वहशत इस कदर छाई
महफिल ए ग़ज़ल को न भूला पाई
कब सुबह से शाम गुनगुनायी '
'मंजू' कानोकान खबर न हो पाई .

manu said...

बड़े वाले अंकल का शे'र...
इश्क मुझको नहीं 'वहशत' ही सही
मेरी 'वहशत' तेरी शोहरत ही सही...

पर मुझे लगा के इससे पहले वाली महफ़िल में शोला शब्द था...
या फिर ये 'मिजाज़' वाली मुझसे मिस हो गयी....
हुआ जब भी के पल दो पल तेरा मेहमान हो जाऊं..
मिजाज अपना बदल लेते हैं मौसम तेरी गलियों के..

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