Skip to main content

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी....और फिर याद आई संगीतकार मदन मोहन की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 141

दन मोहन के संगीत की सुरीली धाराओं के साथ बहते बहते आज हम आ पहुँचे हैं 'मदन मोहन विशेष' की अंतिम कड़ी पर। आज है १४ जुलाई, आज ही के दिन सन् १९७५ में मदन साहब इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ गये थे। विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के शब्दों में - "मदन मोहन के धुनों की मोहिनी में कभी प्रेम का समर्पण है तो कभी मादकता से भरी हैं, कभी विरह की वेदना है और कभी स्वर लहरी से भर देती हैं दिल को, जिसका मध्यम मध्यम नशा है। मदन मोहन के शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों में साज़ों की अनर्थक ऐसी भीड़ भी नहीं है जिससे गाने की आत्मा ही खो जाये। उनके धुनों की स्वरधारा पर्वत से उतरती है और सुर सरिता में विलीन हो जाती है। धाराओं में धारा समाने लगते हैं, और ऐसी ही एक धारा में नहाकर आत्मा तृप्त हो जाती हैं। व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर हर श्रोता को कोई संगीतकार, गीतकार या गायक दूसरों से ज़्यादा पसंद आते हैं जिनकी कोई मौलिकता उन्हे प्रभावित कर जाती हैं। मदन मोहन के संगीत में भी मौलिकता है। फ़िल्म संगीत एक कला होने के साथ साथ एक व्यावसाय भी है जिसमें कई बार कलाकारों को समझौता करना पड़ता है। मदन मोहन जैसे संगीतकार को भी कहीं कहीं समझौता करना पड़ा है, लेकिन कल्पनाशील संगीतकार वो है जो कोई ना कोई रास्ता निकाल लेता है और हर बार अपना छाप छोड़ जाता है। मदन मोहन उनमें से एक हैं।" आज इस विशेष प्रस्तुति के अंतिम अध्याय में हमें याद आ रही है वो भूली दास्ताँ जिसे दशकों पहले लता मंगेशकर ने बयाँ किया था राजेन्द्र कृष्ण के शब्दों में, १९६१ की फ़िल्म 'संजोग' के प्रस्तुत गीत में। दर्द का ऐसा असरदार फ़ल्सफ़ा हर रोज़ बयाँ नहीं होता। और यही वजह है कि यह गीत मदन मोहन के 'मास्टर-पीस' गीतों में गिना जाता है।

प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित 'संजोग' के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और अनीता गुहा। दोस्तों, आप को याद होगा कि 'मदन मोहन विशेष' का पहला गीत "बैरन नींद न आये" (चाचा ज़िंदाबाद) भी अभिनेत्री अनीता गुहा पर ही फ़िल्माया गया था। सही में यह संजोग की ही बात है कि इस शृंखला का अंतिम गीत फिर एक बार अनीता गुहा पर फ़िल्माया हुआ है। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद सुरीले भी हैं और लोकप्रिय भी, लेकिन प्रस्तुत गीत में कुछ ऐसी बात है कि जो इसे दूसरे गीतों के मुकाबिल दो क़दम आगे को रखती है। यह मदन मोहन और लता जी के हौंटिंग मेलडीज़ का एक बेमिसाल नग़मा है जो दिल को उदास भी कर देता है और साथ ही इसका सुरीलापन मन को एक अजीब शांति भी प्रदान करता है। और्केस्ट्रेशन की तो क्या बात है, शुरुवाती संगीत अद्‍भुत है, पहले इंटर्ल्युड में सैक्सोफ़ोन पुर-असर है, कुल मिलाकर पूरा का पूरा गीत एक मास्टरपीस है। "बड़े रंगीन ज़माने थे, तराने ही तराने थे, मगर अब पूछता है दिल वो दिन थे या फ़साने थे, फ़कत एक याद है बाक़ी, बस एक फ़रियाद है बाक़ी, वो ख़ुशियाँ लुट गयीं लेकिन दिल-ए-बरबाद है बाक़ी"। सच दोस्तों, कहाँ गये वो सुरीले दिन, फ़िल्म संगीत का वह सुनहरा युग! आज मदन मोहन हमारे बीच नहीं हैं, जुलाई का यह भीगा महीना बड़ी शिद्दत से उनकी याद हमें दिलाता है, पर आँखें नम करने का हक़ हमें नहीं है क्यूंकि उन्ही का एक गीत हम से यह कहता है कि "मेरे लिए न अश्क़ बहा मैं नहीं तो क्या, है तेरे साथ मेरी वफ़ा मैं नहीं तो क्या"। हिंद युग्म की तरफ़ से मदन मोहन की संगीत साधना को प्रणाम!



पिछले वर्ष हमने मदन मोहन साहब को याद किया था संजय पटेल जी के इस अनूठे आलेख के माध्यम से. आज फिर एक बार जरूर पढें और सुनें ये भी.
नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.....इस गीत से जुडा है एक मार्मिक संस्मरण


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. माउथ ओरगन की धुन इस गीत की खासियत है.
2. राहुल देव बर्मन ने बजायी थी वह धुन इस गीत में.
3. मस्ती से भरे इस गीत के एक अंतरे में "काज़ी" का जिक्र है.

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, मात्र ४ अंक पीछे हैं अब आप अपनी मंजिल से, बहुत बहुत बधाई....पता नहीं हमारी स्वप्न मंजूषा जी कहाँ गायब हैं, पराग जी भी यही सवाल कर रहे हैं. जी पराग जी आपने सही कहा ये गीत रेडियो पर बहुत सुना गया है पर हमें तो यही लगता है कि यह गीत उस श्रेणी का है जिसे जितनी भी बार सुना जाए मन नहीं भरता.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Comments

hai apna dil to aawaara na jane kis pe aayega
hua jo kabhi raazi to mila nahi kaazi jahan pe lagi baazi vahin pe haara. Singer Hemant Kumar
अजी सब लोग कहाँ चले गए ? क्या मैं अकेला ही रह गया हूँ
Shamikh Faraz said…
शरद जी निर्विरोध जीत के लिए बधाई.
माफी चाहती हूँ बूझने के मामले मैं मैं जरा नालायक ही हूँ मगर आप गीत इतने बडिया लाते हैण कि जिन्हे बार बार सुनने का मन करता है धब्यवाद्
rachana said…
आप की पहेली पढ़ के जान गई थी पर फिर देखा तो उत्तर मिलगया था
है अपना दिल तो आवारा
आप को बधाई हो
सादर
रचना
manu said…
खुले थे दिल के दरवाजे...
मुहब्बत भी चली आयी....

लाजवाब गीत...शानदार फिल्मांकन...
manu said…
अदा जी...
आप जाने कहाँ चली गयी...
हम भी तो आते हैं ...भले ही जवाब दिया जा चुका हो...
Disha said…
कितनी ही जल्दी क्यो ना आओ जवाब पहले ही मिल जाता है. शरद जी को बधाई.
"है अपना दिल तो आवारा"बहुत ही मधुर गीत है

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...

छम छम नाचत आई बहार....एक ऐसा मधुर गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 366/2010/66 "ए क बार फिर बसंत जवान हो गया, जग सारा वृंदावन धाम हो गया, आम बौराई रहा, सरसों भी फूल रहा, खेत खलिहान शृंगार हो गया, पिया के हाथ दुल्हन शृंगार कर रही, आज धूप धरती से प्यार कर रही, बल, सुंदरता के आगे बेकार हो गया, सृष्टि पे यौवन का वार हो गया, रात भी बसंती, प्रभात भी बसंती, बसंती पिया का दीदार हो गया, सोचा था फिर कभी प्यार ना करूँगा, पर 'अंजाना' बसंत पे निसार हो गया, एक बार फिर बसंत जवान हो गया।" अंजाना प्रेम ने अपनी इस कविता में बसंत की सुंदरता को शृंगार रस के साथ मिलाकर का बड़ा ही ख़ूबसूरत नज़ारा प्रस्तुत किया है। दोस्तों, इन दिनों आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं इस रंगीले मौसम को और भी ज़्यादा रंगीन बनानेवाले कुछ रंगीले गीत इस 'गीत रंगीले' शृंखला के अंतर्गत। आज प्रस्तुत है राग बहार पर आधारित लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म 'छाया' का गीत "छम छम नाचत आई बहार"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस गीत की तर्ज़ बनाई है सलिल चौधरी ने। १९६१ की यह फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे सुनिल...