Skip to main content

जब दिल से दिल टकराता है... दिलीप का अंदाज़ और रफी साहब की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 152

ब रफ़ी साहब के गीतों पर दस चेहरों की अदायगी की बात हो, तो एक अभिनेता जिनके ज़िक्र के बग़ैर चर्चा अधूरी रह जायेगी, वो हैं अभिनय के शहंशाह दिलीप कुमार साहब। रफ़ी साहब ने एक से एक बढ़कर गीत गाये हैं दिलीप साहब के लिये, लेकिन दिलीप साहब जब फ़िल्मों में आये थे तब रफ़ी साहब मुख्य रूप से उनका प्लेबैक नहीं किया करते थे। अरुण कुमार ने पहली बार दिलीप कुमार का पार्श्वगायन किया था उनकी पहली फ़िल्म 'ज्वार भाटा' में। उसके बाद तलत महमूद बने दिलीप साहब की आवाज़ और कई मशहूर गीत बनें जैसे कि 'दाग़', 'आरज़ू', 'बाबुल', 'तराना', 'संगदिल', 'शिकस्त', 'फ़ूटपाथ', इत्यादि फ़िल्मों में। तलत साहब के साथ साथ मुकेश ने भी कई फ़िल्मों में दिलीप कुमार के लिये गाया जैसे कि 'मधुमती', 'यहूदी' वगेरह। लेकिन जो आवाज़ दिलीप साहब पर सब से ज़्यादा जचीं, वो थी मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़। रफ़ी साहब ने उनके लिए इतने सारे मशहूर गीत गाये हैं कि अगर उसकी फ़ेहरिस्त लिखने बैठें तो उलझ कर रह जायेंगे। बस इतना कहेंगे कि दिलीप साहब पर फ़िल्माया रफ़ी साहब के जिस गीत को हमने चुना है वह है फ़िल्म 'संघर्ष' का, जिसे लिखा है शक़ील बदायूनी ने और संगीत नौशाद साहब का। इन चारों के संगम से बने गीतों में फ़िल्म 'संघर्ष' के अलावा 'कोहिनूर', 'आन', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'गंगा जमुना', 'लीडर', 'दिल दिया दर्द लिया', 'राम और श्याम', और 'आदमी' जैसी फ़िल्मों के गीत संगीत ने अपने समय में ख़ासी धूम मचाई। यूं तो फ़िल्म 'संघर्ष' का "मेरे पैरों में घुंगरू बंधा दे" गीत सब से ज़्यादा प्रचलित है, लेकिन हम आप को इस फ़िल्म का इससे भी ख़ूबसूरत गीत सुनवा रहे हैं। भले ही इस गीत को बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया, लेकिन उससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता। अच्छा गीत हमेशा अच्छा ही रहता है। "जब दिल से दिल टकराता है, मत पूछिये क्या हो जाता है", जी हाँ, यही रचना आज पेश-ए-ख़िदमत है। रफ़ी साहब के देहांत पर दिलीप कुमार ने विविध भारती को दिये अपने शोक संदेश में कहा था - "रफ़ी साहब को ना कोई घमंड था, ना अहंकार, कभी भी नाराज़ नहीं होते थे, और ना कभी उनके बारे में मैने ऐसी कोई बात सुनी। उनका नाम मौसिक़ी की तारीख़ में जगमगाता रहेगा।"

क्यूंकि दिलीप कुमार के साथ साथ नौशाद साहब भी इस गीत से जुड़े हुए हैं और नौशाद साहब और रफ़ी साहब का भी एक लम्बा साथ रहा, तो क्यों न नौशाद साहब की उन बातों पर एक नज़र दौड़ा लिया जाये जो उन्होने अपने इस अज़िज़ गुलुकार के लिये कहे थे। विविध भारती के 'संगीत के सितारे' कार्यक्रम में नौशाद साहब ने रफ़ी साहब की तारीफ़ कुछ इस तरह से की थी - "एक फ़नकार को जो अहसासात होने चाहिये, वो रफ़ी साहब में भरपूर था। एक गीत था राग मधुमंती पर। गाना रिकार्ड होने के बाद रफ़ी साहब ने उसे सुना और बार बार सुनते रहे। बोले कि 'शोरगुल से हट कर यह गाना सितना सुकून दे रहा है!' मैने कहा कि 'पहले यह बताइये कि आप पैसे कितने लोगे?' उन्होने कहा कि 'इसके पैसे नहीं चाहिये, सुकून पैसे से नहीं मिलता है।' उनकी तारीफ़ मैं कहाँ तक बयान करूँ?" दोस्तों, एक बार और नौशाद साहब विविध भारती के 'नौशाद-नामा' कार्यक्रम में रफ़ी साहब के बारे में कुछ बातें कहे थे जो इस तरह से हैं - "जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आये तो दूसरा विश्व युद्ध ख़तम होने की कगार पर था। मुझे साल याद नहीं है। उस वक़्त प्रोड्युसरों को कम से कम एक 'वार प्रोपागंडा फ़िल्म' बनानी ही पड़ती थी। रफ़ी साहब मेरे पास आये लखनऊ से मेरे वालिद साहब से एक सिफ़ारिशी ख़त लिखवाकर। छोटा सा तम्बुरा हाथ में लिये खड़े थे मेरे सामने। मैने उनसे पूछा कि क्या उन्होने किसी से संगीत की तालीम ली है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ साहब से शास्त्रीय संगीत सीखा है। उस्ताद बरकत अली ख़ाँ साहब, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ साहब के छोटे भाई हैं। मैने उनसे कहा कि अभी मेरे पास कोई गीत नहीं है, लेकिन एक कोरस गीत है जिसमें वो अगर चाहे तो चंद लाइनें गा सकते हैं। श्याम, जी. एम. दुर्रनी और कुछ और लोग भी उसमें गा रहे थे। और वह गीत था "हिंदुस्ताँ के हम हैं हिंदुस्ताँ हमारा", फ़िल्म 'पहले आप'। रफ़ी साहब ने दो लाइनें गाये और उन्हे १० रुपय मिला।" तो दोस्तों, यह था रफ़ी साहब के करीयर का पहला पहला गीत जिसे नौशाद साहब ने उनसे गवाया था सन् १९४४ के आसपास। वैसे श्यामसुंदर के संगीत निर्देशन में पंजाबी फ़िल्म 'गुल बलोच' में रफ़ी साहब ने पहली बार गीत गाया था, और इन्ही के संगीत में सन् १९४४ में ही हिंदी फ़िल्म 'गाँव की गोरी' में भी रफ़ी साहब ने गाया था। इसमें थोड़ा सा मतभेद रहा है कि 'पहले आप' का गीत या फिर 'गाँव की गोरी' का गीत, कौन सा गीत रफ़ी साहब का गाया पहला गीत था। ख़ैर, इन सब बातों को छोड़ कर सुनते हैं मोहम्मद रफ़ी, दिलीप कुमार, शक़ील बदायूनी और नौशाद साहब को सलाम करते हुए आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. रफी साहब का गाया एक दर्द भरा नगमा.
2. कलाकार हैं -"सुनील दत्त".
3. एक अंतरा शुरू होता है इन शब्दों से -"कौन कहता है..."

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
पहली न न... दूसरी...न न आखिरकार तीसरी कोशिश में स्वप्न जी ने सही जवाब लपक ही लिया. शरद जी ने हल्का सा हिंट भी दिया "संघर्ष" का नाम देकर. खैर बधाई आप ४२ अंकों पर आ चुकी हैं. मनु जी ने सही कहा...वाकई बहुत खूबसूरत है इस गीत के बोल और धुन भी और स्वप्न जी आपकी पैरोडी बहुत बढ़िया लगी....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Comments

'अदा' said…
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ
'अदा' said…
फिल्म: ग़ज़ल
सुनील दत्त, मीना कुमारी

कौन कहता है चाहत पे सभी का हक़ है
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है
मुझसे कह दे ...
मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ
मैं इन्तज़ार करता रहता हूँ कि अदा जी का जवाब आने ही वाला होगा । चलिए मदन मोहन जी का एक और गीत सुनने को मिल गया ।
manu said…
hnm...
sahi geet.

कौन कहता है चाहत पे सभी का हक़ है
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है
Parag said…
अब तो बस इसी इंतज़ार में बैठे हैं, की कब अदा जी के ५० अंक पूरे हो. तभी हमारे जैसे लेट लातीफोंको कोई मौका मिल सकता हैं सही जवाब देनेका और कुछ अंक पाने का. हा हा हा

बहुत बधाईया अदा जी को.

पराग
Shamikh Faraz said…
भई मुझे तो गाना पता नहीं लेकिन अदा जी ने जवाब दिया है तो मुकम्मल और सही ही होगा.
Manju Gupta said…
नहीं मालूम हा हा .......!

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

बिलावल थाट के राग : SWARGOSHTHI – 215 : BILAWAL THAAT

स्वरगोष्ठी – 215 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 2 : बिलावल थाट 'तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...'   ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। व