Monday, March 22, 2010

एक था गुल और एक थी बुलबुल...एक मधुर प्रेम कहानी आनंद बक्षी की जुबानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 381/2010/81

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी सुननेवालों व पाठकों का हम फिर एक बार इस महफ़िल में हार्दिक स्वागत करते हैं। दोस्तों, इन दिनों आप जम कर आनंद ले रहे होंगे IPL Cricket matches के सीज़न का। अपने अपने शहर के टीम को सपोर्ट भी कर रहे होंगे। क्रिकेट खिलाड़ियो की बात करें तो उनमें से कुछ बल्लेबाज़ हैं, कुछ गेंदबाज़, और कुछ हैं ऐसे जिन्हे हम 'ऒल राउंडर' कहते हैं। यानी कि जो क्रिकेट के मैदान पर दोनों विधाओं में पारंगत है, गेंदबाज़ी मे भी और बल्लेबाज़ी में भी। कुछ इसी तरह से फ़िल्म संगीत के मैदान में भी कई खिलाड़ी ऐसे हुए हैं, जो अपने अपने क्षेत्र के 'ऒल-राउंडर' रहे हैं। ये वो खिलाड़ी हैं जो ज़रूरत के मुताबिक़, बदलते वक़्त के मुताबिक़, तथा व्यावसायिक्ता के साथ साथ अपने स्तर को गिराए बिना एक लम्बी पारी खेली हैं। ऐसे 'ऒलराउंडर' खिलाड़ियों में एक नाम आता है गीतकार आनंद बक्शी का। जी हाँ, आनंद बक्शी साहब, जिन्होने फ़िल्मी गीत लेखन में एक नई क्रांति ही ला दी थी। बक्शी साहब को फ़िल्मी गीतों का 'ऒल-राउंडर' कहना किसी भी तरह की अतिशयोक्ति नहीं है। ज़िंदगी की ज़ुबान का इस्तेमाल करते हुए उन्होने अपने गीतों को सरल, सुंदर और कर्णप्रिय बनाया। उनके गीतों की अपार सफलता और लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है। थोड़े बहुत हल्के फुल्के काव्यों का और अधिक से अधिक आम बोलचाल वाली भाषा का इस्तेमाल उनके गीतों की खासियत रही है। उनके लिखे लोकप्रिय गीतों की अगर हम फ़ेहरिस्त बनाने बैठे तो पता नहीं कितने महीने गुज़र जाएँगे। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अंतर्गत हम यहाँ एक छोटी सी कोशिश कर रहे हैं बक्शी साहब के लिखे १० बेहद सुंदर गीतों को आप के साथ बाँटने की। यूँ तो ये गानें इतने ज़्यादा लोकप्रिय हैं कि आप ने बहुत बहुत बार इन्हे सुने होंगे और आज भी बजते ही रहते हैं, लेकिन हम आशा करते हैं कि बक्शी साहब को समर्पित इस लघु शृंखला के अंतर्गत इन्हे फिर एक बार सुनने का कुछ और ही मज़ा आपको आएगा। तो प्रस्तुत है आज से लेकर अगले दस दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर लघु शृंखला 'मैं शायर तो नहीं'।

आनंद बक्शी का जन्म रावलपिण्डी में २१ जुलाई १९३० में हुआ था जो कि अब पाक़िस्तान में है। बचपन से ही बड़ा आदमी बनने का उनका सपना था। फ़िल्में देखने का उन्हे बहुत शौक था। अपने सपनों को साकार करने के लिए वे घर से भाग गए और नौसेना में भर्ती हो गए। कुछ ही दिनों में वहाँ सैनिक विद्रोह के कारण नौकरी से हाथ धोना पड़ा। देश विभाजन के बाद वे लखनऊ अपने परिवार के पास आ गए और टेलीफोन ओपरेटर की नौकरी में लग गए। वहाँ पे उनका मन नहीं लगा और वे सीधे बम्बई आ पहुँचे। पर वहाँ उनको किसी ने भाव नहीं दिया। कई दिनों तक संघर्ष करने के बाद उनकी मुलाक़ात हुई अभिनेता भगवान दादा से जिन्होने उन्हे अपनी १९५८ की फ़िल्म 'बड़ा आदमी' में पहली बार गीत लिखने का मौका दिलवा दिया। इस फ़िल्म में गीत लिख कर वो बड़े तो नहीं बने पर उस राह पर चल ज़रूर पड़े। १९६२ में फ़िल्म आई 'मेहंदी लगी मेरे हाथ'। इस फ़िल्म के गानें भी पसंद किए गए, लेकिन बहुत ज़्यादा लोगों को पता नहीं चल पाया कि ये गानें लिखे किसने थे। कुछ साल बाद १९६५ में उन्होने लिखे फ़िल्म 'जब जब फूल खिले' के गानें जिनकी लोकप्रियता ने उन्हे रातों रात शीर्ष के गीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। और इसके बाद आनंद बक्शी फिर कभी ज़िंदगी में पीछे मुड़ कर नहीं देखे। तो दोस्तों, ऐसे में बेहद ज़रूरी बन जाता है हमारे लिए भी कि बक्शी साहब पर केन्द्रित इस शृंखला का पहला गीत 'जब जब फूल खिले' फ़िल्म से बजाने की। इस फ़िल्म की अपार सफलता के पीछे इसके गीत संगीत का एक बेहद मह्त्वपूर्ण हाथ रहा है, इस बात को कोई झुठला नहीं सकता। चाहे "परदेसियों से ना अखियाँ मिलाना" हो या "ये समा, समा है ये प्यार का", या फिर "अफ़्फ़ु ख़ुदाया", "यहाँ मैं अजनबी हूँ", या फिर वह सदाबहार रफ़ी-सुमन डुएट "ना ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे"। और इस फ़िल्म में एक और गीत भी था जो इन सब से बिल्कुल अलग था। गीत क्या साहब, यह एक कहानी थी गुल और बुलबुल की जिसे बक्शी साहब ने लिखा और मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया। साथ में फ़िल्म की नायिका नंदा की भी आवाज़ शामिल थी संवाद के तौर पर। आज के लिए हमने इसी गीत को चुना है। इस अनोखे गीत का ज़िक्र इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है कि उस वक़्त बक्शी साहब नए नए आए थे और एक नए गीतकार की तरफ़ से इस तरह का बिल्कुल ही अलग क़िस्म का गीत वाक़ई आश्चर्य की बात थी। तो लीजिए दोस्तों, गुल और बुलबुल की कहानी का आप भी आनंद उठाइए। कल्यानजी-आनंदजी का संगीत है, गीत फ़िल्माया गया है शशि कपूर और नंदा पर।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने करीब ४५०० फ़िल्मी गीत लिखे, ४० बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए नामांकित हुए, और ४ बार उन्होने यह पुरस्कार जीता। इन सभी ४० गीतों की फ़ेहरिस्त आगे चलकर इस शृंखला में हम आपको देंगे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"रामा"-३ अंक.
2. इस फिल्म के लिए मुख्या अभिनेत्री और सह अभिनेत्री दोनों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिले, दोनों के नाम बताएं- २ अंक.
3. कौन हैं इस मधुर गीत के संगीतकार -२ अंक.
4. इस युगल गीत में लता जी के साथ किस गायक की आवाज़ है -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी भी ५० के आंकडे पर आ चुकी हैं, पर अभी भी शरद जी २० अंकों से आगे हैं. पाबला जी, स्वागत है आपका

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

7 comments:

AVADH said...

ramaa gazab dhaye ye purwaiyya
naiya sambhalo kahan khoye ho khiwaiya
Sawan Ka mahina pawan kare sore.
avadh lal

शरद तैलंग said...

चलिए एक मिनट पहले ही उत्तर आगया

शरद तैलंग said...

आज मैं जानबूझ कर गीत के बोल वाला प्रश्न हल नहीं कर रहा हूँ क्योंकि गीत बताते ही बाकी प्रश्न आसान हो जाते है \ एक अंक का घाटा ही सही पहेली में सभी थोडा और दिमाग लगाए इस लिए सिर्फ़ संगीतकार का नाम ही बता रहा हूँ ।
:लक्ष्मीकांत प्यारेलाल

AVADH said...

आज इत्तेफाक से थोडा पहले मौका मिल गया और अब तो मेरे उत्तर पर "महागुरु" की मोहर भी लग गयी.
अवध लाल

indu puri said...

jamuna nutan

padm singh said...

mukesh ji ki

बी एस पाबला said...

हम तो अब पहुँचे हैं! अब एक घंटा पहले क्या कहें :-(

सुबुक सुबुक

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