Saturday, February 13, 2010

मेरा बुलबुल सो रहा है शोर तू न मचा...कवि प्रदीप और अनिल दा का रचा एक अनमोल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 344/2010/44

१९४३। इस वर्ष ने ३ प्रमुख फ़िल्में देखी - क़िस्मत, तानसेन, और शकुंतला। 'तानसेन' रणजीत मूवीटोन की फ़िल्म थी जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने सहगल और ख़ुर्शीद से कुछ ऐसे गानें गवाए कि फ़िल्म तो सुपर डुपर हिट साबित हुआ ही, खेमचंद जी और सहगल साहब के करीयर का एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित हुआ। प्रभात से निकल कर और अपनी निजी बैनर 'राजकमल कलामंदिर' की स्थापना कर वी. शांताराम ने इस साल बनाई फ़िल्म 'शकुंतला', जिसके गीत संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाया। संगीतकार वसंत देसाई की इसी फ़िल्म से सही अर्थ में करीयर शुरु हुआ था। और १९४३ में बॊम्बे टॊकीज़ की सफलतम फ़िल्म आई 'क़िस्मत'। 'क़िस्मत' को लिखा व निर्देशित किया था ज्ञान मुखर्जी ने। हिमांशु राय की मृत्यु के बाद बॊम्बे टॊकीज़ में राजनीति चल पड़ी थी। देवीका रानी और शशधर मुखर्जी के बीच चल रही उत्तराधिकार की लड़ाई के बीच ही यह फ़िल्म बनी। अशोक कुमार और मुम्ताज़ शांति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए। देश भर में कई कई जुबिलीज़ मनाने के अलावा यह फ़िल्म कलकत्ता के 'चित्र प्लाज़ा' थिएटर में लगातार १९६ हफ़्तों (३ साल) तक प्रदर्शित होती रही। इस रिकार्ड को तोड़ा था रमेश सिप्पी की फ़िल्म 'शोले' ने। 'क़िस्मत' एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म रही क्योंकि इस फ़िल्म में बचपन में बिछड़ने और अंत में फिर मिल जाने की कहानी थी। संगीत की दृष्टि से 'क़िस्मत' अनिल बिस्वास की बॊम्बे टॊकीज़ में सब से उल्लेखनीय फ़िल्म रही। धीरे धीरे पार्श्वगायन की तकनीक को संगीतकार अपनाने लगे थे, और अच्छे गायक गायिकाएँ इस क्षेत्र में क़दम रख रहे थे। ऐसे में संगीतकार भी गीतों में नए प्रयोग ला रहे थे। इस फ़िल्म के तमाम गीत गली गली गूंजने लगे थे। ख़ास कर कवि प्रदीप के लिखे "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने तो जैसे पराधीन भारत के लोगों के रग रग में वतन परस्ती के जस्बे का संचार कर दिया था। इसी फ़िल्म में एक नर्मो नाज़ुक लोरी भी थी जिसे शायद आज भी फ़िल्म संगीत के सर्वश्रेष्ठ लोरियों में गिना जाता है! "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल ना मचा"। कवि प्रदीप की गीत रचना, अनिल दा का संगीत। इसी गीत को हमने चुना है १९४३ का प्रतिनिधित्व करने के लिए।

फ़िल्म 'क़िस्मत' के गीतों की बात करें तो उन दिनों अमीरबाई कर्नाटकी अनिल दा की पहली पसंद हुआ करती थीं। फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से ६ गीतों में ही अमीरबाई की आवाज़ शामिल थी। उपर ज़िक्र किए गए दो गीतों के अलावा इस फ़िल्म में अमीरबाई ने दो दुख भरे गीत गाए - "ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा", और "अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया"। जहाँ तक आज के प्रस्तुत गीत का सवाल है, इसके दो वर्ज़न है, एक में अमीरबाई के साथ आवाज़ है अशोक कुमार की, और दूसरे में अरुण कुमार की। दरसल अरुण कुमार अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे जो अच्छा भी गाते थे और जिनकी आवाज़ अशोक कुमार से कुछ कुछ मिलती थी। इसलिए बॊम्बे टॊकीज़ के कुछ फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्लेबैक उन्होने किया था। लेकिन इस गीत को दोनों से ही अलग अलग गवाया गया और दोनों वर्ज़न ही उपलब्ध हैं। आज हम आपको इस गीत के दोनों वर्ज़न सुनवाएँगे। कहा जाता है कि अनिल बिस्वास ने मज़ाक मज़ाक में कहा था कि यही एकमात्र ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया था। यह भी कहा जाता है कि अनिल दा अशोक कुमार के गायन से कुछ ज़्यादा संतुष्ट नहीं होते थे, इसलिए वो अरुण कुमार से ही उनके गानें गवाने में विश्वास रखते थे। इस फ़िल्म में अरुण कुमार ने अमीरबाई के साथ एक और युगल गीत गाया था जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी था, "हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाए, ये जो एक दिन हँसाए एक दिन रुलाए"। अरुण कुमार का गाया "तेरे दुख के दिन फिरेंगे ले दुआ मेरी लिए जा" भी एक दार्शनिक गीत है इस फ़िल्म का। अनिल दा की बहन और गायिका पारुल घोष का "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" शास्त्रीय रंग में ढला हुआ इसी फ़िल्म का एक सुरीला नग़मा था। इससे पहले कि आज का गीत आप सुनें, उस दौर का दादामुनि अशोक कुमार ने सन्‍ १९६८ में विविध भारती पर किस तरह से वर्णन किया था, आइए जानें उन्ही के कहे हुए शब्दों में। "दरअसल जब मैं फ़िल्मों में आया था सन् १९३४-३५ के आसपास, उस समय गायक अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होने फ़िल्मी गानों को एक शक्ल दी और मेरा ख़याल है उनकी वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्ही की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानी बॊक्स ऒफ़िस सक्सेस के लिए गानों को सब से ऊंची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक के तकनीक की तैयारियां हो रही थी। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आए नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गानें सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाए जाते थे ताक़ी हम जैसे गानेवाले आसानी से गा सके। मैं अपनी पुरानी फ़िल्मों से कुछ मुखड़े सुना सकता हूँ, (गाते हुए) "मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूँ रे", "चल चल रे नौजवान", "चली रे चली रे मेरी नाव चली रे", "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है...", "पीर पीर क्या करता रे तेरी पीर ना जाने कोई"। ये पहले पहले बॊम्बे टॊकीज़ के गीतों में "रे" का इस्तेमाल बहुत किया जाता था।" तो आइए दोस्तों, अब इस गीत को सुनें, पहले अशोक कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में, और फिर अरुण कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में।



दूसरा संस्करण


चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

देख रही तेरा रस्ता कब से
अब तो आजा बेदर्दी सैयां,
रो रो अखियाँ तरसे संगदिल,
मन से पडूं मैं तेरे पैयां..

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. ये फिल्म इस बेहद कामियाब संगीतकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही, हम किस संगीतकार की बात कर रहे हैं- सही जवाब के होंगें २ अंक.
3. इस गीत की गायिका का नाम बताएं जिसका हाल के सालों में एक रीमिक्स संस्करण भी आया-सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
4. इस गीत के गीतकार उस दौर के सफल गीतकारों में थे उनका नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
पहेली में नए प्रयोगों के चलते खूब मज़ा आ रहा है. रोहित जी अब तक ७ अंकों के साथ आगे चल रहे हैं, शरद जी हैं ५ अंकों पर, इंदु जी नाराज़ हो गयी क्या ? अरे व्यस्तता के चलते आपका स्वागत नहीं कर पाए, वैसे स्वागत तो मेहमानों का होता है न, आप तो ओल्ड इस गोल्ड की सरताज सदस्या ठहरीं. वैसे पहेली के सुझावों के लिए हम शरद जी का धन्येवाद देते हैं. ताज्जब इस बात का है कि सही गीत पता लग जाने के बाद भी कोई अन्य सवालों के जवाब लेकर हाज़िर नहीं हो रहा. शायद इस शृंखला के मुश्किल गीतों के कारण ऐसा हो...अवध जी हमें मेल किया और सभी सवालों के जवाब दे डाले. नियमानुसार एक से अधिक सही जवाब देने पर कोई अंक नहीं दिए जाने हैं, पर अवध जी का जवाब अन्य लोगों तक नहीं पहुंचा और उनका कंप्यूटर खराब होने के करण हो सकता है उन्हें नियमों की सही जानकारी न हो, तो इस पहली गलती को नज़र अंदाज़ कर हम उन्हें २ अंक देते हैं, ताकि उनका भी खाता खुले...सभी विजेताओं को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

2 comments:

शरद तैलंग said...

अंखियां मिला के जिया भरमा के चले नहीं जाना..
जाओगे जाने ना दूंगी मैं रस्ता रोक लूंगी,
हो सैयां के पैयां पड जांऊगी रो के कहूंगी ।

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर गीत हैं धन्यवाद सुन रही हूँ।

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