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हँसता हुआ नूरानी चेहरा ....क्यों न हो ओल्ड इस गोल्ड के सुनहरे गीतों को सुनते हुए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 336/2010/36

न दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चल रहा है फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग के कुछ कमचर्चित लेकिन बेहद प्रतिभावान पार्श्वगायिकाओं पर समर्पित शृंखला 'हमारी याद आएगी'। आज की कड़ी में ज़िक्र एक अनोखी आवाज़ की। मिट्टी की सौंधी सौंधी ख़ुशबू जैसी आवाज़ वाली ये हैं कमल बारोट। कमल बारोट ने उस दौर में फ़िल्म जगत में क़दम रखा जब दुनिया बस दो आवाज़ों की दीवानी बन चुकी थी, लता और आशा की। ऐसे में किसी नई गायिका के लिए यहाँ पर जगह बनाना बेहद मुश्किल था और ना ही यह हर किसी के बस की बात थी। सुधा मल्होत्रा, सुमन कल्याणपुर, मिनू पुरुशोत्तम, उषा मंगेशकर, मुबारक़ बेग़म के साथ साथ कमल बारोट ने भी गाना शुरु तो किया, लेकिन इन गायिकाओं को बड़े बैनर्स की फ़िल्मों में गाने के अवसर ज़्यादा नहीं मिलते थे। और अगर मिले तो किसी दूसरी बड़ी गायिका के साथ युगल गीत में या फिर कई अवाज़ों वाले किसी समूह गीत में। इन सारी कठिनाइयों और चुनौतियों को स्वीकार किया कमल बारोट ने और जब जैसे गानें उनकी झोली में आए, वो बस गाती चलीं गईं। लता जी और आशा जी के साथ उनके गाए कई गीत बेहद मशहूर हुए। आशा जी के साथ उनका गाया बेहद लोकप्रिय गीत "दादी अम्मा मान जाओ" हम आप को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की बच्चों वाली विशेष शृंखला में सुनवाया था। तो आज क्यों ना लता जी के साथ उनका गाया हुआ शायद उनकी करीयर का सब से हिट गीत आपको सुनवा दिया जाए। जी हाँ, फ़िल्म 'पारसमणि' की वही सदाबहार क़व्वाली "हँसता हुआ नूरानी चेहरा"। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी की पहली ब्लॊकबस्टर फ़िल्म और इस फ़िल्म से जुड़ी तमाम बातें हमने आपको पहले ही बता दिया था "चोरी चोरी जो तुमसे मिली" गीत के दौरान।

दोस्तों, हम बार बार यह कहते हैं कि लता जी और आशा जी की चमकदार आवाज़ों की वजह से दूसरी गायिकाओं को मौके नहीं मिले। लेकिन यह बात भी सच है कि लता जी ने कई बार नई गायिकाओं के नाम रेकमेण्ड भी किए हैं। यहाँ तक कि कमल बारोट को पहली बार फ़िल्म में गाने का मौका भी लता जी की सिफ़ारिश से ही मिला था। दोस्तों, यह बात मैं कहीं पे पढ़कर या किसी से सुन कर आपको नहीं बता रहा हूँ, बल्कि कमल बारोट ने यह बात ख़ुद अपने ज़ुबान से कही थीं विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में। यक़ीन ना आए तो ख़ुद ही पढ़ लीजिए! "ज़िंदगी की तेज़ धूप में संगीत की छैय्या मिल जाए तो कहना ही क्या। मैंने संगीत की दुनिया में पहली बार क़दम रखा जब लता जी ने कल्याणजी भाई से मेरी सुरीली सिफ़ारिश की। उन्होने कहा कि आप कमल से गाना क्यों नहीं गवा लेते हैं? असल में वह गाना लता दीदी गाने वाली थीं, पर वो जा रही थीं कोल्हापुर और गाना मिल गया मुझे। वो गाना था "दिल लेके जाते हो कहाँ"।" दोस्तों, बड़ा ही हिट हुआ था यह गाना, आगे चलकर शायद हम आपको यह गाना भी कभी सुनवा दें। पर आज तो कमल जी की पारस प्रतिभा को सलाम हम 'पारसमणि' के उस मचलते थिरकते नग़मे के साथ ही करेंगे। जैसा कि कमल जी ने ख़ुद बताया कि उन्हे सब से पहले फ़िल्म के लिए गाने का मौका लता जी ने करवा दिया था १९५९ की फ़िल्म 'ओ तेरा क्या कहना' में। इसी साल कल्यणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में एक और फ़िल्म आई 'मदारी', जिसमें कमल बारोट ने लता जी के साथ एक डुएट गाया "अकेली मोहे छोड़ ना जाना" जो काफ़ी हिट हुआ था। लेकिन "हँसता हुआ नूरानी चेहरा" को जो मक़बूलीयत हासिल हुई, वह कई कई गुणा ज़्यादा थी। यह गीत आज भी सब से ज़्यादा लोकप्रिय फ़ीमेल डुएट्स में शामिल किया जाता है। और एक और ख़ास बात इस गीत की कि यह गीत अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला के उस साल के वार्षिक कार्यक्रम में आठवाँ स्थान प्राप्त किया था। यानी कि उस साल का आठवाँ सब से लोकप्रिय गीत। आज कमल जी जहाँ कहीं भी जीवन यापन कर रहीं हैं, हम उन्हे दीर्घायु होने की शुभकामना देते हैं और सुनते हैं लता जी के साथ उनका गाया गीतकार असद भोपाली का लिखा यह हिट गीत।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

जोगन साँसे तेरा नाम पुकारे,
अब तो आजा साजन प्यारे,
लहराती हवा उन्हें छू के आ,
जो हैं मेरी धडकन के सहारे...

अतिरिक्त सूत्र- हंसराज बहल का संगीतबद्ध गीत है ये

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी जैसा कि अवध जी कहा, वाकई मुश्किल था, पर आपके लिए :) हरगिज़ नहीं..बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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