बुधवार, 13 जनवरी 2010

असीर जहनों में सोच भरना कोई तो सीखे... नीलमा सरवर की धारदार गज़ल को तेज किया हामिद ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६६

ज की महफ़िल का श्रीगणेश हो, इससे पहले हीं हम आपसे माफ़ी माँगना चाहते हैं और वो इसलिए क्योंकि आज की महफ़िल थोड़ी छोटी रहनी वाली है। कारण? कारण यह है कि लेखक(यहाँ पर मैं) सामग्रियाँ इकट्ठा करने में इतना मशगूल हो गया कि लिखने के लिए पर्याप्त वक्त हीं नहीं निकाल पाया। तो आज की महफ़िल बस ४५ मिनट में लिखी गई है.. अब इतने कम वक्त में क्या सोचा जा सकता है और क्या लिखा जा सकता है। तो चलिए इस माफ़ीनामे पर दस्तखत करने के बाद महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं।इस महफ़िल में जिस गज़ल की पेशी या फिर अच्छे शब्दों में कहना हो तो ताज़पोशी होने वाली है,उसे लिखने वालीं गज़लगो पाकिस्तान के कुछ चुनिंदा शायराओं में शुमार होती हैं। ये शायराएँ पाकिस्तान में पल-बढ रहे रूढिवादियों और पाकिस्तान के इस्लामिकरण के खिलाफ़ जोर-शोर से आवाज़ उठाती आई हैं। इनके गुस्से की तब सीमा नहीं रही जब १० फरवरी १९७९ को पाकिस्तान में "हुदूद अध्यादेश" पारित किया गया, जिसके तहत क़्फ़्क़ (झूठी गवाही), ज़िना (नाज़ायज़ संबंध) और ज़िना-बिल-जब्र(बलात्कार) की स्थिति में महिलाओं को चादर और चाहरदीवारी के अंदर ढकेल देने का प्रस्ताव था.. यानि कि अगर किसी महिला का बलात्कार हो जाए तब भी दोषी महिला हीं है, पुरूष नहीं। इन शायराओं ने "शरिया" (इस्लामिक कानून) के तहत खुद को अच्छी औरत साबित करने से साफ़ इंकार कर दिया और ऐसी कविताएँ लिखीं जो आज भी पुरूष-प्रधान समाज के सीने पर कील ठोंकने का काम करती हैं। इन सात शायराओं के नाम हैं: किश्वर नाहिद, फ़हमिदा रियाज़, सईदा गज़दर, सारा शगुफ़्ता, इशरत आफ़रीन, नीलमा सरवर और ज़ेहरा निगह। इन सातों की कुछ चुनिंदा रचनाओं का संकलन "वी सिनफ़ुल वीमेन" नाम से १९९० में लंदन के वीमेन्स प्रेस से प्रकाशित किया गया। रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद "रूख्साना अहमद" ने किया है। "वी सिनफ़ुल वीमेन" यानि कि "हम गुनहगार औरतें" किश्वर नाहिद की रचना है। आगे बढने से पहले हम चाहेंगे कि आप एक नज़र उस रचना पर डाल लें:

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का

जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जबकि हमारे जिस्मों की फसल बेचने वाले
करते हैं आनंद
हो जाते हैं लब्ध-प्रतिष्ठ
बन जाते हैं राजकुमार इस दुनिया के।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो निकलती हैं सत्य का झंडा उठाए
राजमार्गों पर झूठों के अवरोधों के खिलाफ
जिन्हें मिलती हैं अत्याचार की कहानियाँ हरेक दहलीज पर
ढेर की ढेर
जो देखती हैं कि सत्य बोलने वाली ज़बानें
दी गयीं हैं काट

ये हम गुनहगार औरतें हैं
अब,चाहे रात भी करे पीछा
ये आंखें बुझेंगी नहीं
क्योंकि जो दीवार ढाह दी गयी है

मत करो ज़िद दोबारा खड़ा करने की उसे ।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का
जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

कितना जोश भरा है इन पंक्तियों में, तभी तो इन शायराओं को छुप-छुपकर और घुट-घुटकर अपना जीवन तमाम करना पड़ा था या फिर पड़ रहा है। इन्हीं शायराओं में से एक थीं सारा शगुफ़्ता, जिन्हें पाकिस्तान का अमृता प्रीतम भी कहा जाता था, लेकिन उन्हें एक दिन समाज के सामने मजबूर होना पड़ा और १९८४ में(जिस दौरान उनकी उम्र महज़ ३० साल थी) उन्होंने जहर खाकर आत्महत्या कर ली...साहित्य को एक चमकता सितारा हासिल हो रहा था, लेकिन नियति को कुछ और हीं मंजूर था। इसरत आफ़रीन को तो अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए अपने पति के साथ भागकर हिन्दुस्तान आना पड़ा। ज़ेहरा निगह की लिखी रचना "हुदूद अध्यादेश" उन लड़कियों को समर्पित है, जो इस कानून के कारण अपनी बाकी ज़िंदगी जेल में गुजारने को मजबूर हैं। गज़दर की "१२ फरवरी १९८३" उन रचनाओं में सबसे बड़ी रचना है, जिसमें उन्होंने लाहौर में की गई एक रैली का ज़िक्र किया है, जिसमें २०० से भी ज्यादा महिलाओं ने "गवाह के कानून" के खिलाफ़ हिस्सा लिया था..यह कानून ऐसा था(है), जिसमें पीड़ित महिला के बयान को तब तक तवज्जो नहीं दी जाती है, जब तक कोई और महिला उसके पक्ष में गवाही न दे दे। ये सारे इतने बेहूदे कानून हैं कि इनके बारे में कुछ लिखना भी अजीब लगता है। अब हम आपको उस शायरा का नाम बता देते हैं जिसकी गज़ल से आज की महफ़िल सजी है.. उस शायरा का नाम है "नीलमा सरवर"। इनके बारे में व्यक्तिगत जानकारी तो कुछ हासिल नहीं हुई, ना हीं इनकी कोई भी रचना हिन्दी में लिखी हुई दिखी हमें, इसलिए हम इनकी वह रचना यहाँ पर पेश किए देते हैं, जो अंग्रेजी में अनुवादित है और "वी सिनफ़ुल वीमेन" में शामिल की गई है.. रचना का नाम है "प्रीज़न" यानि कि कारागार:

As I sat in a garden full of flowers
I saw a huge cage
Crammed with human beings,
Pallid of hue
Wild-eyed
Wild-haired human beings
In that small cramped cage.

Some sat, some lay on the floor
But they were all thinking something.

Perhaps of their punishments
Or of their crimes
Or, maybe, about those people
Who sat outside the cage
And smugly presumed they were free.

अह्हा.. इस रचना में स्वतंत्र और परतंत्र होने के बीच की नाजुक डोर बड़े हीं आराम से हटाई गई है.. वह जो आज़ाद दिखता है, क्या सही मायने में वह आज़ाद है। नहीं है... यानि कि जो कारागार में है, बस वही गुलाम नहीं है, वह भी गुलाम है जो बाहर आराम से अपने लौन में बैठकर चाय पी रहा है। कभी सोचिएगा..आप..आराम से। चलिए इस कविता के बाद नीलम जी के एक शेर पर भी नज़र दौड़ा लेते हैं। यहाँ भी वही रोष, वही नाराज़गी और वही सच्चाई विद्यमान है:

देखते हीं देखते वो क्या से क्या हो जाएगा,
आज जो गुल है वो कल बस खाक-ए-पा हो जागा।


और ये रही आज की गज़ल, जिसे हमने "इंतज़ार" एलबम से लिया है। इस गज़ल को अपनी आवाज़ दी है हामिद अली खान साहब ने।(इनके बारे में कभी आगे गुफ़्तगू करेंगे..आज वक्त के मामले में थोड़ा हाथ तंग है) लफ़्ज़ों में खौलते जज़्बातों को महसूस करना हो तो एक-एक हर्फ़ को खुद पढें, खुद गुनगुनाएँ। आपको मालूम पड़ जाएगा कि लिखते वक्त कवयित्री किन मनोभावों से गुजर रही थीं। मक़्ते तक पहुँचते-पहुँचते वह दर्द पूरी तरह से मुखर हो जाता है। है ना? :

उदास लोगों से प्यार करना कोई तो सीखे,
सुफ़ेद लम्हों में रंग भरना कोई तो सीखे।

कोई तो आए फ़िज़ा में पत्ते उगाने वाला,
गुलों की खुशबू को कैद करना कोई तो सीखे।

कोई दिखाए मोहब्बतों के सराब मुझको,
मेरी निगाहों से बात करना कोई तो सीखे।

कोई तो आए नई रूतों का ____ लेकर,
अंधेरी रातों में चाँद बनना कोई तो सीखे।

कोई पयंबर, कोई इमाम-ए-ज़मां हीं आए,
असीर जहनों में सोच भरना कोई तो सीखे।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "शरारत" और शेर कुछ यूं था -

वो एकबार तेरी शरारत से तौबा,
मेरा रूठ जाना तेरा मनाना।

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की "अवध" जी ने। अवध जी, कोई बात नहीं..गलती इंसान से हीं होती है :) और वैसे भी हमने भी तो एक गलती की। आपने अगर शायर का नाम नहीं डाला तो हम भी तो वह काम कर सकते थे, लेकिन आलस्य... क्या कीजिएगा। वाकई क़तील साहब का वह शेर कमाल का था। और यह शेर भी कमाल का है, जो आपने लिखा है:

उफ यह कमसिनी, यह मासूमियत तेरी
जान ले गयी मेरी इक शरारत तेरी. (स्वरचित)

सजीव जी और निर्मला जी! हौसला-आफ़ज़ाई का शुक्रिया।

सीमा जी, हमें आप पर नाज़ है। जहाँ हमारे पुराने मित्र हमसे धीरे-धीरे कन्नी काटने लगे हैं (कहने में दु:ख तो होता हीं है), वहीं आप हमारे लिए उम्मीद की लौ बनकर आती हैं और महफ़िल की शमा बुझने नहीं देतीं। यह रही आपकी पेशकश:

वो और वफ़ा-दुश्मन मानेंगे न माना है
सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है (जिगर मुरादाबादी)

हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी
हिरन की पीठ पर बैठे परिन्दे की शरारत सी (बशीर बद्र)

हंगामा-ए-ग़म से तंग आकर इज़्हार-ए-मुसर्रत कर बैठे
मशहूर थी अपनी ज़िंदादिली दानिस्ता शरारत कर बैठे (शकील बँदायूनी)

मंजु जी, हमें इस बात की खुशी है कि आपको हमारी महफ़िल पसंद आती है। मौलिक सृजन करके लिखना आसान नहीं होता और यह हम जैसों से अधिक कौन जान सकता है :) । यह रहा आपका स्वरचित शेर:

उनकी अदाओं की शरारतों ने घायल कर दिया ,
अरे!हम तो उनसे दिल लगा ही बैठे .

शामिख जी, बड़ी देर से आपकी आमद हुई। कुछ और देर कर देते तो आपके ये शेर इस महफ़िल में पेश होने से छूट जाते:

गुल था शरारत करने लगा जब
तितली ने कोसा जा खार हो जा (हमारे श्याम सखा ’श्याम’ जी)

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई,
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई (गोपालदास 'नीरज')

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

20 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

कोई तो आये ने रूठों का पयाम ले कर

regards

seema gupta ने कहा…

पयाम आये हैं उस यार-ए-बेवफ़ाके मुझे
जिसे क़रार न आया कहीं भुला के मुझे
(अहमद फ़राज़ )
उसने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
हिज्र की रात बाम पर माहे-तमाम रख दिया

(अहमद फ़राज़ )
सितारों के पयाम आये बहारों के सलाम आये
हज़ारों नामा आये शौक़ मेरे दिल के नाम आये
(अली सरदार जाफ़री )
गोश महजूर-ए-पयाम-ओ-चश्म महरूम-ए-जमाल
एक दिल, तिस पर ये ना-उम्मीदवारी हाए हाए
( गा़लिब )
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था

आपको देख के वह अहद-ए-वफ़ा याद आया

(साहिर लुधियानवी )
regards

सजीव सारथी ने कहा…

waah kya khoob ghazal hai aur kya andaaz hai esh karne ka :)

psingh ने कहा…

बहुत सुन्दर
बहुत बहुत बधाई ......................

psingh ने कहा…

सर्वत साहब
इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए एक बार फिर
बहुत बहुत बधाई ......................

शरद तैलंग ने कहा…

सुबह का पहला पयाम उर्दू
ढ्लती हुई सी जैसे शाम उर्दू
उतरें जह तारे वही बाम उर्दू
बडी कमसिन गुलफ़ाम उर्दू ।
जैसे नए साल का ये दिन हो नया
और बीते साल की हो आखिरी दुआ
नया साल नई राम राम उर्दू
तुझे नई सदी का सलाम उर्दू ।
(लता हया)

neelam ने कहा…

vd ji - aapki post hamesha padhte hain ,par in digaajon ke saamne hmaari kya bisaat ????isliye aapko padh ke chp-chaap nikal lete hain ,aapki mahfil se ,par roothaa koi nahi hai aapse .

Manju Gupta ने कहा…

जवाब -पयाम
स्वरचित शेर हाजिर है -
कभी हवाओं से ,कभी मेघदुतों से वियोग का पयाम भेजा है ,
बेखबर -रूखे महबूब !रुसवाई की भनक भी हुई क्या ?

AVADH ने कहा…

पयाम ले के सबा वां अगर पहुँच जाती
तो मिस्ले-बू-ए-गुल उड़ कर खबर पहुँच जाती.
बहादुर शाह ज़फर 'ज़फर'
अवध लाल

Haar kar Jeetane waale ko BAAZEEGAR kahate hain..! ने कहा…

जवाब -पयाम

स्वरचित even मेरा पहला शेर...

पयाम ज़िन्दगी ने दिया हज़ार बार संभल जाने का...
पर एक दिल था हमारा कि हर बात पर मचल गया...


RAjnish

Shamikh Faraz ने कहा…

निगाह-ए-मस्त-ए-साक़ी का सलाम आया तो क्या होगा अगर फिर तर्क-ए-तौबा का पयाम आया तो क्या होगा

Shamikh Faraz ने कहा…

सही लफ्ज़ "पयाम"

Shamikh Faraz ने कहा…

रक्स करती है फ़ज़ा वज्द में जाम आया है। फिर कोई ले के बहारों का पयाम आया है।

Shamikh Faraz ने कहा…

एक रंगीन झिझक एक सादा पयाम
कैसे भूलूँ किसी का वो पहला सलाम
Kaifi aazmi

Shamikh Faraz ने कहा…

ये पयाम दे गई है मुझे बादे- सुबहशाही

कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मक़ाम पादशाही

(iqbal)

Shamikh Faraz ने कहा…

पयाम बर न मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ
ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शर की आरज़ू करते
(khwaja haidar ali aatish)

Shamikh Faraz ने कहा…

उन्हें अपने दिल की ख़बरें मेरे दिल से मिल रही हैं
मैं जो उनसे रूठ जाऊँ तो पयाम तक न पहुँचे
shakeel badayuni

Shamikh Faraz ने कहा…

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था
daag dahalwi

Shamikh Faraz ने कहा…

न निगाह न पयाम न वादा
नाम को हम भी यार रखते हैं
meer taqi meer

Shamikh Faraz ने कहा…

सबा यह उन से हमारा पयाम कह देना
गए हो जब से यहां सुबह-ओ-शाम ही न हुई
jigar muradabadi

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