Wednesday, January 6, 2010

परी हो आसमानी तुम मगर तुमको तो पाना है....लगभग १० मिनट लंबी इस कव्वाली का आनंद लीजिए पंचम के साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 306/2010/06

राहुल देव बर्मन के रचे दस अलग अलग रंगों के, दस अलग अलग जौनर के गीतों का सिलसिला जारी है इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज इसमें सज रही है क़व्वाली की महफ़िल। पंचम के बनाए हुए जब मशहूर क़व्वालियों की बात चलती है तो झट से जो क़व्वालियाँ ज़हन में आती हैं, वो हैं फ़िल्म 'दीवार' में "कोई मर जाए किसी पे ये कहाँ देखा है", फ़िल्म 'कसमें वादे' में "प्यार के रंग से तू दिल को सजाए रखना", फ़िल्म 'आंधी' में "सलाम कीजिए आली जनाब आए हैं", फ़िल्म 'हम किसी से कम नहीं' की शीर्षक क़व्वाली, फ़िल्म 'दि बर्निंग् ट्रेन' में "पल दो पल का साथ हमारा", और 'ज़माने को दिखाना है' फ़िल्म की मशहूर क़व्वाली "परी हो आसमानी तुम मगर तुमको तो पाना है", जो इस फ़िल्म का शीर्षक ट्रैक भी है। तो इन तमाम सुपरहिट क़व्वालियों में से हम ने यही आख़िरी क़व्वाली चुनी है, आशा है आप सब इस क़व्वाली का लुत्फ़ उठाएँगे। बार बार इस शृंखला में नासिर हुसैन, मजरूह सुल्तानपुरी और राहुल देव बर्मन की तिकड़ी का ज़िक्र आ रहा है, और आज की यह क़व्वाली भी इसी तिकड़ी की उपज है। सचिन भौमिक की कहानी पर निर्माता निर्देशक नासिर हुसैन ने यह फ़िल्म बनाई, जिसके मुख्य कलाकार थे ऋषी कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरी। १९८१ की इसी फ़िल्म में पद्मिनी कोल्हापुरी पहली बार बतौर नायिका पर्दे पर नज़र आईं। इससे पहले कई फ़िल्मों में वो बतौर बाल कलाकार काम कर चुकी हैं, जिनमें 'सत्यम शिवम सुंदरम' उल्लेखनीय है। 'ज़माने को दिखाना है' फ़िल्म का संगीत हिट रहा लेकिन फ़िल्म नासिर हुसैन की पिछली तीन फ़िल्मों (हम किसी से कम नहीं, यादों की बारात, कारवाँ) की तरह बॊक्स ऒफ़िस पर सफल नहीं रही।

'ज़माने को दिखाना है' फ़िल्म की इस शीर्षक क़व्वाली में आप आवाज़ें सुनेंगे शैलेन्द्र सिंह, आशा भोसले और स्वयं ऋषी कपूर की। आइए इस क़व्वाली के ज़िक्र को आगे बढ़ाने से पहले जान लेते हैं कि आशा जी ने अपने जीवन साथी पंचम से पहली मुलाक़ात का विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में किस तरह से ज़िक्र किया था - "यह बहुत पुरानी बात है, फ़िल्म 'अरमान' में एस. डी. बर्मन, यानी दादा के लिए मैं गा रही थी। रिकार्डिंग् रूम में एक जवान लड़का आया। बर्मन दादा ने कहा कि आशा, ये मेरा लड़का है। मैंने कहा नमस्ते जी, कैसे हैं आप? उन्होने मुझसे ऒटोग्राफ़ लिया और चले गए। फिर कुछ दिनों के बाद हमारी मुलाक़ात हुई। दादा ने कहा कि पंचम, आशा को ज़रा गाना सीखा। उसके बाद उनके लिए गाते गाते मुझे क्या पता था कि उनके लिए खाना भी पकाना पड़ेगा और उनका घर भी संभालना पड़ेगा!" दोस्तों, वापस आते हैं आज की क़व्वाली पर। हाँ तो हम ज़िक्र कर रहे थे कि इस क़व्वाली में ऋषी कपूर की भी आवाज़ शामिल है। इसमें उनके संवाद हैं। क़व्वाली की शुरुआत ही उनके संवाद से होती है कुछ इस क़दर। "हज़रात, आज की शाम इस महफ़िल में आपके पसंदीदा क़व्वाल चुलबुले असरानी साहब को बुलाया गया था, मगर अचानक तबीयत ख़राब हो जाने की वजह से वो चुलबुले गुलबुले से गुलगुले होकर बुलबुले हो चुके हैं। इसलिए यहाँ नहीं आ सके। उनके ना आने की मैं जनाब कर्नल टिपसी से माफ़ी चाहता हूँ इस ग़ुज़ारिश के साथ कि उनकी ये हसीन महफ़िल साज़ और आवाज़ के जादू से महरूम नहीं रहेगी। अगर मेरे सीने में दिल है और उस दिल में तड़प है और उसका असर तड़प लाज़मी है। अपने आवाज़ से सब दिलों को जीतने का वायदा तो नहीं कर सकता, पर हुज़ूर अगर ये नाचीज़ एक रात में एक दिल भी जीत सका तो मेरी क़िस्मत चमक उठेगी।" और साहब, नायिका को इम्प्रेस करने का इससे बेहतर मौका भला और क्या हो सकता था! आइए रंग जमाया जाए इस हसीन शाम का इस मचलती क़व्वली के साथ। "क्या इश्क़ ने समझा है क्या हुस्न ने जाना है, हम ख़ाक नशीनों की ठोकर में ज़माना है"। मुलाहिज़ा फ़रमाइए!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

झटपट समझ लेती हैं,
ऑंखें आखों की भाषा,
बस एक उजाला दिख जाए,
मन जाग उठे फिर आशा

पिछली पहेली का परिणाम-
कोई जवाब नहीं, कहाँ खो गए हमारे धुरंधर सब....इतना मुश्किल तो नहीं था, और फिर चारों शब्द भी दिए गए थे....फिर ? इंदु जी और पाबला जी जाने कहाँ है इन दिनों, इंदु जी, आप विजेता हैं अपनी पसंद के ५ गीतों की सूची जल्दी से भेजिए

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

6 comments:

शरद तैलंग said...

मेरे भोले बलम , मेरे प्यारे बलम
गायक : किशोर कुमार
फ़िल्म : पडोसन

AVADH said...

meri bholi si bindu, meri pyari si bindu,... jhatpat padh le mere nayanon ki bhasha, mere andhe kuyen mein deep jala de kar de ujala....
Sharad ji ko badhai.
Avadh Lal

paro said...

jis tarah yuni kavi partiyogita men koi ek bar yuni kavi ke bad bhag nahin le sakta yahan bhi ek bar ka vijeta agar sda ke liye nhin to km sekm 6 mah tk hissa n lena chahiye

paro said...

jis tarah yuni kavi partiyogita men koi ek bar yuni kavi ke bad bhag nahin le sakta yahan bhi ek bar ka vijeta agar sda ke liye nhin to km sekm 6 mah tk hissa n lena chahiye

paro said...

jis tarah yuni kavi partiyogita men koi ek bar yuni kavi ke bad bhag nahin le sakta yahan bhi ek bar ka vijeta agar sda ke liye nhin to km sekm 6 mah tk hissa n lena chahiye

अतुल्य said...

यह क़व्वाली दस की जगह मात्र 3.25 मिनिट की ही है। क्या इसे पूरा सुना जा सकेगा....

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