शनिवार, 2 जनवरी 2010

ओ हसीना जुल्फों वाली....जब पंचम ने रचा इतिहास तो थिरके कदम खुद-ब-खुद

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 302/2010/02

'पंचम के दस रंग' शृंखला की दूसरी कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। कल आपने पहली कड़ी में सुनें थे पंचम के गीत में भारतीय शास्त्रीय संगीत की मधुरता। आज इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में जाते हुए आप के लिए हम लेकर आए हैं एक धमाकेदार पाश्चात्य धुनों पर आधारित गीत। फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' राहुल देव बर्मन की पहली सुपरहिट फ़िल्म मानी जाती है, जिसमें कोई संशय नहीं है। इसी फ़िल्म में वो अपने नए अंदाज़ में नज़र आए और जिसकी वजह से उन्हे पाँच क्रांतिकारी संगीतकारों में जगह मिली। (बाक़ी के चार संगीतकार हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचंद्र, ओ. पी. नय्यर, और ए. आर. रहमान)। इन नामों को पढ़कर आप ने यह ज़रूर अंदाज़ा लगा लिया होगा कि इन्हे क्रांतिकारी क्यों कहा गया है। तो फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' पंचम की कामयाबी की पहली मंज़िल थी। इस फ़िल्म से फ़िल्म संगीत जगत में उन्होने जो हंगामा शुरु किया था, वह हंगामा जारी रखा अपने अंतिम समय तक। रफ़ी साहब पर केन्द्रित शृंखला के अन्तर्गत इस फ़िल्म से "दीवाना मुझसा नहीं" गीत हमने सुनवाया था और फ़िल्म की जानकारी भी दी थी। आज बस यही कहेंगे कि मजरूह साहब के लिखे इस गीत को गाया रफ़ी साहब और आशा जी ने और गाना फ़िल्माया गया शम्मी कपूर और हेलेन पर। जी हाँ, भले ही आशा पारेख फ़िल्म की हीरोइन थीं पर यह कल्ब सोंग हेलेन पर फ़िल्माया गया था। अब तक आप के ज़हन में इस गानें के दॄश्य ज़रूर उभर चुके होंगे।

आइए आज कुछ बातें करें राहुल देव बर्मन की, और क्योंकि गाना शम्मी कपूर साहब पर फ़िल्माया हुआ है तो क्यों ना जानें शम्मी साहब क्या कहते हैं इस अनोखे संगीतकार के बारे में! इस अंश में वो केवल पंचम के बारे में ही नहीं बल्कि 'तीसरी मंज़िल' से जुड़ी कुछ और यादों को भी पुनर्जीवित कर रहे हैं (सौजन्य: विविध भारती - उजाले उनकी यादों के)। "नासिर मेरा बड़ा क़रीब और जिगरी दोस्त है। पहली पिक्चर डिरेक्ट की थी 'तुमसा नहीं देखा', जिसका मैं हीरो था। फिर 'दिल देके देखो' में भी मैं हीरो था। फिर उसने देव आनंद को ले लिया 'जब प्यार किसी से होता है' में। बहुत ही बढ़िया म्युज़िक था उस पिक्चर का। ख़ैर, एक अरसे के बाद हम फिर साथ में आए, नासिर और मैं, 'तीसरी मंज़िल' के लिए। तो नासिर ने कहा कि इस फ़िल्म के लिए एक नया म्युज़िक डिरेक्टर लेते हैं। मैंने कहा अच्छी बात है। उन्होने कहा कि मुझे भी शौक है, तुझे भी शौक है, 'why should we take Shankar Jaikishan only?' बोले कि आर. डी. बर्मन को लेते हैं। तो एक दिन हम सब सिटिंग् पे बैठे। पंचम ने गाना शुरु किया "दीवाना मुझसा नहीं इस अंबर के नीचे", और मैं भी गा उठा "ए कांचा मलाइ सुनको तारा खसाई देओ ना"। वो पागल हो गया, उठके भाग गया वहाँ से। कहने लगा कि मैं म्युज़िक नहीं दूँगा। मैने यह गाना दार्जिलिंग में सुना था, इसलिए मुझे याद रह गया था। बहुत सारी यादें हैं उस पिक्चर के साथ, इस पिक्चर का पहला गाना पिक्चराइज़ कर रहे थे "ओ हसीना ज़ुल्फ़ोंवाली", और वह गाना ख़त्म किया ही था कि 'my wife fell sick'. Geeta fell sick', और फिर मैं घर चला आया था यहाँ पे, 'and she died'. वह पिक्चर रुक गई, शूटिंग् रुक गई, नासिर ने सेट लगाए रखा महबूब स्टुडियो में तीन महीने तक। और तीन महीनों तक मैने शूटिंग् नहीं की। 'I was not in that mental state', और फिर जब मैं ठीक हो गया, मुझे लगा कि अब मैं शूटिंग् कर सकता हूँ, मैं गया सेट पे और तब वह गाना पिक्चराइज़ होना था "तुमने मुझे देखा हो कर महरबाँ"।" दोस्तों, ये तो थीं कुछ खट्टी मीठी यादें शम्मी कपूर जी के फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' से जुड़ी हुई। अब गीत का आनंद उठाने से पहले ज़रा पंचम दा की भी तो सुन लीजिए कि उनका क्या कहना है इस गीत के बारे में (सौजन्य: जयमाला, विविध भारती): "उसके बाद ('छोटे नवाब' के बाद) मेरी जो बड़ी फ़िल्म, बड़ी यानी कि जिसका स्टार कास्ट बड़ा हो, वह फ़िल्म थी 'तीसरी मंज़िल'। इस फ़िल्म से मुझे नाम और रिकाग्निशन मिला, सब लोग बोलने लगे कि ये अलग टाइप का म्युज़िक देता है,मोडर्न टाइप का। इस फ़िल्म का पहला गाना बना कर मैं आशा जी और रफ़ी साहब के घर गया, उनसे कहा कि यह गाना प्रोड्युसर, डिरेक्टर, शम्मी कपूर, सभी को बहुत पसंद है। रफ़ी साहब को कहा कि आप को इसमें शम्मी कपूर के स्टाइल में गाना पड़ेगा। दोनों ने गाना सुन कर कहा कि इस गाने के लिए तो ४/५ रिहर्सल देने पड़ेंगे। यह सुन कर मैं बहुत प्राउड फ़ील करने लगा कि इतने बड़े सिंगर्स लोग कह रहे हैं कि मेरे गीत के लिए ४/५ रिहर्सल्स देने पडेंगे।" तो सुनिए यह गाना।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

हाथ साफ़ रख हर सौदे में,
न ईमान डिगा दुनिया के डर से,
चलना पड़े अकेला बेशक,
गिर तू कभी अपनी नज़र से...

पिछली पहेली का परिणाम-


खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

1 टिप्पणी:

शरद तैलंग ने कहा…

ओ मेरे दिल के चैन
चैन आए मेरे दिल को दुआ कीजिए
यूं तो अकेला ही अक्सर
गिर के संभल सकता हूँ मैं
तुम जो पकड़ जो हाथ मेरा
दुनिया बदल सकता हूँ मैं ...

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