Monday, August 10, 2009

बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते है...कितना सही कहा था शायर ने किशोर में स्वरों में बसकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 167

"फूलों से ख़ूबसूरत कोई नहीं, सागर से गहरा कोई नहीं, अब आप की क्या तारीफ़ करूँ, दोस्ती में आप जैसा प्यारा कोई नहीं"। जी हाँ, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में दोस्त और दोस्ती की बातें। एक अच्छा दोस्त जहाँ एक ओर आप की ज़िंदगी को सफलता में बदल सकता है, वहीं बुरी संगती आदमी को बरबादी की तरफ़ धकेल देती है। इसलिए हर आदमी को अपने दोस्त बहुत सावधानी से चुनने चाहिए। वो बड़े क़िस्मत वाले होते हैं जिन्हे ज़िंदगी में सच्चे दोस्त नसीब होते हैं। कुछ इसी तरह का फ़लसफ़ा आज किशोर दा हमें सुना रहे हैं 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़' के अंतर्गत। "दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं, बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं". यूँ तो दोस्ती पर किशोर दा ने कई हिट गीत गाये हैं जैसे कि फ़िल्म 'शोले' में "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे", फ़िल्म 'दोस्ताना' में "बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा", फ़िल्म 'याराना' मे "तेरे जैसा यार कहाँ", आदि। लेकिन इन सभी गीतों को पीछे छोड़ देता है फ़िल्म 'नमक हराम' का प्रस्तुत गीत। बड़े ही ख़ुबसूरत बोलों में पिरो कर गीतकार आनंद बक्शी साहब ने ख़ूब लिखा है कि "दौलत और जवानी एक दिन खो जाती है, सच कहता हूँ सारी दुनिया दुश्मन हो जाती है, उम्र भर दोस्त लेकिन साथ चलते हैं, दीये जलते हैं..."। बक्शी साहब इस गीत के ज़रिये दुनिया को यह बता गये हैं कि एक आम आदमी की बोलचाल जैसी भाषा में भी बेहतरीन गीत लिखे जा सकते हैं। राहुल देव बर्मन के संगीत की तारीफ़ भी शब्दों में संभव नहीं।

'नमक हराम' सन् १९७३ की हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार फ़िल्म रिलीज़ हुई थी १९ नवंबर को। फ़िल्म 'आनंद' के बाद राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन फिर एक बार साथ साथ आये इस फ़िल्म में, और फिर एक बार वही कामयाबी की कहानी का दोहराव हुआ। बीरेश चटर्जी की कहानी कुछ इस तरह से थी कि सोमू (राजेश खन्ना) एक ग़रीब घर का लड़का है, और विक्की (अमिताभ बच्चन) एक उद्योगपति का बेटा। दोनों में दोस्ती होती है। विक्की के पिता के अस्वस्थ होने की वजह से विक्की को कारखाने का ज़िम्मा अपने उपर लेना पड़ता है, लेकिन युनियन लीडर से भिड़ जाने की वजह से कारखाने में हड़ताल हो जाती है। पिता के अनुरोध पर विक्की माफ़ी तो माँग लेता है, लेकिन बदले की आग में झुलसने लगता है। सोमू के साथ मिलकर वो युनियन लीडर को सबक सीखाने की ठान लेता है। सोमू कारखाने में नौकरी कर लेता है और जल्द ही मज़दूरों को प्रभावित कर ख़ुद युनियन लीडर बन जाता है। विक्की के पिता को विक्की और सोमू की दोस्ती ख़ास पसंद नहीं आती क्योंकि उन्हे लगता है कि सोमू अपने मध्यम वर्गीय विचारों से विक्की को प्रभावित कर रहा है। आख़िर में दोस्ती की जीत होती है या पिता के उसूलों की, यह तो आप ख़ुद ही इस फ़िल्म में कभी देख लीजिएगा। बहरहाल, आप को यह बता दें कि प्रस्तुत गीत के अलावा भी इस फ़िल्म में किशोर कुमार ने कम से कम दो और ऐसे गीत गाये हैं जिन्हे उनके सदाबहार गीतों की फ़ेहरिस्त में शामिल किया जाता है। ये गानें हैं "मैं शायर बदनाम" और "नदिया से दरिया, दरिया से सागर"। ये सभी गीत राजेश खन्ना ने परदे पर गाये थे। फ़िल्म की नायिकायें थीं रेखा और सिमी गरेवाल। फ़िल्म दो-नायक प्रधान फ़िल्म होने की वजह से नायिकाओं को ज़्यादा स्पेस नहीं मिल पाया और शायद इसीलिए इस फ़िल्म में किसी गायिका का गाया कोई गीत ज़्यादा चर्चित नहीं हुआ। तो दोस्तों, सुनिए आज का यह गीत और याद कीजिए अपने सच्चे दोस्तों और अपनी दोस्ती को। लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को भी अपने दोस्तों की लिस्ट में शामिल करना ना भूलिएगा!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक जोशीला गीत किशोर का.
2. कल के गीत का थीम है - "जवानी, यूथ".
3. मुखड़े में शब्द है -"बदनामी".

पिछली पहेली का परिणाम -
हा हा हा...भाई कल की पहेली में हमें खूब मज़ा आया....सभी धुरंधर जहाँ चूक गए वहां मनु जी ने संशय से भरा ही सही, मगर एकदम सही जवाब देकर बाज़ी मारी. देखा मनु जी, अपने पर विश्वास रखिये आप कमाल कर सकते हैं. ४ अंक हुए आपके. सभी श्रोताओं ने जिन्होंने कोशिश की उनकी हम दाद देते हैं.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

8 comments:

Anonymous said...

ham matwale naujawan manzilon ke ujale, log kare badnami kaise ye duniyawale.

6:25 se page refresh kar raha tha.

ROHIT RAJPUT

शरद तैलंग said...

aaj tp Rohit ji baazi mar le gaye. Badhaai

Manju Gupta said...

रिफ्रेश होकर हम रोहित जी को बधाई दे रहे हैं .

Parag said...

फिल्म शरारत का यह गीत सही जवाब मालूम होता है. बधाई रोहित जी को.

पराग

शरद तैलंग said...

अदा जी और दिशा जी
आज नाराज़ है क्या ? दर्शन नहीं हुए अभी तक ।

manu said...

pataa nahi kyon..?
ye hi get milaa hanein..jab sab haar gaye..
ise ham apne dost samjay ke sath baith kar uski awaa mein khoob sunte the..
nayi paheli kaa jaawab sahi lag rahaa hai..'
:)

Anonymous said...

SL No. 168 hona chahiye.

ROHIT

Shamikh Faraz said...

बधाई रोहित जी को.

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