Monday, August 17, 2009

शहर अमरुद का है ये, शहर है इलाहाबाद.....पियूष मिश्रा ने एक बार फिर साबित किया अपना हुनर

ताजा सुर ताल (15)

ताजा सुर ताल का नया अंक लेकर उपस्थित हूँ मैं सुजॉय और मेरे साथ है सजीव.

सजीव - नमस्कार दोस्तों..सुजॉय लगता है आज कुछ ख़ास लेकर आये हैं आप हमारे श्रोताओं के लिए.

सुजॉय - हाँ ख़ास इस लिहाज से कि आज हम मुख्य गीत के साथ-साथ श्रोताओं को दो अन्य गीत भी सुनवायेंगें उसी फिल्म से जिसका का मूल गीत है.

सजीव - कई बार ऐसा होता है कि किसी अच्छे विषय पर खराब फिल्म बन जाती है और उस फिल्म का सन्देश अधिकतम लोगों नहीं पहुँच पाता....इसी तरह की फिल्मों की सूची में एक नाम और जुडा है हाल ही में...फिल्म "चल चलें" का.

सुजॉय - दरअसल आज के समय में बच्चे भी अभिभावकों के लिए स्टेटस का प्रतीक बन कर रह गए हैं. वो अपने सपने अपनी इच्छाएँ उन पर लादने की कोशिश करते हैं जिसके चलते बच्चों में कुंठा पैदा होती है और कुछ बच्चे तो जिन्दगी से मुँह मोड़ने तक की भी सोच लेते हैं. यही है विषय इस फिल्म का भी...

सजीव - फिल्म बेशक बहुत प्रभावी न बन पायी हो, पर एक बात अच्छी है कि निर्माता निर्देशक ने फिल्म के संगीत-पक्ष को पियूष मिश्र जैसे गीतकार और इल्लाया राजा जैसे संगीतकार को सौंपा. फिल्म को लोग भूल भी जाएँ पर फिल्म का थीम संगीत के सहारे अधिक दिनों तक जिन्दा रहेगा इसमें कोई शक नहीं....हालाँकि पियूष भाई ने कोई कसर नहीं छोडी है पर इल्लाया राजा ने अपने संगीत से निराश ही किया है....

सुजॉय- हाँ सजीव, मुझे भी संगीत में उनके इस बार कोई नयापन नहीं मिला....श्रोताओं ये वही संगीतकार हैं जिन्होंने मेरा एक सबसे पसंदीदा गीत बनाया है. आज एक लम्बे अरसे के बाद संगीतकार इलय्या राजा का ख़याल आते ही मुझे 'सदमा' फ़िल्म का वह गीत याद आ रहा है "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले"। आज भी इस गीत को सुनता हूँ तो एक नयी उर्जा तन मन में जैसे आ जाती है ज़िंदगी को और अच्छे तरीके से जीने के लिए। जहाँ तक मेरे स्मरण शक्ति का सवाल है, मुझे याद है 'सदमा', 'हे राम', 'लज्जा', 'अंजली', 'अप्पु राजा', 'महादेव', 'चीनी कम', जैसी फ़िल्मों में उनका संगीत था।

सजीव - 2 जून 1953 को तमिल नाडु के पन्नईपूरम (मदुरई के पास) में इलय्याराजा का जन्म हुआ था पिता रामास्वामी और माता चिन्नथयी के घर संसार में। उनका असली नाम था ज्ञानदेसीकन, और उन्हे बचपन में प्यार से घर में रसय्या कह कर सब बुलाते थे। बाद में उन्होने अपने नाम में 'राजा' का प्रयोग शुरु किया जो उनके गुरु धनराज मास्टर ने रखा था। इन्हीं के पास उन्होंने अलग-अलग साज़ों की शिक्षा पायी थी। और आख़िरकार उनका नाम इलय्याराजा तमिल फ़िल्मों के निर्देशक पंजु अरुणाचलम ने रखा। पिता के मौत के बाद उनकी माताजी ने बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा किया। 1968 में फ़िल्मों के प्रति उनका लगाव उन्हें मद्रास खींच ले आया सगीत में कुछ कर दिखाने का ख़्वाब लिए हुए। इन्हीं दिनों वो प्रयोगधर्मी संगीत की रचना किया करते थे और 'पवलर ब्रदर्स' के नाम से एक और्केस्ट्रा को भी संगठित किया। इस टोली को लेकर उन्होंने कई जगहों पर शोज़ किए जैसे कि स्टेज पर, चर्च में, इत्यादि। फिर वो संस्पर्श में आये संगीतकार वेंकटेश के, जिनके वो सहायक बने।

सुजॉय - बिना किसी विधिवत शिक्षा के इलय्याराजा ने जो मुकाम हासिल किया है, वो सही मायने में एक जिनीयस हैं। उन्हे ट्रिनिटी कालेज औफ़ लंदन ने क्लासिकल गीटार में स्वर्णपदक से सम्मानित किया था। इलय्याराजा ने अपने भाई की याद में 'पवलर प्रोडक्शन्स' के बैनर तले कुछ फ़िल्मों का भी निर्माण किया था। उनके इस भाई का उस समय निधन हो गया था जब उनका परिवार चरम गरीबी से गुज़र रही थी। इलय्याराजा का तमिल फ़िल्म जगत मे पदार्पण हुआ था सन् 1976 में जब उन्हे मौका मिला था फ़िल्म 'अन्नाकिलि' में संगीत देने का। फ़िल्म कामयाब रही और संगीत भी ख़ासा पसंद किया गया क्योंकि उसमें एक नयापन जो था। मुख्य संगीत और पार्श्वसंगीत मिलाकर उन्होंने कुल 750 फ़िल्मों में काम किया है। उन्हें 1998 का लता मंगेशकर पुरस्कार दिया गया था। 'चल चलें' उनके संगीत से सजी लेटेस्ट फ़िल्म है। पीयूष मिश्रा ने इस फ़िल्म में गानें लिखे हैं। गीतों में आवाज़ें हैं शान, कविता कृष्णामूर्ती, हरिहरण, साधना सरगम, सुनिधि चौहान, आदित्य नारायण और कृष्णा की।

सजीव - अच्छा सुजॉय, ये बताओ दिल्ली और मुंबई के अलावा किसी और शहर पर बना कोई गीत तुम्हें याद आया है.

सुजॉय - हूँ ....एक गीत है फिल्म चौदहवीं का चाँद में "ये लखनऊ की सरजमीं...", "झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में" गीत है और एक गीत है जिसमें बीकानेर शहर का जिक्र है फिल्म राजा और रंक में "मेरा नाम है चमेली...". याद आया आपको ?

सजीव - हाँ बिलकुल पर यदि बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो ऐसे गीत लगभग न के बराबर हैं जो छोटे शहरों पर आधारित हो. मतलब जिसमें उस शहर से जुडी तमाम बातों का जिक्र हो ...

सुजॉय - हाँ तभी तो हमें आज इस गीत को चुना है जिसमें खूब तारीफ है "संगम" के शहर इलाहाबाद की."शहर है ख़ूब क्या है ये, शहर अमरूद का है ये, शहर है इलाहाबाद"। गंगा, जमुना, सरस्वती के संगम का ज़िक्र, हरिवंशराय और अमिताभ बच्चन के ज़िक्र, और तमाम ख़ूबियों की बात कही गयी है इलाहाबाद के बारे में। गीत पेपी नंबर है, जिसे शान, श्रेया घोषाल और कृष्णा ने मस्ती भरे अंदाज़ में गाया है।

सजीव - पियूष मिश्रा ने बहुत सुंदर लिखे हैं बोल. संगीत साधारण है....जिस कारण लोग जल्दी ही इस गीत को भूल जायेंगें. पर इलाहाबाद शहर के चाहने वाले तो इस गीत को सर आँखों पे बिठायेंगे ही. कुल मिलाकार गीत मधुर है. आपकी राय सुजॉय ?

सुजॉय - मुझे ऐसा लगा है कि आज फ़िल्म संगीत जिस दौर से गुज़र रही है, जिस तरह के गीत बन रहे हैं, उसमें इस फ़िल्म के गीत थोड़े से अलग सुनाई देते हैं। मिठास भी है और आज की पीढ़ी को आकर्षित करने का सामान भी है। लेकिन अगर आप मेरी व्यक्तिगत राय लेंगे तो अब भी इलय्याराजा के स्वरबद्ध किए 'सदमा' के गीतों को ही नंबर एक पर रखूँगा।

सजीव - बिलकुल....तभी तो आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3 अंक 5 में से, अब हमारे सुधि श्रोता बताएं कि उनकी राय क्या है. गीत के बोल इस प्रकार हैं -

शहर हाय खूब क्या है ये,
शहर अमरूद का है,
शहर है इलाहाबाद...
हाँ यही रहे थे,
हरिबंश हमारे,
क्या खूब निराला, वाह अश्क दुलारे,
कभी तो गंगा को चूम ले,
कभी तो जमुना को चूम ले,
सरस्वती आके झूम ले, अरे वाह
वाह वाह वाह...

ये तो अमिताभ का,
चटपटी चाट का,
साथ में कलम दवात और किताब का,
चुटकुले है यहाँ,
फिर भी गंभीर है,
है मज़ा यही तो यहाँ ये संग साथ का...
वो है एल्फ्रेड पार्क, जो है इतना पाक,
कि लड़ते लड़ते यहीं मरे आज़ाद...
ये तो इलाहाबाद है,
इसकी क्या ही बात है,
ये तमाम शहरों का ताज मेरी जान...

संगम की नाद से देता कोई तान है,
वो देखो सामने आनंद भवन में शाम है,
पंडित नेहरु हो कि यहाँ लाल बहादुर शास्त्री,
हिंदुस्तान के तख्त के जन्मे हैं राजा यहीं,
रस के जनों का ठौर है ये,
महादेवी का मान है ये,
नेतराम का चौराहा,
आज भी इसकी शान है ये,
अलबेला ये फुर्तीला मगर रुक-रुक के चलता है,
महंगा है न खर्चीला,
तनिक थोडा अलग सा शहर है ये....




सजीव - सुजॉय जैसा कि हमें वादा किया था कि आज हम इस फिल्म के दो गीत श्रोताओं को और सुन्वायेंगें. उसका कारण ये है कि इस फिल्म का मूल थीम है जिसका हमने ऊपर जिक्र किया है को बहुत अच्छे तरीके से उभारता है. पियूष मिश्रा के उत्कृष्ट बोलों के लिए इन गीतों को सुनना ही चाहिए. तो श्रोताओं सुनिए ये दो गीत भी -

बतला दे कोई तो हमें बतला दे



चल चलें (शीर्षक)



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. कैलाश खेर ने मधुर भंडारकर की किस फिल्म में गायन और अभिनय किया है....और वो गीत कौन सा है ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का जवाब तो अब तक आपको मिल ही चुका होगा...पर अफ़सोस हमारे श्रोता कोई इसे नहीं बूझ पाए, चलिए इस बार के लिए शुभकामनाएँ.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

6 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

वाह..बहुत बढ़िया..
शब्दों को खूब सुंदर ढंग से पिरोया इलाहाबाद के तारीफ मे..
वैसे शहर कबीले तारीफ है..

बढ़िया कविता..

neelam said...

PAHELI KA JAWAAB HAI "CORPORATE ".


ALLAHABAD (CITY OF ALLAH )SIRF 7 DIN RAHNE KA SAWASAR MILA THA ,TAB SE DIL ME BASA HAI .I LOVE THIS CITY .
AUR GANA SUNKAR TO PHIR SE WAHIN PAHU

NCH GAYE .

Manju Gupta said...

गीत तो मुझे सुनाई नही दिया .कविता पढ़कर वहां के टोकरी भरे मीठे - ,मीठे अमरुद ,संगम याद
आ गये . कविता को ..३ /५ दूंगी .

शैलेश भारतवासी said...

इस फिल्म का संगीत बहुत कमज़ोर है। बिलकुल नहीं जम रहा। एक बार के बाद यदि कोई दुबारा सुनेगा तो केवल पीयूष मिश्रा के बोलों के दम पर। मेरे हिसाब से गाने नहीं चल पायेंगे। पता नहीं इलाहाबाद के भी कितने लोगों ने इन्हें सुना।

खैर मैं 5 में से 2 अंक दूँगा, वो भी इसलिए कि गीत के बोल बहुत बढ़िया हैं।

neelam said...

ank to hmne diye hi nahi.5 me se 4 ank diye hain hmne

Shamikh Faraz said...

५ में से ३ दूंगा.

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