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यादें : भारतीय सिनेमा के सौ साल : फिरोज दस्तूर


स्वरगोष्ठी – ७४ में आज

फिल्म संगीत के शुरुआती दौर के नगीने : फिरोज दस्तूर

भारतीय फिल्मों के मूक से वाचाल होते ही उसका संगीत से ऐसा गहरा नाता जुड़ा कि आज आठ दशकों बाद तक कायम है। गीत-संगीत के बिना आज भी भारतीय सिनेमा के सफलता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिल्मों से पहले हमारे नाटकों में संगीत एक प्रमुख तत्व के रूप में उपस्थित रहा करता था। आरम्भिक फिल्मों में कई ऐसे संगीतकारों का योगदान रहा है, जिन्हें हम विस्मृत कर चुके हैं। पण्डित फिरोज दस्तूर एक ऐसे ही संगीतज्ञ थे।

शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, फिल्म और लोक-संगीत पर केन्द्रित साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक में सभी संगीत-प्रेमियों का, मैं कृष्णमोहन मिश्र, हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस तथ्य से हम सब परिचित हैं कि भारत की पहली सवाक फिल्म ‘आलमआरा’ थी। इस पहली बोलती फिल्म में भी गीत-संगीत की प्रधानता थी, यद्यपि इस ऐतिहासिक फिल्म का संगीत दुर्भाग्य से आज उपलब्ध नहीं है। आरम्भिक दौर के फिल्म-संगीत की छानबीन के दौरान एक उल्लेखनीय और दुर्लभ कृति नज़र आई, जिसे आज के अंक में हम आपके साथ बाँट रहे हैं।
फिल्म लाल-ए-यमन में फिरोज दस्तूर

१ जनवरी, १९३३ को फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का प्रदर्शन हुआ था। ‘वाडिया मूवीटोन’ नामक कम्पनी ने इस फिल्म का निर्माण किया था। फ़िल्म की कहानी एक काल्पनिक कुमारपुर नगर के शाही परिवार पर आधारित है। शुरुआती दौर की फिल्मों पर तत्कालीन व्यावसायिक पारसी थियेटर का गहरा प्रभाव था। १९३२ के उत्तरार्द्ध में बनी और वर्ष १९३३ के पहले दिन प्रदर्शित फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ भी पारसी थियेटर के गुण-अवगुण से प्रभावित थी। हिन्दी फिल्मों के इतिहासकार और शोधकर्त्ता विजयकुमार बालकृष्णन् के अनुसार यह फिल्म पूरी तरह पारसी रंगमंच का फिल्म-रूपान्तरण था। उन दिनों पारसी रंगमंच की लोकप्रियता शिखर पर थी। नाटकों में चमत्कारपूर्ण दृश्यों की एक सीमा होती थी, किन्तु फिल्मों में यह सीमा और सम्भावना काफी बढ़ गई थी। इस फिल्म में चमत्कारपूर्ण दृश्यों की भरमार थी। परन्तु फिल्म की सफलता का प्रमुख तत्त्व इसका संगीत था। फिल्म के निर्देशक जे.बी.एच. वाडिया ने १३ वर्षीय एक किशोर को शाहजादे की भूमिका निभाने के लिए सौ रुपये (जो उस समय एक बड़ी धनराशि थी) पर मात्र एक गीत गाने के लिए अनुबन्धित किया था। वह किशोर और कोई नहीं शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर रहे फिरोज दस्तूर थे। अनुबन्ध के अनुसार जब फिरोज दस्तूर ने फिल्म का पहला गीत गाया, तब उस गायकी पर मुग्ध होकर फिल्म के निर्माता-निर्देशक जे.बी.एच. वाडिया ने एक के बाद एक छह और गीत उनसे गवाए। ८९ वर्ष की आयु में मई २००८ को निधन से पहले पण्डित फिरोज दस्तूर के सांगीतिक जीवन पर एक वृत्तचित्र का निर्माण हुआ था, जिसमें उन्होने अपनी इस पहली फिल्म का ज़िक्र किया था। अब हम आपको पहले वृत्तचित्र का अंश, फिरोज दस्तूर की आवाज़ में सुनवाते है। इसके बाद उनकी आवाज़ में फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का राग मालकौंस पर आधारित एक गीत भी आपको सुनवाएँगे।

पण्डित फिरोज दस्तूर से की गई बातचीत का एक अंश


फिल्म लाल-ए-यमन : ‘मशहूर थे जहाँ में...’ : फिरोज दस्तूर



१९३२ में बनी फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ के इस गीत के बीच में बादल गरजने और बिजली चमकने का प्रभाव उत्पन्न किया गया था। उन दिनों जब रिकार्डिंग तकनीक विकसित नहीं हुई थी, इस प्रकार के ध्वनि-प्रभाव दर्शकों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थे। फिरोज दस्तूर ने फिल्म में कुल सात गीत गाये थे। फिल्म में तीन गीत मास्टर मोहम्मद ने फकीर की भूमिका निभाते हुए गाए थे। कई इतिहासकार मास्टर मोहम्मद को ही फिल्म का संगीतकार मानते हैं। परन्तु फिल्म में यह श्रेय जोसेफ डेविड को दिया गया है। दरअसल जोसेफ डेविड मूलतः पारसी थियेटर के नाट्यालेख तैयार करने और चमत्कारपूर्ण दृश्य रचने में माहिर थे। पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ की पटकथा जोसेफ डेविड ने ही तैयार की थी। अब हम इस फिल्म का एक और गीत प्रस्तुत कर रहे हैं, फिरोज दस्तूर की ही आवाज़ में। इस गीत को सुन कर आपको सहज अनुमान हो जाएगा कि मात्र १३ वर्ष की आयु में ही उनका गला रागानुभूति कराने में कितना समर्थ था। इस गीत में आप राग दरबारी की छटा देखिए।

फिल्म लाल-ए-यमन : ‘अब नाहीं धरत धीर...’ : फिरोज दस्तूर



युवावस्था में फिरोज दस्तूर 
भारतीय फिल्मों के संगीत-इतिहास-लेखक पंकज राज के शोध-ग्रन्थ ‘धुनों की यात्रा’ में फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ के संगीत के बारे में लिखा है- “मास्टर मोहम्मद वाडिया मूवीटोन की स्टंट फिल्मों में संगीत दिया करते थे। पारसी थियेटर के रंग से सराबोर वाडिया की प्रथम फंतासी ‘लाल-ए-यमन’ (१९३३) में उन्होने संगीत देने के अलावा एक सूफी फकीर की भूमिका भी निभाई थी और एक गीत‘गाफिल बंदे कुछ सोच जरा...’ भी गाया था। स्वयं गीत गाने के अलावा उन्होने फिरोज दस्तूर से भी कई गीत गवाए थे”। दरअसल मास्टर मोहम्मद ही इस फिल्म के संगीतकार थे और फिल्म में एक नहीं बल्कि तीन गीत गाये थे। उस दौर में गायक, वादक और संगीतकार फिल्म निर्माण कम्पनी के मुलाज़िम हुआ करते थे और आम तौर पर उन्हें श्रेय दिये जाने का चलन नहीं था। पंकज जी ने अपनी पुस्तक में मास्टर मोहम्मद के गाये जिस गीत का उल्लेख किया है, अब हम आपको वही गीत सुनवाते है।

फिल्म लाल-ए-यमन : ‘गाफिल बंदे कुछ सोच जरा...’ : मास्टर मोहम्मद



फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ में फिरोज दस्तूर के गाये सात, मास्टर मोहम्मद के तीन गीतों के अलावा नारी कण्ठ-स्वर में दो गीत गाये गए हैं, किन्तु ये दोनों गीत किस गायिका के स्वर में है, यह ज्ञात नहीं हो सका है। फिल्म के सभी गीत मुंशी अश्क ने लिखे थे। इस फिल्म के सभी गीतों को हम दो वर्गों में बाँट सकते हैं। कुछ गीत ऐसे हैं, जिनमें तत्कालीन पारसी थियेटर के गीतों की यथावत नकल है। मास्टर मोहम्मद के गाये तीनों गीतों में पारसी थियेटर की स्पष्ट नकल है, किन्तु फिरोज दस्तूर के गाये कई गीतों में शास्त्रीय गायकी का अंदाज नज़र आता है। आइए फिरोज दस्तूर की आवाज़ में फिल्म का एक ऐसा ही गीत अब हम आपको सुनवाते हैं।

फिल्म लाल-ए-यमन : ‘तोरी हरदम परवर आस...’ : फिरोज दस्तूर




अपने गुरूभाई पण्डित भीमसेन

जोशी के साथ फिरोज दस्तूर



फिरोज दस्तूर का जन्म १९१९ में एक संगीत-प्रेमी पारसी परिवार में हुआ था। १३ वर्ष की आयु में जब उन्होने फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ में अभिनय और गायन किया था उस समय उनकी संगीत-शिक्षा आरम्भ हो चुकी थी। फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ के बाद उन्होने वाडिया की ही दो और फिल्मों- ‘बाग-ए-मिस्र’ और ‘काला गुलाब’ में भी काम किया था। आगे चल कर उन्होने किराना घराने की संगीत-शिक्षा प्राप्त की। सवाई गन्धर्व उनके गुरु थे। इस प्रकार वे पण्डित भीमसेन जोशी और विदुषी गंगुबाई हंगल के गुरुभाई थे। मुम्बई विश्वविद्यालय में संगीत विभाग की स्थापना १९६९ में की गई थी। पण्डित फिरोज दस्तूर विभाग के स्थापना-काल से ही यहाँ प्रोफेसर पद पर नियुक्त किये गए। संगीत-शिक्षा के साथ-साथ देश-विदेश के हर प्रतिष्ठित संगीत सम्मेलनों में उनकी सहभागिता रहती थी। अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन, सूरदास संगीत सम्मेलन, सुरश्रृंगार संसद, तानसेन संगीत समारोह आदि में वे नियमित रूप से आमंत्रित किये जाते थे। महाराष्ट्र में आयोजित होने वाले सवाई गन्धर्व संगीत महोत्सव में वे १९५२ से लगातार प्रत्येक वर्ष भाग लेते रहे। मई २००८ में ८९ वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था। जीवन के अन्तिम क्षणों तक अपने शिष्यों के बीच सक्रिय पण्डित फिरोज दस्तूर एक संगीत-शास्त्री, शिक्षक और संगीतज्ञ के रूप में तो सदा याद किये जाएँगे ही, सवाक फिल्मों के आरम्भिक दौर में भी उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अब आज के इस अंक से विराम लेते हुए हम आपको पण्डित फिरोज दस्तूर के स्वर में राग यमन के द्रुत एकताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं।

पण्डित फिरोज दस्तूर : राग यमन : ‘बल बल जाऊँ...’ : द्रुत एकताल



आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, एक परम्परागत ठुमरी का फिल्मी संस्करण। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। प्रत्येक सही उत्तर पर एक-एक अंक निर्धारित है। ‘स्वरगोष्ठी’ के ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – यह ठुमरी किस राग पर आधारित है?

२ – गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमें उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७६वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के उत्तर

‘स्वरगोष्ठी’ के ७२वें अंक की पहेली में हमने आपको जुबीन मेहता द्वारा संयोजित पाश्चात्य संगीत की वाद्यवृन्द (आर्केस्ट्रा) रचना का एक अंश सुनवाया था, जिसमें पण्डित रविशंकर का सितार-वादन भी था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- जुबीन मेहता और दूसरे का सही उत्तर है- पण्डित रविशंकर। इस बार की पहेली के दोनों प्रश्नों का सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। हमारे एक नये पाठक, वाराणसी के अभिषेक मिश्रा ने पहले प्रश्न का सही किन्तु दूसरे प्रश्न का गलत उत्तर दिया है, जबकि पटना की अर्चना टण्डन पहले का गलत और दूसरे का सही उत्तर दिया है। तीनों प्रतियोगियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।


मित्रों, अब हमने आपकी प्रतिक्रियाओं, सन्देशों और सुझावों के लिए एक अलग साप्ताहिक स्तम्भ ‘आपकी बात’’ आरम्भ किया है। अब प्रत्येक शुक्रवार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया ’ पर आपके भेजे संदेशों को हम अपने सजीव कार्यक्रम में शामिल करते हैं। आप हमें swargoshthi@gmail.com अथवा cine.paheli@yahoo.com के पते पर अपनी टिप्पणियाँ, सुझाव और सन्देश आज ही लिखें।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में ठुमरी गीतों के अप्रतिम भाष्यकार और अनूठे हारमोनियम (संवादिनी) वादक भैया गणपत राव के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आपसे चर्चा करेंगे, जिनके बारे में यह उक्ति प्रचलित थी- ‘हारमोनियम बनाया तो अंग्रेजों ने, परन्तु बजाया भैया गणपत राव ने’। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में हम इन्हीं कलाकार के विषय में चर्चा करेंगे। आप अवश्य पधारिएगा। 


कृष्णमोहन मिश्र

Comments

Sajeev said…
बहुत बढ़िया कृष्णमोहन जी, एक और नयी शुरुआत
Unknown said…
pandit ji kee awaz men keval yaman ki bandish sun kar ji nahi bhara. ek lekh keval unki ragdari sangeet par bhi honi chahiye.
Shrikumar mishra
(Mayuri Veena Player)

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