शनिवार, 23 जून 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (4) गैंग्स ऑफ वासेपुर, एक कप चाय और आपकी बात

संगीत समीक्षा - गैंग्स ऑफ वासेपुर



दोस्तों कभी कभी कोई ऐसी एल्बम आती है जिस पर चर्चा करना बेहद सुखद लगता है. गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसा शीर्षक हो और अनुराग कश्यप का नाम उससे जुड़ा हो तो एक इमेज बनती है बेहद गंभीर किस्म के फिल्म की, जहाँ संगीत की गुंजाईश न के बराबर हो. मगर कांस फिल्म समारोह में अधिकारिक रूप से प्रदर्शित इस अनूठी फिल्म में लगभग १५ गीत हैं. संगीत है स्नेहा कंवालकर का, जो खुद पहचान है "वोमनिया" की, जैसा कि अल्बम का एक गीत भी है. संगीतकारों की पुरुष प्रधान दुनिया में एक अलग ही पहचान लेकर आयीं हैं स्नेहा. अल्बम की एक और बड़ी खासियत ये है कि इसके सभी गीत किसी स्थापित बॉलीवुड गायक/गायिकाओं ने नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार और वेस्ट बंगाल के स्थानीय गायकों ने गाये हैं. ठेठ देसी अंदाज़ के इस अल्बम में एक मात्र स्टार हैं भोजपुरी गायक मनोज तिवारी, जिनकी आवाज़ से सजे "जिया हो" गीत से अल्बम की शुरुआत होती है. कोई ताम झाम नहीं सिर्फ और सिर्फ भोजपुरिया रंग में रंग ये गीत अल्बम की सटीक शुरुआत कर देता है. जिसके बाद आता है एक मस्त अंदाज़ का, हल्का फुल्का द्विअर्थी, और थोड़ी सी छेड छाड भरा गीत "हम हैं शिकारी". हंटर नाम का ये लोक गीत कैरिबियन में बसे उत्तर भारतियों में ख़ासा लोकप्रिय है. अंग्रेजी और हिंदी शब्दों का अनूठा अंदाज़ वाकई में दिलचस्प है. आप एक बार सुनकर इसे गुनगुनाये बिना नहीं रह पायेंगें. और जब भी गुनगुनायेंगे एक शरारत भरी मुस्कराहट आपके होंठों पे भी अवश्य होगी...खुशबू राज और रेखा झा जो कि बनारस की गायिकाएं हैं, की आवाजों में वुमनिया की चर्चा हम कर ही चुके है, कुछ रेट्रो अंदाज़ का ये गीत सही मायनों में नारी शक्ति को पुरुष प्रधान समाज में निर्भयता के साथ खड़े का एलान करती है, मगर इतने हलके फुल्के अंदाज़ में कि कोई भी पुरुष इस गीत को मजे से सुनना चाहेगा, और नारियों की जुबान पे ये चढ जाए तो हैरानी बिलकुल नहीं हो.

चूँकि बात गैंग्स की है तो ललकारों की धमकियों की बात भी लाजमी है. "कह के लूँगा" एक इसी अंदाज़ का गीत है. गीतकार ने "कह के लूँगा" फ्रेस को बखूबी अपनी कमान में चढाया है जो अमूमन लड़ाई झगडों के दौरान इस्तेमाल होता है. संगीतकार अमित त्रिवेदी यहाँ एक गायक के रूप में है स्नेहा के साथ. मनीष टीपू और भूपेश सिंह की आवाजों में "भूस" शब्द, संगीत और गायिकी हर लिहाज से देसी गीत है....जहाँ दार्शनिकता किनारे से गुजरती है और मस्त मलंग वाला ठाठ सर चढ कर बोलता है. जिन्हें भी तीसरी कसम का चलत मुसाफिर गीत भाया होगा उनके लिए पेश है ये नए दौर की चौपाल और वहाँ बैठी गायकों की टोली...एक बगल में चाँद होगा एक बगल में रोटियाँ, ये सदा है गीतकार गायक पियूष मिश्रा की. पियूष यहाँ एक दम उसी रूप में है जिस रूप में उनके चाहने वालों ने उन्हें एकल नाटकों में देखा होगा. गीत में एक अजीब सी कशिश है और पियूष के शब्द गहरी चोट करते हैं. आपको राज कपूर की फ़िल्में याद आ सकती हैं इसे सुनकर. आज के दौर में ऐसा गीत संभव करने के लिए एक बार फिर टीम बधाई की हकदार है. भैयासूना करके, ऐ जवानों, और हमको छोड़ी के जैसे छोटे छोटे कुछ गीत हैं जिन्हें लोक गायकों ने अंजाम दिया है, मुज़फ्फर पुर के दीपक का गाया "हमको छोड़ी के" में सिर्फ हारमोनियम का इस्तेमाल हुआ है. मगर मजाल है जो आप एक सेकंड के लिए भी बोर हो जाएँ. एक और गीत है बांग्ला लोक रंग का "मन मौजी" जिसे बहुत खूब गाया है उर्मी बनर्जी ने. गैंग ऑफ वासेपुर से वापसी हुई है, तबला, हारमोनियम, मंजीरा, जैसे लोक वाद्यों की, लोक कलाकारों ने यहाँ मायिक संभाला है और ठेठ भारतीय अंदाज़ को दुनिया के सामने परोसा है. एक जैसे सुनाई देने वाले बहुत से फ़िल्मी गीतों की भीड़ में ये अल्बम एक अनूठा प्रयास है. रेडियो प्लेबैक इंडिया इस अल्बम को ४.३ की रेटिंग दे रही है ५ में से. अवश्य सुनें   



पुस्तक चर्चा - एक कप चाय  




एक कप चाय, विश्व प्रसिद्ध कहानियों का एक संकलन है जिसमें कैथरीन मैस्फील्ड, अर्नेस्ट हेम्न्ग्वे, लियो तोल्स्तोय, खुश्वंती सिंह, ओस्कर वाईल्ड, आर के नारायण, जिम कोर्बेट, और ७ अन्य विश्व प्रसिद्ध कथाकारों की एक एक कहानी संकलित है जिसका संपादन किया है मंजुला ने.
वी के पब्लिशिंग की इस प्रस्तुति में जहाँ एक कप चाय, बरसात में बिल्ली, और दही वाली जैसी भावप्रधान कहानियां है, तो बच्चों के लिए वीर कुम्हार, स्वार्थी राक्षस और विष्णु का चिन्ह जैसी कहानियां भी है जिनसे हम में से अधिकतर अपने स्कूल कॉलेज के दिनों से ही परिचित हैं. विल एफ जैकिंस की "एक डरी हुई वापसी" लियो तोल्स्तोय की "दो बूढ़े आदमी" और जय निम्बकर की "एक नायक की मौत" क्लास्सिकल लेखन के उत्कृष्ट नमूने के रूप में पाठकों को बाधें रखती है. हालाँकि अनुवाद का स्टार बहुत अच्छा नहीं है और कहानियों के चयन में भी एकरूपता का अभाव है मगर फिर भी इस तरह के संकलन वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के मार्गदर्शन के लिए सहेज कर रखे जा सकते हैं. पुस्तक की कीमत है २०० रूपए मात्र   
 


और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

 

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