Sunday, June 19, 2011

पिया बिन नाहीं आवत चैन: राग झिंझोटी के सुरों में उभरी देवदास की बेचैनी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 681/2011/121

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! सजीव सारथी के निर्देशन में इस सुरीले कारवाँ को लेकर आगे बढ़ते हुए हम बहुत जल्द पहुँचने वाले हैं अपने ७००-वे पड़ाव पर। इस ख़ास मंज़िल को छू पाना हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इसलिए हमें लगा कि जिस शृंखला के ज़रिये हम इस ७००-वे अंक तक पहुँचेंगे, वह शृंखला बेहद ख़ास होनी चाहिए। इस मनोकामना को साकार करने के लिए हम एक बार फिर से आमंत्रित कर रहे हैं हमारे अतिथि स्तंभकार और वरिष्ठ कला-समीक्षक व पत्रकार श्री कृष्णमोहन मिश्र को। आइए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अगले तीस अंकों (६८१ से ७१०) का हम आनंद लें कृष्णमोहन जी के साथ।
************************************************************************

'ओल्ड इज गोल्ड' के संगीत प्रेमी पाठकों/श्रोताओं का आज से शुरू हो रही हमारी नई श्रृंखला 'रस के भरे तोरे नैन...' में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक स्वागत है| आपको शीर्षक से ही यह अनुमान हो ही गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल उपशास्त्रीय गायन शैली "ठुमरी" है| सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से ही फ़िल्मी गीतों के रूप में ठुमरियों का प्रयोग आरम्भ हो गया था| विशेष रूप से फिल्मों के गायक सितारे कुंदनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता को बल दिया| चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है| इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया| कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है| इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर चर्चा करेंगे|

आज के ठुमरी गीत पर चर्चा से पहले भारतीय संगीत की रस, रंग और भाव से परिपूर्ण शैली "ठुमरी" पर चर्चा आवश्यक है| "ठुमरी" उपशास्त्रीय संगीत की लोकप्रिय गायन शैली है| यद्यपि इस शैली के गीत रागबद्ध होते हैं, किन्तु "ध्रुवपद" और "ख़याल" की तरह राग के कड़े प्रतिबन्ध नहीं रहते| रचना के शब्दों के अनुकूल रस और भाव की अभिव्यक्ति के लिए कभी-कभी गायक राग के स्वरों में अन्य स्वरों को भी मिला देते हैं| ऐसी ठुमरियों को 'मिश्र खमाज', 'मिश्र पहाडी', 'मिश्र काफी' आदि रागों के नाम से पहचाना जाता है| ठुमरियों में श्रृंगार और भक्ति रसों की प्रधानता होती है| कुछ ठुमरियों में इन दोनों रसों का अद्भुत मेल भी मिलता है| ठीक उसी प्रकार जैसे सूफी गीतों और कबीर के निर्गुण पदों में उपरी आवरण तो श्रृंगार रस से ओत-प्रोत होता है, किन्तु आन्तरिक भाव आध्यात्म और भक्ति भाव की अनुभूति कराता है|

आइए, अब आज के ठुमरी गीत पर थोड़ी चर्चा कर ली जाए| इस श्रृंखला की पहली फ़िल्मी ठुमरी के लिए हमने 1936 की फिल्म "देवदास" का चयन किया है| यह फिल्म सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के इसी नाम के उपन्यास पर बनाई गई थी| यह उपन्यास 1901 में लिखा गया और 1917 में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ था| "देवदास" पर सबसे पहली बार 1928 में मूक फिल्म 'इस्टर्न फिल्म सिंडिकेट' ने बनाई थी, जिसमे देवदास की भूमिका नरेश चंद्रा ने निभाया था| सवाक फिल्मों के युग में "देवदास" उपन्यास पर अब तक सात और फ़िल्में बन चुकी हैं| अकेले 'न्यू थिएटर्स' ने ही चार अलग-अलग भाषाओं में फिल्म "देवदास" का निर्माण किया था| 1935 में पी.सी. बरुआ (प्रथमेश चन्द्र बरुआ) के निर्देशन में बांग्ला भाषा की फिल्म "देवदास" का निर्माण हुआ| 1936 में श्री बरुआ के निर्देशन में ही हिन्दी में और 1937 में असमीया भाषा में यह फिल्म बनी थी| 1936 में ही 'न्यू थिएटर्स' की ओर से पी.वी. राव के निर्देशन में इस फिल्म के तमिल संस्करण का निर्माण भी किया गया था, किन्तु दक्षिण भारत में यह फिल्म बुरी तरह असफल रही| 1953 में तमिल और तेलुगु में "देवदास" के निर्माण का पुनः प्रयास हुआ और इस बार दक्षिण भारत में यह द्विभाषी प्रयोग सफल रहा| 1955 में विमल राय के निर्देशन में "देवदास" का निर्माण हुआ, जिसमें दिलीप कुमार देवदास की भूमिका में थे| इसके बाद 2002 में शाहरुख़ खान अभिनीत "देवदास" का निर्माण हुआ था|

आज हम आपके लिए फिल्म "देवदास" के जिस गीत को लेकर उपस्थित हुए हैं वह 1936 में हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म "देवदास" का है| फिल्म के निर्देशक पी.सी. बरुआ हैं, देवदास की भूमिका में कुंदनलाल सहगल, पारो (पार्वती) की भूमिका में जमुना बरुआ और चन्द्रमुखी की भूमिका में राजकुमारी ने अभिनय किया था| फिल्म के संगीतकार तिमिर बरन (भट्टाचार्य) थे| तिमिर बरन उस्ताद अलाउद्दीन खां के शिष्य और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वानों के कुल के थे| साहित्य और संगीत में कुशल तिमिर बरन के 'न्यू थियेटर्स' में प्रवेश करने पर पहली फिल्म "देवदास" का संगीत निर्देशन सौंपा गया| इस फिल्म के गीत आज आठ दशक के बाद भी चिर-नवीन लगते हैं| फिल्म के दो गीतों (ठुमरी) पर आज हम विशेष चर्चा करेंगे| पहली ठुमरी है -"बालम आय बसों मोरे मन में....."| राग "काफी" की यह ठुमरी प्राकृतिक परिवेश में, प्रणय निवेदन के भाव में प्रस्तुत किया गया है| दूसरी ठुमरी है -"पिया बिन नाहीं आवत चैन...", जो वास्तव में राग "झिंझोटी" की एक परम्परागत ठुमरी है, जिसका स्थायी और एक अन्तरा सहगल साहब ने अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ गाया है| "झिंझोटी" की यह विशेषता होती है कि श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रवृत्ति का होते हुए भी अद्भुत रस, भ्रम, बेचैनी और आश्चर्य भाव की अभिव्यक्ति में भी सक्षम होता है| राग "झिंझोटी" की यह ठुमरी 1925 -26 में महाराज कोल्हापुर के राज-गायक खां साहब अब्दुल करीम खां के स्वरों में अत्यन्त लोकप्रिय थी| रिकार्डिंग के बाद सहगल साहब की आवाज़ में इस ठुमरी को अब्दुल करीम खां साहब ने सुना और सहगल साहब की गायन शैली की खूब तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई का एक सन्देश भी भेजा था| सहगल साहब ने परदे पर शराब के नशे में धुत देवदास की भूमिका में इस ठुमरी का स्थाई और एक अन्तरा गाया है| गायन के दौरान ठुमरी में ताल वाद्य (तबला) की संगति नहीं की गई है| पार्श्व संगीत के लिए केवल वायलिन और सरोद की संगति है| आइए, राग "झिंझोटी" की यह ठुमरी के.एल. सहगल के स्वरों में सुनते हैं -



क्या आप जानते हैं...
कि "देवदास" उपन्यास के लेखक शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने फिल्म देख कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था -"फिल्म देखने के बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि इस उपन्यास को लिखने के लिए ही मेरा जन्म हुआ है और इसे सिनेमा के परदे पर मूर्त रूप देने के लिए ही आपका (पी.सी. बरुआ) का जन्म हुआ है|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - फिल्म की नायिका अभिनेत्री मुमताज शान्ति थीं.
सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गायिका बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार का नाम बताएं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी कमाल कर दिया आपने, ३ अंकों की बहुत बधाई. शानदार शुरुआत, इस बढ़त को बरकरार रखें

खोज और आलेख
कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

6 comments:

Avinash Raj said...

Indra Chandra

अमित तिवारी said...

PT INDRA CHANDRA

Deep Chandra said...

Movie: Bhartruhari

Kshiti said...

Gaaika Ameer baai

हिन्दुस्तानी said...

Gayika: Amir Bai Kernataki

RAJ SINH said...

प्रिय सजीव जी व सुजॉय दा,

कुछ दिनों पहले आपका पत्र मिला था की क्या आजकल मैंने ' आवाज़ ' से किनारा कर लिया है ? उसका जबाब तो दे ही दिया था की जिन्दगी की आपा धापी में ' आवाज़ ' एक शांति और राहत बन कर आता है,और जिन्दगी का हिस्सा बन गया है भले देर सबेर हो जाता हो , हाँ लिख कर आपका धन्यवाद नहीं कर पाता .
लेकिन आज अगर आपका धन्यवाद ना दूं तो खुद को अपराधी मानूँगा . शास्त्रीय संगीत मेरे लिए हमेशा जिन्दगी का हिस्सा रहा है और उसकी शुरुवात फिल्मों के शास्त्रीय sangeet से ही प्रेरित हो आगे बढ़ा गहराई तक . इसके लिए फिल्मों के शास्त्रीय संगीत का मैं हमेशा शुक्रगुजार रहूँगा वर्ना जीवन के अपने सबसे अनमोल आनंद से वंचित ही रहता .क्योंकि जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि से मैं आया वहां पूरे संगीत को ही ' मिरासी पना ' समझा जाता था .
बहरहाल ' देवदास ' मेरे लिए जिन्दगी का गंभीर पड़ाव रहा चाहे वह शुरुवाती हिंदी अनुवाद रहा हो या जिसके लिए ही मैंने बांग्ला लिखना पढना सहित भाषा सीखी ,शरत जी को ओरिजिनल बांग्ला में पढने के लिए .१९३६ के न्यू थियेटर के तमिल संस्करण को छोड़ मैंने सभी भाषाओँ की ' देवदास देखी है और बिमल दा की तो न जाने कितनी बार .गिन भी नहीं पाउँगा . सहगल जी की भी कई बार .
इसलिए आज मैं अपनी खुशी का पूरा इजहार तो न कर पाउँगा पर आपके इस आयोजन और इस श्रृंखला के ७०० वीं पायदान तक आपके इस काम को अपने निजी सौभाग्य से कम कुछ न कह पाउँगा .और जिस तरह से पारखी कृष्ण मोहन मिश्र जी पर यह जिम्मेदारी आपने दे शुरुआत कराई है ज्ञानपूर्ण आलेख सहित वह खुद साबित करता है की आपकी टीम आवाज़ के लिए कितनी समर्पित और प्रतिबद्ध है .
और ठुमरी ? ठुमरी तो क्म से क्म समय में मुझे पूरे ख्याल का आनंद देने वाली विधा रही है और सब से प्यारी भी .बिमल दा के देवदास में भी तलत जी के मितवा .......में भी उसी सिचुएसन में भी एक प्यारी झलक दिखती है .
आपकी पूरी टीम बधाई की पात्र है . इस उम्मीद और प्रार्थना के साथ की ' आवाज़ ' का कारवाँ ऐसे ही मंजिल दर मंजिल अपनी उचायीओं को आगे बढाता रहे आप सभी का धन्यवाद .

और मिश्रा जी को तो अनंत धन्यवाद !

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ