गुरुवार, 23 जून 2011

भैरवी के सुरों में श्रृंगार, वैराग्य और आध्यात्म का अनूठा संगम -"बाबुल मोरा नैहर छुटो ही जाए.."

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 685/2011/125

'ओल्ड इज गोल्ड' पर जारी श्रृंखला "रस के भरे तोरे नैन" की पाँचवी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आपका स्वागत करता हूँ| दोस्तों; संगीत के मंच की एक परम्परा है कि गायक या वादक अपनी प्रस्तुतियों का समापन राग भैरवी के गायन-वादन से करते हैं| आज की यह सप्ताहान्त प्रस्तुति है, अतः आज हमने आपके लिए जो ठुमरी चुनी है वह राग भैरवी में निबद्ध है| राग भैरवी को "सदा सुहागन राग" कहा गया है| संगीत के अन्य रागों को समय (प्रहर) या ऋतुओं में ही गाने-बजाने की परम्परा है, किन्तु "भैरवी" हर मौसम और हर समय कर्णप्रिय लगता है| राग "भैरवी की एक विशेषता यह भी होती है कि इस राग के बाद दूसरा कोई भी राग सुनने में अच्छा नहीं लगता, इसीलिए हर कलाकार द्वारा प्रस्तुति के अन्त में "भैरवी" का गायन-वादन किया जाता है| सभी कोमल स्वरों वाला यह राग उपशास्त्रीय और सुगम संगीत की रचनाओं के लिए सबसे उपयुक्त राग है| इसीलिए फिल्म संगीत में राग आधारित गीतों में सर्वाधिक संख्या भैरवी आधारित गीतों की ही है|

श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हमने अवध के नवाब वाजिद अली शाह के संगीत-नृत्य-प्रेम के विषय में चर्चा की थी| आज उसी चर्चा को आगे बढाते हैं| नवाब वाजिद अली शाह 1847 से 1856 तक अवध के शासक रहे| उनके कार्यकाल में ही "ठुमरी" एक शैली के रूप में विकसित हुई थी| उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी| नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की स्वयं रचनाएँ भी की| इसके अलावा "अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी| राग "खमाज" का सादरा -"सुध बिसर गई आज अपने गुनन की..." तथा राग "बहार" का ख़याल -"फूलवाले कन्त मैका बसन्त गडुआ मोल ले दे रे....." उनकी बहुचर्चित रचनाएँ हैं| उनका राग "खमाज" का सादरा संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने राग "हेमन्त" में परिवर्तित कर फिल्म "संगीत सम्राट तानसेन" में प्रयोग किया था| 7 फरवरी 1856 को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी -"बाबुल मोरा नैहर छुटल जाए...." में अभिव्यक्त हुआ| नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को ना गाया हो| 1936 के लखनऊ संगीत सम्मलेन में जब उस्ताद फैयाज़ खां ने इस ठुमरी को गाया तो श्रोताओं की आँखों से आँसू निकल पड़े थे| इसी ठुमरी को पण्डित भीमसेन जोशी ने अनूठे अन्दाज़ में गाया, तो विदुषी गिरिजा देवी ने बोल-बनाव से इस ठुमरी का अध्यात्मिक पक्ष उभारा है| फिल्मों में भी इस ठुमरी के कई संस्करण उपलब्ध हैं| 1938 में बनी फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' में कुन्दन लाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी भैरवी सर्वाधिक लोकप्रिय हुई|

श्रृंखला का प्रारम्भ हमने सहगल साहब के स्वरों से किया था| आज हम पुनः उन्हीं की आवाज़ में आपको वर्ष 1938 में बनी फिल्म "स्ट्रीट सिंगर" की ठुमरी भैरवी -"बाबुल मोरा नैहर छुटो ही जाए..." सुनवाने जा रहे हैं| फिल्म के संगीतकार आर.सी. (रायचन्द्र) बोराल थे| सहगल साहब ने अपनी गायी इस ठुमरी पर स्वयं अभिनय किया है| उनके साथ अभिनेत्री कानन देवी हैं| हालाँकि उस समय पार्श्वगायन की शुरुआत हो चुकी थी, परन्तु फिल्म निर्देशक फणी मजुमदार ने गलियों में पूरे आर्केस्ट्रा के साथ इस ठुमरी की सजीव रिकार्डिंग और फिल्मांकन किया था| एक ट्रक के सहारे माइक्रोफोन सहगल साहब के निकट लटकाया गया था और चलते-चलते यह ठुमरी और दृश्य रिकार्ड हुआ था| राग भैरवी में निबद्ध यह एक शानदार ठुमरी है| भैरवी के स्वरों का जितना शुद्ध रूप इस ठुमरी गीत में किया गया है, फिल्म संगीत में उतना शुद्ध रूप कम ही पाया जाता है| आइए सुनते हैं, नवाब वाजिद अली शाह की सर्वाधिक लोकप्रिय ठुमरी रचना-
राग भैरवी : "बाबुल मोरा नैहर छुटो ही जाए..." : फिल्म - स्ट्रीट सिंगर



क्या आप जानते हैं...
कि नवाब वाजिद अली शाह की इस ठुमरी को गाते समय के.एल. सहगल ने कुछ शब्दों में परिवर्तन किया था, किन्तु विदुषी गिरिजा देवी ने इस ठुमरी को गाते समय मूल शब्दों का ही प्रयोग किया है|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - किस अभिनेत्री पर फिल्मांकित है ये गीत - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -


खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

8 टिप्‍पणियां:

अमित तिवारी ने कहा…

This post has been removed by the author.

Avinash Raj ने कहा…

Mala Sinha

Kshiti ने कहा…

nalini jayawant

AVADH ने कहा…

आज तो लगता है कि भाई अमित चूक गए.
लगता है कि आपके बंगले को किसी की नज़र लग गयी.
अविनाश जी, क्षिति जी ने आज बाज़ी मार ली.
गीतकार - मजरूह सुल्तानपुरी.
आशा ताई की मधुर आवाज़.
अवध लाल

AVADH ने कहा…

भाई अनजाना जी, इतनी नाराजगी भी अच्छी नहीं.
आपकी कमी खटक रही है.
Please come back to where you belong.
We are all missing you very much.
अवध लाल

अमित तिवारी ने कहा…

जवाब दे पा रहा हूँ वो ही गनीमत है. आब जल्दबाजी में गलती तो होगी ही.

अमित तिवारी ने कहा…

धन्यवाद अवध जी.भागते भूत की लंगोटी भली. १ नंबर से ही संतोष कर लेंगे.
दादा सचिन देव बर्मन

Anjaana ने कहा…

Awadh ji .. I am here only. it just that I am not answering the questions..

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