Monday, June 13, 2011

मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनो....लीजिए एक बार फिर बच्चे बनकर आनंद लें इस कहानी का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 677/2011/117

हानीनुमा फ़िल्मी गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की आज की कड़ी में हम जिस गीतकार की रचना सुनवाने जा रहे हैं, उन्हीं के लिखे हुए गीत के मुखड़े को इस शृंखला का नाम दिया गया है। जी हाँ, "एक था गुल और एक थी बुलबुल" के लेखक आनन्द बक्शी, जिन्होंने इस गीत के अलावा भी कई कहानीनुमा गीत लिखे हैं। इनमें से दो गीत तो इस क़दर मशहूर हुए हैं कि उन्हें अगर इस शृंखला में शामिल न करें तो मज़ा ही नहीं आयेगा। तो चलिये आज और कल की कड़ियों में बक्शी साहब के लिखे दो हिट गीतों का आनन्द लें। अब तक इस शृंखला में आपनें जितने भी गीत सुनें, वो ज़्यादातर राजा-रानी की कहानियों पर आधारित थे। लेकिन आज का जो हमारा गीत है, उसमें क़िस्सा है एक शेर का। बच्चों को शेर से बड़ा डर लगता है, और जहाँ डर होता है, वहीं दिलचस्पी भी ज़्यादा होती है। इसलिये शेर और जंगल की कहानियाँ बच्चों को बहुत पसंद आते हैं। अभी हाल ही में बक्शी साहब के बेटे राकेश जी से हमारी मुलाक़ात में उन्होंने बताया था कि बक्शी साहब हर रोज़ एक नई कहानी, एक नई किताब पढ़ते थे, और गीत लेखन के अलावा भी उनका फ़िल्मों के सीन्स का आइडिया अच्छा था। शायद यही वजह है कि इस कहानीनुमा गीत को उन्होंने इतना ख़ूबसूरत अंजाम दिया है। अमिताभ बच्चन, मास्टर रवि और बच्चों की आवाज़ों में यह है फ़िल्म 'मिस्टर नटवरलाल' का गीत "मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक क़िस्सा सुनों"। कमाल की कल्पना की है उन्होंने इस गीत को लेकर। और आख़िर में "ये जीना भी कोई जीना है लल्लु" को तो जैसे फ़िल्मी गीतों के पंचलाइनों का सरताज ही कहलाया जा सकता है। संगीतकार राजेश रोशन के संगीत नें भी बड़ा ही यथार्थ माहौल बनाया, बिल्कुल जिस माहौल की इस गीत को ज़रूरत थी।

अमिताभ बच्चन का गाया यह पहला पहला फ़िल्मी गीत था, और इस गीत को गा कर उन्हें बतौर गायक भी प्रसिद्धी मिली। अभिनय के साथ साथ उनकी गायकी को भी लोगों नें हाथों हाथ ग्रहण किया। यह सच है कि आनन्द बक्शी और राजेश रोशन का इस गीत में बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन अगर किसी नें इस गीत में जान फूंकी है, तो वो हैं हमारे बिग-बी। इस गीत में उनकी अदायगी ही उनकी प्रतिभा का लोहा है, यह गीत साबित करती है कि वोही नंबर वन हैं। दोस्तों, इस गीत के बारे में चाहे आप कितनी भी चर्चा क्यों न कर लें, असली मज़ा तो केवल इस गीत को सुनने में ही आता है। इसलिए अब मैं आपके और इस गीत के बीच में से हट जाता हूँ, लेकिन उससे पहले ये रही जंगल और शेर की कहानी:

कई साल पहले की ये बात है,
भयानक अंधेरी सिया रात में,
लिये अपनी बंदूक मैं हाथ में,
घने जंगलों से गुज़रता हुआ कहीं जा रहा था।

नहीं भूलती उफ़ वो जंगल की रात,
मुझे याद है वो थी मंगल की रात,
चला जा रहा था मैं डरता हुआ,
हनुमान चालीसा पढ़ता हुआ,
बोलो हनुमान की जय,
जय जय बजरंग बली की जय।

घड़ी थी अंधेरा मगर सख़्त था,
कोई बस दस सवा दस का वक़्त था,
लरज़ता था कोयल की भी कूक से,
बुरा हाल हुआ उसपे भूख से,
लगा तोड़ने एक बेरी से बेर,
मेरे सामने आ गया एक शेर।

कोई घिघी बंदी नज़र फिर गई,
तो बंदूक भी हाथ से गिर गई,
मैं लपका वो झपका,
मैं उपर वो नीचे,
वो आगे मैं पीछे,
मैं पेड़ पे वो नीचे,
अरे बचाओ अरे बचाओ,
मैं डाल-डाल वो पात-पात,
मैं पसीना वो बाग-बाग,
मैं सुर में वो ताल में,
मैं जंगल वो पाताल में,
बचाओ बचाओ,
अरे भागो रे भागो,
ख़ुदा की क़सम मज़ा आ गया,
मुझे मार कर "बेसरम" खा गया।

खा गया? लेकिन आप तो ज़िंदा हो?

अरे ये जीना भी कोई जीना है लल्लू? हाँ?




क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्मकार मोहन कुमार नें एक दिन आनन्द बक्शी को गाते हुए सुन लिया और इतने प्रभावित हुए कि उनसे ज़बरदस्ती अपनी फ़िल्म 'मोम की गुड़िया' में दो गीत गाने के लिये राज़ी करवा लिये।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 8/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान .
सवाल १ - नायक के पिछले जनम वाले किरदार की भूमिका किस ने की थी - ३ अंक
सवाल २ - किस अभिनेत्री ने फिल्म में खलनायिका का काम किया है - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी अनजाना जी कि अनुपस्तिथि में अब आगे आ गए हैं. अविनाश जी को भी २ अंकों की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

3 comments:

Avinash Raj said...

Simi Grewal

अमित तिवारी said...

Raj Kiran

Kshiti said...

Film - KARZ

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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