Skip to main content

उडी हवा में जाती है गाती चिड़िया....देविका रानी के अभिनय और स्वर की कहानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 613/2010/313

हिंदी फ़िल्मों के शुरुआती दौर में हमारी समाज व्यवस्था कुछ इस तरह की थी कि अच्छे घरों के महिलाओं का इस क्षेत्र में आना असम्भव वाली बात थी। इस पुरुष शासित समाज में औरतों पर लगाये जाने वाले प्रतिबंधों में यह भी एक शामिल था। बावजूद इसके कुछ सशक्त और साहसी महिलाओं ने इस परम्परा के ख़िलाफ़ जाते हुए फ़िल्म जगत में क़दम रखा, अपना करीयर संवारा, और दूसरी महिलाओं के लिए इस राह पर चलना आसान बनाया। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इन दिनों चल रही लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की आज तीसरी कड़ी में बातें एक ऐसी अदाकारा व निर्मात्री की जिन्हें First Lady of the Indian Screen कहा जाता है। कर्नल चौधरी की बेटी और कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की पर-भाँजी (grand niece) देविका रानी को समर्पित है आज का यह अंक। ३० और ४० के दशकों में देविका रानी ने अपनी अदाकारी और फ़िल्म निर्माण से पूरे हिंदुस्तान के लोगों का दिल जीत लिया। उनका जन्म आंध्र प्रदेश के वाल्टियर में ३० मार्च १९०७ में हुआ था। १९२० के दशक में वो लंदन चली गयीं जहाँ उन्होंने रॊयल अकादमी ऒफ़ आर्ट्स ऐण्ड म्युज़िक से आर्किटेक्चर की डिग्री प्राप्त की। वहीं उनकी मुलाक़ात हुई हिमांशु राय से जिनसे उन्होंने २२ वर्ष की आयु में विवाह कर लिया। देविका रानी की फ़िल्मों में एण्ट्री हुई सन् १९२९ में 'प्रपांच पाश' नामक फ़िल्म में, लेकिन बतौर अभिनेत्री नहीं बल्कि बतौर फ़ैशन डिज़ाइनर। इस फ़िल्म का पोस्ट-प्रोडक्शन जर्मनी में हुआ था। बतौर अभिनेत्री देविका रानी की पहली फ़िल्म थी १९३३ में बनीं 'कर्म', जिसके नायक थे ख़ुद हिमांशु राय। यह फ़िल्म अंग्रेज़ी में भी बनी। हिमांशु राय के साथ मिलकर देविका रानी ने स्थापना की 'बॊम्बे टाकीज़' की, जिसकी पहली फ़िल्म आयी 'जवानी की हवा', साल १९३५ में, जो एक मर्डर मिस्ट्री थी। फिर १९३६ में बनीं 'अछूत कन्या', जिसमें उनके साथ नायक के रूप में अभिनय किया अशोक कुमार ने। फ़िल्म बेहद कामयाब रही और देविका रानी - अशोक कुमार की 'ऒन-स्क्रीन' जोड़ी तैयार हो गई। इसी फ़िल्म का मशहूर गीत "मैं बन की चिड़िया" हम आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। 'अछूत कन्या' की कामयाबी के बाद इस जोड़ी द्वारा अभिनीत दो और कामयाब फ़िल्में आईं - 'जीवन नैया' और 'जन्मभूमि'

देविका रानी की संवेदनशील अभिनय और उनकी ख़ूबसूरती ने उनकी एक अलग पहचान बनाई फ़िल्म जगत में। उन्होंने १९३५ से लेकर १९४३ तक अभिनय किया। देविका रानी की अभिनय से सजी प्रचलित फ़िल्में हैं - कर्म, जवानी की हवा, जीवन नैय्या, अछूत कन्या, इज़्ज़त, सावित्री, जीवन प्रभात, निर्मला, वचन, और अंजान। १९४० में हिमांशु राय की मृत्यु हो जाने से 'बॊम्बे टाकीज़' की देख-रेख का सारा ज़िम्मा आ गया देविका रानी पर। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक से एक म्युज़िकल फ़िल्में बनाती चलीं जैसे कि 'बंधन', 'क़िस्मत', और 'झूला'। देविका रानी ने कई नये कलाकारों को भी खोज निकाला। उन्होंने ही मोहम्मद यूसुफ़ ख़ान को नैनिताल से बम्बई ला कर बना डाला दिलीप कुमार अपनी फ़िल्म 'ज्वार भाटा' में बतौर नायक ब्रेक देकर। १९४० से १९४५ तक 'बॊम्बे टाकीज़' का भार सम्भालने के बाद देविका रानी ने रशियन पेण्टर स्वेतोस्लाव रीरिच से शादी कर ली और बैंगलोर जाकर अपना घर बसा लिया, और फ़िल्मों को हमेशा के लिए कह दिया अलविदा। जीवन के अंतिम दिनों तक वो बैंगलोर में ही रहीं और ९ मार्च १९९४ को निकल पड़ीं अपनी अनंत महायात्रा पर। फ़िल्मों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए देविका रानी को १९५८ में पद्मश्री और १९७० में दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से भारत सरकार ने सम्मानित किया। आइए आज उनको सलाम करते हुए सुने फ़िल्म 'अछूत कन्या' का ही एक और गीत "उड़ी हवा में जाती है गाती चिड़िया ये राम"। आवाज़ देविका रानी की और संगीत सरस्वती देवी का। सरस्वती देवी का नाम भी प्रथम महिला संगीतकार के रूप में मशहूर है और उन्हीं को समर्पित होगा हमारा कल का अंक। तो लीजिए यह गीत सुनिए, और चलते चलते हम यही कहना चाहेंगे कि देविका रानी ने महिलाओं के लिए फ़िल्मों का द्वार खोल दिया, इससे उनकी प्रगतिशील विचारधारा का पता चलता है। उनका योगदान हमेशा सुनहरे अक्षरों में हमारी फ़िल्म इतिहास में लिखा रहेगा। 'आवाज़' की तरफ़ से देविका रानी को सलाम!!!



क्या आप जानते हैं...
कि १९३३-३४ में हिमांशु राय ने देविका रानी को संगीत सिखाने के लिए सरस्वती देवी को नियुक्त किया था, जिन्हें वो खोज लाये थे लखनऊ में आयोजित एक संगीत समारोह से।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आज की पहेली आज के और अगले गीत की संगीतकारा सरस्वती देवी के नाम है, देखते हैं इनके बारे में आप कितनी जानकारी रखते हैं.

सवाल १ - संगीतकारा सरस्वती देवी का असली नाम क्या था - ३ अंक
सवाल २ - उनकी बतौर संगीतकारा पहली फिल्म कौन सी थी - १ अंक
सवाल ३ - सरस्वती देवी ने फिल्मों में पहली बार प्ले बैक किया था, किस अभिनेत्री के लिए था ये - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर से टाई है मामला...शरद जी भी हैं मैदान में अब...शरद जी शक है इस गीत को लेकर, पर लगता है कि आप ठीक हैं, गीतकार हसरत ही हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Comments

Anjaana said…
This post has been removed by the author.
Khursheed Manchersher Minoche
Anjaana said…
Khursheed Manchersher Minoche
विजय said…
देविका रानी
disha said…
jawani ki hawa
AVADH said…
सरस्वती देवी द्वारा पहले प्ले-बैक की अदाकारा का नाम - चंद्र प्रभा, जो उनकी बहिन थीं.
अवध लाल
AVADH said…
एक शंका है. क्या ऐसा संभव है कि दो भिन्न भिन्न व्यक्ति एक प्रश्न का उत्तर अधूरा दें और उन दोनों के अपूर्ण उत्तर में एक जैसी ही कमी हो?
मैं समझता हूँ कि सरस्वती देवी जी का वास्तविक नाम था खुर्शीद मंचेर्शेर मिनोचेर- होमजी (Khursheed Manchersher Minocher-Homji).
यदि यह सही है तो इस प्रश्न के प्राप्त पहले दो उत्तर अपूर्ण हैं.पर एक जैसी कमी? एक ही समय पर? अनोखा संयोग है. ऐसे ही संयोग पर दो उत्तरदाताओं की उत्तर पुस्तिका पर परीक्षक बहुधा 'नकल' या (collusion) का संदेह व्यक्त करते हैं
सब सम्बंधित लोगों से क्षमा याचना के साथ कहना चाहूँगा कि मैं किसी ईर्ष्या-वश किसी पर तोहमत नहीं लगा रहा हूँ. पर गौर से विचार करें कि क्या मेरा यह संदेह बिलकुल निराधार प्रतीत होता है.कोई भी ऐसा ही अनुमान लगायेगा.
अवध लाल
अवधजी सफाई नही दे रहा हूँ पर आपने जो नाम दिया है वो मालूम था:

http://en.wikipedia.org/wiki/Saraswati_Devi_(Music_Director)

दोनों ने शायद इसीलिए ऐसा उत्तर दिया क्योंकि हर कोई चाहता है कि जल्दी से उत्तर दे दिया जाए. और यह कुछ इस तरह से है जैसे हम राहुल देव बर्मन न बोलकर आर. डी. बोल देते हैं.

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT

स्वरगोष्ठी – 214 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया