Thursday, September 9, 2010

चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में....मजलिस-ए-कव्वाली के माध्यम से सभी श्रोताओं को ईद मुबारक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 480/2010/180

प सभी को 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से ईद-उल-फ़ित्र की दिली मुबारक़बाद। यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियाँ लेकर आए ऐसी हम कामना करते हैं। ईद-उल-फ़ित्र के साथ रमज़ान के महीने का अंत होता है और इसी के साथ क़व्वालियों की इस ख़ास मजलिस को भी आज हम अंजाम दे रहे हैं। ४० के दशक से शुरु कर क़व्वालियों का दामन थामे हर दौर के बदलते मिज़ाज का नज़ारा देखते हुए आज हम आ गए हैं ८० के दशक में। जिस तरह से ८० के दशक में फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर ख़त्म होने की कगार पर था, वही बात फ़िल्मी क़व्वालियों के लिए भी लागू थी। क़व्वालियों की संख्या भी कम होती जा रही थी। फ़िल्मों में क़व्वालियों के सिचुएशन्स आने ही बंद होते चले गए। कभी किसी मुस्लिम सबजेक्ट पर फ़िल्म बनती तो ही उसमें क़व्वाली की गुंजाइश रहती। कुछ गिनी चुनी फ़िल्में ८० के दशक की जिनमें क़व्वालियाँ सुनाई दी - निकाह, नूरी, परवत के उस पार, फ़कीरा, नाख़ुदा, नक़ाब, ये इश्क़ नहीं आसाँ, ऊँचे लोग, दि बर्निंग्‍ ट्रेन, अमृत, दीदार-ए-यार, आदि। इस दशक की क़व्वालियों का प्रतिनिधि मानते हुए आज की कड़ी के लिए हमने चुनी है फ़िल्म 'निकाह' की क़व्वाली "चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में"। फ़िल्मी क़व्वलियों की बात चलती है तो आशा जी का नाम गायिकाओं में सब से उपर आता है। क़व्वाली गायन में गायिका के गले में जिस तरह की हरकत होनी चाहिए, जिस तरह की शोख़ी, अल्हड़पन और एक आकर्षण होनी चाहिए, उन सभी बातों का ख़्याल आशा जी ने रखा और शायद यही वजह है कि उन्होंने ही सब से ज़्यादा फ़िल्मी क़व्वालियाँ गाई हैं। तो आज का यह एपिसोड भी कल की तरह आशा जी के नाम, और उनके साथ इस क़व्वली में आप आवाज़ें सुनेंगे महेन्द्र कपूर, सलमा आग़ा और साथियों की। हसन कमाल के बोल और रवि का संगीत।

फ़िल्म 'निकाह' एक मुस्लिम सामाजिक फ़िल्म थी और बेहद कमयाब भी साबित हुई थी। बी. आर. चोपड़ा की यह फ़िल्म थी जो डॊ. अचला नागर की लिखी एक नाटक पर आधारित थी। २४ सितंबर १९८२ को प्रदर्शित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज बब्बर, दीपक पराशर, सलमा आग़ा, हिना कौसर प्रमुख। यह फ़िल्म तो आपने देखी ही होगी, फ़िल्म की कहानी तलाक़ और मुस्लिम पुनर्विवाह के मसलों के इर्द गिर्द घूमती है। इस्लामिक मैरिज ऐक्ट के मुताबिक़, किसी तलाक़शुदा महिला से उसका पूर्व पति तभी दुबारा शादी कर सकता है जब वो किसी और से शादी कर के तलाक़ ले आए। बस इसी बात को केन्द्रबिंदु में रख कर लिखी गई थी नाटक 'निकाह' की कहानी, जिस पर आगे चलकर यह फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म को बहुत सराहना मिली थी और आज भी मुस्लिम सामाजिक फ़िल्मों के जौनर की सब से मक़बूल फ़िल्म मानी जाती है। फ़िल्म में गायिका अभिनेत्री सलमा आग़ा ने कुछ ऐसे दिल को छू लेने वाले गीत गाए कि वो गानें सदाबहार नग़मों में दर्ज हो चुके हैं। "दिल के अरमाँ आसुओं में बह गए" के लिए उन्हें उस साल फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका के ख़िताब से नवाज़ा गया था। इसके अलावा "फ़ज़ा भी है जवाँ जवाँ, हवा भी है रवाँ रवाँ" तथा महेन्द्र कपूर के साथ गाया युगल गीत "दिल की यह आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले" भी ख़ासा लोकप्रिय हुए थे। वैसे इस क़व्वाली में आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ें ही मुख्य रूप से सुनाई देती है, सलमा आग़ा बस एक लाइन गाती हैं आख़िर की तरफ़ - "यह झूठ है कि तुमने हमें प्यार किया है, हमने तुम्हे ज़ुल्फ़ों में गिरफ़्तार किया है"। आइए सुना जाए यह दिलकश क़व्वाली जिसमें है प्यार मोहब्बत के खट्टे मीठे गिले शिकवे और तकरारें हैं। और इसी के साथ 'मजलिस-ए-क़व्वाली' शृंखला पूरी होती है। आपको यह शृंखला कैसी लगी, क्या ख़ामियाँ रह गईं, आप अपने विचार हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजें। और अगर कोई और क़व्वाली आप सुनना चाहते हैं 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में, तो उसका भी ज़िक्र आप कर सकते हैं। तो अब आपसे अगली मुलाक़ात होगी शनिवार की शाम, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, और एक बार फिर से आप सभी को ईद-उल-फ़ित्र की हार्दिक शुभकामनाएँ।



क्या आप जानते हैं...
कि हाल ही में आशा भोसले का नाम दुनिया के सब से लोकप्रिय १० कलाकारों में शामिल हुआ है। यह सर्वे सी.एन.एन के तरफ़ से आयोजित किया गया है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह गीत एक अमर प्रेमिक और प्रेमिका की प्रेम कहानी पर बनी फ़िल्म का है जिसका निर्माण ४० के दशक के आख़िर के तरफ़ के किसी साल में हुआ था। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
२. फ़िल्म में कुल तीन संगीतकार हैं, जिनमें दो जोड़ी के रूप में हैं। इस जोड़ी के एक सदस्य आगे चलकर एक सफल संगीतकार सिद्ध हुए लेकिन एक अन्य नाम से। बताइए इस गीत के तीनों संगीतकारों के नाम। ४ अंक।
३. यह गीत एक पारम्परिक रचना है जिसका इस्तेमाल उसी सफल संगीतकार ने आगे चलकर अपनी एक बेहद उल्लेखनीय फ़िल्म में किया है और जिनसे गवाया है वो भी उनके ही परिवार की एक सदस्या हैं। इस पारम्परिक रचना को पहचानिए। ३ अंक।
४. इस गीत की गायिका का नाम बताएँ जिन्होंने इसी फ़िल्म में जी. एम. दुर्रानी के साथ मिलकर युगल गीत भी गाया है। २ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी और इंदु जी एकदम सही हैं, प्रतिभा जी आपने हसन कमाल को देखिये तो जरा क्या लिख दिया :), रोमेंद्र जी एकदम सही हैं. सभी मित्रों को ईद की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

5 comments:

singhSDM said...

Musicians are Aziz Khan & Sharmaji-Varmaji
*****
PAWAN KUMAR

indu puri said...

गीता दत्त जी

indu puri said...

जल्दी में हूँ सॉरी सॉरी बस पिटाई होने वाली समझो.बच्ची और उसके पापा .... उल्टा ही लटका देंगे आज तो.
वैसे शर्मा जी अपने खय्याम साहब है और वर्माजी आपके रहमान वर्मा.
ये ......फुर्र

AVADH said...

फिल्म का नाम तो समझ गया पर लालच बुरी बला.
पारम्परिक रचना के बारे में एक अंदाज़, लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का.
काहे को ब्याहे बिदेस - अमीर खुसरो की रचना जिसे जगजीत कौर गा चुकी हैं खय्याम साहेब के संगीत निर्देशन में जो उनके पति/शौहर हैं.
लेकिन यह नहीं पता कि इसे और किस दूसरी गायिका ने गाया है.
अवध लाल

Pratibha said...

यह गीत एक अमर प्रेमिक और प्रेमिका की प्रेम कहानी पर बनी फ़िल्म का है जिसका निर्माण ४० के दशक के आख़िर के तरफ़ के किसी साल में हुआ था। फ़िल्म का नाम बताएँ। - Heer Ranjha (1948)

Pratibha
My computer is slowly coming up...It has been misbehaving

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