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एक आम आदमी जिसने भोजपुरी को बना दिया खास...

भिखारी ठाकुर की जयंती पर हमारी संगीतमयी प्रस्तुति

भिखारी ठाकुर
एक आम आदमी के सतह से शिखर तक की बेजोड़ मिसाल हैं भिखारी ठाकुर... बहुत कम लोग होते हैं जो जीते-जी विभूति बन जाते हैं... दरअसल, इस भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा ही है...फर्क सिर्फ यह है कि लीजेंड बनने की यह यात्रा भिखारी ने किसी रुपहले पर्दे पर नहीं असल ज़िंदगी में जिया.

भोजपुरी के नाम पर सस्ता मनोरंजन परोसने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है, जितना भोजपुरी का इतिहास....18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया.....उन्होंने भोजपुरी संस्कृति को सामीजिक सरोकारों के साथ ऐसा पिरोया कि अभिव्यक्ति की एक धारा भिखारी शैली जानी जाने लगी...आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का सशक्त मंच बन कर जहाँ-तहाँ भिखारी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है....
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भिखारी ठाकुर के स्वर में उन्हीं की कविता 'डगरिया जोहता ना".
यह काव्यपाठ 'बिदेसिया' फिल्म से ली गई है
बिदेसिया, गबर-घिचोर, बेटी-बियोग भा बेटी-बेचवा सहित उनके सभी नाटकों में बदलाव को दिशा देने वाले एक सामाजिक चिंतक की व्यथा साफ दिखती है....सबसे बड़ी बात कि उनके नाटकों में पात्र कभी केंद्र में नहीं रहे, हमेशा परिवेश केंद्र में रहा....यही वजह थी कि उनके पात्रों की निजी पीड़ा सार्वभौमिक रुप अख्तियार कर लेती थी... हर नयी शुरुआत को टेढ़ी आंखों से देखने वाले भिखारी के दौर में भी थे...सामाजिक व्यवस्था के ऐसे ठेकेदारों से भिखारी अपने नाटकों के साथ लड़े...वो अक्सर नाटकों में सूत्रधार बनते और अपनी बात बड़े चुटीले अंदाज़ में कह जाते....अपनी महीन मार की मार्फत वो अंतिम समय तक सामाजिक चेतना की अलख जगाते रहे....
कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता हैं तो कोई भोजपुरी का भारतेंदू हरिश्चंद्र.....महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें "भोजपुरी का शेक्सपियर" की उपाधि दे दी.....इसके अलावा उन्हें कई और उपाधियाँ व सम्मान भी मिले....भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया..... इतना सम्मान मिलने पर भी भिखारी गर्व से फूले नहीं, उन्होंने बस अपना नाटककार ज़िंदा रखा...पूर्वांचल आज भी भिखारी से नाटकों से गुलज़ार है....ये बात अलग है कि सरकारी उपेक्षा का शिकार इनके गांव तक अब भी नाव से ही जाना पड़ता है....

राममुरारी के साथ निखिल आनंद गिरि



सन् १९६३ में भिखारी ठाकुर के अमर नृत्य-नाटक बिदेशिया पर एक फिल्म बनी, इसी नाम से। जिसका संगीत बहुत हिट हुआ। भिखारी ठाकुर का लिखा एक गीत 'हँसी-हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा, अ रे बसेला परदेस' जिसे एस॰ एन॰ त्रिपाठी ने संगीतबद्द किया था और मन्ना डे गाया था। बहुत प्रसिद्ध हुआ। हम आज अपने श्रोताओं के लिए वह गीत तो लाये ही हैं, साथ में बिलकुल नये तरह से कम्पोज किया गया यही गीत लाये हैं।

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(फिल्म- बिदेसिया, संगीत- एस॰एन॰ त्रिपाठी, आवाज़- मन्ना डे)

यह प्रस्तुति हिन्द-युग्म से सितम्बर २००८ में जुड़े राजकुमार सिंह की है, जो न्यूयार्क रहते हैं। ये अपने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। फिल्म का नाम होगा 'लूंगी, लोटा और सलाम'। राज भिखारी ठाकुर के इस गीत को अपनी फिल्म में रखना चाहते हैं। और यह गीत नये तरीके से तैयार भी हो गया है। 'हँसी-हँसी पनवा' को नया रूप दिया है 'Valley Of Flower' फिल्म के संगीत निर्देशक विवेक अस्थाना ने। गीत को गाया है भोजपुरी गीतों की चर्चित गायिका पूनम जैन ने। हम उम्मीद करते हैं कि यह नया प्रयोग आपको पसंद आयेगा।

इस फिल्म की बातें फिर कभी, पहले आप गीत सुनें।



(फिल्म- लूँगी, लोटा और सलाम (प्रस्तावित) , संगीत- विवेक अस्थाना और राजकुमार सिंह, आवाज़- पूनम जैन)

इस गीत के माध्यम से हम राजकुमार सिंह के साथ मिलकर अमर नाटककार भिखारी ठाकुर को श्रद्धाँजलि देना चाहते हैं।


साथ में पढ़िए भिखारी ठाकुर का दुर्लभ साक्षात्कार

Comments

rachana said…
ये गीत तो मैने सुना था पर इस के कवि के बारे में मालूम न था भिखारी जी का नाम तो सुना था पर इनके बारे में कुछ भी जानती नही थी आज बहुत अच्छा लगा पढ़ के .आप का बहुत बहुत धन्यवाद इस लेख के लिए .राज कुमार जी को उनकी फ़िल्म के लिए शुभ कामनाएं
सादर
रचना
प्रभाकर पाण्डेय said…
नमन इस महापुरुष को।
मेने इन के बारे पहले भी कही पढा था, पता नही कहा, शायद आप के यहाम या कही ओर, ओर यह गीत भी बहुत बार सुना है.
इस सुंदर जानकारी के लिये ...
धन्यवाद
आचार्य संजीव 'सलिल', सम्पादक दिव्य नर्मदा
सलिल.संजीव.@जीमेल.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम

महाकवि भिखारी केवल भोजपुरी ही नहीं अपितु विश्वभाषा हिन्दी के भी महाकवि एवं नाटककार हैं. वस्तुतः वे विश्व साहित्य के सारस्वत मणि रत्न हैं. जिस तरह पूर्व से निकलने के कर्ण सूर्य को केवल पूर्व का नहीं कहा जा सकता उसी तरह भिखारी ठाकुर को केवल भोजपुरी कवि कहना उनके साथ न्याय नहीं है. भिखारी ठाकुर की बिदेसिया को समूचे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान आदि प्रदेशों में भी खूब गया और सुना जाता है. भारत के स्वतंत्रता सत्याग्रहों में बिदेसिया प्रेरणा गीत बनकर अम्र हो गया.
उनहोंने लोकगीत, लोकनाट्य को संभवतः पहली बार इतनी सशक्तता के साथ रचा कि उच्च-संभ्रांत वर्ग के लिए उसे अनसुना करना सम्भव ही नहीं रहा. आम आदमी का दर्द. अभाव. संघर्ष, आशा और अपेक्षा सब भिखारी ठाकुर के माध्यम से आंदोलनों के कर्णधार नेताओं तक पहुँच सका. उन्हें सामाजिक समरसता का अग्रदूत भी मानना होगा. राजनीती से सीधे-सीधे न जुड़ने पर भी उनहोंने उसे प्रभावित किया.
शुक्रिया इन महापुरुष
के बारे मैं इतनी सुंदर जानकारी देने का

भिकारी ठाकुर जी को मेरा शत् शत् नमन

धन्यवाद
पहले कभी कोई भोजपुरी गीत सूना हो याद नहीं पड़ता, सिवाय "नदिया के पार" के गीतों के (यदि वे भोजपुरी हैं तो) भिखारी ठाकुर के बारे में जानकर और उनकी रचनाएं सुनकर बहुत अच्छा लगा. भारत की विविध सांस्कृतिक रूपों की झलकियाँ देने वाले इस तरह के सार्थक लेखों का स्वागत है. अन्तिम गीत का संगीत बहुत ही मोहक है.

बहुत बहुत धन्यवाद,
अनुराग शर्मा
आपका प्रयास अत्यन्त प्रशंनीय एवं सराहनीय है।
गीत में वह कसक नहीं, जो विदेशिया फिल्म में प्रस्तुत सुरताल में है। मुझे नहीं लगता कि कोई अच्छा प्रयास हुआ है।
indu puri said…
भोजपुरी फिल्म बदेसिया और गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ईबो'के गाने इतने मधुर हैं कि इसे बार बार सुनना पसंद करेंगे सभी.
भिखारी ठाकुर जी का नाम सुना था आज पढा बहुत अच्छा लगा.
कभी समय मी तो एक भोजपुरी 'लोरी'
'ए चंदा मामा आरे आव पारे आव ' जरूर सुनाइए. साथ ही भोजपुरी फिल्मो के खूबसूरत,प्यारे-२ गीतों की जानकारी भी देते रहिये,सुनाइये.
मैं अक्सर लोगों को कहती हूं भोजपुरी ब्लेक एंड व्हाईट फिल्म्स में बहुत अच्छे गीत हैं,बस कोई जानकारी तो दे.

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