बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

एहतराम की अंतिम कड़ी- मीर तकी 'मीर' की ग़ज़ल

एहतराम - अजीम शायरों को सलाम

इस श्रृंखला में अब तक हम ६ उस्ताद शायरों का एहतराम कर चुके हैं. आज पेश है शिशिर पारखी साहब के आवाज़ में ये आखिरी सलाम अजीम शायर मीर के नाम, सुनिए ये लाजवाब ग़ज़ल-

हस्ती अपनी हुबाब की सी है ।
ये नुमाइश सराब की सी है ।।

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है ।

चश्मे-दिल खोल इस भी आलम पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।

बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज्तेराब की सी है ।

मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।

‘मीर’ उन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है ।

हुबाब=bubble; सराब=illusion, mirage
इज्तेराब=anxiety, नीमबाज=half open



मीर तकी 'मीर'

आगरा में रहने वाले सूफी फ़कीर मीर अली मुत्तकी की दूसरी पत्नी के पहले पुत्र मुहम्मद तकी, जिन्हें उर्दू शायरी की दुनिया में मीर तकी 'मीर' के नाम से जाना जाता है का जन्म वर्ष अंदाज़न 1724 ई. माना गया है. वैसे एकदम सही जन्म वर्ष का भी कहीं लेखा जोखा नहीं मिलता. ख़ुद मीर तकी 'मीर' ने अपनी फारसी पुस्तक 'जिक्रे मीर' अपना संक्षिप्त सा परिचय दिया है उसी से उनका जन्म वर्ष आँका गया है. मीर के पूर्वज साउदी अरेबिया (हेजाज़) से हिंदुस्तान में आए थे. दस वर्ष के होने पर मीर के पिता का इंतकाल हो गया. सौतेले भाई मुहम्मद हसन ने पिता की संपत्ति पर हक़ जमा लिया और क़र्ज़ देने का बोझ इन पर डाल दिया. पिता के किसी मित्र के एक शिष्य की मदद से मीर ने कर्जा उतार दिया और नौकरी खोजने दिल्ली चले आए. यहाँ नवाब सम्सामुद्दौला ने मीर साहब को एक रूपए रोजाना गुजारे का दे कर उन्हें कुछ सहारा दिया.



यहीं इन्हें ज़ुबान-ओ-अदब सीखने का भी मौक़ा मिला। कुछ अच्छे शायरों की सोहबत भी मिली जिससे इनकी शायरी का ज़ौक़ परवान चढ़ा। मीर की घरेलू हालत बद से बदतर होती जा रही थी लेकिन शे'र-ओ-अदब का ख़ज़ाना रोज़-ब-रोज़ बढ़ता जा रहा था। रफ़्ता-रफ़्ता मीर ने वो मक़ाम शायरी में हासिल कर लिया कि ग़ालिब जैसे शायर को भी कहना पड़ा कि

रेख़ती के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था

पर जब नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया तो नवाब सम्सामुद्दौला उसमें मारे गए. कुछ समय बाद मीर साहब को सहारा तो मिला पर वहां उन पर एक आफत सी आ गई. उनके सौतेले भाई के मामा खान आरजू एक मशहूर शायर थे. मीर साहब को उन्होंने ने अपने यहाँ रखा. पर मीर साहब कुछ समय बाद पगला से गए क्यों की उन्हें खान आरजू की बेटी से इश्क हो गया और उन्हें चाँद में भी अपनी महबूबा नज़र आने लगी. किसी फखरुद्दीन नाम के भले मानुष ने हकीमों की मदद से उनका इलाज किया. कुछ और भले लोगों के सहारा मिलने पर वे मुशायरों में जाने लगे और शायरी में शुरूआती तौर पर अच्छी तरक्की कर ली. खान आरजू से उनके रिश्ते बिगड़ चुके थे और उनके घर से अलग हो कर एक दिन वे किसी रियायत खान के यहाँ नौकरी करने लगे. फ़िर वहां भी बिगड़ गई. इस तरह कुछ लोगों से बनाते बिगाड़ते वे किसी राजा नागर मल के दरबार में लग गए. फ़िर वे पहुँच गए सूरज मल जाट के दरबार में. पर हालात कुछ ऐसे बने कि वे फ़िर रजा नागर मल के यहाँ पहुँच गए. अब तक कई सहारे तो बदले पर इस बीच वे खासे मशहूर हो गए. दिल्ली के बादशाह आलमगीर II के पास भी रहे. पर लडाइयों और मारकाट ने उनके शायराना दिल को पस्त कर दिया.आख़िर मीर साहब को परिस्थितियों ने पहुँचा दिया लखनऊ, जहाँ अवध के नवाब आसफ उद्दौला ने जब उन्हें अपने यहाँ शरण दी तो उन्होंने एक प्रकार से जीवन भर की दिल्ली और दिल्ली से बाहर की भटकन के बाद निजात पाई.नवाब साहब के साथ घोडे पर सवार मीर तकी 'मीर' शिकार पर बहराइच गए तो 'शिकार-नामा लिखा. फ़िर वे नवाब के साथ हिमालय के तलहटियों में गए तो एक और 'शिकार-नामा' लिखा. यहीं से वे शायरी के शिखर तक पहुँच कर चौतरफ मशहूर भी हो गए. वैसे परिस्थितियों ने उन्हें इतने कड़वे अनुभव दिखाए के शख्सियत के तौर पर मीर साहब बेहद बदमिजाज व्यक्ति माने जाते थे जो कई बार उनका अपमान करते भी देर न करते थे जो उन्हें सहारा देते थे. उनका गुरूर अक्सर बर्दाश्त से बाहर हो जाता था. मीर ख़ुद अपनी कलम से लिखते हैं:

सीना तमाम चाक है सारा जिगर है दाग
है मजलिसों में नाम मेरा 'मीरे' बेदिमाग.

उर्दू के इस अज़ीम शायर का इंतिक़ाल सन 1810 में लखनऊ में हुआ। आज हम यहाँ उनकी दो ग़ज़लें पेश कर रहे हैं।

मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
हैरती है ये आईना किस का

शाम से कुछ बुझा सा रहता है
दिल हुआ है चराग़ मुफ़लिस का

फ़ैज़ अय अब्र चश्म-ए-तर से उठा
आज दामन वसीअ है इसका

ताब किसको जो हाल-ए-मीर सुने
हाल ही और कुछ है मजलिस का

कठिन शब्दों के अर्थ
हैरती---चकित, ताज्जुब में, मुफ़लिस---ग़रीब आदमी
फ़ैज़----लाभ, फ़ायदा, चश्म-ए-तर ---आंसू बहाती हुई आँख
अब्र---बादल, वसीअ-----फैला हुआ, विशाल
ताब--- ताक़त, फ़ुरसत, मजलिस---- महफ़िल, सभा

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मे-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

ग़ैरते-युसुफ़ है ये वक़्ते-अज़ीज़
मीर इसको रायगाँ खोता है क्या

कठिन श्ब्दों के अर्थ
राहे-दूरे-इश्क़----- इश्क़ के लम्बे रास्ते
सब्ज़-----हरी, सरज़मीं-----धरती
तुख़्मे-ख़्वाहिश -----इच्छाओं के बीज
वक़्ते-अज़ीज़------बहूमूल्य समय
रायगाँ------फ़िज़ूल--बेकार---व्यर्थ

Ghazal - Hasti Apni Hubab ki si...
Artist - Shishir Parkhie
Album - Ahetaram

2 टिप्‍पणियां:

shivani ने कहा…

शायर मीर तकी मीर जी की जीवनी पढ़ी !आपके द्वारा इस श्रृंख्ला में शायरों की शायरी तो सुनने को मिली ,परन्तु इससे भी बड़ी बात उनके जीवन के बारे में भी जानकारी प्राप्त हुई !ये प्रयास बहुत ही सही और ज्ञानवर्धक रहा !आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

Manish Kumar ने कहा…

achcha laga shishir ji ko sunna sath hi Meer ke bare mein jaankaari bhi pasand aayi.

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