Wednesday, October 22, 2008

सांसों की माला में सिमरूं मैं पी का नाम...बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ां की आवाज़ में एक दुर्लभ कम्पोज़ीशन

अपनी आकृति पए ध्यान मत दो, चाहे वह कैसी भी सुन्दर हो या बदसूरत
प्रेम पर ध्यान दो और उस लक्ष्य पर जहां तुम्हें पहुंचना है ...
अरे तुम! जिसके होंठ पपड़ा गए हैं, तुम जो लगातार खोज रहे हो पानी को
प्यास से पपड़ाए तुम्हारे होंठ सबूत हैं इस बात का
कि बिल आख़ीर तुम पानी के सोते तक पहुंच ही जाओगे


यह कविता सबसे बड़े सूफ़ी कवि जलालुद्दीन रूमी की है. युद्ध, बाज़ारवाद, पैसे, उपनिवेशवाद और इन सबसे उपजे आतंकवाद से लगातार रूबरू अमरीकी समाज के बारे में एक नवीनतम तथ्य रूमी से जुड़ा हुआ है. वाल्ट व्हिटमैन और एमिली डिकिन्सन जैसे दिग्गज अमरीकी कवियों के संग्रह पिछले कई दशकों से बेस्टसैलर्स की सूची में सबसे ऊपर रहा करते थे. वर्ष २००६ और सात में इस स्थान पर रूमी काबिज़ हैं. आम अमरीकी जनता की पसन्द में आया यह बदलाव यह एक ऐसी प्रतिक्रिया है जो बार बार इस बात को अन्डरलाइन करती जाती है कि सूफ़ी काव्य और संगीत इतनी सदियों बाद आज भी प्रासंगिक है और अपनी सार्वभौमिकता में एक स्पन्दन छिपाए हुए है जो मुल्कों, सरहदों, मजहबों, भाषाओं और संवेदनाओं से बहुत आगे की चीज़ है.

सूफ़ी दरवेश उस सर्वव्याप्त सर्वशक्तिमान प्रेम के गीत गाते हैं जो उनके समूचे अस्तित्व को अन्ततः उनके "मेहबूब" में एकाकार कर देता है. स्वयं से मुक्त हो जाने का यह वांछित लक्ष्य अपने ईगो से मुक्त होने के बाद ही आता है. तमाम सूफ़ी कविताओं में मरने के बाद दोबारा जन्म लेकर अपने आराध्य में एकाकार होने की इच्छा व्यक्त की गई है.

यह अनायास ही नहीं हुआ कि महान सूफ़ी कवि तब पैदा हुए जब समाज पर धार्मिक कट्टरवाद अपने चरम पर था. इन कवियों-गायकों की आमफ़हम भाषा की बढ़्ती लोकप्रियता से चिन्तित कठमुल्ले शासकों ने उन पर प्रतिबन्ध लगाए. एक और बड़े सूफ़ी कवि हाफ़िज़ ने इस वजह से अपनी रचनाओं में ईश्वर को कहीं तो पिता, माता, दोस्त और महबूब कहा तो कहीं उसे साक़ी, पहेलियां बनाने और उनका समाधान करने वाला जैसे सम्बोधनों से पुकारा. ईश्वर को इस तरह वर्णित किये जाने से दो तरह की समस्याओं का निदान हुआ. पहला तो यह कि इस प्रकार की कविता को प्रतिबन्धित कर पाना मुश्किल हो गया. दूसरे इस ने ईश्वर की प्रकृति के बारे में लिखते वक़्त एक कवि के सामने आने वाली मूलभूत दिक्कतों को रेखांकित किया. ईश्वर बिना नाम, बिना आकार का एक अनन्त है और शब्दों में उसे बांधा जाना मुमकिन नहीं होता. सूफ़ी कवि राबिया अल-बसरी इसे यूं कहते हैं:

प्रेम में, दो दिलों के बीच किसी दूसरी चीज़ का अस्तित्व नहीं होता
वाणी का जन्म इच्छा से होता है
सही वर्णन वास्तविक स्वाद लेने के बाद किया जा सकता है
वह जो स्वाद ले लेता है, जानने लगता है:
वो वर्णन कर रहा होता है, वह झूठा होता है
आप कैसे वर्णन कर सकते हैं किसी भी ऐसी चीज़ का
जिसकी उपस्थिति में आप ख़ुद मिट जाते हैं?
जिसके अस्तित्व के भीतर आप तब भी बने रहते हैं?
और जो तुम्हारी यात्रा की निशानी के तौर पर बना रहता है?


इस के बावजूद सूफ़ी ज्ञानियों ने जितनी रचनाएं कीं वे हमें विवश करती हैं कि हम उनकी कविताओं-गीतों-ग़ज़लों को पन्ना-दर-पन्ना पलटते जाएं और उन्हें अपने दिल में उतरता हुआ महसूस करें. शब्द से प्रेम करने वाला जानता है कि कविता शब्द का शुद्धतम रूप होती है, जिसे दुनिया के किसी तर्क से नहीं सीखा या समझा जा सकता. यही बात संगीत पर भी लागू होती है. ज़रा देखिए, हाफ़िज़ ने कितने सुन्दर शब्दों में सूफ़ी कवि के उद्देश्य को बताते हुए उसे परिभाषित किया है

"सूफ़ी कवि वह होता है जो एक प्याले में रोशनी भरता है और प्यास से पपड़ाए-सूखे तुम्हारे पवित्र हृदय के लिए उसे पी जाता है!"

सूफ़ी उस्तादों का यक़ीन था कि सारे बाहरी धार्मिक रूप पूर्णतः अनुपयोगी थे. इस वजह से इन कवियों ने धर्म के साथ जोड़ी गई झूठ-धन और दोगलेपन का भी ख़ूब मज़ाक उड़ाया.

मिसाल के तौर पर पंजाब के सूफ़ी कवि हज़रत बाबा बुल्ले शाह कहते हैं कि जहां-जहां तूने मन्दिर मस्जिद देखे, तू उनमें प्रवेश कर गया, अलबत्ता अपने भीतर कभी नहीं घुसा. आसमानी चीज़ को पकड़ने की फ़िराक़ में तू अपने भीतर बसने वाले को कभी नहीं पकड़ता. भारतीय उपमहाद्वीप के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो राजनीति की बिसात पर अब तक उछल-उबल रहे हिन्दू-मुस्लिम विवादों को सुलझाने का इकलौता ईमानदार जतन भी सूफ़ी कवि-संगीतकारों ने ही किया. देखिये बुल्लेशाह कितनी आसानी से आपको इस विवाद की जड़ तक पहुंचा देते हैं:

"रामदास किते फते मोहम्मद, ऐहो कदीमी शोर
मिट ग्या दोहां दा झगड़ा, निकल ग्या कोई होर"


सूफ़ी कवि लयबद्ध वक्तृता और गहरी अध्यात्मिकता का दुर्लभ संयोजन प्रस्तुत करते थे और समय-काल की सीमाओं के परे उनके शब्द आज भी उन दिलों को बींध जाते हैं जिन्हें सत्य, सौन्दर्य और प्रेम की तलाश रहती है. ज़रा रूमी के इन शब्दों की बानगी देखिए:

"पगलाया घूमता है प्रेमी साल भर
अस्त-व्यस्त, प्रेम का मारा और अपमानित
प्रेम में दुःख के अलावा कुछ नहीं मिलता
और प्रेम में ... और क्या चाहिए?"


आज इस क्रम में सुना रहा हूं एक बार फिर से बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ां की आवाज़ में एक संगीत रचना. इस के छोटे संस्करण तो कई जगहों पर पाए जा सकते हैं पर तक़रीबन आधे घन्टे की यह दुर्लभ कम्पोज़ीशन किसी समतल हरे मैदान में चलते जाने-चलते जाने का सुख देती है.



(जारी)

9 comments:

सजीव सारथी said...

ऐसी मस्ती पिला दी आज तो कि पूरे दिन खुमारी रहेगी वाह क्या बात है नुसरत साहब की और हमरे प्रिय अशोक भाई की भी...

Udan Tashtari said...

आनन्द आ गया!!आभार.

तपन शर्मा said...

क्या बात है..
अशोक जी... आपको किस तरह से धन्यवाद कहूँ...
सुनते ही मस्ती सी आ गई...बार बार सुनने का मन कर रहा है...

शैलेश भारतवासी said...

डूबो देने वाला संगीत। सूफी संगीत के बारे में हम आम श्रोता भी इतना जान पा रहे हैं और इस तरह के दुर्लभ संगीत सुन पा रहे हैं, तो वो केवल अशोक जी की कृपा के कारण।

मानसी said...

बहुत ही शुक्रिया। डूब ही जाना है इसमें तो...

विश्व दीपक said...

नुसरत साहब को सुनने को मिले तो कहने-सुनने को कुछ और नहीं रह जाता।
आभारी हूँ अशोक जी का।

बधाईयाँ।

AMIT ARUN SAHU said...

पांडेजी आपने ये कम्पोजीशन नुसरत साहब की आवाज में सुनकर अभिभूत कर दिया . अलग ही रूहानियत महसूस कर रहा हूँ . आपका तहे दिल से शुक्रिया.

Dilip kumar said...

इन्हे सुनने के बाद लगता है कि सुरो को साध कर रब को पाया जा सकताहै,दिल से सुन कर रब कि अनुभूति कि जासकती है दिलिप खत्री

ramesh pandya said...

hai hari boll sat nam wahe guru

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