शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

"पहला म्युज़िक विडियो प्लस चैनल नें ही बनाया नाज़िया हसन को लेकर"- अमित खन्ना

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 63
"मैं अकेला अपनी धुन में मगन" - भाग:२
पढ़ें भाग ०१ यहाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! पिछले अंक में आप मिले सुप्रसिद्ध गीतकार एवं फ़िल्म व टी.वी. प्रोड्युसर-डिरेक्टर अमित खन्ना से। अमित जी इन दिनों रिलायन्स एन्टरटेनमेण्ट के चेयरमैन हैं, इसलिए ज़ाहिर है कि वो बहुत ही व्यस्त रहते हैं। बावजूद इसके उन्होंने 'हिन्द-युग्म' को अपना मूल्यवान समय दिया, पर बहुत ज़्यादा विस्तार से बातचीत सम्भव नहीं हो सकी। और वैसे भी अमित जी अपने बारे में ज़्यादा बताने में उत्साही नहीं है, उनका काम ही उनका परिचय रहा है। आइए अमित जी से बातचीत पर आधारित शृंखला 'मैं अकेला अपनी धुन मे मगन' की दूसरी कड़ी में उनसे की हुई बातचीत को आगे बढ़ाते हैं। पिछली कड़ी में यह बातचीत आकर रुकी थी फ़िल्म 'चलते चलते' के शीर्षक गीत पर। अब आगे...

सुजॉय - अमित जी, 'चलते चलते' फ़िल्म का ही एक और गीत था लता जी का गाया "दूर दूर तुम रहे"।
अमित जी - जी हाँ, इस गीत के लिए उन्हें अवार्ड भी मिला था। इस गीत की धुन बी. जे. थॉमस के मशहूर गीत "raindrops keep falling on my head" की धुन से इन्स्पायर्ड थी।

सुजॉय - चलिए इस गीत को भी सुनते चलें।

गीत - दूर दूर तुम रहे पुकारते हम रहे (चलते चलते)


सुजॉय - अच्छा, 'चलते चलते' के बाद फिर आपकी कौन सी फ़िल्में आईं?
अमित जी - उसके बाद मैंने बहुत से ग़ैर-फ़िल्मी गीत लिखे, ८० के दशक में, करीब १००-१५० गानें लिखे होंगे। फ़िल्मी गीतों की बात करें तो 'रामसे ब्रदर्स' की ४-५ हॉरर फ़िल्मों में गीत लिखे, जिनमें अजीत सिंह के संगीत में 'पुराना मन्दिर' भी शामिल है।

सुजॉय - 'पुराना मन्दिर' का आशा जी का गाया "वो बीते दिन याद हैं" गीत तो ख़ूब मकबूल हुआ था। क्यों न इस गीत को भी सुनवाते चलें और बीते दिनों को यादों को एक बार फिर ताज़े किए जायें?
अमित जी - ज़रूर!

गीत - वो बीते दिन याद हैं (पुराना मन्दिर)


सुजॉय - अच्छा अमित जी, यह बताइए कि जब आप कोई गीत लिखते हैं तो आप की रणनीति क्या होती है, किन बातों का ध्यान रखते हैं, कैसे लिखते हैं?
अमित जी - देखिए मैं बहुत spontaneously लिखता हूँ। मैं दफ़्तर या संगीतकार के वहाँ बैठ कर ही लिखता था। घर पे बिल्कुल नहीं लिखता था। फ़िल्म में गीत लिखना कोई कविता लिखना नहीं है कि किसी पहाड़ पे जा कर या तालाब के किनारे बैठ कर लिखने की ज़रूरत है, जो ऐसा कहते हैं वो झूठ कहते हैं। फ़िल्मों में गीत लिखना एक बहुत ही कमर्शियल काम है, धुन पहले बनती है और आपको उस हिसाब से सिचुएशन के हिसाब से बोल लिखने पड़ते हैं। हाँ कुछ गीतकार हैं जिन्होंने नए नए लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया, जैसे कि राजा मेहन्दी अली ख़ाँ साहब, मजरूह साहब, साहिर साहब। इनके गीतों में आपको उपमाएँ मिलेंगी, अन्य अलंकार मिलेंगे।

सुजॉय - अच्छा अलंकारों की बात चल रही है तो फ़िल्म 'मन-पसन्द' में आपनें अनुप्रास अलंकार का एक बड़ा ख़ूबसूरत प्रयोग किया था, उसके बारे में बताइए।
अमित जी - 'मन-पसन्द' मैंने ही प्रोड्युस की थी। फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसा आया कि जिसमे छन्दों की ज़रूरत थी। देव आनद टिना मुनीम को गाना सिखा रहे हैं। तो मैंने उसमें जयदेव की कविता से यह लाइन लेकर गीत पूरा लिखा।

सुजॉय - बहुत सुन्दर!
अमित जी - मैं यह समझता हूँ कि जो एक गीतकार लिखता है उसपे उसके जीवन और तमाम अनुभवों का असर पड़ता है। उसके गीतों में वो ही सब चीज़ें झलकती हैं। सबकॉनशियस माइण्ड में वही सबकुछ चलता रहता है गीतकार के।

सुजॉय - वाह! चलिए 'मनपसन्द' का लता जी और किशोर दा का गाया यह गीत सुनते चलें।

गीत - चारू चन्द्र की चंचल चितवन... सा रे गा मा (मनपसन्द)


सुजॉय - 'मनपसन्द' के सभी गीत इतने सुन्दर हैं कि जी चाहता है कि सभी गीत सुनवाएँ। "सुमन सुधा रजनीगंधा" भी लाजवाब गीत है। इस गीत को हम फिर कभी अवश्य अपने श्रोताओं को सुन्वएंगें. राजेश रोशन और बप्पी लाहिड़ी के अलावा और किन किन संगीतकारों के साथ आपने काम किया है?
अमित जी - लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ फ़िल्म 'भैरवी' में काम किया, एक और फ़िल्म थी उनके साथ जो बनी नहीं। भूपेन हज़ारिका के साथ NFDC की एक फ़िल्म 'कस्तूरी' में गीत लिखे। दान सिंह के साथ भी काम किया है। जगजीत सिंह के साथ भी काम किया है, दूरदर्शन की एक सीरियल था जलाल आग़ा साहब का, उसमें। अनु मलिक की २-३ फ़िल्मों में गीत लिखे, रघुनाथ सेठ के साथ १-२ फ़िल्मों में। इस तरह से कई संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला।

सुजॉय - अमित जी, कई नए कलाकारों नें आप ही के लिखे गीत गा कर फ़िल्म-जगत में उतरे थे, उनके बारे में बताइए।
अमित जी - अलका याग्निक नें अपना पहला गीत 'हमारी बहू अलका' में गाया था जिसे मैंने लिखा था। उदित नारायण नें भी अपना पहला गीत रफ़ी साहब के साथ 'उन्नीस बीस' फ़िल्म में गाया था जो मेरा लिखा हुआ था। शरन प्रभाकर, सलमा आग़ा नें मेरे ग़ैर फ़िल्मी गीत गाए। पिनाज़ मसानी का पहला फ़िल्मी गीत मेरा ही लिखा हुआ था। शंकर महादेवन नें पहली बार एक टीवी सीरियल में गाया था मेरे लिए। सुनिता राव भी टीवी सीरियल से आई हैं। फिर शारंग देव, जो पंडित जसराज के बेटे हैं, उनके साथ मैंने २/३ फ़िल्मों में काम किया।

सुजॉय - जी हाँ, फ़िल्म 'शेष' में आप प्रोड्युसर, डिरेक्टर, गीतकार, कहानीकार, पटकथा, संवाद-लेखक सभी कुछ थे और संगीत दिया था शारंग देव नें।
अमित जी - फिर इलैयाराजा के लिए भी गीत लिखे। गायकों में किशोर कुमार नें सबसे ज़्यादा मेरे गीत गाये, रफ़ी साहब नें कुछ ८-१० गीत गाये होंगे। लता जी, आशा जी, मन्ना डे साहब, और मुकेश जी नें भी मेरे दो गीत गाये हैं, दोनों डुएट्स थे, एक बप्पी लाहिड़ी के लिए, एक राजेश रोशन के लिए। इनके अलावा अमित कुमार, शैलेन्द्र सिंह, कविता कृष्णमूर्ति, अलका, अनुराधा, उषा उथुप नें मेरे गीत गाये हैं। भीमसेन जोशी जी के बेटे के साथ मैंने एक ऐल्बम किया है। नॉन-फ़िल्म में नाज़िया हसन और बिद्दू नें मेरे कई गीत गाए हैं। मंगेशकर परिवार के सभी कलाकारों नें मेरे ग़ैर-फ़िल्मी गीत गाए हैं। मीना मंगेशकर का भी एक ऐल्बम था मेरे लिखे हुए गीतों का। मीना जी नें उसमें संगीत भी दिया था, वर्षा नें गीत गाया था।

सुजॉय - अमित जी, अब मैं जानना चाहूँगा 'प्लस चैनल' के बारे में।
अमित जी - 'प्लस चैनल' हमनें १९९० में शुरु की थी पार्टनर्शिप में, जिसने मनोरंजन उद्योग में क्रान्ति ला दी। उस समय ऐसी कोई संस्था नहीं थी टीवी प्रोग्रामिंग की। महेश भट्ट भी 'प्लस चैनल' में शामिल थे। हमनें कुछ १० फ़ीचर फ़िल्मों और ३००० घंटों से उपर टीवी प्रोग्रामिंग् और १००० म्युज़िक ऐल्बम्स बनाई। 'बिज़नेस न्यूज़', 'ई-न्यूज़' हमने शुरु की थी। पहला म्युज़िक विडियो हम ही नें बनाया नाज़िया हसन को लेकर।

सुजॉय - 'प्लस चैनल' तो काफ़ी कामयाब था, पर आपने इसे बन्द क्यों कर दिया?
अमित जी - रिलायन्स में आने के बाद बन्द कर दिया।

सुजॉय - क्या आपनें गीत लिखना भी छोड़ दिया है?
अमित जी - जी हाँ, अब बस मैं नए लोगों को सिखाता हूँ, मेन्टरिंग् का काम करता हूँ। रिलायन्स एन्टरटेन्मेण्ट का चेयरमैन हूँ, सलाहकार हूँ, बच्चों को सिखाता हूँ।

सुजॉय - अच्छा अमित जी, चलते चलते अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए।
अमित जी - मैं अकेला हूँ, मैंने शादी नहीं की।

सुजॉय - अच्छा अच्छा। फिर तो 'मनपसन्द' का गीत "मैं अकेला अपनी धुन में मगन, ज़िन्दगी का मज़ा लिए जा रहा था" गीत आपकी ज़िन्दगी से भी कहीं न कहीं मिलता-जुलता रहा होगा। ख़ैर, अमित जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका, इतनी व्यस्तता के बावजूद आपनें हमें समय दिया, फिर कभी सम्भव हुआ तो आपसे दुबारा बातचीत होगी। बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
अमित जी - धन्यवाद!

गीत - मैं अकेला अपनी धुन में मगन (मनपसन्द)


तो दोस्तों, यह था गीतकार और फ़िल्मकार अमित खन्ना से की हुई बातचीत पर आधारित शृंखला 'मैं अकेला अपनी धुन में मगन' का दूसरा और अन्तिम भाग। अगले शनिवार फिर एक विशेषांक के साथ उपस्थित होंगे, तब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित कड़ियों का आनन्द लेते रहिए, नमस्कार!

1 टिप्पणी:

Anonymous ने कहा…

salute u sir :)

- sajeev sarathie

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ