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साईकिल की सवारी - पंडित सुदर्शन

सुनो कहानी: पंडित सुदर्शन की "साईकिल की सवारी"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार कमलेश्वर की पहली कहानी "कामरेड" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं हिंदी और उर्दू के अमर साहित्यकार पंडित सुदर्शन की प्रसिद्ध कहानी "साईकिल की सवारी", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

पंडित सुदर्शन की कालजयी रचना "हार की जीत", को सुनो कहानी में शरद तैलंग की आवाज़ में हम आपके लिए पहले ही प्रस्तुत कर चुके हैं. ।

कहानी "साईकिल की सवारी" का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 17 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



“अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।”
~ सुदर्शन (मूल नाम: पंडित बद्रीनाथ भट्ट)
(1895-1967)


जम्मू में पांचवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में पहली बार "हार का जीत" पढी थी। तब से ही इसके लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता थी। दुःख की बात है कि हार की जीत जैसी कालजयी रचना के लेखक के बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को है। गुलज़ार और अमृता प्रीतम पर आपको अंतरजाल पर बहुत कुछ मिल जाएगा मगर यदि आप पंडित सुदर्शन की जन्मतिथि, जन्मस्थान (सिआलकोट) या कर्मभूमि के बारे में ढूँढने निकलें तो निराशा ही होगी। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह पंडित सुदर्शन हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे हैं। उनकी गणना प्रेमचंद संस्थान के लेखकों में विश्वम्भरनाथ कौशिक, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि के साथ की जाती है। लाहोर की उर्दू पत्रिका हज़ार दास्ताँ में उनकी अनेकों कहानियां छपीं। उनकी पुस्तकें मुम्बई के हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय द्वारा भी प्रकाशित हुईं। उन्हें गद्य और पद्य दोनों ही में महारत थी। पंडित जी की पहली कहानी "हार की जीत" १९२० में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी। मुख्य धारा के साहित्य-सृजन के अतिरिक्त उन्होंने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे हैं. सोहराब मोदी की सिकंदर (१९४१) सहित अनेक फिल्मों की सफलता का श्रेय उनके पटकथा लेखन को जाता है। सन १९३५ में उन्होंने "कुंवारी या विधवा" फिल्म का निर्देशन भी किया। वे १९५० में बने फिल्म लेखक संघ के प्रथम उपाध्यक्ष थे। वे १९४५ में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा की साहित्य परिषद् के सम्मानित सदस्यों में थे। उनकी रचनाओं में तीर्थ-यात्रा, पत्थरों का सौदागर, पृथ्वी-वल्लभ, बचपन की एक घटना, परिवर्तन, अपनी कमाई, हेर-फेर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। फिल्म धूप-छाँव (१९३५) के प्रसिद्ध गीत तेरी गठरी में लागा चोर, बाबा मन की आँखें खोल आदि उन्ही के लिखे हुए हैं।
(निवेदक: अनुराग शर्मा)

बुरा समय आता है तो बुद्धि पहले ही भ्रष्ट हो जाती है।
(पंडित सुदर्शन की "साईकिल की सवारी" से एक अंश)


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#70th Story, Cycle ki Savari: Pt. Sudarshan/Hindi Audio Book/2010/15. Voice: Archana

Comments

डाउनलोड कर रहा हूँ - एक घंटे में हो जाएगा। तब तक समाचार देख लूँगा। इस कहानी को 'सुनने' की इच्छा थी, आप ने पूरी कर दी। धन्यवाद
वाह आपने कहानी में आवश्यक भाव भी डाले हैं, पहली बार आपको यहाँ देख बहुत खुशी हुई, आगे भी प्रयास जारी रखियेगा
बहुत ही सुन्दर प्रयास. अच्छा लगा.
बधाई अर्चना जी, आवाज़ में आपका स्वागत है. लग ही नहीं रहा है कि कथा-वाचन का यह आपका प्रथम प्रयास है.
Archana said…
धन्यवाद आप सभी का............कोशिश करुंगी कि आगे भी..जारी रखूं...........
Gaurav Pandey said…
Bahut Badiya, I was looking everywhere for this story and could only find it here on your blog. It is really sad that they have taken out saikil ki sawari and chikitsa ka chakkar from the syllabus. Even in syllabus ghoonskhori aur nepotism chalta hai.

Kya aap chikitsa ka chakkar doondh sakte hai?
Kundan Kumar said…
This comment has been removed by the author.
Kundan Kumar said…
बहुत ही सुन्दर। मैं बहुत ही दिनों से सुदर्शन जी की ये कहानी ढूँढ रहा था पढ़ने के लिये। आज जा कर खोज पूरी हुई। बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतिकरण। बचपन में ये कहानी हमारे पाठ्यक्रम में था। आज उनदिनों की याद दिला दी आपने।

आपको और आपके पूरे टीम का धन्यवाद विशेषकर अर्चना चावजी का जिन्होंने अपनी स्वर से इस कहानी को जीवंत करने की भरपूर और सफल कोशिश की है। आशा है, आप सब इसी तरह प्रेमचंद और अन्य नामचीन कथाकारों और कहानीकारों के कृत्यों को आज के नये और अनभिज्ञ पीढ़ी तक सुगम और रोचक रूप में पहुँचायेंगे। अपनी मातृभाषा से इस पीढ़ी को अवगत कराने की ज़रुरत है।

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