Saturday, October 31, 2009

दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना...जहाँ न गूंजे बर्मन दा के गीत वहां क्या रहना

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 248

ज है ३१ अक्तुबर। १९७५ साल के आज ही के दिन सचिन देव बर्मन हम सब को हमेशा के लिए छोड़ गए थे। आज उनके हमसे बिछड़े लगभग ३५ साल हो चुके हैं, लेकिन ऐसा लगता ही नहीं कि वो हमारे बीच नहीं है। उनके रचे गीत इतने ज़्यादा लोकप्रिय हैं कि आज भी हर रोज़ उनके गानें रेडियो पर सुनने को मिल जाते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि एक अच्छा कलाकार ना तो कभी बूढ़ा होता है और ना ही मरता है, वो अमरत्व को प्राप्त करता है अपनी कला के ज़रिए, अपनी रचनाओं के ज़रिए, अपनी प्रतिभा के ज़रिए। सचिन देव बर्मन एक ऐसे ही संगीत शिल्पी थे। उनकी सुमधुर संगीत रचनाएँ आज भी हमारे मन की वादियों में अक्सर गूँजते ही रहते हैं। शारीरिक रूप से वो भले ही हमसे बहुत दूर चले गए हों, लेकिन उनकी आत्मा उनके ही रचे संगीत के माध्यम से दुनिया की फ़िज़ाओं में गूँजती रहती है, और गूँजती रहेगी अनंत काल तक। 'जिन पर नाज़ है हिंद को' शृंखला में सचिन देव बर्मन और साहिर लुधियानवी की जोड़ी के गीतों का सफ़र जारी है, और आज जिस सुरीले मोती को हम चुन लाए हैं वह है फ़िल्म 'फ़ंटूश' का, "दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना, जहाँ नहीं चैना वहाँ नहीं रहना"। किशोर कुमर के गाए दर्द भरे गीतों में एक बहुत ऊँचा मकाम रखता है यह गीत। किशोर दा की आवाज़ की यही खासियत रही है कि हास्य रस के गीत गाए तो लोगों को हँसा हँसा कर लोट पोट कर दिया, और जब दर्द भरा कोई नग़मा गाया तो जैसे कलेजा चीर कर रख दिया। प्रस्तुत गीत भी कुछ ऐसा ही कलेजा चीरने वाले अंदाज़ का है। और साहिर साहब के दर्दीले अंदाज़ की एक और मिसाल है यह गीत। "दर्द हमारा कोई ना जाने, अपनी गरज के सब हैं दीवाने, किसके आगे रोना रोएँ, देस पराया लोग बेगाने"। युं तो खेमचंद प्रकाश ने किशोर कुमार को पहली बार फ़िल्म में गाने का मौका दिया था, पर सही मायने में किशोर बर्मन दा की खोज हैं। उन्होने ही किशोर को गवाने से पहले कहा था कि अगर वो अपनी आवाज़ से सहगल को अलग कर दें तो उनकी आवाज़ करिश्मा कर सकती है।

'फ़ंटूश' १९५६ की फ़िल्म थी। सचिन देव बर्मन, साहिर लुधियानवी और नवकेतन बैनर का साथ 'बाज़ी' (१९५१), 'टैक्सी ड्राइवर' (१९५४) और 'हाउस नंबर ४४' (१९५५) जैसी हिट म्युज़िकल फ़िल्मों में रही। १९५६ में यह साथ एक बार फिर से रंग लाई 'फ़ंटूश' के रूप में। फ़ंटूश बने देव आनंद, और साथ में थीं कुमकुम और लीला चिटनिस। १९५६ के आते आते किशोर दा ने युं तो कई लोकप्रिय गीत गा चुके थे, लेकिन 'फ़ंटूश' का यह प्रस्तुत गीत उन्हे रातों रात जैसे सितारों पर बिठा दिया। किशोर दा, जो अब तक मूलत: हँसी मज़ाक के गाने गाते चले आ रहे थे, इस गीत से हर किसी को आश्चर्य में डाल दिया। जो संगीतकार उन्हे एक गायक मानने से इंकार कर रहे थे, उनके मुँह पर तो जैसे ताला सा लग गया था इस गीत को सुनने के बाद। दोस्तों, आप को याद होगा जब हमने 'चलती का नाम गाड़ी' फ़िल्म का गीत 'हम थे वो थीं' सुनवाया था, उस कड़ी में हमने अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'फ़िल्मी मुक़द्दमा' कार्यक्रम का एक अंश प्रस्तुत किया था जिसमें किशोर दा ने अपने बर्मन दादा के बारे में कई दिलचस्प बातें कहे थे। आइए, आज जब फिर एक बार मौका हाथ लगा है, तो क्यों ना फिर से उसी कार्यक्रम की तरफ़ रुख़ करें, और एक और अंश का आनंद उठाएँ! इस अंश में आज के प्रस्तुत गीत का भी ज़िक्र है, पढ़िए। "सचिन दा ने मुझे पहला गाना गवाया फ़िल्म 'आठ दिन' में, पूरा गाना नहीं था, दो तीन लाइनें थीं। गाना था "बाँका सिपहिया घर ज‍इ हो"। पहला पूरा गाना मैने उनके लिए फ़िल्म 'बहार' में गाया, "क़ुसूर आपका हुज़ूर आपका, मेरा नाम लीजिए ना मेरे बाप का"। मगर यह गाना मैने बम्बई में नहीं बल्कि मद्रास में गाया। वहाँ उन्होने मुझे अपने ही कमरे में ठहराया। और तब मुझे पता चला कि संगीत ही उनका जीवन था। उठते बैठते चलते फिरते हर बात संगीत की होती, हर काम सुरीला होता। सचिन दा मुझे बार बार समझाते 'ए किशोर, ये जा, ऐसा जा, एक्स्प्रेशन के साथ, ज़्यादा मुड़कियाँ तानें मारने से कुछ नहीं होता, सीधा गाएगा तो गाना पब्लिक को ज़्यादा अच्छा लगेगा, समझा न?' फिर मेरे जीवन का वो दौर शुरु हुआ जिसका संबंध ना केवल सचिन दा से था बल्कि देव आनंद की अदाकारी से भी। देव के लिए सचिन दा ने सब से पहले मुझे गाना गवाया फ़िल्म 'बाज़ी' में। वह गाना था "तेरे तीरों में छुपे प्यार के तरानें हैं, नैय्या पुरानी तूफ़ान भी पुराने हैं"। और फिर आई 'फ़ंटूश'। 'फ़ंटूश' में बहुत दुख भरा गाना था। सब कहने लगे कि यह नया लड़का किशोर यह गाना नहीं गा सकेगा। सचिन दा अड़ गए, गाना किशोर ही गाएगा, मैं गाना उसी से गवाउँगा। फिर क्या था, मैने गाया, और उस गीत से सचिन दा मेरे जीवन का एक हिस्सा बन गए। उस गीत से उनमें और मुझमें वो नाता जुड़ा जिसे ना दूरी तोड़ पायी है और ना मौत!"

दोस्तों, कितनी सच्चाई है किशोर दा की इन बातों में! सच ही तो कहा है कि इस गीत ने किशोर दा और सचिन दा के बीच जो रिश्ता गढ़ा है, उसे मौत भी नहीं तोड़ सकी है, और इसका जीता जागता उदाहरण यही है कि हम आज ५५ साल बाद भी इस गीत को उतने ही चाव से सुनते चले जा रहे हैं जितने चाव से उस ज़माने के श्रोता सुना करते होंगे! सुनते हैं यह गीत और सचिन दा को उनकी पुण्य तिथि पर 'हिंद युग्म' की तरफ़ से स्मृति सुमन!



दोस्तों, यूं तो किशोर कुमार के गाये इस गीत को सुनने के बाद कुछ और सुनने की तमन्ना नहीं रहती पर सचिन दा की यादों को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए हमारे नियमित श्रोता दिलीप कवठेकर जी अपनी आवाज़ में आज कुछ सुनाना चाहते हैं, तो दोस्तों स्वागत करें दिलीप जी का और इस गीत को सुनकर हम सब भी याद करें आज हम सब के प्रिय बर्मन दा को.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. सचिन दा की एक और मधुर धुन.
२. साहिर के शब्द.
३. मुखड़े में शब्द है -"बाहें".

पिछली पहेली का परिणाम -

कल बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ जब दो जवाब एक ही समय पर आये और जवाब देने वाले दोनों श्रोता सही भी थे, इसलिए दोनों के खाते में दो-दो अंक जोड़े जायेंगें, दिलीप जी का स्कोर ६ हो गया है वहीँ अवध जी अभी ने कल ही अपना खाता खोला है २ अंकों के साथ, बधाई दोनों को.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

घर-जमाई - प्रेमचंद

सुनो कहानी: प्रेमचंद की "घर-जमाई"
'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद की हृदयस्पर्शी कहानी "सवा सेर गेहूं" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं मुंशी प्रेमचंद की कहानी "घर-जमाई", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 59 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।







मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी


इस घर में वह कैसे जाय? क्या फिर वही गालियाँ खाने, वही फटकार सुनने के लिए?
(प्रेमचंद की "घर-जमाई" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)








यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Fourty Fourth Story, Gharjamai: Premchand/Hindi Audio Book/2009/38. Voice: Anurag Sharma

Friday, October 30, 2009

ये रात ये चांदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की दास्ताँ....पुरअसर आवाज़ संगीत और शब्दों का शानदार संगम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 247

साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन को एक साथ समर्पित शृंखला 'जिन पर नाज़ है हिंद को' में आप सभी का एक बार फिर से हार्दिक स्वागत है। लता, गीता, तलत, किशोर और मन्ना दा के बाद आज जिस गायक की आवाज़ साहिर साहब के बोलों पर और दादा बर्मन की धुनों पर हवाओं में गूँजेंगी, उस गायक का नाम है हेमन्त कुमार। जब भी साहिर और सचिन दा की एक साथ बात चलती है, यकायक 'नवकेतन' बैनर की याद भी आ ही जाती है। और क्यों ना आए, इसी बैनर के तले ही तो इस गीतकार - संगीतकार जोड़ी ने ५० के दशक के शुरुआती सालों में एक से एक बेहतरीन नग़में हमें दिए थे। सचिन दा ने नवकेतन बैनर की पहली फ़िल्म 'अफ़सर' में संगीत दिया था १९५० में। उसके बाद १९५१ में आई सुपरहिट फ़िल्म 'बाज़ी', जिसका एक गीत आप सुन चुके हैं। १९५२ में नवकेतन ने बनाई 'आंधियाँ', लेकिन इसके संगीत के लिए चुना गया था उस्ताद अली अक़बर ख़ान साहब को। देव आनंद और कल्पना कार्तिक अभिनीत यह फ़िल्म नहीं चली, लेकिन हेमन्त दा का गाया "दिल है किसी दीवाने का" गीत मशहूर हुआ था। १९५२ में भले ही बर्मन दादा ने 'आंधियाँ' का संगीत न दिया हो, लेकिन देव आनंद के साथ वे जुड़े रहे और इसी साल, यानी कि १९५२ में निर्देशक गुरु दत्त ने बर्मन दादा को चुना फ़िल्म 'जाल' के लिए, जिसके देव साहब नायक थे। 'जाल' बनी थी 'फ़िल्म आर्ट्स प्रोडक्शन्स' के बैनर तले, और इस फ़िल्म में देव साहब की नायिका बनीं गीता बाली। और इस फ़िल्म में बर्मन दा का एक बार फिर से साथ हुआ साहिर साहब का, और एक बार फिर 'बाज़ी' जैसी कामयाबी रिपीट हुई। आज हम आपको सुनवा रहे हैं इसी फ़िल्म 'जाल' का एक सदाबहार गीत "ये रात ये चांदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की दास्ताँ"।

फ़िल्म 'जाल' के संगीत की जहाँ तक बात है, और ख़ास तौर से प्रस्तुत गीत की जहाँ तक बात है, इस गीत के दो वर्ज़न हैं। एक हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ों में है जो कुछ ग़मगीन अंदाज़ में गाया गया है जुदाई के दर्द को उभारते हुए; और दूसरा वर्ज़न हेमन्त दा की एकल आवाज़ में है, जो एक फ़ास्ट और पॊज़िटिव मूड में है, और ऒर्केस्ट्रेशन भी कमाल का हुआ है। हेमन्त दा की आवाज़ में गीत के शुरु में जो आलाप है, और इंटर्ल्युड में जो हमिंग् है, उन्हे सुनकर एक अजीब सी अनुभूति होती है, जिसे सिर्फ़ सुन कर ही महसूस किया जा सकता है, यहाँ आलेख में पढ़कर नहीं। साहिर साहब एक अंतरे में लिखते हैं "पेड़ों की शाख़ों पे सोयी सोयी चांदनी, तेरे ख़यालों मे खोयी खोयी चांदनी, और थोड़ी देर में थक के लौट जाएगी, रात ये बहार की फिर कभी ना आएगी, दो एक पल और है ये समां, सुन जा दिल की दास्ताँ"। आप ही कहें कि हम भला क्या तारीफ़ करें ऐसे शब्दों की। प्रकृति के सौंदर्य का वास्ता देकर जिस तरह से साहिर साहब के नायक नायिका को अपने पास बुला रहा है, बस कमाल है! इसी फ़िल्म में लता जी का गाया एक गीत है "पिघला है सोना दूर गगन पर", इस तरह के गीत साहिर जैसे गीतकारों की कलम से ही निकल सकता है। फ़िल्म 'जाल' गोवा की पृष्ठभूमी पर बनाई गई थी, जब पोर्चुगीज़ लोगों की यहाँ कॉलोनी हुआ करती थी। ऐसे में फ़िल्म के संगीत में वैसी संस्कृति को दर्शाना अनिवार्य था। तभी तो बर्मन दादा ने "चोरी चोरी मेरी गली आना है बुरा" में बैंजो, ट्रम्पेट जैसे साज़ों का इस्तेमाल कर एक बड़ा ही सुंदर गीत बनाया था जिसे लता जी और साथियों ने गाया था। और इन सब गीतों में बर्मन दादा के सहायक रहे एन. दत्ता, जो बाद में ख़ुद स्वतंत्र संगीतकार भी बने। कुल मिलाकर 'जाल' एक सफल संगीतमय फ़िल्म साबित हुई जिसने देव आनंद, गुरु दत्त, साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन के मुकुट पर एक और मयूरपंख लगा दिया। तो आइए, हेमन्त दा की पुरसर एकल आवाज़ का आनंद उठाते हैं। इस गीत को सुनते हुए महसूस कीजिए किसी के इंतज़ार का दर्द।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक दर्द भरा गीत कल सुनेंगें हम सचिन दा की पुण्यतिथि पर.
२. साहिर ने उंडेला है सारे जहाँ का दर्द इस गीत में.
३. एक अंतरे की पहले पंक्ति में शब्द है -"लाख".

पिछली पहेली का परिणाम -
चलिए आखिरकार हमारे पराग जी भी बन ही गए विजेता, हालाँकि ये बहुत पहले हो जाना चाहिए था, खैर देर से ही सही.....ढोल नगाडे तो बज ही गए.....दोस्तों ज़ोरदार तालियों के साथ स्वागत करें हमारे चौथे विजेता पराग सांकला जी का. वैसे तो पराग जी के चुने गीता दत्त जी के १० मधुर गीत हम जल्द ही सुनेंगें आने वाली शृंखला में, पर गीता जी के इतर भी हम चाहेंगें कि आप अपनी पसंद हमें जल्द से जल्द लिख भेजें. राज सिंह और समीर लाल जी आप दोनों को बहुत दिनों बाद देखकर अच्छा लगा. मुरली जी, पूर्वी जी, राज जी और शरद जी, आप सब का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, October 29, 2009

आन मिलो आन मिलो श्याम साँवरे...लोक धुनों पर भी बेहद सुरीले गीत रचे साहिर और बर्मन दा की जोड़ी ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 246

'जिन पर नाज़ है हिंद को' शृंखला इन दिनों आप सुन रहे हैं जिसके अंतर्गत हम आपको साहिर लुधियानवी के लिखे कुछ ऐसे गानें सुनवा रहे हैं जिन्हे सचिन देव बर्मन ने संगीतबद्ध किए हैं। युं तो इस जोड़ी ने बहुत सारे लाजवाब गीत हमें दिए हैं, लेकिन हमने उस ख़ज़ाने में से १० मोतियों को चुन लाए हैं, और हमें उम्मीद है कि आपको हमारे चुने हुए ये गानें पसंद आ रहे होंगे। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है मन्ना डे और गीता दत्त का गाया एक भक्ति मूलक रचना। ये भजन है १९५५ की फ़िल्म 'देवदास' का "आन मिलो आन मिलो श्याम साँवरे आन मिलो, बृज में अकेली राधे खोई खोई सी रे"। 'देवदास' फ़िल्म से जुड़ी तमाम बातें हमने आपको उस दिन बताई थी जिस दिन हमने आपको इस फ़िल्म से लता जी का गाया "जिसे तू क़बूल कर ले वो अदा कहाँ से लाऊँ" सुनवाया था। बंगाल की पृष्ठभूमि पर आधारित पीरियड फ़िल्म होने की वजह से इस फ़िल्म के गीत संगीत में उसी पुराने बंगाल को जीवित करना था। ऊर्दू के शायर होते हुए भी साहिर साहब ने जो न्याय इस फ़िल्म के गीतों के साथ किया है, इस फ़िल्म के गीतों को सुनकर कभी ऐसा नहीं महसूस हुआ कि काश इन गीतों को फ़लाने गीतकार ने लिखा होता! और सचिन दा ने तो बंगाल के लोक संगीत की ऐसी छटा बिखेरी, कीर्तन, भटियाली और बाउल शैली के संगीत को मिलाकर बंगाल को संगीत के द्वारा पर्दे पर ज़िंदा कर दिया। मन्ना डे और गीता दत्त का गाया प्रस्तुत गीत भी इसी तरह के बंगाली लोक संगीत पर आधारित है।

यह गीत सचिन देव बर्मन की ज़िंदगी से इस तरह से जुड़ा हुआ है कि यह एक बेहद महत्वपूर्ण रचना है उनकी करीयर का। क्या आपको पता है कि जिस लोक धुन से प्रेरीत होकर उन्होने इस गीत की रचना की थी, उसी लोक धुन से उन्होने अपना 'जयमाला' कार्यक्रम शुरु किया था और कार्यक्रम का समापन भी इसी धुन के ज़िक्र से किया था। विविध भारती के उस कार्यक्रम की शुरुआत दादा ने कुछ इस तरह से की थी - "फ़ौजी भाइयों, आप सभी को सचिन देव बर्मन का नमस्कार! मैं जब बहुत छोटा था तब त्रिपुरा के गाँव में एक बूढ़े किसान को गाते हुए सुनता था, "रोंगीला रोंगीला रोंगीला रे, रोंगीला"। जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ यह गीत भी मेरे साथ जवान होता गया। मेरी जो संगीत में रुचि है वह इसी गाने को सुनकर पैदा हुई थी।" दोस्तों, ये जो "रोंगीला रोंगीला" की धुन थी, वही धुन बनी "आन मिलो आन मिलो" की। और अब जान लीजिए कि बर्मन दादा ने उस कार्यक्रम का समापन कैसे किया था - "मेरी गीतों में जो लोक संगीत झलकती है, उसे मैने अपने गाँव के बूढ़े किसानों से सीखा है और शास्त्रीय संगीत अल्लाउद्दिन ख़ान साहब से सीखा है। मैं सब से ज़्यादा प्यार अपनी मिट्टी को करता हूँ, और संगीत मेरा शौक है। अब मैं फिर से उस गाँव को लौट जाता हूँ जहाँ पर वह बूढ़ा किसान गा रहा था "रोंगीला रोंगीला रोगीला रे, रोंगीला"।" तो दोस्तों, देखा आपने, किस तरह से जुड़ा हुआ है "आन मिलो श्याम साँवरे" का संगीत त्रिपुरा के उस सुदूर गाँव की धरती से। एक और उल्लेखनीय बात की इसी संगीत का इस्तेमाल राहुल देव बर्मन ने किया था अपनी अंतिम फ़िल्म '१९४२ ए लव स्टोरी' के गीत "कुछ ना कहो" के प्रील्युड म्युज़िक में। ज़रा याद तो कीजिए! तो सुनिए आज का यह गीत और खो जाइए भक्ति रस के महासागर में मन्ना दा और गीता जी की आवाज़ों के साथ। इन दो गायकों की आवाज़ों से वो भक्ति रस झड़े हैं इस गीत में कि सुननेवालों के मन ख़ुद ब ख़ुद पवित्र हो जाए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. बर्मन दा का एक और अमर गीत.
२. साहिर के लिखे इस गीत का फिल्म में एक से अधिक बार इस्तेमाल हुआ है.
३. एक अंतरे की दूसरी पंक्ति ने शब्द है -"ख्यालों".

पिछली पहेली का परिणाम-

रोहित जी ३५ अंक हुए आपके बधाई, आखिर आपने गीत बूझ ही लिया, मुरारी जी बहुत दिनों बाद आये शायद इसीलिए चूक गए, कल वेटरन शरद जी और पराग जी नहीं दिखे पर मनु जी, दिलीप जी, निर्मला जी सब की हजारी लगी...अच्छा लगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

'नर हो न निराश करो मन को' को संगीतबद्ध कीजिए और जीतिए रु 7000 के नगद पुरस्कार

पिछले महीने हमने गीतकास्ट प्रतियोगिता में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम, आज उनकी जय बोल' को संगीतबद्ध कविता करने की प्रतियोगिता आयोजित की थी। छठवीं गीतकास्ट प्रतियोगिता के आयोजन की उद्‍घोषणा करने में हमें लगभग 20 दिनों का विलम्ब हुआ क्योंकि कोई प्रायोजक नहीं मिल पाया था। परंतु जहाँ चाह है, वहाँ राह है। दुनिया में साहित्य और भाषा प्रेमियों की कमी नहीं है। जब हमने छठवीं गीतकास्ट प्रतियोगिता का प्रायोजक बनने का प्रस्ताव उत्तरी आयरलैण्ड के क्वीन'स विश्वविद्यालय के शोधार्थी दीपक मशाल के समक्ष रखा तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इन्होंने यह ज़रूर कहा कि रु 7000 की धनराशि एक विद्यार्थी के लिए जुटाना थोड़ा मुश्किल है, तो ये अपने दो अन्य शोधार्थी मित्रों को इस आयोजन के प्रायोजकों में जोड़ना चाहेंगे। हमने इन तीन शोधार्थी मित्रों के साथ मिलकर छठवीं गीतकास्ट प्रतियोगिता में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'नर हो न निराश करो मन को' का निश्चय किया है।

दीपक मशाल एक कवि भी हैं और सितम्बर 2009 के यूनिकवि घोषित किये गये हैं। दीपक के अनुसार इनके दादाजी राम बिहारी चौरसिया 'बिहारी दद्दा' मैथिली शरण गुप्त के बहुत करीबी थे। बिहारी दद्दा दीपक मशाल को मैथिली शरण गुप्त से जुड़े बहुत-से संस्मरण सुनाते रहते हैं। दीपक मानते हैं कि इनके अंदर कविता का बीजारोपण इनके बिहारी दद्दा और इनके गुरू वैदेही शरण लोहकर 'जोगी' ने ही किया है।

गीत को केवल पढ़ना नहीं बल्कि गाकर भेजना होगा। हर प्रतिभागी इस गीत को अलग-अलग धुन में गाकर भेजे (कौन सी धुन हो, यह आपको खुद सोचना है)।

1) गीत को रिकॉर्ड करके भेजने की आखिरी तिथि 15 नवम्बर 2009 है। अपनी प्रविष्टि podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल करें।
2) इसे समूह में भी गाया जा सकता है। यह प्रविष्टि उस समूह के नाम से स्वीकार की जायेगी।
3) इसे संगीतबद्ध करके भी भेजा जा सकता है।
4) श्रेष्ठ तीन प्रविष्टियों को क्वीन्स विश्वविद्यालय की ओर से क्रमशः रु 4000, रु 1500 और रु 1500 के नग़द पुरस्कार दिये जायेंगे।
5) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को डलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो स्टेशन फन एशिया के कार्यक्रमों में बजाया जायेगा। इस प्रविष्टि के गायक/गायिका से आदित्य प्रकाश रेडियो के किसी कार्यक्रम में सीधे बातचीत करेंगे, जिसे दुनिया में हर जगह सुना जा सकेगा।
6) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को 'हिन्दी-भाषा की यात्रा-कथा' नामक वीडियो/डाक्यूमेंट्री में भी बेहतर रिकॉर्डिंग के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है।
8) श्रेष्ठ प्रविष्टि के चयन का कार्य आवाज़-टीम द्वारा किया जायेगा। अंतिम निर्णयकर्ता में आदित्य प्रकाश का नाम भी शामिल है।
9) हिन्द-युग्म का निर्णय अंतिम होगा और इसमें विवाद की कोई भी संभावना नहीं होगी।
10) निर्णायकों को यदि अपेक्षित गुणवत्ता की प्रविष्टियाँ नहीं मिलती तो यह कोई ज़रूरी भी नहीं कि पुरस्कार दिये ही जायँ।

मैथिली शरण गुप्त की कविता 'नर हो न निराश करो मन को'

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रह के निज नाम करो।

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो!
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को।

सँभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला!
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को।।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे।
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को।।

Wednesday, October 28, 2009

जाएँ तो जाएँ कहाँ....तलत की आवाज़ में उठे दर्द के साथी बने साहिर और बर्मन दा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 245

१९५४ की फ़िल्म 'आर पार' की कहानी टैक्सी ड्राइवर कालू (देव आनंद) की थी। फ़िल्म में दो नायिकाएँ हैं, जिनमें से एक के पिता अंडरवर्ल्ड से जुड़ा हुआ है और वो चाहता है कि कालू भी उसके साथ मिल जाए ताकि वो जल्दी अमीर बन जाए। कालू भी ख़ुद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है, लेकिन सही रास्तों पर चलकर या ग़लत राह पकड़कर? यही थी 'आर पार' की मूल कहनी। गुरु दत्त साहब ने अपनी प्रतिभा से इस साधारण कहानी को एक असाधारण फ़िल्म में परिवर्तित कर चारों ओर धूम मचा दी। और इसी कामयाबी से प्रेरित होकर आनंद भाइयों ने इसी साल १९५४ में अपने 'नवकेतन' के बैनर तले इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए एक और फ़िल्म के निर्माण का निश्चय किया। और इस बार फ़िल्म का शीर्षक भी रखा गया 'टैक्सी ड्राइवर'। चेतन आनंद ने फ़िल्म का निर्देशन किया, विजय आनंद ने कहानी लिखी, और देव साहब नज़र आए टैक्सी ड्राइवर मंगल के किरदार में। नायिका बनीं कल्पना कार्तिक। गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार सचिन देव बर्मन की जोड़ी ने एक बार फिर से अपना जादू दिखाया और इस फ़िल्म के लिए बने कुछ यादगार सदाबहार नग़में। आज 'जिन पर नाज़ है हिंद को' शृंखला में हम इसी फ़िल्म का एक सुपरहिट गीत लेकर आए हैं तलत महमूद की मखमली आवाज़ में। जी हाँ, "जाएँ तो जाएँ कहाँ"। इस गीत के दो वर्जन हैं, दूसरा वर्ज़न लता जी की आवाज़ में है। लेकिन तलत साहब वाले गीत को ही ज़्यादा बजाया और सुना जाता है। राग जौनपुरी पर आधारित यह गीत बड़ा ही कर्णप्रिय है। बांसुरी की मधुर तानें गीत के इंटर्ल्युड में हमें एक और ही जगत में ले जाती है। साहिर साहब एक बार फिर से अपने उसी दर्दीले अंदाज़ में नज़र आते हैं। "उनका भी ग़म है, अपना भी ग़म है, अब दिल के बचने की उम्मीद कम है, एक कश्ती सौ तूफ़ान, जाएँ तो जाएँ कहाँ"। और सब से बड़ी बात यह कि इस गीत के लिए सचिन देव बर्मन को उस साल के सर्वर्श्रेष्ठ संगीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। और यह उनका पहला फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी था।

'टैक्सी ड्राइवर' का साउंड ट्रैक बहुत ही विविध है। इस फ़िल्म में साहिर साहब ने कुछ आशावादी गीत भी लिखे हैं, जैसे कि लता जी की आवाज़ में "दिल जले तो जले, ग़म पले तो पले" और "ऐ मेरी ज़िंदगी, आज रात झूम ले आसमान चूम ले"। इन दोनों गीतों को दादा ने पाश्चात्य शैली में स्वरबद्ध किया था। किशोर दा का गाया "चाहे कोई ख़ुश हो चाहे गालियाँ हज़ार दे" में जितना साहिर और बर्मन दादा का योगदान है, उससे कहीं ज़्यादा इसमें किशोर दा का अनोखा अंदाज़ सुनाई देता है। इस फ़िल्म के संगीत की एक और ख़ास बात यह है कि इसी फ़िल्म में आशा भोसले ने अपना पहला गीत गाया था बर्मन दादा के निर्देशन मे और वह भी एक कैबरे नंबर "जीने दो और जियो"। आशा और जगमोहन बक्शी का गाया इस फ़िल्म का एक युगलगीत "देखो माने नहीं रूठी हसीना" भी हम आपको सुनवा चुके हैं। इस साल, यानी कि १९५४ में साहिर और सचिन दा की जोड़ी एक बार फिर नज़र आई नासिर ख़ान और नरगिस अभिनीत फ़िल्म 'अंगारे' में, जिसमें भी तलत महमूद ने एक ख़ूबसूरत गीत गाया था "डूब गए आकाश के तारे जाके ना तुम आए, तकते तकते नैना हारे जाके ना तुम आये", लेकिन इस गीत को वह प्रसिद्धि नहीं मिली जितनी "जाएँ तो जाएँ कहाँ" को मिली। इसी फ़िल्म में साहिर साहब ने एक अनोखा गीत लिखा था जिसे लता और तलत ने गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह से थे कि तलत साहब गाते हैं "तेरे साथ चल रहे हैं ये ज़मीं चाँद तारे", और लता जवाब देती है "ये ज़मीं चाँद तारे तेरी एक नज़र पे वारे"। इन दो पंक्तियों में ध्यान दीजिए कि किस तरह से पहली पंक्ति समाप्त होती है "ये ज़मीं चाँद तारे" पे और दूसरी पंक्ति शुरु होती है इसी "ये ज़मीं चाँद तारे" से। तो दोस्तों, हमने 'टैक्सी ड्राइवर' के साथ साथ 'अंगारे' फ़िल्म का भी ज़िक्र किया आज की इस कड़ी में। चलिए अब आनंद उठाया जाए तलत साहब की मख़मली आवाज़ में साहिर साहब व सचिन दा की एक उत्कृष्ट गीत रचना फ़िल्म 'टैक्सी ड्राइवर' से।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. लोक संगीत पर आधारित इस गीत को लिखा साहिर ने.
२. इस युगल गीत की धुन बनायीं सचिनदा ने.
३. मुखड़े में शब्द है -"अकेली".

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी मात्र २ मिनट के अंतर से आपने २ अंक चुरा ही लिए शरद जी से, बधाई अब आप ४८ अंकों पर हैं. पूर्वी जी आपने अपने अनुभव हमसे बांटे अच्छा लगा, दिलीप जी बहुत दिनों बाद आपकी आमद हुई है. कहाँ थे ? राज जी आप बस गीतों का आनंद लीजिये, और रचना जी उदास तो मत रहा कीजिये....:)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने...."अदा" के तखल्लुस से गज़ल कह रहे हैं शहरयार साहब

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५७

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की आखिरी गज़ल लेकर। सीमा जी की पसंद औरों से काफ़ी अलहदा है। अब आज की गज़ल को हीं ले लीजिए। लोग अमूमन मेहदी हसन साहब, गुलाम अली साहब या फिर जगजीत सिंह जी की गज़लों की फ़रमाईश करते हैं, लेकिन सीमा जी ने जिस गज़ल की फ़रमाईश की है, उसे आशा ताई ने गाया है। इस गज़ल की एक और खासियत है और खासियत यह है कि आज की गज़ल और आज से दो कड़ी पहले पेश की गज़ल (जिसकी फ़रमाईश सीमा जी ने हीं की थी) में दो समानताएँ हैं। दो कड़ी पहले हमने आपको "गमन" फिल्म की गज़ल सुनाई थी और आज हम "उमराव जान" फिल्म की गज़ल लेकर आप सबके सामने हाज़िर हैं। इन दोनों फ़िल्मों का निर्माण मुज़फ़्फ़र अली ने किया था और इन दोनों गज़लों के गज़लगो शहरयार हैं। ऐसा लगता है कि मुज़फ़्फ़र अली हमारी महफ़िल के नियमित मेहमान बन चुके हैं। अब चूँकि मुज़फ़्फ़र अली और शहरयार के बारे में हम बहुत कुछ कह चुके हैं, इसलिए क्यों न आज आशा ताई के बारे में बातें की जाएँ। ८ सितम्बर १९३३ को जन्मी आशा ताई अब ७६ साल की हो चुकी हैं, लेकिन उन्हें सुनकर उनकी उम्र का तनिक भी भान नहीं होता। वैसे शायद आपको पता हो कि इसी साल इनके एलबम "प्रीसियश प्लैटीनम" को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ एलबम की सूची में ३७ वाँ स्थान मिला है। इस बारे में पूछने पर वो कहती हैं: मैं उस समय कोलकाता में थी। वहाँ मेरा एक बंगाली एलबम रिलीज़ हो रहा था। पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया, क्योंकि यहाँ अपने देश में तो इस एलबम को लोगों ने सुना भी नहीं है ठीक से। वैसे भी अपने देश से बाहर संगीत को सुनने वाले और सराहने वाले श्रोता बहुत हैं। अपने देश में तब उस संगीत को सराहा जाता है जब विदेश में उसको पसंद किया जाता है। आशा ताई की बात में सच्चाई तो है। अगर हमसे पूछें तो हमने भी अभी तक इस एलबम को नहीं सुना है, हाँ लेकिन फ़ख्र तो होता है कि हमारी एक धरोहर धीरे-धीरे विश्व की धरोहर बनती जा रही है। आज के संगीतकारों में शंकर-एहसान-लाय और मोंटी शर्मा को पसंद करने वाली आशा ताई नए गायक-गायिकाओं में किसी को खास पसंद नहीं करतीं। लता मंगेशकर उन्हें अब भी सबसे प्रिय हैं। इस मामले में उनका कहना है: लता मंगेशकर. हम ४५ साल से एक घर में रहते हैं. मां, हम पाँच भाई-बहन सब साथ रहते थे. जहाँ तक लोगों की बात है तो ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना.’

कब तक गाती रहेंगी..यह पूछने पर वो मजाकिया अंदाज़ में कहती हैं: मैं आखिरी साँस तक गाना चाहती हूँ. एक ज्योतिषी ने मुझे बताया था कि मैं ८ साल और जीवित रहूँगी लेकिन गाने के बारे में पूछने पर उन्होंने कुछ नहीं कहा तो समझ लीजिए कम से कम आठ साल अभी और गाऊँगी. पिछले ६५ सालों से गा रहीं आशा ताई को अब तक ८ बार फिल्म-फ़ेयर अवार्ड मिल चुका है। इस दौरान उन्होंने १४ से भी ज्यादा भाषाओं में १२००० से भी ज्यादा गानें गाए हैं। पहली फिल्म कैसे मिली..इस बाबत उनका कहना था: दीदी एक मराठी फ़िल्म माझा बाड़ में काम कर रही थी. उसमें गाने का मौका मिला. यह फ़िल्म १९४४ में बनी थी. उसके बाद ‘अंधों की दुनिया’ में वसंत देसाई ने मौके दिया. हंसराज बहल ने मुझे हिंदी फ़िल्म में पहली बार किसी अभिनेत्री के लिए गाने का मौका दिया. मेरा पहला गाना हिट हुआ १९४८ में, जिसके बोल थे- गोरे गोरे हाथों में. आज के दौर का संगीत पहले के संगीत से काफ़ी अलग है...इस बात पर जोर देते हुए वह कहती है: मैं उस वक्त को याद करती हूं, जब कलाकार बिना पैसा लिए कार्यक्रम देने के लिए आ जाते थे। मैंने उस वक्त उस्ताद विलायत खान को सुना था। प्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत खान द्वारा संगीतबद्ध १९७६ की फिल्म ‘कादंबरी' में मैंने गाया था। उस दौरान कुछ संगीतकार ऐसे थे, जो कार्यक्रम देने के पहले तैयारी करते थे, जबकि कुछ संगीतकार अचानक कार्यक्रम देते थे। उस्ताद विलायत खान दोनों तरह के संगीतकार थे। जब मैंने गाना शुरू किया था तब और आज के संगीत के परिदृश्य में काफी बदलाव आ गया है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे उस्ताद अली अकबर खान, उस्ताद विलायत खान, पंडित रविशंकर और शिव हरि ‘पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया' जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला। वक्त के साथ संगीत में काफी फर्क आया है. ‘नया दौर’ से लेकर ‘रंगीला’ के बीच में संगीत में तकनीक का दखल काफी बढ़ गया है और वर्तमान समय का फिल्मी संगीत बिना रूह के इनसान की तरह हो गया है. आजकल का फिल्मी संगीत सुनकर ऐसा लगता है कि संगीत अपनी रूह को खोज रहा है. बेताल को ताल में ढाला जा रहा है और बेसुरे को सुर में ढाला जा सकता है लेकिन भावनाएँ किसी भी सूरत में नहीं ढाली जा सकती हैं. एक जमाने में सुख और दुख, विरह और मिलन एवं वक्त के मुताबिक गीत लिखे जाते थे और उसी भावना से गाए भी जाते थे, लेकिन अब तो फिल्मी गीतों से कोई भाव निकालना बेहद मुश्किल हो गया है। आजकल ज्यादातर गीतों के बोल अच्छे नहीं होते। हालांकि, लिखने वालों की कमी नहीं है, आज भी गुलजार, जावेद अख्तर और समीर जैसे कई अच्छे गीतकार बॉलीवुड में है।

आशा ताई की बात हो और ओ०पी०नैय्यर साहब और पंचम दा का ज़िक्र न हो, यह कैसे संभव है। इन दोनों को याद करते हुए आशा ताई अतीत के पन्नों में खो-सी जाती हैं: मुझे लोकप्रियता नैयर साहब का साथ मिलने के बाद मिली..यह बात कुछ हद तक सही है. उस जमाने में सी रामचंद्र के गाने भी बहुत हिट हुए. ईना-मीना-डीका बहुत हिट रहा. मैं सिर्फ़ आर डी बर्मन का नाम भी नहीं लूँगी. हर संगीत निर्देशक का मेरे करियर में योगदान रहा है. मसलन मदन जी का ‘झुमका गिरा रे’, रवि साहब का ‘आगे भी जाने न तू’, शंकर जयकिशन का ‘पर्दे में रहने दो’. आर डी बर्मन मेरे पहले भी पसंदीदा संगीतकार थे आज भी हैं और कल भी रहेंगे. ये बात सिर्फ़ मेरे लिए नहीं बल्कि सबके लिए है. सभी संगीत निर्देशक, गायक आज महसूस करते हैं कि उनके जैसा संगीत कोई नहीं दे सकता. उनका गाना सिखाने का तरीका सबसे अलग था. वह गायक को नर्वस नहीं होने देते थे. उन्हें पता था कि गायक को किस तरह गंवाना चाहिए और बड़े ही प्यार से गायक से गीत गवा लेते थे. मुझे उनके गाने गाने में बहुत मजा आता था. वैसे भी मुझे नई चीज़ें करना अच्छा लगता था. बहुत मेहनत से गाते थे. बर्मन साहब को भी अच्छा लगता था कि मैं कितनी मेहनत करती हूँ. तो कुल मिलाकर अच्छी आपसी समझदारी थी. तो मैं कहूँगी कि हमारे बीच संगीत से प्रेम बढ़ा, न कि प्रेम से हम संगीत में नजदीक आए. आजकल जब कोई उनके पुराने गानों को तोड़-मरोड़कर गाता है, उससे दुख होता है. ‘चुरा लिया है तुमने’ को बाद में जिस तरह से गाया गया. उससे मुझे और बर्मन साहब को बहुत दुख हुआ था. अब अगर घर में हीं संगीत-शिरोमणि विराजमान हों तो तुलना होना लाजिमी है। इस बाबत वह कहती हैं: गुलज़ार भाई ने कहा था कि लोग कहते हैं कि आशा नंबर वन है, लता नंबर वन है. उनका कहना था कि अंतरिक्ष में दो यात्री एक साथ गए थे, लेकिन जिसका क़दम पहले पड़ा नाम उसका ही हुआ. मुझे खुशी है कि पहला क़दम दीदी का पड़ा और मुझे इस पर गर्व है. वैसे भी किसी को अच्छा कहने के लिए किसी और को ख़राब कहना ज़रूरी नहीं है. १६ आने खड़ी बात की है आशा ताई ने। तो चलिए आशा ताई के बारे में हमने आपको बहुत सारी जानकारी दे दी, अब हम आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। उससे पहले "शहरयार" साहब का एक बेमिसाल शेर पेश-ए-खिदमत है:

हमराह कोई और न आया तो क्या गिला
परछाई भी जब मेरी मेरे साथ न आयी...


क्या बात है!!! पढकर ऐसा लगता है कि मानो कोई हमारी हीं कहानी सुना रहा हो। आप क्या कहते हैं?

अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। हमें पूरा यकीन है कि यह आपको बेहद पसंद आएगी। तो लुत्फ़ उठाने के लिए तैयार हो जाईये, हाँ ध्यान देने की बात यह है कि फिल्म उमराव जान में नायिका का नाम "अदा" था, इसलिए शहरयार साहब ने "अदा" तखल्लुस का इस्तेमाल किया है:

जुस्तजू जिस की थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

तुझको रुसवा न किया ख़ुद भी _____ न हुये
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं
ज़िन्दगी तुझको तो बस ख़्वाब में देखा हमने

ऐ "अदा" और सुनाये भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा हमने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बुनियाद" और शेर कुछ यूं था -

आज जो दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन ये थी कि बुनियाद हिलनी चाहिए....

दुष्यंत कुमार के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना शामिख फ़राज़ ने। आपने "बुनियाद" शब्द पर यह शेर पेश किया:

मुनव्‍वर मां के आगे यूं कभी खुलकर नहीं रोना
जहां बुनियाद हो इतनी नमी अच्‍छी नहीं होती। (मुनव्वर राणा)

इनके बाद महफ़िल की शोभा बनीं सीमा जी। यह रही आपकी पेशकश:

गहे रस्न-ओ-दार के आग़ोश में झूले
गहे हरम-ओ-दैर की बुनियाद हिला दी (अहमद फ़राज़)

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी (साहिर लुधियानवी)

शामिख जी और सीमा जी के बाद महफ़िल में नज़र आए शरद जी। आपने पहली मर्तबा खुद के लिखे शेर नहीं कहे। चलिए कोई बात नही...यह भी सही। चाहे यह शेर आपका न हो, लेकिन क्या खूब कहा है:

हम वो पत्थर हैं जो गहरे गढ़े रहे बुनियादों में,
शायद तुमको नज़र न आए इसीलिए मीनारों में। (आर.सी.शर्मा ’आरसी’)

निर्मला जी, आप आतीं कैसे नहीं...आना तो था हीं, आखिर महफ़िल का सवाल है। बस कभी ऐसा हो कि आपके साथ कुछ शेर भी आ जाएँ तो मज़ा आ जाए।
राकेश जी, महफ़िल में आपका स्वागत है। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

डिग नहीं सकती कभी नीयत सरे बाज़ार में.
शर्त इतनी है कि बस बुनियाद पक्की चाहिए.

इन सब के बाद महफ़िल में आईं मंजु जी। यह रहा आपका अपने हीं अंदाज़ का स्वरचित शेर(जिसे पिछली बार शरद जी ने शेरनी घोषित कर दिया था :) ):

हम तो बुनियाद के बेनाम पत्थर हैं ,
जिस पर महल खड़ा .

महफ़िल में आखिरी शेर कहा कुलदीप जी ने। हुजूर, इस बार आपने बड़ी देर लगा दी। अगली बार से समय का ध्यान रखिएगा। आपने मीराज़ साहब का यह शेर महफ़िल में पेश किया:

हम भी हैं तामीले वतन में बराबर के शरीक
दरो दीवार अगर तुम हो तो बुनियाद हैं हम

दिशा जी और सुमित जी, आप दोनों कहाँ रह गए। महफ़िल में आने के बाद शेर कहने की परम्परा है, पता है ना!

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, October 27, 2009

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए...पूछते हैं संगीत प्रेमी आज भी बर्मन दा और साहिर को याद कर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 244

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों जारी है गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार सचिन देव बर्मन के संगीतबद्ध गीतों की ख़ास लघु शॄंखला 'जिन पर नाज़ है हिंद को'। दोस्तों, सन् १९५१ की बात करें तो अब तक हमने दो फ़िल्में, 'नौजवान' और 'बाज़ी' के एक एक गीत सुनें हैं इस शृंखला में। १९५१ पहला पहला साल था साहिर साहब और सचिन दा के सुरीले साथ का। और यह पहला ही साल इतना धमाकेदार रहा है कि हम बार बार मुड़ रहे हैं उसी साल की ओर। कम से कम एक और मशहूर गीत सुनवाए बग़ैर हम इस साल की चर्चा ख़त्म ही नहीं कर सकते। यह गीत है फ़िल्म 'सज़ा' का। फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने का यह भी एक 'टाइमलेस क्लासिक' है, जिसे आज भी जुदाई के दर्द में डूबी प्रेमिकाएँ मन ही मन गा उठती हैं। "तुम न जाने किस जहाँ में खो गए, हम भरी दुनिया में तन्हा हो गए"। जी. पी. सिप्पी, जो कराची में एक नामचीन शख़्स हुआ करते थे, देश के बँटवारे के बाद भारत आ गए और फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में क़दम रखा जी. पी. प्रोडक्शन्स के बैनर के साथ। १९५१ में उन्होने बना डाली फ़िल्म 'सज़ा', जो कि एक 'क्राइम थ्रिलर' थी। देव आनंद, निम्मी और श्यामा अभिनीत इस फ़िल्म में देव साहब कुछ कुछ ग्रेगरी पेक के अंदाज़ में नज़र आए थे। हालाँकि इस फ़िल्म के तमाम गानें राजेन्द्र कृष्ण ने लिखे, बस एक गीत ऐसा था जिसे सचिन दा के अनुरोध पर साहिर साहब से लिखवाया गया था। जी हाँ, यह आज का प्रस्तुत गीत ही था। और बताने की ज़रूरत नहीं कि यही गीत फ़िल्म का सब से कामयाब गीत साबित हुआ। आम तौर पर देखा गया है कि ख़ुशनुमा गानें ही ज़्यादा लोकप्रिय होते हैं और ग़मज़दा गीतों को थोड़ा सा कम तवज्जो देती है आम जनता। लेकिन समय समय पर ऐसे ऐसे दर्द भरे गानें बनें हैं जिनको लोगों ने अपने पलकों पर बिठा लिए हैं। आज का यह गीत एक ऐसा ही गीत है। इस गीत के बनने के पीछे भी एक मज़ेदार क़िस्सा है। कहा जाता है कि उन दिनों बर्मन दादा सुबह सुबह सैर पर जाया करते थे, और एक तालाब के पास जा कर मछलियाँ देखा करते थे। एक दिन जब उन्हे कोई भी मछली नहीं दिखाई दी तो वो कुछ निराश से हो गए और एक दम से गुनगुना उठे कि "तुम न जाने किस जहाँ में खो गए", और धुन भी बना डाली। और इस तरह सी बनी इस 'मास्टरपीस' गीत की भूमिका।

लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत सुनवाने से पहले आइए पहले पढ़ लेते हैं लता जी के उद्‍गार अपने इस पिता समान संगीतकार सचिन देव बर्मन के बारे में, और ख़ास कर आज के इस गीत के बारे में, जो उन्होने कहे थे अमीन सायानी साहब को। "बॉम्बे टॊकीज़ की फ़िल्म 'मशाल' का गाना था वह, जो शायद उनके साथ मेरा पहला गाना था, "हँसते हुए चल मेरे मन"। फिर कई गानें मैने गाए उनके लिए, जैसे 'मुनीमजी' का गाना "जीवन के सफ़र में राही", 'बुज़दिल' का गाना "रोते रोते गुज़र गई रात", या "झन झन झन झन पायल बाजे", 'टैक्सी ड्राइवर' का "जाएँ तो जाएँ कहाँ", जिसे तलत भ‍इया ने भी गाया, और एक गाना फ़िल्म 'सज़ा' का, जो आज गाने को जी चाह रहा है उनके लिए, (लता जी यहाँ वह गीत गुनगुनाती हैं "तुम न जाने किस जहाँ में खो गए")। अगर युं कहा जाए कि संगीत ही सचिन दा का पूरा जीवन था तो ग़लत नहीं होगा। जागते, सोते, उठते, बैठते, सैर करते हुए या फ़ूटबॊल मैच देखते हुए उनका तन मन बस संगीत ही में मस्त रहता। उनका संगीत समर्पण इतना गहरा था कि सचमुच हम सब के लिए सीखने की बात थी।" तो दोस्तों, आइए, सचिन दा और साहिर साहब को एक बार फिर से नमन करते हुए सुनते हैं लता जी की मधुरतम आवाज़ में "तुम न जाने किस जहाँ में खो गए"। सच ही तो है, सचिन दा और साहिर जैसे कलाकारों के बिना फ़िल्म संगीत की भरी दुनिया भी तन्हा ही तो है!



तुम न जाने किस जहाँ में खो गए
हम भरी दुनिया में तन्हा हो गए ।

मौत भी आती नहीं, आस भी जाती नही
दिल को ये क्या हो गया ,कोई शै भाती नहीं
लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ ।

एक जाँ और लाख गम, घुट के रह जाए न दम
आओ तुम को देख ले, डूबती नज़रों से हम
लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ ।

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. साहिर का लिखा एक और दर्द भरा नगमा.
२. इस फिल्म के लिए बर्मन दा ने जीता था फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार सम्मान.
३. एक अंतरा खत्म होता है इस शब्द पर -"तूफ़ान".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी देखते ही देखते आप ३० अंकों पर पहुँच गए, क्या बात है जनाब, बधाई. उम्मीद है नीलम जी आज अवश्य आएँगी इस गीत को सुनने, पराग जी आपसे आगे भी इस तरह की दुर्लभ जानकारियों की उम्मीद रहेगी. रोहित जी, आपकी समस्या जायज है, पर क्या करें यही तो इस खेल की खूबी है

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, October 26, 2009

टिप टिप टिप... देख के अकेली मोहे बरखा सताए...गीता दत्त का चुलबुला अंदाज़ खिला साहिर-सचिन दा की जोड़ी संग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 243

साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन की जोड़ी को सलाम करते हुए हमने शुरु की है यह विशेष शृंखला 'जिन पर नाज़ है हिंद को'। पहली कड़ी में आप ने इस जोड़ी की पहली फ़िल्म 'नौजवान' का गीत सुना था जो बनी थी सन् '५१ में; फिर दूसरी कड़ी में १९५५ की फ़िल्म 'मुनीमजी' का एक गीत सुना। आज इसकी तीसरी कड़ी में एक बार फिर से हम चलेंगे सन् १९५१ की ही तरफ़ और सुनेंगे फ़िल्म 'बाज़ी' का एक बड़ा ही चुलबुला सा गीत गीता रॉय और सखियों की आवाज़ों में। फ़िल्म संगीत के हर युग में बरसात पर, सावन पर असंख्य गानें लिखे गए हैं, जिनमें से अधिकतर काफ़ी लोकप्रिय भी हुए हैं। आज का गीत भी बरखा रानी को ही समर्पित है। लेकिन यह गीत दूसरे गीतों से बहुत अलग है। "देख के अकेली मोहे बरखा सताए, गालों को चूमे कभी छींटें उड़ाए रे, टिप टिप टिप टिप टिप"। टिप टिप बरसते हुए पानी को शरारती क़रार दिया है साहिर साहब ने इस गीत में। किसी सुंदर कमसिन लड़की को देख कर किस तरह से बरखा रानी उसे छेड़ती है, यही भाव है इस गीत का। सचिन दा ने इस शरारती और चुलबुली अंदाज़ वाले इस गीत का संगीत कुछ इस तरह से तैयार किया है, इसका संयोजन ऐसा किया है कि गीत सुनने के बाद बहुत देर तक गीत ज़हन में रहता है, और मन ही मन हम इसे गुनगुनाते रहते हैं। और गीता जी की आवाज़ में जो शोख़ी, जो चुलबुलापन था, उसके तो क्या कहने! जिस तरह से वो गीत में बार बार "उई" कहती हैं, बड़ा ही चंचल और शोख़ अंदाज़ है, जिसे सुनकर हमारे होठों पर मुस्कान आ ही जाती है। और जो न्याय गीता जी ने इस गीत के साथ किया है, उनके गाने के बाद फिर किसी और गायिका की आवाज़ में इस गीत की कल्पना करना भी निरर्थक है। गीत के शुरुआती संगीत में जिस तरह से बरसात की बरसती बूंदों को "टिप टिप" शब्दों और उससे मेल खाती ध्वनिओं से साकार किया है, उससे गीत बेहद आकर्षक और मनमोहक बन पड़ा है। साहिर जैसे संजीदे शायर के कलम से इस तरह का नटखट गीत हमें हैरत में डाल देती है कि क्या ये उसी मोहब्बत में नाक़ाम, ज़िंदगी से परेशान, बाग़ी शायर ने लिखा है!

आइए अब इस फ़िल्म 'बाज़ी' से जुड़ी कुछ बातें आपको बताई जाए। १९४९ में नवकेतन की पहली प्रस्तुति 'अफ़सर' पिट गई थी, हालाँकि उसका गीत संगीत अच्छा चला था। गुरु दत्त, जो उस समय प्रभात स्टुडियो से जुड़े हुए थे, वो देव आनंद साहब के भी अच्छे मित्र थे। गुरु दत्त तब तक अमिय चक्रबर्ती को 'गर्ल स्कूल' (१९४९) और ज्ञान मुखर्जी को 'संग्राम' (१९५०) में ऐसिस्ट कर चुके थे। १९५१ में देव साहब ने उन्हे नवकेतन की फ़िल्म 'बाज़ी' को स्वाधीन रूप से निर्देशित करने का मौका दिया और इस तरह से गुरु दत्त ने अपनी पहली फ़िल्म निर्देशित की। देव आनंद, गीता बाली, कल्पना कार्तिक, के. एन. सिंह व जॉनी वाकर अभिनीत इस हिट फ़िल्म में साहिर और बर्मन दादा ने एक से एक हिट गीत दिए जो आज सदाबहार नग़मों में अपना नाम दर्ज कर चुके हैं। फ़िल्म 'बाज़ी' इसलिए भी यादगार है क्योंकि इस फ़िल्म की शूटिंग् के दौरान दो प्रेम कहानियों का जन्म हुआ था। एक गुरु दत्त और गीता राय के बीच, और दूसरा देव आनंद और कल्पना कार्तिक के बीच। गीता रॊय ने इस फ़िल्म में अपने करीयर के कुछ बेहद मक़बूल गीत गाए हैं, जैसे कि "सुनो गजर क्या गाए", "तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले", "ये कौन आया के मेरे दिल की दुनिया में बहार आई", और "आज की रात पिया दिल ना तोड़ो"। आज का प्रस्तुत गीत भी उतना ही प्यारा है जितना कि ये तमाम गीत, लेकिन इस गीत को आज उतना नहीं सुना जाता जितना कि दूसरे गीतों को सुना जाता है। एक और कमचर्चित गीत है "लाख ज़माने वाले डाले दिलों पे ताले"। गीता जी को उन दिनों ज़्यादातर धार्मिक और उदास गानें ही मिला करते थे। ऐसा लग रहा था लोगों को कि उनकी आवाज़ को इसी खांचे में कैद कर ली जाएगी। लेकिन बर्मन दादा ने इसको ग़लत साबित करते हुए उनसे कुछ ऐसे सेन्सुयस और नशीले गीत गवाए कि सब दंग रह गए। कहाँ एक तरफ़ वेदना भरी आवाज़ लिए भक्ति रचनाएँ और कहाँ क्लब सॊंग्स् गाती हुई मदमस्त आवाज़-ओ-अंदाज़ की धनी एक चुलबुली शोख़ गायिका। यहाँ पर अगर हम नय्यर साहब का नाम नहीं लेंगे तो ग़लत बात होगी क्योंकि उन्होने भी गीता जी की इसी अंदाज़ को बाहर निकालने में मुख्य भूमिका निभाई थी। तो दोस्तों, पेश है साहिर साहब, बर्मन दादा और गीता रॉय के नाम आज का यह मस्ती भरा नग़मा। सावन का महीना तो निकल गया, लेकिन हमें पूरा यक़ीन है कि इस गीत में टिप टिप बरसते हुए पानी को आप दिल से महसूस करेंगे क्योंकि इन तीनों कलाकारों ने बरसते हुए पानी के नज़ारे को एकदम जीवंत कर दिया है इस गीत में, सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म में ये इकलौता गीत था जो साहिर ने लिखा.
२. संगीत बर्मन दा का है.
३. मुखड़े में शब्द है -"तन्हा".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी अब तो रोके रुकते नज़र नहीं आते, लगता है पराग जी को अपने ४ अंक लेने भी भारी पड़ जायेंगें, अवध जी हम भी आपकी तरह शरद जी के कायल हैं, सुब्रमनियन जी आपकी यादें ताजा हुई, हमें भी आनंद आया :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रफा दफा किया नहीं जाए....नए दौर के गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के लिए बस यही कहेंगें हम भी

ताजा सुर ताल TST (33)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में तन्हा जी ने इस बार फुर्ती दिखाई, और दो सही जवाब देकर चार अंक बटोर लिए, पर सीमा जी ने भी २ अंक चुरा ही लिए अंतिम सवाल का सही जवाब देकर, तो दोस्तों मुकाबला अब सीधे सीधे सीमा जी और तन्हा जी के बीच है, दोनों को हमारी शुभकामनाएँ

सजीव - सुजॉय, एक और नए सप्ताह की शुरुआत हो रही है, और हम भी हाज़िर हैं इस नए सप्ताह के स्वागत के लिए तीन नए गीतों को लेकर।

सुजॉय - जी बिल्कुल हम हाज़िर हैं। और मेरे ख़याल से TST का मक़्सद यह है कि अपने श्रोताओं और पाठकों को बिल्कुल नई फ़िल्मों के संगीत से रु-ब-रु करवाएँ। क्योंकि क्या होता है कि आज हर फ़िल्म में नई नई आवाज़ें सुनाई देती हैं और लोगों को पता ही नहीं चलता कि कौन सा गीत किसने गाया है। इस शृंखला में गीत सुनवाने के साथ साथ फ़िल्म से संबंधित जो जानकारियाँ हम देते हैं, उससे शायद कुछ हद् तक लोगों की नए फ़िल्म संगीत के प्रति थोड़ी सी जागरुक्ता बढ़ रही होगी, ऐसा हम उम्मीद करते हैं।

सजीव - ठीक कहा तुमने, और सिर्फ़ आवाज़ें ही क्यों, बहुत सारे नए गीतकार भी इन दिनों क़दम रख रहे हैं फ़िल्म जगत में। कुल मिलाकर अगर नए ज़माने के साथ ताल से ताल मिलाकर चलना है तो TST की महफ़िल इस दृष्टि से लोगों का सहायक बन सकता है। तो अब बताओ कि आज कौन सा गीत सब से पहले तुम सुनवा रहे हो हमारे श्रोताओं को?

सुजॉय - आज पहला गीत है 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' का। इस फ़िल्म के गानें इन दिनों बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं, और सुनने में आया है कि इस फ़िल्म से काफ़ी उम्मीदें लगाई जा रही है। 'वेक अप सिद' तो बहुत ज्यादा नहीं चली, लेकिन शायद इस बार रणबीर की क़िस्मत चमक जाए!

सजीव - प्रोमोज़ तो लुभावनीय लग रहे हैं, देखते हैं क्या होता है। ख़ैर, गीत कौन सा है यह भी तो बताओ!

सुजॉय - गीत है "तेरा होने लगा हूँ"। संगीतकार प्रीतम की ख़ासीयत है कि वो किसी भी गीत के लिए गायक गायिका के चुनाव को बहुत ज़्यादा अहमीयत देते हैं। किस गीत में किस गायक की आवाज़ अच्छी लगेगी, इस बात पर हमेशा उनकी नज़र रहती है। और तभी तो समय समय पर वो श्रोताओं को सर्प्राइज़ देते रहते हैं। जैसे कि इस गीत के लिए उन्होने चुने हैं दो ऐसी आवाज़ें जो पहली बार साथ में कोई गीत गा रहे हैं। एक तरफ़ पॉप diva अलिशा चिनॉय और दूसरी तरफ़ जवाँ दिलों की धड़कन आतिफ़ अस्लम।

सजीव - अलिशा चिनॉय का अंदाज़ हमेशा से ही सेन्सुयल रहा है, उस पर आतिफ़ के आवाज़ में वो जुनूनी अंदाज़, कुल मिलाकर एक बहुत ही अच्छा कॊम्बिनेशन और एक सुरीला कॊम्पोज़िशन है यह गीत। चलो सुनते हैं। और हाँ, इस गीत को लिखा है इर्शाद कामिल ने। एक बात और सुजॉय इन दिनों हिंदी फ़िल्मी गीतों में पूरे पूरे अंग्रेजी प्रोस् का जम कर इस्तेमाल हो रहा है, इन अंग्रेजी शब्दों को कौन लिखता है, इसका कोई क्रेडिट नहीं दिया जाता....खैर प्रस्तुत गीत भी इसी नए चलन का एक उदाहरण है

तेरा होने लगा हूँ (अजब प्रेम की गजब कहानी)
आवाज़ रेटिंग - ***1/2



TST ट्रिविया # 19- किस अभिनेत्री के लिए अलीशा ने पार्श्वगायन किया है जिसमें उस अभिनेत्री के "घरेलु" (pet) नाम पर ही गीत रचा गया है ?

सजीव - आओ अब बढ़ते हैं आज के दूसरे गीत की ओर। पिछले अंक में हमने फ़िल्म 'क़ुर्बान' का चार्ट बस्टर्स पर सब से उपर चल रहे गीत "शुक्रान अल्लाह" को सुना था। इसी फ़िल्म से एक और गीत आज सुनवा रहे हैं। यह गीत है कुछ सूफी अंदाज़ का जिसका नाम है "अली मौला".

सुजॉय - सजीव, "शुक्रान अल्लाह" तो लोगों को पसंद आ रहा है, अली मौला गीत भी इस अल्बम का एक ख़ास आकर्षण है. वास्तव में यह एक प्रार्थना है, सलीम की आवाज़ में इस गीत में गजब का सम्मोहन है.

सजीव - हालांकि शब्द काफी गूढ़ है और आम फिल्म संगीतप्रेमियों को कुछ शब्दों को समझने में मशक्कत करनी पड़ सकती है पर गीत का थीम और संयोजन कुछ ऐसा गजब का है कि सुनकर मन उस परवरदिगार के जलवों में कहीं खो सा जाता है, ऑंखें बंद कर इसे सुनिए बेहद सकूं मिलेगा ये दावा है हमारा.

सुजॉय- अली मौला का मन्त्र और उस पर सलीम की आवाज़ में "ओ मौला" कहना बहुत सुहाता है. कुर्बान के ये दो गीत निश्चित रूप से फिल्म के प्रति उम्मीदें कायम रखता है, यदि सफल हुई तो ये सैफ की दूसरी हिट होगी इस साल की, लव आज कल के बाद.

सजीव- यह बात भी सही है आपकी। चलिए सुनते है 'क़ुर्बान' का ये सूफी गीत, और इस फ़िल्म के निर्माता के लिए यही दुआ करें कि इस फ़िल्म के चलते उन्हे किसी भी तरह की क़ुर्बानियाँ न देनी पड़े :-)

अली मौला (कुर्बान)
आवाज़ रेटिंग - ****



TST ट्रिविया # 20- किस राम गोपाल वर्मा निर्देशित फिल्म के पार्श्वसंगीत के लिए सलीम सुलेमान को एक प्रतिष्टित पुरस्कार प्राप्त हुआ था ?

सुजॉय - सजीव, आपको हिमेश रेशम्मिया की नई फ़िल्म 'रेडियो' के गानें कैसे लगे?

सजीव - अच्छे हैं। कम से कम पिछले दो एक सालों से वो जिस तरह वो लगभग एक ही तरह का संगीत देते चले आ रहे थे, उससे कुछ अलग हट के उन्होने काम किया है इस फ़िल्म में। अपने लुक्स और आवाज़ भी बदल डाली है। उनका यह चेंज-ओवर तो भई मुझे अच्छा लगा है।

सुजॉय - और मुझे भी। चलिए 'रेडियो' फ़िल्म का एक और गीत आज सुना जाए। इस फ़िल्म के गानें बहुत ही अलग तरह के हैं, जिन्हे ज़्यादातर हिमेश और कैलाश खेर ने गाए हैं। इस पूरे ऐल्बम की ख़ासीयत यही है कि हर गीत अलग अंदाज़ का है, लेकिन सारे गानें आपस में जुड़े से लगते हैं और ऐल्बम जैसे कम्प्लीट लगता है।

सजीव - ठीक ही कहा है तुमने। फ़िल्म में कुल १२ गानें हैं, और आज हम चलो इस ऐल्बम का अंतिम गीत सुनते हैं "रफ़ा दफ़ा किया नहीं जाए", जिसे हिमेश ने ही गाया है।

सुजॉय - यह गीत शुरु होता है एक धीमे संगीत से, लेकिन गीत के बोल भी उतने ही असरदार हैं।

सजीव - हम आज शुरु में ही नई आवज़ों और नए गीतकारों की बात कर रहे थे न, तो इस फ़िल्म में नए गीतकार सुब्रत सिन्हा ने सभी गानें लिखे हैं। उन्हे हम 'आवाज़' की तरफ़ से शुभकामनाएँ देते हैं, और सुनते हैं 'रेडियो - लव ऑन एयर' का यह गीत। बिलकुल जैसा इस गीत में खुद हिमेश ने कहा है कि, रफा दफा किया नहीं जाए, संगीत समीक्षक भी हिमेश को यूहीं रफा दफा करने की हिम्मत नहीं कर सकते

रफा दफा किया नहीं जाए (रेडियो)
आवाज़ रेटिंग -***1/2



TST ट्रिविया # 21-सुब्रत सिन्हा के लिखे गीत "छोटे छोटे पैरों तले" के संगीतकार कौन हैं?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, October 25, 2009

जीवन के सफर में राही मिलते है बिछुड़ जाने को...और बिछड़ गया वो संजीदा शायर हमसे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 242

"रो..रो के इन्ही राहों में खोना पड़ा एक अपने को, हँस हँस के इन्ही राहों में अपनाया था बेगाने को। जीवन के सफ़र में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को, और दे जाते हैं यादें तन्हाई में तड़पाने को"। ये पंक्तियाँ सुनने में निराशावादी भले ही लगे, लेकिन है बिल्कुल सच। आज २५ अक्तुबर का दिन हम सब के लिए एक आम तारीख़ हो सकता है, लेकिन साहित्य और फ़िल्म संगीत के रसिकों के लिए आज का दिन यादगार दिन है, क्योंकि आज है महान शायर व गीतकार साहिर लुधियानवी साहब की पुण्यतिथि। २५ अक्तुबर १९८० के दिन इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिए छोड़ गये थे साहिर साहब, और अपने पीछे छोड़ गए अपने शब्दों का एक ऐसा महासागर जिसमें मोतियाँ हैं अनगिनत, और जिनमें सुरीली तरंगें हैं बेशुमार! साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन पर केन्द्रित शृंखला 'जिन पर नाज़ है हिंद को' का आज का यह अंक समर्पित है साहिर साहब की पुण्य स्मृति को। मोह भंग, विद्रोह और निराशा के सुर साहिर लुधियानवी की ज़िंदगी के हिस्से बन गए थे। पिता का दुर्व्यवहार और कॊलेज का पहला असफ़ल प्रेम उनके कोमल मन पर गहरा असर कर गया था। इसलिए फ़िल्मों में भी गानें लिखते वक़्त अक्सर उनके मन की भड़ास और दर्द बार बार उनके गीतों से छलक पड़ी है। कई बार व्यंगात्मक तरीके से, कभी सीधे सीधे। हमने आज जिस गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'मुनीमजी' का "जीवन के सफ़र में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को"। वैसे तो इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है लता जी की आवाज़ में, लेकिन आज हम आपको इसका ज़्यादा लोकप्रिय वर्ज़न सुनवा रहे हैं जिसे किशोर कुमार ने गाया है। 'मुनीमजी' १९५५ की सुबोध मुखर्जी की फ़िल्म थी, जिसमें कलाकार थे देव आनंद और नलिनी जयवंत। इसी फ़िल्म से देव साहब अपने उन मैनरिज़्म्स में नज़र आए जिनकी वजह से वो आगे जाने गए और जो उनका ट्रेडमार्क बना रहा, और आज भी है। इस फ़िल्म में बर्मन दादा के संगीत और साहिर साहब के गीत तो थे ही, शैलेन्द्र ने भी कुछ गानें इस फ़िल्म में लिखे थे। लेकिन फ़िल्म का सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत साहिर साहब की कलम से ही निकला था। जी हाँ, हमारा इशारा आज के प्रस्तुत गीत की तरफ़ ही है।

फ़िल्म 'मुनीमजी' के इस गीत को अगर किशोर कुमार का गाया हुआ पहला ब्लॊकबस्टर गीत कहा जाए तो शायद बहुत ज़्यादा ग़लत बात नहीं होगी। इस गाने की चरम लोकप्रियता का एक ही कारण मुझे जो लगता है, वह यह कि बहुत ही सीधे सरल शब्दों में जीवन दर्शन की गहरी बात कही गई है, और धुन भी ऐसा है कि जिसे आम जनता आसानी के गा सके, गुनगुना सके। जैसा कि उपर हमने आपको बताया कि साहिर साहब अक्सर अपने दिल की भड़ास को कभी व्यंगात्मक अंदाज़ से तो कभी सीधे सीधे व्यक्त कर देते थे, तो इस गीत के साथ तो ये दोनों तरीके अपनाए गए हैं। मेरे कहने का मतलब है कि किशोर दा वाले वर्ज़न, जो कि ख़ुशनुमा सा सुनाई देता है, उसमें पहला तरीका अपनाया गया है, जब कि लता जी वाले सैड वर्ज़न में सीधे सीधे नायिका अपना दर्द बयान करती है। किशोर दा वाले गीत की एक उल्लेखनीय बात यह है कि गीत के बोल तो हैं बिछड़ने की, दग़ा देने की, बेवफ़ाई की, लेकिन संगीत बड़ा ही पेप्पी है, ख़ुशमिज़ाज है। इस तरह का विरोधाभास कई और गीतों में भी समय समय पर हुआ है, मस्लन, फ़िल्म 'सौतन' में आशा भोसले का गाया "जब अपने हो जाए बेवफ़ा तो दिल टूटे" कुछ कुछ इसी अंदाज़ का है। इससे पहले कि आप गीत सुनें, आपको बता दें कि इस फ़िल्म में लता जी के गाए साहिर साहब के कुछ बेहद सुरीले गानें थे जैसे कि "घायल हिरणिया मैं बन बन डोलूँ", "साजन बिन नींद ना आवे", "एक नज़र बस एक नज़र जानेतमन्ना देख इधर" और "आँख खुलते ही तुम छुप गए हो कहाँ"। लेकिन आज बारी है किशोर दा के आवाज़ की, तो सुनते हैं...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. साहिर साहब का लिखा एक यादगार गीत.
२. संगीत बर्मन दा का है.
३. इस चंचल से गीत में गायिका ने बड़े शरारती अंदाज़ में कई बार "उई" शब्द का इस्तेमाल किया है.

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी अभी आपको लगता है इंतज़ार करना पड़ेगा, क्योंकि शरद जी ने एक और सही जवाब देकर २ अंक कमा लिए हैं, आपका स्कोर हुआ २६. बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

हिन्दी के कवि-सम्मेलन में हिन्दी

तकनीकी दौर में कवि सम्मेलन का एक रूप यह भी

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
Khushboo
खुश्बू
रश्मि प्रभा पिछले 6 महीने से हिन्द-युग्म के विशेष कार्यक्रम पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का संचालन कर रही हैं। रश्मि अपनी मातृभाषा हिन्दी से बहुत स्नेह रखती हैं। शायद इसीलिए इन्होंने इच्छा जाहिर की कि अक्टूबर 2009 का कवि सम्मेलन 'हिन्दी' विषय पर आयोजित किया जाये ताकि इसी माध्यम से हिन्दी भाषा की स्थिति, इसे बोलने वालों की अपनी भाषा के प्रति सरोकार और प्रतिबद्धता का जायजा लिया जा सके।

दुनिया की लाखों बोलियों और हज़ारों भाषाओं पर विलुप्त होने का संकट मंडरा रहा है। बाज़ार के इस समय में बिकने और बेचने वाली वस्तुओं का मोल है। इसलिए हिन्दी जहाँ बाज़ार का हिस्सा है, वहाँ फल-फूल रही है। इस दुनिया में नैतिकता, कर्तव्य-बोध के नाम पर किसी भी चीज़ को जिंदा नहीं रखा जा सकता, इसलिए पुस्तकों में भाषा को माँ जैसा स्थान मिलने के बावजूद हिन्दी को वर्तमान पीढ़ी में नहीं रोंपा जा सका है। रोंपा भी कैसे जाये- अब तो शुभकामनाओं के बाज़ार में भी देवनागरी की दुकान नहीं है।

खैर, हम इसमें ख़ाहमख़ाह उलझ रहे हैं। आइए कवि-उद्‍गारों से सजी इस महफिल में कोने की एक सीट तलाशते हैं और वाह-वाह कर तथा ताली बजाकर कवि सम्मेलन को सफल बनाते हैं।



प्रतिभागी कवि- शन्नो अग्रवाल, संत शर्मा, शरद तैलंग, सुषमा श्रीवास्तव, शिखा वार्ष्नेय, विभूति खरे, किशोर कुमार खोरेन्द्र, आर.सी.शर्मा ’आरसी’ ।


संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इसे सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो कृपया नीचे के लिंकों से डाउनलोड करें-
WMAMP3




आप भी इस कवि सम्मेलन का हिस्सा बनें

1॰ अपनी साफ आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7. नवम्बर 2009 अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 22 नवम्बर 2009
8. नवम्बर 2009 अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 29 नवम्बर 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 16. Month: October 2009.
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Saturday, October 24, 2009

ठंडी हवाएं लहराके आये....साहिर, बर्मन दा और लता का संगम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 241

हिंदी फ़िल्म संगीत जगत में गीतकार-संगीतकार की जोडियाँ कोई नई बात नहीं है। चाहे आरज़ू लखनवी व आर. सी. बोराल की जोड़ी हो, या क़मर जलालाबादी व हुस्नलाल भगतराम की जोड़ी, शैलेन्द्र/हसरत - शंकर जयकिशन हो, या फिर शक़ील-नौशाद की जोड़ी, फ़िल्म संगीत के हर युग में, हर दौर में इस तरह की जोडियों की भरमार रही है। इन में से कुछ कलाकार ऐसे भी थे जिन्होने एक से ज़्यादा जोडियाँ बनाई। ऐसे ही एक गीतकार थे साहिर लुधियानवी और ऐसे ही एक संगीतकार थे सचिन देव बर्मन। साहिर साहब ने सचिन दा के साथ तो काम किया ही, संगीतकार रवि के साथ भी उनकी ट्युनिंग् बहुत अच्छी जमी। ठीक उसी तरह सचिन दा के साथ साहिर के अलावा गीतकार शैलेन्द्र, मजरूह, नीरज और कुछ हद तक आनंद बक्शी ने अच्छी पारी खेली। दोस्तों, कितनी अजीब बात है कि २५ अक्तुबर को साहिर साहब की पुण्य तिथि है और उसके ठीक ६ दिन बाद, ३१ अक्तुबर को है बर्मन दादा की पुण्य तिथि। इसलिए इन दो महान कलाकारों की जोड़ी को एक साथ स्मरण करने का यही उचित समय है, और उन्होनें एक साथ मिलकर जो सदाबहार नग़में हमें दिए हैं उन्हे एक बार फिर सुनने का यही एक लाजवाब मौका है। तो चलिए, आज से अगले दस दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनिए साहिर लुधियानवी के लिखे हुए गीत जिन्हे सुरों में पिरोया है सचिन देव बर्मन ने, यह है हमारी ख़ास पेशकश 'जिन पर नाज़ है हिंद को'। इस शृंखला के लिए पहला गीत जो हमने चुना है वह साहिर साहब की पहली प्रदर्शित फ़िल्म भी है। और पहली ही फ़िल्म में उन्हे मिली अपार सफलता। यह है १९५१ की फ़िल्म 'नौजवान' का सदाबहार गीत "ठंडी हवाएँ लहराके आयें, रुत है जवाँ तुमको यहाँ कैसे बुलायें"। लता जी की नई ताज़ी कमसीन आवाज़ में यह गीत बेहद सुरीला बन पड़ा है। जहाँ एक तरफ़ गीत मे इस धरती का सुरीलापन है, वहीं कुछ कुछ पाश्चात्य रंग भी है, आलाप भी है, हमिंग् भी है, व्हिस्लिंग् भी है। कुल मिलाकर उस ज़माने के लिहाज़ से एक नया प्रयोग रहा है यह गीत। और उससे भी ज़्यादा ख़ास बात यह कि इस गीत की धुन पर आगे चलकर दो और गीत बनें जिन्हे भी अपार सफलता हासिल हुई। इनमें से एक है रोशन के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'ममता' का गीत "रहें ना रहें हम", जिसके लिए रोशन साहब ने सचिन दा की अनुमती ली थी, और दूसरा गीत है छोटे नवाब पंचम का फ़िल्म 'सागर' का गीत "सागर किनारे दिल ये पुकारे"।

सचिन देव बर्मन का फ़िल्म जगत में पदार्पण सन् १९४१ में हुआ था बतौर गायक, और फ़िल्म थी 'ताज महल', जिसके सगीतकार थे माधवलाल (मधुलाल) दामोदर मास्टर। हालाँकि उन्होने सन् १९४० में ही बंगला फ़िल्म 'राजकुमार निर्शोने' में संगीत दे चुके थे, हिंदी फ़िल्मों में उन्होने पहली बार संगीत दिया सन् १९४४ में जब फ़िल्मिस्तान के शशधर मुखर्जी ने उन्हे न्योता दिया अपनी दो फ़िल्मों ('आठ दिन' और 'शिकारी') में संगीत देने का। इन दोनों फ़िल्मों में गीत लिखे क़मर जलालाबादी ने। उसके बाद १९४७ में फ़िल्म 'दो भाई' में संगीत देकर उन्हे पहली बड़ी सफलता हासिल हुई, इस फ़िल्म में उनके गीतकार रहे राजा मेहंदी अली ख़ान। १९४९ की फ़िल्म 'शबनम' में एक बार फिर क़मर साहब ने दादा के लिए गीत लिखे। फिर उसके बाद १९५० की फ़िल्म 'मशाल' में बर्मन दादा की धुनों के लिए कवि प्रदीप ने गीत लिखे। और फिर आया १९५१ का साल जिससे शुरुआत हुई सचिन देव बर्मन और साहिर लुधियानवी के जोड़ी की, जिस जोड़ी ने ५० के दशक में एक से एक हिट और बेहद सुरीले गीत दिए। निस्संदेह इन गीतों का उनके फ़िल्मों की कामयाबी में बड़ा हाथ रहा। साहिर साहब १९४९ में बम्बई आए थे और सहायक संवाद लेखक की हैसीयत से नौकरी कर रहे थे। १९५१ में महेश कौल ने अपनी फ़िल्म 'नौजवान' के लिए उन्हे गीतकार चुना और इस तरह से फ़िल्म जगत को मिला एक बेहतरीन गीतकार। नलिनी जयवंत और प्रेम नाथ अभिनीत यह फ़िल्म अगर आज लोग याद करते हैं तो बस आज के प्रस्तुत गीत की वजह से। वैसे तो प्रदर्शित होने वाले तारीख़ के लिहाज़ से 'नौजवान' ही साहिर साहब की पहली फ़िल्म है बतौर गीतकार, लेकिन कहा जाता है कि उन्होने सब से पहले अनिल विश्वास के साथ १९५० की फ़िल्म 'दोराहा' में काम किया था, लेकिन फ़िल्म बाद में रिलीज़ हुई। फ़िल्म 'दोराहा' में तलत महमूद के गाए कुछ हिट गीत रहे "मोहब्बत तर्क की मैने", "दिल में बसाके मीत बनाके भूल ना जाना प्रीत पुरानी" और "तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं कभी, बेदर्द मैने तुझको भुलाया नहीं अभी"। तो दोस्तों, आइए अब सुना जाए आज का गीत। साहिर साहब और बर्मन दादा से संबधित बातें आगे भी जारी रहेंगी इस शृंखला में। अब दीजिए इजाज़त, कल फिर होगी मुलाक़ात, फिलहाल आप ठंडी हवाओं का आनंद लीजिए, और याद कीजिए अपने उस पहले पहले प्यार को जिसके इंतज़ार में आप कुछ इसी तरह की ठंडी आहें भरा करते थे कभी।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. साहिर साहब का लिखा एक यादगार गीत.
२. संगीत बर्मन दा का है.
३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"दौलत".

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी बिलकुल सही, एक कदम और आप आगे बढ़ गए हैं. बधाई, "नौजवान" साहिर साहब की पहली प्रर्दशित फिल्म थी, हाँ शरद जी ने जिस फिल्म का नाम लिया वो भी पहली फिल्म हो सकती है, बाज़ी उसके बाद प्रर्दशित हुई थी ये तय है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सवा सेर गेहूं - प्रेमचंद

सवा सेर गेहूं - प्रेमचंद
सुनो कहानी: प्रेमचंद की "सवा सेर गेहूं"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद की हृदयस्पर्शी कहानी "ज्योति" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं मुंशी प्रेमचंद की कहानी "सवा सेर गेहूं", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 59 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

महात्मा जी ने भोजन किया। लम्बी तान कर सोये। प्रातःकाल आर्शीवाद देकर अपनी राह ली।
(प्रेमचंद की "सवा सेर गेहूं" से एक अंश)



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#Fourty Third Story, Sawa Ser Gehun: Premchand/Hindi Audio Book/2009/37. Voice: Anurag Sharma

Friday, October 23, 2009

ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ.....बॉम्बे माफ़ कीजियेगा मुंबई मेरी जान का नारा लगते गीता दत्त और रफी साहब

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 240

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आज बारी है गीता दत्त और मोहम्मद रफ़ी साहब के गाये एक युगल गीत की। जो श्रोता व पाठक हमसे हाल में जुड़े हैं, उनकी सहूलीयत के लिए हम यहाँ बता दें कि इससे पहले इस महफ़िल में दो रफ़ी-गीता डुएट्स् बज चुके हैं, पहला गीत था फ़िल्म 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' का "जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी", और दूसरा गीत था फ़िल्म 'मिलाप' का "बचना ज़रा ये ज़माना है बुरा"। और आज तीसरी बार हम किसी रफ़ी-गीता डुएट लेकर हाज़िर हुए हैं। युं तो रफ़ी साहब और गीता जी ने एक साथ कई रोमांटिक गीत गाए हैं, लेकिन उनमें एक हल्की फुल्की कॉमेडी का अंग भी हमेशा रहा है जिसकी चुलबुलाहट हमें गुदगुदा जाती है, फिर चाहे संगीतकार सचिन देव बर्मन हो या फिर हमारे नय्यर साहब। आज सुनिए ओ. पी. नय्यर के संगीत में मजरूह साहब की एक और सुप्रसिद्ध रचना फ़िल्म 'सी. आइ. डी' से। इस फ़िल्म से शम्शाद बेग़म का गाया "बूझ मेरा क्या नाव रे" आप सुन चुके हैं इस महफ़िल में और इस फ़िल्म के बारे में हम आपको बता भी चुके हैं। आज के इस प्रस्तुत गीत के बारे में यही कहेंगे कि यह गीत अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला के १९५६ के वार्षिक कार्यक्रम में सरताज गीत बना था, यानी कि उस साल का सब से लोकप्रिय गीत। जब अमीन सायानी ने गीतमाला कार्यक्रम के पहले २५ वर्षों के सरताज गीतों का ऒडियो कसैट जारी किया था, तब इस गीत को प्रस्तुत करते हुए उन्होने कहा था - "१९५६ के आते आते बिनाका गीतमाला ने तहल्का मचाना शुरु कर दिया, ऐसा कोई रेडियो प्रोग्राम नहीं था जिससे कि हिन्दुस्तानी फ़िल्म संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सके। उस लोकप्रियता ने कई संगीतकारों को संगीत प्रेमियों के दिलों में बसा दिया था, जैसे कि अनिल विश्वास, सी. रामचन्द्र, नौशाद, एस. डी. बर्मन, हेमन्त कुमार, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, और १९५६ में ज़ोरों में उभरने लगे सलिल चौधरी, वसंत देसाई और ओ. पी. नय्यर।"

दोस्तों, बम्बई अर्थात आज के मुंबई के प्रति आम लोगों की धारणा ऐसी है कि यह एक रंगीन नगरी है जहाँ पर सारे सपने सच होते हैं, एक सपनों की दुनिया है मुंबई। यह बात और है कि हक़ीक़त कुछ और ही है। ख़ैर, ५० के दशक के कई फ़िल्मों के ज़रिये उस समय के बम्बई का नज़ारा देखा जा सकता है। यहाँ तक कि बम्बई पर समय समय पर कुछ गानें भी बनें हैं जो बम्बई के असली चेहरे का खुलासा करते हैं। इस श्रेणी में जो पहला गीत रहा वह मेरे ख़याल से प्रस्तुत गीत ही होना चाहिए। ५० के दशक के मध्य भाग की बम्बई को जानने के लिए यह गीत मददगार साबित हो सकता है। इस गीत में जॉनी वाकर एक के बाद एक लोगों से टकराते रहते हैं और हर बार उनका बटुआ हथिया लेते हैं। जी हाँ, एक पाकिटमार का किरदार निभाया था उन्होने। गीता दत्त की आवाज़ लेकर कुमकुम का गीत के तीसरे अंतरे में आगमन होता है। जहाँ जॉनी वाकर बम्बई की बुराई करते हैं, वहीं कुमकुम बम्बई पर फ़िदा हैं। एक तरफ़ हताशा और नकारात्मक सोच, तो दूसरी तरफ़ आशा की किरण। कुल मिलाकर इस माया नगरी का एक चित्र जनता के सामने पेश करने का बीड़ा उठाया था गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने। कुछ बातें हमारे समाज की ऐसी है जिन पर समय का कोई प्रभाव नहीं चल पाया है। पचास साल पहले लिखे गए इस गीत में मजरूह साहब ने लिखा था कि "बेघर को आवारा यहाँ कहते हँस हँस", यह बात आज की दुनिया में भी १००% सही है। तो आइए दोस्तों, बम्बई की सैर पर चलें मोहम्मद रफ़ी और गीता दत्त के साथ, "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ, ज़रा हट के ज़रा बच के ये है बॊम्बे मेरी जान"। गीत का पंच लाइन है "ये है बॊम्बे मेरी जान", जो इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ कि आज भी लोग मुंबई के बारे में कुछ कहते हुए मज़ाकिया तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। इस शीर्षक से एक फ़िल्म भी बनी थी। 'मिस्टर आशिक़' शीर्षक से एक फ़िल्म बनी थी सैफ़ अली ख़ान और ट्विंकल खन्ना अभिनीत, जिसे रिलीज़ करते वक़्त निर्माता ने इसका नाम बदल कर रख दिया था 'ये है मुंबई मेरी जान'। और लीजिए, अब सुनिए 'सी. आइ. डी' से "ये है बॊम्बे मेरी जान" और याद कीजिये जॊनी वाकर और कुमकुम की उस कॊमिक जोड़ी को।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी एक विशेष शृंखला जो समर्पित है दो अमर फनकारों के नाम.
२. इनमें से एक गीतकार है और एक संगीतकार, दोनों की पुण्यतिथि इसी माह के आखिरी सप्ताह में आ रही है.
३. गीतकार की पहली फिल्म का है ये गीत जिसके मुखड़े में शब्द है - "जवाँ".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आपका जवाब हमने बाद में देखा, आपके दो अंक सुरक्षित हैं, गीतकार के विषय में कुछ संशय था, पर आप और पराग जी बिकुल सही हैं, "ओ बेकरार दिल" के गीतकार कैफी साहब ही हैं, इस भूल के लिए माफ़ी चाहेंगें. पर पराग जी आपने तो बस कमाल ही कर दिया, जेकपोट सवाल का सही जवाब देकर कमा लिए पूरे ४ अंक, अब आप मात्र ६ अंक दूर हैं मंजिल से, मजरूह साहब के सबसे अधिक 37 गीत हैं अब तक के सफ़र में, दूसरे स्थान पर है शैलेन्द्र (३०), साहिर साहब के १९ गीत है और शकील के १४. बधाई बहुत आपको. आज का गीत तो किसी तोहफे से कम नहीं होगा आपके लिए :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ...."फ़राज़" के शब्द और "रूना लैला" की आवाज़...

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५६

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की चौथी गज़ल लेकर। आज की गज़ल पिछली तीन गज़लों की हीं तरह खासी लोकप्रिय है। न सिर्फ़ इस गज़ल के चाहने वाले बहुतेरे हैं, बल्कि इस गज़ल के गज़लगो का नाम हर गज़ल-प्रेमी की जुबान पर काबिज़ रहता है। इस गज़ल को गाने वाली फ़नकारा भी किसी मायने में कम नहीं हैं। हमारे लिए अच्छी बात यह है कि हमने महफ़िल-ए-गज़ल में इन दोनों को पहले हीं पेश किया हुआ है...लेकिन अलग-अलग। आज यह पहला मौका है कि दोनों एक-साथ महफ़िल की शोभा बन रहे हैं। तो चलिए हम आज की महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं। उससे पहले एक आवश्यक सूचना: ५६ कड़ियों से महफ़िल सप्ताह में दो दिन सज रही है। शुरू की तीन कड़ियो में हमने दो-दो गज़लें पेश की थीं और उस दौरान महफ़िल का अंदाज़ कुछ अलग हीं था। फिर हमे उस अंदाज़, उस तरीके, उस ढाँचे में कुछ कमी महसूस हुई और हमने उसमें परिवर्त्तन करने का निर्णय लिया और वह निर्णय बेहद सफ़ल साबित हुआ। अब चूँकि उस निर्णय पर हमने ५० से भी ज्यादा कड़ियाँ तैयार कर ली हैं तो हमें लगता है कि बदलाव करने का फिर से समय आ गया है। तो अभी तक हम जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, उसके अनुसार अगले सप्ताह से महफ़िल सप्ताह में एक हीं दिन सजेगी और वह दिन रहेगा..बुधवार। महफ़िल में और भी क्या परिवर्त्तन आएँगे, इस पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। इसलिए आपको वह परिवर्त्तन देखने के लिए अगले बुधवार २८ अक्टूबर तक इंतज़ार करना होगा। अगर आप कुछ सुझाव देना चाहें तो आपका स्वागत है। कृप्या रविवार सुबह तक अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपने विचार हम तक प्रेषित कर दें। धन्यवाद!!

चलिए अब आज के फ़नकार की बात करते हैं। आज की महफ़िल को हमने अहमद फ़राज़ साहब के सुपूर्द करने का फ़ैसला किया है। फ़राज़ साहब के बारे में अपने पुस्तक "आज के प्रसिद्ध शायर- अहमद फ़राज़" में कन्हैया लाल नंदन साहब लिखते हैं: अहमद फ़राज़,जिनका असली नाम सैयद अहमद शाह है, का जन्म पाकिस्तान के सरहदी इलाके कोहत में १४ जनवरी १९३१ को हुआ। उनके वालिद (पिता) एक मामूली शिक्षक थे। वे अहमद फ़राज़ को प्यार तो बहुत करते थे लेकिन यह मुमकिन नहीं था कि उनकी हर जिद वे पूरी कर पाते। बचपन का वाक़या है कि एक बार अहमद फ़राज़ के पिता कुछ कपड़े लाए। कपड़े अहमद फ़राज़ को पसन्द नहीं आए। उन्होंने ख़ूब शोर मचाया कि ‘हम कम्बल के बने कपड़े नहीं पहनेंगे’। इस पर उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे पहला शेर भी कह दिया:

लाए हैं सबके लिए कपड़े सेल से,
लाए हैं हमारे लिए कपड़े जेल से।

बात यहाँ तक बढ़ी कि ‘फ़राज़’ घर छोड़कर फ़रार हो गए। वह फ़रारी तबियत में जज़्ब हो गई। आज तक अहमद फ़राज़ फ़रारी जी रहे हैं। कभी लन्दन, कभी न्यूयार्क, कभी रियाद तो कभी मुम्बई और हैदराबाद।
जानकारी के लिए बता दें कि "फ़राज़" साहब पिछले अगस्त २५ अगस्त को सुपूर्द-ए-खाक हो चुके हैं। इसी पुस्तक में नंदन साहब आगे लिखते हैं: अहमद फ़राज़ की शोहरत ने अब अपने गिर्द एक ऐसा प्रभामण्डल पैदा कर लिया है जिसमें उनकी साम्राज्यवाद और वाज़ीवाद से जूझने वाले एक क्रान्तिकारी रुमानी शायर की छवि चस्पाँ है। फ़राज़ का अपना निजी जीवन भी इस प्रभामण्डल के बनाने में एक कारण रहा है, उन्होंने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से बाहर गुज़ारा है और वे एक जिलावतन (देशनिकाला) शायर के रूप में पहचाने और सराहे गए हैं। इसके अक्स उनकी शायरी में जगह-जगह हैं। उसमें देश से दूर रहने, देश के लिए तड़पने का एहसास, हिजरत की पीड़ा और हिजरत करने वालों का दर्द जगह-जगह मिलता है। बखूबी हम इसे फ़राज़ की शायरी के विभिन्न रंगों का एक ख़ास रंग कह सकते हैं। हिजरत यानी देश से दूर रहने की पीड़ा और अपने देश की यादें अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साथ उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें :

वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है।

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है।

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है।


अपनी पुस्तक "खानाबदोश" की भूमिका में वे लिखते है: मुझे इसका ऐतराफ़ करते हुए एक निशात-अंगेज़ फ़ख़्र महसूस होता है कि जिस शायरी को मैंने सिर्फ़ अपने जज़्बात के इज़हार का वसीला बनाया था इसमें मेरे पढ़ने वालों को अपनी कहानी नज़र आई और अब ये आलम है कि जहाँ-जहाँ भी इन्सानी बस्तियाँ हैं और वहाँ शायरी पढ़ी जाती है मेरी किताबों की माँग है और गा़लिबन इसलिए दुनिया की बहुत सी छोटी-बड़ी जु़बानों में मेरी शायरी के तर्जुमे छप चुके हैं या छप रहे हैं। इस मामले में मैं अपने आपको दुनिया के उन चन्द ख़ुशक़िस्मत लिखने वालों में शुमार पाता हूँ जिन्हें लोगों ने उनकी ज़िन्दगी में ही बे-इन्तिहा मोहब्बत और पज़ीराई बख़्शी है। हिन्दुस्तान में अक्सर मुशायरों में शिरकत से मुझे ज़ाती तौर पर अपने सुनने और पढ़ने वालों से तआरुफ़ का ऐज़ाज़ मिला और वहाँ के अवाम के साथ-साथ निहायत मोहतरम अहले-क़लम ने भी अपनी तहरीरों में मेरी शेअरी तख़लीक़ात को खुले दिल से सराहा। इन बड़ी हस्तियों में फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, डॉक्टर क़मर रईस, खुशवंत सिंह, प्रो. मोहम्मद हसन और डॉ. गोपीचन्द नारंग ख़ासतौर पर क़ाबिले-जिक्र हैं। इसके अलावा मेरी ग़ज़लों को आम लोगों तक पहुँचाने में हिन्दुस्तानी गुलूकारों ने भी ऐतराफ़े-मोहब्बत किया, जिनमें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, जगजीत सिंह, पंकज उधास और कई दूसरे नुमायाँ गुलूकार शामिल हैं। फ़राज़ साहब यूँ हीं हम सब की आँखों के तारे नहीं थे। कुछ तो बात थी या कहिए है कि उनका लिखा एक-एक हर्फ़ हमें बेशकिमती मालूम पड़ता है। उदाहरण के लिए इसी शेर को देख लीजिए:

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो ...


क्या बात है!!! पढकर ऐसा लगता है कि मानो कोई हमारी हीं कहानी सुना रहा हो। आप क्या कहते हैं?

अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। हमें पूरा यकीन है कि यह आपको बेहद पसंद आएगी। तो लुत्फ़ उठाने के लिए तैयार हो जाईये:

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही, फिर भी कभी तो
रस्मों-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

आज जो दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन ये थी कि ___ हिलनी चाहिए


आपके विकल्प हैं -
a) नींव, b) बुनियाद, c) सरकार, d) आधार

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "हिचकी" और शेर कुछ यूं था -

आखिरी हिचकी तेरे ज़ानों पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ....

क़तील शिफ़ाई साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "सीमा" जी ने। "हिचकी" शब्द पर आपने कुछ शेर भी पेश किए:

साथ हर हिचकी के लब पर उनका नाम आया तो क्या?
जो समझ ही में न आये वो पयाम आया तो क्या? (आरज़ू लखनवी)

तेरी हर बात चलकर यूँ भी मेरे जी से आती है,
कि जैसे याद की खुशबू किसी हिचकी से आती है। (डा. कुँअर 'बेचैन')

सीमा जी के बाद महफ़िल की शान बने "शामिख" जी। यह रही आपकी पेशकश:

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो,
यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो। (सुभद्राकुमारी चौहान)

इनके बाद महफ़िल में हाज़िर हुए अपने स्वरचित शेरों के साथ शरद जी और मंजु जी। ये रही आप दोनों की रचनाएँ। पहले शरद जी:

मैं इसलिए तुझे अब याद करूंगा न सनम
जो हिचकियाँ तुझे चलने लगीं तो बन्द न होंगीं।

इधर हिचकी चली मुझको ,उधर तू मुझको याद आई
मगर ये तय है कि तुझको भी अब हिचकी चली होगी।

और अब मंजु जी:

हिचकी थमने का नाम ही नहीं ले रही थी ,
सजा ए मौत लगने लगी ,
रोकने के लिए कई टोटके भी किये ,
जैसे ही उसका नाम लबों ने लिया
झट से गायब हो गयी .

दिशा जी, आप महफ़िल में आईं, बहुत अच्छा लगा....लेकिन शेर की कमी खल गई। अगली बार ध्यान दीजिएगा।
चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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