Friday, July 31, 2009

जाने क्या ढूंढती रही है ये ऑंखें मुझमें...ढूंढते हैं हम संगीत प्रेमी आज भी उस आवाज़ को जो कहीं आस पास ही है हमेशा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 157

'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी', आवाज़ पर इन दिनों आप सुन रहे हैं गायक मोहम्मद रफ़ी को समर्पित यह लघु शृंखला, जिसमें दस अलग अलग अभिनेताओं पर फ़िल्माये रफ़ी साहब के गाये गीत सुनवाये जा रहे हैं। आज बारी है अभिनेता धर्मेन्द्र की। धर्मेन्द्र और रफ़ी साहब का एक साथ नाम लेते ही झट से जो गानें ज़हन में आ जाते हैं वो हैं "यही है तमन्ना तेरे घर के सामने", "मैं निगाहें तेरे चेहरे से हटाऊँ कैसे", "क्या कहिये ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे", "आप के हसीन रुख़ पे आज नया नूर है", "मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे", "एक हसीन शाम को दिल मेरा खो गया", "छलकायें जाम आइये आपकी आँखों के नाम", "गर तुम भुला न दोगे", "हो आज मौसम बड़ा बेइमान है", "मैं जट यमला पगला दीवाना", और भी न जाने कितने ऐसे हिट गीत हैं जिन्हे रफ़ी साहब ने गाये हैं परदे पर अभिनय करते हुए धर्मेन्द्र के लिये। लेकिन आज हम ने इस जोड़ी के नाम जिस गीत को समर्पित किया है वह उस फ़िल्म का है जो धर्मेन्द्र की पहली फ़िल्म थी। जी हाँ, 'शोला और शबनम' फ़िल्म में रफ़ी साहब ने धर्मेन्द्र के लिये एक बड़ा ही प्यारा गीत गाया था, जिसे बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया और न ही आज कहीं सुनाई देता है। इसलिए हम ने यह सोचा कि धर्मेन्द्र और रफ़ी साहब के धूम मचाने वाले लोकप्रिय गीतों को एक तरफ़ रखते हुए क्यों न इस कम सुने से गीत की महक को थोड़ा सा बिखेरा जाये! "जाने क्या ढ़ूंढती रहती हैं ये आँखें मुझ में, राख के ढ़ेर में शोला है न चिंगारी है"। संगीतकार ख़य्याम का ठहराव से भरा मधुर संगीत, गीतकार कैफ़ी आज़मी का शायराना अंदाज़, तथा रफ़ी साहब की पुर-असर आवाज़ व अदायगी, इन सब ने मिलकर बनाया इस गीत को गुज़रे ज़माने का एक अनमोल नग़मा।

इससे पहले हमने रफ़ी साहब और लता जी की युगल आवाज़ों में 'शोला और शबनम' फ़िल्म का एक सदाबहार गीत सुनवा चुके हैं "जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम", और उसके साथ फ़िल्म से जुड़ी तमाम बातें भी बतायी गयी थी। इसलिए आज उन बातों का दोहराव हम नहीं कर रहे हैं। बजाय इसके हम सीधे आ जाते हैं धर्मेन्द्र साहब के बातों पर जो उन्होने सन् २००० में प्रकाशित 'फ़िल्म-फ़ेयर' पत्रिका के लिए कहे थे। जब उनसे यह पूछा गया कि "हेमन्त कुमार, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, इन सब ने आप के लिए गाया है, लेकिन आप के हिसाब से किस गायक की आवाज़ आप को सब से ज़्यादा सूट करती थी?", धर्मेन्द्र जी का जवाब था, "मेरे करीयर में मोहम्मद रफ़ी साहब का योगदान बहुत बड़ा योगदान था। "जाने क्या ढ़ूंढती रहती हैं ये आँखें मुझ में" से लेकर "मैं जट यमला पगला दीवाना" तक मेरे लिये उनके गाये सभी गीत सदाबहार हैं। दूसरे गायकों ने भी मेरे करीयर में बहुत बड़ा योगदान दिया है जिन्हे भी मैं कभी नहीं भुला सकता। लेकिन रफ़ी साहब मेरी निजी पसंद है।" तो दोस्तों, चलिए आप और हम मिलकर धर्मेन्द्र साहब के पहली पहली फ़िल्म के इस पहले पहले गीत का आनंद उठाते हैं, जो आधारित है राग पहाड़ी पर। गीत में साज़ों का कम से कम प्रयोग हुआ है, शुरूआती संगीत में सारंगी के एक सुंदर पीस का इस्तेमाल हुआ है, तो 'इंटर्ल्युड' में बांसुरी की मधुर तानें दिल को छू लेती है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक और दर्द भरा गीत जिसे रफी साहब के अपने स्वरों से रोशन किया.
2. कलाकार हैं -"मनोज कुमार".
3. मुखड़े में शब्द है -"कश्ती".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -

अदा जी ४८ अंक, बस एक सही जवाब और आप......:), दिशा जी आपने भूल सुधार की धन्येवाद, जी आपके ४ अंक हो गए हैं. मंजू जी आपकी भूल सुमित जी ने सुधार ही दी है. एरोशिक जी हिंदी में लिखने के बाबत तो आलेख में ही लिखा है, ज़रा ध्यान से पढिये. दिलीप जी एक एक लफ्ज़ सोलह आने सच है आपका. आज भी रफी साहब अपनी आवाज़ के साथ हमारे बीच वैसे ही मौजूद हैं. शमिख जी, मनु जी, शरद जी...आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला....... महफ़िल में इक़बाल बानो और क़तील एक साथ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३४

१८वें एपिसोड में हमने आपको "तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे" सुनवाया था जिसे अपनी पुरकशिश आवाज़ से रंगीन किया था मोहतरमा "इक़बाल बानो" ने। उस एपिसोड के ९ एपिसोड बाद यानी कि २७ वें एपिसोड में हम लेकर आए थे "मोहे आई न जग से लाज, मैं इतनी जोर से नाची आज कि घुंघरू टूट गए"। यूँ तो उस नज़्म में आवाज़ थी "रूना लैला" की लेकिन जिसकी कलम ने उस कलाम को शिखर तक पहुँचाया उस शख्स का नाम था "क़तील शिफ़ाई"। तो हाँ आज हम इ़क़बाल बानो और क़तील शिफ़ाई की मिलीजुली मेहनत को सलाम करने के लिए जमा हुए हैं। हम आज जो गज़ल लेकर हाज़िर हुए हैं उसकी फ़रमाईश श्री शरद तैलंग जी ने की थी। जानकारी के लिए बता दें कि अगली कड़ी में हम दिशा जी की फ़रमाईश की हीं गज़ल प्रस्तुत करेंगे। अब चूँकि उनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त हमें देर से हासिल हुई, इसलिए वक्त लगना लाजिमी है। आज की गज़ल इसलिए भी खास है क्योंकि टिप्पणियों के माध्यम से कई बार शरद जी इसकी खूबसूरती का ज़िक्र कर चुके हैं। इतना होने के बावजूद हम इस गज़ल को टालने की सोच रहे थे क्योंकि इक़बाल बानो और क़तील शिफ़ाई के बारे में हम पहले हीं लिख चुके हैं और इक़बाल बानो पर तो एक पूरा का पूरा आलेख आवाज़ पर लिखा जा चुका है, फिर इनके बारे में कुछ नया कहना तो मुश्किल हीं होगा। लेकिन गज़ल की शोखी के सामने हमारी एक न चली और हमें इस गज़ल को सुनवाने पर बाध्य होना पड़ा। फिर हमने सोचा कि क्यों न क़तील शिफ़ाई के बारे में नए सिरे से खोज की जाए। और ढूँढते-ढूँढते हम पहुँच गए प्रकाश पंडित की पुस्तक "क़तील शिफ़ाई और उनकी शायरी" तक। जनाब प्रकाश पंडित से तो आप अब तक परिचित हो हीं गए होंगे। "फ़ैज़" साहब पर प्रस्तुत की गई कड़ी इन्हीं के पुस्तक के कारण मुमकिन हो पाई थी। आज की कड़ी का भी कुछ ऐसा हीं हाल है। वैसे "प्रकाश" साहब इतना बढिया लिखते हैं कि हमें उनका लिखा आप सबके सामने लाने पर बड़ा हीं फ़ख्र महसूस होता है। उम्मीद करते हैं कि हमारा और प्रकाश पंडित का साथ आगे भी इसी तरह बना रहेगा। चलिए अब प्रकाश पंडित की पुस्तक से क़तील शिफ़ाई का परिचय प्राप्त करते हैं।

किसी शायर के शेर लिखने के ढंग आपने बहुत सुने होंगे। उदाहरणतः 'इक़बाल’(मोहम्मद अल्लामा इ़क़बाल) के बारे में सुना होगा कि वे फ़र्शी हुक़्क़ा भरकर पलंग पर लेट जाते थे और अपने मुंशी को शेर डिक्टेट कराना शुरू कर देते थे। ‘जोश’ मलीहाबादी सुबह-सबेरे लम्बी सैर को निकल जाते हैं और यों प्राकृतिक दृश्यों से लिखने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। लिखते समय बेतहाशा सिगरेट फूँकने, चाय की केतली गर्म रखने और लिखने के साथ-साथ चाय की चुस्कियाँ लेने के बाद ,यहाँ तक कि कुछ शायरों के सम्बन्ध में यह भी सुना होगा कि उनके दिमाग़ की गिरहें शराब के कई पैग पीने के बाद खुलनी शुरू होती हैं। लेकिन यह अन्दाज़ शायद ही आपने सुना हो कि शायर शेर लिखने का मूड लाने के लिए सुबह चार बजे उठकर बदन पर तेल की मालिश करता हो और फिर ताबड़तोड़ दंड पेलने के बाद लिखने की मेज पर बैठता हो। यदि आपने नहीं सुना तो सूचनार्थ निवेदन है कि ये शायर ‘क़तील शिफ़ाई’ हैं। इनके शेर लिखने के इस अन्दाज़ को और लिखे शेरों को देखकर आश्चर्य होता है कि इस तरह लंगर–लँगोट कसकर लिखे गये शेरों में कैसे झरनों का-सा संगीत फूलों की-सी महक और उर्दू की परम्परागत शायरी के महबूब की कमर-जैसी लचक मिलती है। अर्थात् ऐसे वक़्त में जबकि इनके कमरे से ख़म ठोकने और पैंतरें बदलने की आवाज़ आनी चाहिए, वहां के वातावरण में एक अलग तरह की गुनगुनाहट बसी होती है। और इसके साथ यदि आपको यह भी मालूम हो जाए कि ‘क़तील शिफ़ाई’ जाति के पठान हैं और एक समय तक गेंद-बल्ले, रैकट, लुंगियाँ और कुल्ले बेचते रहे हैं, चुँगीख़ाने में मुहर्रिरी और बस-कम्पनियों में बुकिंग-क्लर्की करते रहे हैं तो इनके शेरों के लोच-लचक को देखकर आप अवश्य कुछ देर के लिए सोचने पर विवश हो जाएँगे। इन सारी रोचक बातों के बाद ’क़तील शिफ़ाई’ की जि़स बात का ज़िक्र आता है, वह है उनकी असफ़ल प्रेम कहानी। किस तरह एक परंपरागत गज़लें लिखने वाला इंसान यथार्थ के धरातल पर कदम रखने को मजबूर हो गया, इसका बड़ा हीं बढिया तरीके से इस पुस्तक में वर्णन किया हुआ है।

पहली नज़र में वह इंसान जो भी नज़र आता हो, दो-चार नज़रों या मुलाक़ातों के बाद बड़ी सुन्दर वास्तविकता खुलती है-कि वह डकार लेने के बारे में नहीं, अपनी किसी प्रेमिका के बारे में सोच रहा होता है-उस प्रेमिका के बारे में जो उसे विरह की आग में जलता छोड़ गई, या उस प्रेमिका के बारे में जिसे इन दिनों वह पूजा की सीमा तक प्रेम करता है। प्रेम और पूजा की सीमा तक प्रेम उसने अपनी हर प्रेमिका से किया है और उसकी हर प्रेमिका ने वरदान-स्वरूप उसकी शायरी में निखार और माधुर्य पैदा किया है, जैसे ‘चन्द्रकान्ता’ नाम की एक फिल्म ऐक्ट्रेस ने किया है जिससे उसका प्रेम केवल डेढ़ वर्ष तक चल सका और जिसका अन्त बिलकुल नाटकीय और शायर के लिए अत्यन्त दुखदायी सिद्ध हुआ। चन्द्रकान्ता से प्रेम और विछोह से पहले ‘क़तील शिफ़ाई’ आर्तनाद क़िस्म की परम्परागत शायरी किया करते थे और ‘शिफ़ा’ कानपुरी नाम के एक शायर से अपने कलाम पर इस्लाह लेते थे (इसी सम्बन्ध से वे अपने को ‘शिफ़ाई’ लिखते हैं)। फिर उन्होंने अहमद नदीम क़ासमी से मैत्रीपूर्ण परामर्श लिये। लेकिन किसी की इस्लाह या परामर्श तब तक किसी शायर के लिए हितकर सिद्ध नहीं हो सकते जब तक कि स्वयं शायर के जीवन में कोई प्रेरक वस्तु न हो। चन्द्रकान्ता उन्हें छोड़ गई लेकिन उर्दू शायरी को एक सुन्दर विषय और उस विषय के साथ पूरा-पूरा न्याय करने वाला शायर ‘क़तील’ शिफ़ाई दे गई। अपने व्यक्तिगत गम और गुस्से के बावजूद तब ‘क़तील’ ने चन्द्रकान्ता को अपना काव्य-विषय बनाया-एक ऐसी नारी को जो अपना पवित्र नारीत्व खो चुकी थी और खो रही थी। चन्द्रकान्ता के प्रेम और विछोह के बाद उन पर यह नया भेद खुला कि काव्य की परम्पराओं से पूरी जानकारी रखने, शैली में वृद्धि करने तथा नए विचार और नए शब्द देने के साथ-साथ केवल वही शायरी अधिक अपील कर सकती हैं जिसमें शायर का व्यक्तित्व या ‘मनोवृत्तान्त’ विद्यमान हों। मुहब्बत की नाकामी ने ‘क़तील’ को सोचने की प्रेरणा दी। समय, अनुभव और साहित्य की प्रगतिशील धारा से सम्बन्धित होने के बाद जिस परिणाम पर वे पहुँचे, उनकी आज की शायरी उसी की प्रतीक है। इस तरह प्रकाश पंडित को पढने के बाद हमें क़तील के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है। अपनी पुस्तक में इन्होंने क़तील साहब के बारे में और भी बहुत कुछ लिखा है, लेकिन वो सब आगे कभी। वैसे एक बात जो ’क़तील’ साहब की सबको बहुत भाती है, वह है उनका मज़ाकिया लहज़ा। ’मोहे आई न जग से लाज’ के बारे में वे कहते हैं: जब तक भारत और पाकिस्तान का कोई भी गायक इस गीत को गा नहीं लेता वो गवैया नहीं कहलाता। आप माने या ना माने लेकिन इस बात में सच्चाई तो है...लगभग सभी गायकों ने इस नज़्म पर अपनी आवाज़ साफ की है। क़तील साहब की यही तो खासियत है, कुछ ऐसा लिख जाते हैं जो चाहने से भी नहीं छूटता। इसी बात पर क्यों ना उन्हीं का लिखा एक शेर देख लिया जाए जो आजकल के इश्क़ पर फिट बैठता है:

हौसला किसमें है युसुफ़ की ख़रीदारी का
अब तो महंगाई के चर्चे है ज़ुलैख़ाओं में।


क़तील शिफ़ाई एक ऐसे शख्स हैं जिनपर जितना लिखा जाए उतना कम है। इन्हें नज़र-अंदाज़ करना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है और इसीलिए हम यह फ़ैसला करते हैं कि कुछ हीं दिनों में इनकी अगली गज़ल/नज़्म लेकर जरूर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए इक़बाल बानो की दर्दभरी आवाज़ में इस गज़ल का लुत्फ़ उठाया जाए:

उल्फ़त की नयी मंज़िल को चला तू बाहें डाल के बाहों में
दिल तोड़ने वाले देख के चल, हम भी तो पड़े हैं राहों में

क्या-क्या न जफ़ाएं दिल पे सहीं, पर तुमसे कोई शिक़वा न किया
इस जुर्म को भी शामिल कर लो मेरे मासूम ग़ुनाहों में

जब चांदनी रातों में तूने, ख़ुद हम से किया इक़रार-ए-वफ़ा
फिर आज हैं क्यों हम बेगाने, तेरी बे-रहम निग़ाहों में

हम भी हैं वही तुम भी हो वही ये अपनी-अपनी क़िस्मत है
तुम खेल रहे हो खुशियों से, हम डूब गये हैं आहों में




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

__ को दर्द मिला, दर्द को ऑंखें न मिली,
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं...


आपके विकल्प हैं -
a) रूह, b) दिल, c) होश, d) इश्क

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "बला" और शेर कुछ यूं था -

ये दुनिया भर के झगड़े घर के किस्‍से काम की बातें
बला हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ।

इस शेर का सबसे पहले संधान शरद जी ने किया। और अगले हीं क्षण बला पर एक शेर दाग दिया-

बला कैसी भी हो अपने को उसके पास रखता हूँ
तभी तो लोग कहते हैं हुनर कुछ ख़ास रखता हूँ ।

दिशा जी कहाँ कम थीं। उन्होने एक नहीं बल्कि दो-दो स्वरचित शेर डाले। दो में से एक यह था-

बला छू न सके उनको,जिनका हाफिज हो खुदा
इस सच का एहसास लेकर मैं तेरे दर से उठा

निर्मला जी आपको हमारी महफ़िल और हमारे लिखने का अंदाज़ अच्छा लग रहा है, इसके लिए हम आपका तहे-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन यह क्या आपकी तरफ़ से कोई भी शेर नहीं। अगर अपना कोई ध्यान नहीं आ रहा तो किसी दूसरे शायर का हीं डाल दें। चलिए अगली बार आप से उम्मीद रहेगी।

मंजु जी हमेशा से हीं हमारी श्रोता/पाठिका रही हैं। आगे भी इसी तरह हम पर अपना स्नेह डालती रहेंगी, यही दुआ है।

मनु जी, आखिरकार आपने हमारा पोस्ट पढ हीं लिया :) आपको गज़ल पसंद आई तो इसी फ़नकार की दूसरी गज़ल (बदकिस्मती से उनकी दो हीं गज़लें उपलब्ध हैं) लेकर हम ज़ल्द हीं महफ़िल-ए-गज़ल पर हाज़िर होंगे, इस बात का आपको हम यकीन दिलाते हैं।

शामिख जी, धीरे-धीरे आप हमारे लिए गज़लों का एक स्रोत होते जा रहे हैं। आप अपनी टिप्पणियों के माध्यम से हमें कई सारी गज़लों की जानकारी देते हैं, जो हमारे लिए लाभप्रद साबित होता है। आपने ना सिर्फ़ "जावेद अख्तर" साहब के इस शेर को पकड़ा बल्कि उनकी एक और गज़ल हमें मुहैया करा दी। साथ-साथ मनु जी के बड़े चाचा (मिर्ज़ा ग़ालिब) के इस शेर से महफ़िल को रंगीन भी कर दिया:

क़हर हो या बला हो, जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिये होते

कुलदीप जी आपकी बात सोलह आने सच है कि अगर मास्टर मदन कुछ दिन/साल और जीते तो भारतीय संगीत का रंग हीं अलहदा होता। आप इस शेर के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए:

बला की खूबसूरती जब सफ़ेद ताज पे नौश फरमाती है .
क्या कहें तब तो जन्नत से मुमताज़ की चांदनी भी उतर आती है .

निकलते-निकलते कुलदीप जी भी ग़ालिब के रंग में रंग गए। ये रही बानगी:

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब्-ऐ-गम बुरी बला है
मूझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

मनु जी, यह क्या आपके रहते एक और शब्दकोष :) ...वैसे हमारे लिए अच्छा है, ज्यादा से ज्यादा लोग गज़लों का मज़ा लें तो हमें और क्या चाहिए....

इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए दीजिये इजाज़त, खुदा हाफिज़ !!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, July 30, 2009

लिखे जो ख़त तुझे वो तेरी याद में...शशि कपूर का रोमांस और रफी साहब का अंदाज़-ए-बयां

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 156

भी दो दिन पहले हम ने आप को प्रेम-पत्र पर लिखा एक मशहूर गीत सुनवाया था फ़िल्म 'संगम' का। रफ़ी साहब का गाया एक और ख़त वाला मशहूर गीत है फ़िल्म 'कन्यादान' का "लिखे जो ख़त तुझे वह तेरी याद में हज़ारों रंग के नज़ारे बन गये"। यह गीत भी उतना ही लोकप्रिय हुआ जितना कि फ़िल्म 'संगम' का गीत। इन दोनों गीतों में कम से कम दो बातें सामान थी, एक तो रफ़ी साहब की आवाज़, और दूसरा शंकर जयकिशन का संगीत। "ये मेरा प्रेम-पत्र" फ़िल्माया गया था राजेन्द्र कुमार पर और फ़िल्म 'कन्यादान' का यह गीत है शशी कपूर के अभिनय से सजा हुआ। जी हाँ, 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' के अंतर्गत आज हम जिस चेहरे पर फ़िल्माये गीत से आप का रु-ब-रु करवा रहे हैं, वो शशी कपूर ही हैं। फ़िल्म 'कन्यादान' बनी थी सन् १९६८ में जिसमें शशी कपूर के साथ नायिका की भूमिका में थीं आशा पारेख। मोहन सहगल की यह फ़िल्म एक पारिवारिक सामाजिक फ़िल्म थी जिसका आधार था शादी, झूठ, तथा पुराने और नये ख़यालातों में द्वंद। फ़िल्म तो कामयाब थी ही, उसका गीत संगीत भी ज़बरदस्त कामयाब रहा। इस फ़िल्म के गीतों को हसरत जयपुरी और कवि नीरज ने लिखे हैं। आज का प्रस्तुत गीत नीरज का लिखा हुआ है। नीरज की फ़िल्मी रचनायें संख्या में बहुत ही सीमित हैं, लेकिन उनके लिखे हर एक गीत का असर इतना व्यापक हुआ करता था कि गीत सीधे दिल में बस जाता था। तभी तो आज ४० सालों के बाद भी इस गीत को सुनते हुए उसी ताज़गी का अहसास होता है।

मोहम्मद रफ़ी साहब ने इस गीत को रुमानीयत के सजीले रंग से कुछ इस क़दर भर दिया है कि हर एक प्यार करनेवाले की ज़ुबाँ पर चढ़ गया था यह गीत उस ज़माने में। रफ़ी साहब की आवाज़ कुदरत की देन है, पर जो बात उन्हे दूसरे गायकों से अलग करती है वह है उनकी गायकी जो बेहद निराली थी और यही अदायगी दूसरे गायकों को उनसे मीलों पीछे छोड़ देती थी। उनकी गायकी का अंदाज़ ऐसा था कि सरगम के सौ धारे निकल पड़े, मंद मंद पुरवाई चलने लग जायें, बाग़ों में सैंकड़ों गुंचे खिल उठे, समां शराबी शराबी हो जाये! बाबुल गाया तो आँखें गीली कर दी, भजन गाया तो मन को श्रद्धा और भक्ति भाव से भर दिया, और ग़ज़ल गाया तो रुमानी लम्हात से भर दिया दिल को। उनकी अदायगी हर गीत में अपना ख़ास हस्ताक्षर छोड़ देती थी। उनके गाये किसी भी गीत को सुन कर फ़िल्म के नायक का चेहरा ख़ुद ब ख़ुद ज़हन में आ जाता है। फिर चाहे वो शम्मी कपूर हो या दिलीप कुमार, धर्मेन्द्र हो या फिर शशी कपूर। यहाँ तक कि ऐसा भी कहा गया है कि हास्य अभिनेता जौनी वाकर का अगर कोई नकल कर सकता है तो वो हैं केवल रफ़ी साहब, और वह भी गीतों के ज़रिये। सच, रफ़ी साहब सही मायने में एक पार्श्व-गायक रहे हैं। असरदार और सफल पार्श्व-गायक वही है जिसके गाये गीत को सुनकर आप परदे पर अभिनय करते हुए नायक की कल्पना कर सकें। रफ़ी साहब के गाये गीतों को सुनते हुए फ़िल्म का नायक आँखों के सामने आ ही जाता है। जैसे कि फ़िल्म 'कन्यादान' के इस गीत को सुनते हुए शशी कपूर के वो 'मैनरिज़्म्स' यकायक आँखों के सामने तैरने लग जाते हैं। तो लीजिए, फिर देर किस बात की, शशी कपूर के सजीले अंदाज़ को कीजिए याद रफ़ी साहब की आवाज़ के साथ। गीत के बोल इतने अच्छे हैं कि इनके बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, बस सुनते जाइये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक बेहद दर्द भरा नगमा रफी साहब का गाया.
2. कलाकार हैं -"धर्मेन्द्र".
3. मुखड़े में शब्द है -"चिंगारी".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -

दिशा जी बहुत बहुत मुबारक आखिर आप का भी खाता खुल ही गया २ अंकों के साथ. एरोशिक (?) जी आपके जवाब सही होते हैं पर थोडा और जल्दी अगर आयेंगें तो टक्कर दे पायेंगें दिग्गजों को. मनु जी, सुमित जी, शरद जी, मंजू जी, शमिख जी, और अन्य सभी श्रोताओं का आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, July 29, 2009

छू लेने दो नाज़ुक होंठों को...राज कुमार का संजीदा अंदाज़ और रफी साहब की गलाकारी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 155

मोहम्मद रफ़ी पर केन्द्रित विशेष शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़' के लिए आज हम ने जिस चेहरे को चुना है, वो ज़्यादातर जाने जाते हैं अपने संवाद अदायगी के ख़ास अंदाज़ की वजह से। जी हाँ, ज़िक्र है राजकुमार साहब का। राजकुमार जैसे अभिनेताओं पर गानें नहीं फ़िल्माये जाते, उनकी संवाद अदायगी और अभिनय ही उनके निभाये किरदारों के केन्द्रबिंदु में रहे। लेकिन फिर भी कुछ फ़िल्मों में उन्होने परदे पर कुछ गानें भी गाये, और जिनमें से अधिकतर रफ़ी साहब की ही आवाज़ में थे। 'नीलकमल', 'हीर रांझा', और 'काजल' कुछ ऐसी ही फ़िल्में हैं। आज इनमें से सुनिये फ़िल्म 'काजल' का वह सदाबहार नग़मा जिसमें है अजीब सा एक नशा है जिसे सुनकर यकायक मन बहकने लगे, क़दम डगमागाने लगे। "छू लेने दो नाज़ुक होठों को, कुछ और नहीं है जाम है ये, कुदरत ने जो हमको बख़्शा है, वो सब से हसीं इनाम है ये"। सन्‍ १९६५ में बनी फ़िल्म 'काजल' का निर्माण व निर्देशन किया था राम महेश्वरी ने और राजकुमार के अलावा फ़िल्म के प्रमुख कलाकार थे मीना कुमारी और धर्मेन्द्र। कहानी गुल्शन नंदा की थी और पटकथा फणी मजुमदार का। गीतकार साहिर और संगीतकार रवि के गीत संगीत का भी बड़ा हाथ रहा फ़िल्म की कामयाबी में। प्रस्तुत गीत के अलावा रफ़ी साहब का गाया एक और गीत जो बड़ा ही मशहूर हुआ था वह है "ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाये तो अच्छा"। आशा भोंसले की आवाज़ में "मेरे भ‍इया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन" और "तोरा मन दर्पण कहलाये" भी ख़ूब चले थे।

विविध भारती पर एक बार शायर व गीतकार साहिर लुधियानवी पर एक विश्लेषण सभा का आयोजन किया गया था जिसमे शरीक़ हुये थे संगीतकार रवि, शायर अहमद वसी, और विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक रज़िया रागिनी व कमल शर्मा। उसमें फ़िल्म 'काजल' के प्रस्तुत गीत के बारे में रवि साहब ने कहा था - "फ़िल्म 'काजल' के 'प्रोड्युसर डिरेक्टर' ने साहिर साहब को कहा कि फ़िल्म में राजकुमार मीना कुमारी को शराब पीने के लिए ज़िद कर रहे हैं, इस 'सिचुयशन' पर दो शेर लिख दें। तो अगले दिन साहिर साहब दो शेर लिख कर ले आये, "छू लेने दो नाज़ुक होठों को, कुछ और नहीं है जाम है ये, कुदरत ने जो हमको बख़्शा है, वो सब से हसीं इनाम है ये"। मैने जब इस शेर को सुना तो मैने उनसे कहा कि 'इतना अच्छा लिखा है आप ने, इस का तो गाना बनना चाहिए'। लेकिन प्रोड्युसर साहब ने कहा कि 'राजकुमार साहब गाने वाने नहीं गायेंगे, वो कहाँ गाते हैं?' लेकिन मैने भी ज़िद नहीं छोड़ी और यह गीत बनकर रहा। रफ़ी साहब ने जब इसे गाया तो 'रिकॉर्डिंग' पर मौजूद सभी लोग वाह वाह कर उठे। और जब फ़िल्म के डिस्ट्रिब्युटरों ने यह गीत सुना तो कहने लगे कि 'इतने अच्छे गाने में बस दो ही शेर (दो अंतरे)?' तब लोगों ने साहिर साहब को चारों तरफ़ ढूँढा पर पूरे शहर में कहीं उनका पता न चल सका, और इस तरह से दो ही अंतरे इस गाने में रह गये।" तो दोस्तों, यह थी इस गीत के बनने की कहानी, अब वक़्त हो चुका है गीत को सुनने का, सुनिये...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. बेहद खुशमिजाज़ अंदाज़ में गाया है रफी साहब ने इस गीत को.
2. कलाकार हैं -"शशि कपूर".
3. एक अंतरा खत्म होता है इन शब्दों पर -"जुल्फ लहराई".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -

अदा जी गलत जवाब, कोई बात नहीं हो जाता है कई बार, पर इसी बहाने एक नए विजेता से हमारा साक्षात्कार हुआ. किश या एरोशिक जो भी इनका नाम है उनको बधाई. २ अंक मिले आपको. दिलीप जी बहुत अच्छी जानकारी दी आपने, बाकी सभी श्रोताओं से भी अनुरोध है कि अपनी पसंद के गीत और लघु आलेख रक्षा बंधन वाले रविवार सुबह की कॉफी एपिसोड के लिए जल्दी भेजें

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

लोग उन्हें "गाने वाली" कहकर चिढ़ाते थे, धीरे धीरे ये उनका उपनाम हो गया....

दुनिया में कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिनके जाने के बाद भी उनकी मधुर स्मृतियाँ हमें प्रेरित करती हैं. सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती हैं. इसी श्रेणी में एक नाम और दर्ज हुआ है, वो है शास्त्रीय संगीत की मल्लिका गंगूबाई का. गीता में कहा है कि 'शरीर मरता है आत्मा नही'. गंगूबाई शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं. आज वो नहीं रहीं लेकिन उनकी संगीत शैली आत्मा के रुप में हमारे बीच विराजमान है.

यूँ तो आज गंगूबाई संगीत के शिखर पर विराजित थीं लेकिन उस शिखर तक पहुँचने का रास्ता उन्होंने बहुत ही कठिनाईयों से तय किया था. गंगूबाई का जन्म १९१३ में धारवाड़ में हुआ था. देवदासी कुल में जन्म लेने वाली गंगूबाई ने छुटपन से संगीत की शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी. अक्सर उन्हें जातीय टिप्पणी का सामना करना पड़ता और उनकी गायन कला को लेकर लोग मजाक बनाया करते थे. उस समय गायन को अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए लोग उन्हें 'गाने वाली' कहकर चिढ़ाते थे. धीरे-धीरे यह उनका उपनाम हो गया.

गंगूबाई कर्नाटक के दूरस्थ इलाके हंगल में रहती थीं. इसी से उनकी पहचान बनी और उनके नाम के साथ गाँव का नाम हंगल जुड़ गया. गंगूबाई हंगल की माँ कर्नाटक शैली की गायिका थीं लेकिन गंगूबाई ने हिन्दुस्तानी शैली का गायन सीखने का फैसला किया. अपने गुरु सवाई गंधर्व से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखने के लिये गंगूबाई कुडगोल जाया करती थीं. गंगूबाई ने कई बाधाओं को पार कर शास्त्रीय संगीत को एक मुकाम तक पहुँचाया. गंगूबाई ने गुरु-शिष्य परम्परा को बरकरार रखा. उन्होंने अपने गुरु सवाई गंधर्व की शिक्षाओं के बारे में एक बार कहा था कि -'मेरे गुरु जी ने मुझे सिखाया है कि जिस तरह एक कंजूस अपने पैसों के साथ व्यवहार करता है उसी तरह सुर का इस्तेमाल करो ताकि श्रोता राग की हर बारीकी को समझ सके'.

गंगूबाई ने भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ संगीत शिक्षा ली थी. किराना घराने की परम्परा को बरकरार रखने वाली गंगूबाई ने कभी भी इससे जुड़ी शैली की शुद्धता के साथ समझौता नहीं किया. गंगूबाई को 'भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पुरिया, धनश्री, मारवा, केदार और चन्द्रकौंस' रागों की गायिकी के लिये अधिक सम्मान मिला. उनका कहना था कि 'मैं रागों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की हिमायती हूँ, इससे श्रोता की उत्सुकता बनी रहती है और उसमें अगले चरण को जानने की इच्छा बढ़ती है'. एक बार फ़िल्म मेकर विजया मूले से बात करते हुए गंगूबाई ने कहा था कि 'पुरुष संगीतकार अगर मुसलमान हो तो उस्ताद कहलाने लगता है, हिन्दु हो तो पंडित हो जाता है, लेकिन केसरबाई, हीराबाई और मो्गाबाई जैसी गायिकायें बाई ही रह जाती हैं उनके व्यक्तित्व में जीवन से और स्त्री होने से मिले दुखों की झलक साफ नजर आती थी. उनकी आवाज में दर्द था लेकिन उसे भी उन्होंने मधुरता से सजाया. ईश्वर के प्रति श्रद्धा होने के कारण गंगूबाई ने भक्ति संगीत को भी नई ऊँचाईयों तक पहुँचाया.

गंगूबाई एक महान गायिका थीं. उन्हें पद्म विभूषण, तानसेन पुरुस्कार, संगीत नृत्य अकादमी पुरुस्कार और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरुस्कारों से नवाजा गया. गंगूबाई हंगल ने हर तरह का वक्त देखा था. गंगूबाई को नौ प्रधानमंत्रियों और पाँच राष्ट्रपतियों द्वार सम्मान प्राप्त हुआ जो अपने आप में एक उपलब्धि है. उन्होंने भारत में दो सौ से अधिक स्कूलों मे भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिये कार्यक्रम किये साथ ही देश के बाहर भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को पहुँचाया.

यह सच है कि पद्म भूषण गंगूबाई हंगल नहीं रहीं लेकिन उनकी आँखे आज भी दुनिया देखेंगी. गंगूबाई हंगल अपनी आँखे दान कर गयीं हैं. कहते हैं कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति कभी नहीं मरता है उसकी उपस्थिति उसके अनगिनत महान कार्यों से दुनिया में रहती है. गंगूबाई हंगल भी अपने संगीत और आँखों द्वारा इस दुनिया में रहेंगी. गंगूबाई हंगल एक ऐसी गायिका थीं जिन्होने अपने शास्त्रीय गायन में कभी कोई मिलावट नहीं की. उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया. ऐसी महान शास्त्रीय गायिका को हम श्रद्धाजंली देते हैं और सुनते हैं उनकी आवाज़ में आज राग दुर्गा, प्ले का बटन दबाईये, ऑंखें बंद कीजिये और महसूस कीजिये आवाज़ के इस तिलस्मी अहसास को-



आलेख - दीपाली तिवारी "दिशा"

Tuesday, July 28, 2009

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना....राजेंद्र कुमार की दरख्वास्त रफी साहब की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 154

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के तहत इन दिनों आप सुन रहें हैं लघु शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी'। अब तक जिन चेहरों से आपका परिचय हुआ है, वो हैं शम्मी कपूर, दिलीप कुमार और सुनिल दत्त। आज का चेहरा भी बहुत ख़ास है क्योंकि इनके भी ज़्यादातर गानें रफ़ी साहब ने ही गाये हैं। इस चेहरे को हम सब जुबिली कुमार, यानी कि राजेन्द्र कुमार के नाम से जानते हैं। रफ़ी साहब और राजेन्द्र कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो जो जो प्रमुख फ़िल्में ज़हन में आती हैं, उनके नाम हैं धूल का फूल, मेरे महबूब, आरज़ू, सूरज, गंवार, दिल एक मंदिर, और आयी मिलन की बेला। लेकिन एक और फ़िल्म ऐसी है जिसमें मुख्य नायक राज कपूर थे, और सह नायक रहे राजेन्द्र कुमार। ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म के ज़्यादातर गानें मुकेश ने ही गाये होंगे, लेकिन उस फ़िल्म में दो गानें ऐसे थे जो राजेन्द्र कुमार पर फ़िल्माये जाने थे। उनमें से एक गीत तो लता-मुकेश-महेन्द्र कपूर का गाया हुआ था जिसमें राजेन्द्र साहब का प्लेबैक किया महेन्द्र कपूर ने, और दूसरा जो गीत था वह रफ़ी साहब की एकल आवाज़ में था। जी हाँ, यहाँ फ़िल्म 'संगम' की ही बात चल रही है। रफ़ी साहब के गाये इस अकेले गीत ने वो शोहरत हासिल की कि जो शायद फ़िल्म के दूसरे सभी गीतों को बराबर का टक्कर दे दे। इसमें कोई शक़ नहीं कि रफ़ी साहब के गाये इस गीत ने फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार के किरदार को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बनाया और किरदार को और ज़्यादा सशक्त किया। "ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना, कि तुम मेरी ज़िंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो"। राजेन्द्र कुमार और रफ़ी साहब की जोड़ी के तमाम हिट गीतों में से यही गीत हम आज लेकर आये हैं ख़ास आप के लिए। अगर बहुत दिनों से आप ने यह गीत नहीं सुन रखा था, तो आज इस गीत को सुनकर तमाम पुरानी यादें आपकी ताज़ा हो गयी होंगी, ऐसा हमारा ख़याल है।

'संगम' फ़िल्म इतनी चर्चित रही है कि इस फ़िल्म के बारे में नया कुछ बताने को हमारे पास नहीं है। बस प्रस्तुत गीत के बारे में यह ज़रूर कहूँगा कि प्रेम पत्र लिखने पर जितने भी गानें बने हैं, उनमें यह गीत एक अहम स्थान रखता है। रोमांटिक गानें लिखने में हसरत जयपुरी साहब का कोई सानी नहीं था, इस गीत के ज़रिये उन्होने इस बात को फिर एक बार प्रमाणित किया है। गीत का मुखड़ा और अंतरे जितने ख़ूबसूरत हैं, उतना ही ख़ूबसूरत है गीत के शुरुवाती बोल - "मेहरबाँ लिखूँ, हसीना लिखूँ, या दिलरुबा लिखूँ, हैरान हूँ कि आप को इस ख़त में क्या लिखूँ"! हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा! और रफ़ी साहब तो रफ़ी साहब, क्या समर्पण और अदायगी इस गीत में उन्होने दिखाई है, के सुन कर प्रेम-पत्र लिखने वाले के लिए दिल में हमदर्दी पैदा हो जाये! शंकर जयकिशन का संगीत भी उतना ही असरदार था इस गीत में। कुल मिलाकर यह गीत इन सभी कलाकारों के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन कर रह गया। और आज हम उसी पड़ाव से गुज़र रहे हैं, तो सुनिये फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर का यह सुनहरा नग़मा। और हाँ, आप को यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के लिये राजेन्द्र कुमार को उस साल के फ़िल्म-फ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार मिला था।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक सदाबहार ग़ज़ल रफी साहब की आवाज़ में.
2. कलाकार हैं -"राज कुमार".
3. मुखड़े में शब्द है -"कुदरत".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न जी आप बस दो जवाब दूर हैं हमारी दूसरी विजेता बनने से. एक बार स्वप्न जी विजेता बन जाए उसके बाद हमें लगता है कि पराग जी और दिशा जी में जम कर टक्कर होने वाली है. रोहित जी हौंसला अफजाई के लिए धन्येवाद. शरद जी आपकी पैरोडी पढ़कर तो मज़ा आ गया. दरअसल जैसा कि उपर सुजॉय ने लिखा भी है, प्रेम पत्र हम सभी ने लिखा होगा कभी न कभी. लिखने के बाद जो सोच सबसे पहले जेहन में आती है उसे ये गीत बहुत सुंदर अभिव्यक्ति देता है. शायद ही कोई होगा जिसे ये गीत पसंद न हो.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

यूँ न रह-रहकर हमें तरसाईये.....एक फ़नकार जो चला गया हमें तरसाकर

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३३

यूँतो हमने पिछली दफ़ा फ़रमाईश की गज़लों का सिलसिला शुरू कर दिया था.. लेकिन न जाने क्यों आज मन हुआ कि कम से कम एक दिन के लिए हीं अपने पुराने ढर्रे पर वापस आ जाया जाए। अहा..... हम अपने वादे से मुकर नहीं रहे, आने वाली ७ कड़ियों में हमें फ़रमाईश की ५ गज़लों/नज़्मों को हीं सुनाना है, इसलिए आगे भी दो बार हम अपने संग्रह से चुनी हुई २ गज़लों/नज़्मों का आनंद ले सकते हैं। तो चलिए आज की गज़ल की ओर बढते हैं। आज की गज़ल "यूँ न रह-रहकर हमें तरसाईये" को लिखा है "सागर निज़ामी" ने और संगीत से सँवारा है चालीस के दशक के मशहूर संगीतकार "पंडित अमरनाथ" ने। जानकारी के लिए बता दूँ कि "पंडित अमरनाथ" जानी-मानी संगीतकार जोड़ी "हुस्नलाल-भगतराम" के बड़े भाई थे। रही बात "सागर निज़ामी" की तो अंतर्जाल पर उनकी लिखी चार हीं गज़लें मौजूद हैं- "यूँ न रह-रहकर", "हैरत से तक रहा", "हादसे क्या-क्या तुम्हारी बेरूखी से हो गए" और "काफ़िर गेशु वालों की रात बसर यूँ होती है"। संगीतकार और शायर के बाद जिसका नाम हमारे जेहन में आता है वह है इस गज़ल का गायक। बात यहीं पर आकर अटक जाती है। यहाँ से आगे भावुक हुए बिना बढा हीं नहीं जा सकता। इस गज़लगायक की ज़िंदगी बस १४ साल ५ महीने और ११ दिन में हीं पूरी हो गई। जालंधर के "खानखाना" में २८ दिसंबर १९२७ को जन्मा यह शख्स ५ जून १९४२ को हमें तरसता छोड़कर चला गया। यह शख्स यह फ़नकार अपनी उम्र का १५वाँ वसंत भी नहीं देख सका। फिर भी इस फ़नकार में कुछ तो ऐसी बात थी कि आज भी लोग इसका नाम आदर से लेते हैं।

अगर श्रोतों की मानें तो इस फ़नकार ने अपना पहला पब्लिक परफ़ोर्मेंश महज़ ३ साल की उम्र में धरमपुर में दिया था। "हे शारदा नमन करूँ" की गूँज कुछ ऐसी उपजी थी कि सुनने वालों को अपने कानों पर भरोसा न हुआ। बस इतना हीं नहीं इन्होंने इस भजन के बाद "ध्रुपद" में और भी कई सारी रचनाएँ गाईं। फिर तो साधारण जन क्या जाने-माने शास्त्रीय संगीत के पुजारियों और भक्तों को भी इस बात का यकीन हो गया कि कुछ तो पारलौकिक है इनकी आवाज़ में। इनकी प्रसिद्धि इतनी बढी कि लोग किसी भी कीमत पर इन्हें सुनना चाहते थे। यहाँ तक कहा जाता है कि उस दौर में इन्हें लोकल परफ़ोर्मेंश के लिए ८० रूपए और आउट आफ़ स्टेशन के लिए २५० रूपए तक मिलने लगे। लेकिन इन्हें पैसों से कोई प्यार न था। इन्हें गाने में जो सुकून मिलता था, बस इसी कारण ये महीने में २०-२० शो करने लगे थे। रेडियो पर इनके गाने फिर नियमित बजने लगे। इनकी मक़बूलियत को भुनाने के लिए एक फिल्मकार शिमला(जहाँ ये सपरिवार रहते थे) पहुँच गए और इन्हें संत कबीर का रोल आफ़र कर दिया, लेकिन घर वाले राजी ने हुए। इनके परिवार वालों को हमेशा हीं इस बात का अफ़सोस रहा है। कम-से-कम वे लोग इन्हें बड़े पर्दे पर तो देख पाते। संगीत की दुनिया में चमत्कार की तरह उभरा यह फ़नकार देखते-देखते एक लीज़ेंड बन गया। इनकी प्रसिद्धि का बखान "मैथिली शरण गुप्त" ने अपनी पुस्तक "भारत-भारती" में भी किया है। यह बात स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की है, इसलिए उस समय "महात्मा गाँधी" की प्रसिद्धि का आकलन आसानी से किया जा सकता है। फिर भी कहा जाता है कि एकबारगी जब "गाँधी" जी किसी सभा को संबोधित करने शिमला आए थे तो उस सभा में उम्मीद से बहुत कम लोगों ने शिरकत की थी। कारण जानने की जब कोशिश की गई तो यह पता चला कि उसी दिन शिमला में "मास्टर मदन" का कार्यक्रम चल रहा था। इसी बात से आप "मास्टर मदन" की मक़बूलियत का हिसाब लगा सकते हैं। जी हाँ, हमारे आज के फ़नकार मास्टर मदन हीं हैं, जिन्हें कई लोग गलती से "मदन मोहन" समझ बैठते हैं तो कई लोग इस बात पर आपत्ति जताते हैं कि इन्हें उस्ताद मदन क्यों नहीं कहा जाता। चूँकि इन्होंने १८ वसंत भी पार नहीं किए थे इसलिए इन्हें उस्ताद नहीं कहा जा सकता, नहीं तो प्रतिभा में तो ये कब के उस्ताद बन चुके थे। कलकत्ता में इनका अंतिम परफ़ोर्मेंश कई लोगों के दिलों में अभी तक बसा है। राग बागेश्वरी में इन्होंने जब "बिनती सुनो मोरे अवधपुर के बसिया" गाया था तो संगीत के एक पारखी ने इन पर ५०० रूपए न्योछावर कर दिए थे। दुर्भाग्यवश कलकत्ता के बाद इनकी महफ़िल कहीं नहीं जमी। धीरे-धीरे ये बीमार पड़ते गए और एक दिन काल का ग्रास बन गए।

इनकी मौत के बारे में कई कहानियाँ प्रचलित हैं। किस कहानी में सच्चाई है, यह कहा नहीं जा सकता। जानेमाने लेखक और इतिहासविद प्राण नेविल लिखते हैं: कई सारी अफ़वाहें जुड़ी हैं इनकी मौत से। कुछ लोग कहते हैं कि अंबाला में कुछ गवैया लड़कियों ने इन्हें "कोठा" पर बुलाया था। फिर पान में कोई जहरीला चीज डालकर इन्हें खिला दिया जिससे धीरे-धीरे इनकी हालत बिगड़ती चली गई और अंतत: इनकी मौत हो गई। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कलकत्ता में इनके अंतिम पब्लिक परफ़ोर्मेंश की सफ़लता को देखकर इनके दुश्मनों ने इनके पेय में कोई स्लो प्वाइजन मिला दिया था। यह भी कहा जाता है कि आल इंडिया रेडियो के लिए दिल्ली में जब ये अपना कार्यक्रम देने गए थे तो इनके किसी राइवल(समकालीन गायक) ने इन्हें रास्ते से हटाने के लिए इनके दुध(जो ये आल इंडिया रेडियो के कैंटीन में नियमित रूप से पीया करते थे) में मरकरी की मिलावट कर दी थी। इस बात में इतनी सच्चाई तो है हीं कि डाक्टरों ने इनकी मौत का कारण इनके खून में मरकरी का होना बताया था। इन पर गायकी का अत्यधिक बोझ होना भी इनकी मौत का एक कारण बना। घर वालों को इनके स्वास्थ्य से ज्यादा गायकी से आने वाले पैसों की फ़िक्र थी जो अंदर हीं अंदर मास्टर मदन को निगलता चला गया। पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार "खालिद हसन" के अनुसार शक़ की ऊँगली के०एल०सहगल पर भी उठती है, जो दर-असल मास्टर मदन से उम्र में १३ साल बड़े भाई "मास्टर मोहन" के साथ रियाज़ किया करते थे। वैसे ये सारी बातें इतनी उलझी हुई हैं कि "कौन दोस्त, कौन रक़ीब" का फ़ैसला नहीं किया जा सकता। फ़ैसला हो भी तो हम कौन होते हैं फ़ैसला करने वाले और वो भी तब जब फ़ैसला सुनने वाला इस दुनिया में हीं नहीं रहा। हम कुछ भी कर लें लेकिन हम उस फ़नकार को वापस तो नहीं ला सकते। सोचिए अगर वह फ़नकार १४ साल की कच्ची उम्र में सुपूर्द-ए-खाक़ नहीं हुआ होता तो आज संगीत का स्तर कितना ऊँचा होता। "मास्टर मदन" की बमुश्किल आठ रिकार्डिंग्स हीं उनके चाहने वालों को नसीब हो पाई हैं। अगर आल इंडिया रेडियो ने एक भी रिकार्डिंग को सहेज़ कर रखा होता तो बात हीं कुछ और होती। अभी तो "मास्टर मदन" का हर चाहने वाला यही दुआ करता है कि काश एक और उनकी कोई रचना सुनने को मिल जाए। गज़लों में उनकी आवाज़ का जादू कुछ इस तरह रंगीन हुआ जाता है कि सुनने वाला अपने आप को गज़ल से जोड़े बिना रह नहीं पाता। और अगर इस हाल में कोई यह कहे कि उनकी बस दो गज़लें हीं हासिल हो सकीं हैं तो इससे बड़ी सजा क्या होगी! जी हाँ इस गज़ल के अलावा "सागर निज़ामी" की "हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे" हीं वह दूसरी गज़ल है जो इनकी आवाज़ में उपलब्ध है। अब जब "सागर" साहब की बात आ हीं गई है तो क्यों ना उन्हीं का लिखा एक शेर देख लिया जाए जो कमोबेश हर दीवाने पर फिट बैठता है:

कैफ़-ए-खुदी ने मौज़ को कश्ती बना दिया,
होश-ए-खुदा है अब न गम-ए-नाखुदा मुझे।


सागर निज़ामी, पंडित अमरनाथ और मास्टर मदन को याद करते हुए चलिए अब हम आज की इस गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं:

यूँ न रह-रहकर हमें तरसाईये,
आईये आ जाईये आ जाईये।

फिर वही दानिस्ता ठोकर खाईये,
फिर मेरी आगोश में गिर जाईये।

मेरी दुनिया मुन्तज़िर है आपकी,
अपनी दुनिया छोड़कर आ जाईये।

ये हवा ’सागर’ ये हल्की चाँदनी,
जी में आता है यहीं मर जाईये।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

ये दुनिया भर के झगडे, घर के किस्से, काम की बातें,
__ हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ...

आपके विकल्प हैं -
a) सज़ा, b) खता, c) बला, d) मुसीबत

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "मकान" और शेर कुछ यूं था -

ऊंची इमारतों से मकान मेरा घिर गया,
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए...

हर बार की तरह इस बार भी दीपाली जी सही जवाब और अपने शेर के साथ सबसे पहले हाज़िर हुई-

घर इंसा से बनता है ईंटों से नहीं
इनसे तो खाली मकान बना करते हैं
जो डाल दे इन पत्थरों में भी जान
उसे ही तो परिवार कहा करते हैं

बिलकुल सही बात दिशा जी, चूँकि शेर जावेद अख्तर साहब का था शमिख फ़राज़ जी ने उन्हें याद किया कुछ बहतरीन शेरों के साथ, देखिये बानगी -

इस शहर में जीने के अंदाज निराले हैं
होठों पर लतीफे हैं आवाज में छाले हैं

सब का खुशी से फासला एक कदम है
हर घर मे बस एक ही कमरा कम है

आज की दुनिया मे जीने का करीना समझो (तरीका)
जो मिले प्यार से उन लोगों को जीना समझो (सीढ़ी)

वाह क्या बात है फ़राज़ साहब...शमिख जी पूरे मूड में दिखे, शैलेश जैदी के इन शेरों से समां बाँध दिया आपने -

ज़िन्दगी किराये का मकान बन गयी।
अब खुशी भी दर्द के समान बन गयी॥

पत्थरों को छेनियों की चोट जब लगी।
एक अमूर्त कल्पना महान बन गयी

बहुत खूब...
सुमित जी को याद आया ये नायाब शेर -

कैफ परदेश में मत याद करो अपना मकान,
अबके बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा

शरद जी कहाँ पीछे रहने वाले थे -

दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की,
लोगों ने मेरे जेहन में रास्ते बना लिए...

अदा जी ने इरफान सिद्दीकी का ये शेर याद दिलाया, पर आपने हिंदी में टंकण क्यों नहीं किया....उधर मनु जी ने फरमाया -

ये क्या बस्ती है या रब जाने क्या इसकी कहानी है
मकां रहते हैं बस कायम, नहीं मिलते मकां वाले..

कुलदीप अंजुम साहब आये जनाब इफ्तिखार साहब का शेर लेकर -

मेरे खुदा मूझे इतना तो मोअतबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे

निर्मला कपिला जी ने भी महफ़िल का आनंद लिया, चलिए चलते चलते मंजू जी का स्वरचित ये शेर भी सुनते चलें-

ईंट -पत्थर के मकान में हर कोई रह लेता है ,
इन्सान तो वह जो लोगो के दिल में घर बनता है .

जी हाँ मंजू जी हमारी भी कोशिश यही है कि आप सब के दिल में भी अपने लिए एक छोटा सा फ्लैट मतलब मकां बुक कर लें कहीं कहीं कुछ हद तक तो हम कामियाब भी हुए हैं इसी खुशफहमी के साथ अगली महफिल तक दीजिये इजाज़त, खुदा हाफिज़ !!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, July 27, 2009

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ...सुनील दत्त का दर्द, रफी के स्वर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 153

'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' के तहत आज जिस चेहरे पर रफ़ी साहब की आवाज़ सजने वाली है, उस चेहरे का नाम है सुनिल दत्त। सुनिल दत्त उन अभिनेताओं में से हैं जिनका कई गायकों ने पार्श्व-गायन किया है जैसे कि तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, और रफ़ी साहब भी। रफ़ी साहब की आवाज़ और दत्त साहब के अभिनय से सजी एक बेहद मशहूर फ़िल्म रही है 'ग़ज़ल'. १९६४ में बनी यह फ़िल्म एक मुस्लिम सामाजिक फ़िल्म थी। ज़ाहिर है ऐसे फ़िल्मों में उर्दू शायरी का बड़ा हाथ हुआ करता है और यह फ़िल्म भी व्यतिक्रम नहीं है। साहिर लुधियानवी के अशआर, मदन मोहन का संगीत, सुनिल दत्त और मीना कुमारी के अभिनय, तथा रफ़ी साहब की आवाज़, कुल मिलाकर आज यह फ़िल्म यादगार फ़िल्मों में अपना जगह बना चुकी है, और यह जगह इसके गीत संगीत के वजह से ही और ज़्यादा पुख़्ता हुई है। साहिर, मदन मोहन, रफ़ी साहब, ये तीनों अपने अपने क्षेत्र में अग्रणी रहे हैं और आज का प्रस्तुत गीत इन तीनों के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है, इसमें कोई शक़ नहीं है। "रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ, ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ"। मदन मोहन के संगीत में और रफ़ी साहब की आवाज़ पर सुनिल दत्त साहब के दो और बेहद मशहूर गीत रहे हैं "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है" (चिराग़) एवं "आप के पहलू में आ कर रो दिये" (मेरा साया), जिनमें से यह दूसरा गीत आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन चुके हैं।

वेद मदन निर्मित एवं निर्देशित फ़िल्म 'ग़ज़ल' के इस ग़ज़ल का फ़िल्मांकन कुछ इस तरह हुआ है कि सुनिल दत्त और मीना कुमारी एक दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन मीना कुमारी की शादी कहीं और हो रही है। और उसी शादी की महफ़िल में सुनिल दत्त को गीत गाने का अनुरोध किया गया है। अपनी बरबाद मोहब्बत के मज़ार पर खड़े हो कर नाकाम आशिक़ अपने जज़्बात किस तरह से पेश कर सकता है, यह साहिर साहब से बेहतर भला कौन लिख सकता था भला! ऐसा लगता है जैसे साहिर साहब ने अपने ख़ुद के जज़्बात इस गाने में भर दिए हो! "कौन कहता है के चाहत पे सभी का हक़ है, तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है, मुझसे कहदे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ, ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ"। रफ़ी साहब की आवाज़ में इस ग़ज़ल को थोड़े अलग अंदाज़ में साहिर और मदन साहब ने पेश किया था लता जी की आवाज़ में भी जिसके बोल हैं "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ, ये छलकते हुए जज़्बात किसे पेश करूँ"। रफ़ी साहब और लता जी के गाये इस ग़ज़ल को सुनकर यह बताना मुश्किल है कि कौन किससे बेहतर है। लता जी की आवाज़ में इसे हम आप तक फिर कभी पहुँचाने की कोशिश करेंगे, लेकिन आज लता जी के उद्‍गार हम आप तक ज़रूर पहुँचा सकते हैं जो उन्होने रफ़ी साहब के बारे में कहा था अमीन सायानी साहब के एक इंटरव्यू में - "रफ़ी साहब बहुत सीधे आदमी थे, बहुत ही सीधे, और उनके मन में कोई छल कपट नहीं था। वो जब बात करते थे तो बहुत सीधे, और बात बहुत कम करते थे। जब कभी मिलते थे तो दो चार शब्द बोल कर चुप हो जाते थे। अच्छा, उनको कभी ग़ुस्सा भी आता था तो ग़ुस्सा भी पता चल जाता था कि इस वक़्त वो नाराज़ हैं। एक दिन मुझे मिले और 'रिकॉर्डिंग' मेरी हो रही थी। तो उस ज़माने में मैने मेहदी हसन साहब को सुना था और मुझे बहुत अच्छे लगते थे गानें उनके। तो मैं कभी 'रिकॉर्डिंग' में उनका कोई गाना गुनगुना रही थी ऐसे ही, तो उन्होने सुन लिया था। तो मेहदी साहब आये बम्बई, और पता चला उनको कि मेहदी हसन आये हैं, तो रफ़ी साहब आये तो उनको ग़ुस्सा आया हुआ था किसी बात पर, तो मुझे कहने लगे कि 'हाँ अभी सुनिए जाके उनको, वो आये हैं ना जिनका गाना आप को बहुत पसंद है'। मैने कहा कि 'रफ़ी साहब, आप को क्या तक़लीफ़ है, आप क्यों इस तरह जल के बात कर रहें हैं?' 'नहीं नहीं नहीं, आप सुनिये ना, आप को तो उनके गानें बहुत अच्छे लगते हैं'। मैने कहा 'अच्छे लगते हैं, आप के भी गानें अच्छे लगते हैं'. 'नहीं नहीं, हमारा क्या है, हम तो फ़िल्मों में गाते हैं'। पर ये था कि मन में कुछ नहीं था। वो दिल के बहुत साफ़ आदमी थे। और किसी बात का शौक नहीं, मैने आप को पहले भी एक मरतबा बताया था कि कोई पान, तम्बाकू, शराब, सिगरेट, कुछ नहीं। सिर्फ़ खाने का शौक था। यह भी मैने सुना था उनके घर में एक दिन कि कभी कभी रात को आते हैं तो फ़्रिज खोल कर जो भी मिलता है खा लेते हैं। पर जितने बीमार थे किसी को नहीं बताते थे। उनको बहुत प्रेशर की तक़लीफ़ थी, कभी कभी 'रिकॉर्डिंग' में पता चलता था, उनकी शक्ल बदल जाती थी, पर बताते नहीं थे, गाते रहते थे। और अमीन साहब, कभी कभी इतने अच्छे लोगों के साथ भी कुछ ऐसे लोग मिलते हैं, घरवाले, कि उनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं था, उन्हे किसी ने सम्भाला नहीं, नहीं तो रफ़ी साहब और देर तक रहते!" रफ़ी साहब आज ज़रूर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ के विविध रंग और उनका नूर हमेशा हमेशा फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को चमकाता रहेगा, रंगीन करता रहेगा, सुनिये "रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ"। हम भी पेश कर रहे हैं रफ़ी साहब की प्रतिभा को श्रद्धांजली।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक मासूम सा प्रेम गीत रफी साहब का गाया.
2. कलाकार हैं -"राजेंद्र कुमार".
3. मुखड़े में शब्द है - "नाराज़".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
४४ अंकों के साथ स्वप्न जी मंजिल के और करीब आ चुकी है. दूर दूर तक आपका कोई प्रतिद्वंधी नहीं है. बहुत बधाई. मनु जी, पराग जी, शमिख जी और शरद जी आप सब से भी अनुरोध है कि रक्षा बंधन से जुडी अपनी यादें और पसंद के गीत हमें जल्द से जल्द लिख कर भेजें. शुरुआत आप सब खुद से कीजिये बाद में अपने साथियों को भी जोडीये, यकीन मानिये ये एक बहुत अच्छा आयोजन साबित होगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

जुलाई का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन और बारिश की फुहारें

सुनिए ऑनलाइन कवि सम्मेलन का बारिश अंक

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
Khushboo
खुश्बू
एक समय था जब हम महीने के नाम से मौसम का मिज़ाज बता सकते थे। उत्तर भारत में सावन का महीना झूलों का, छोटी-बड़ी नदियों में आई उफानों का, धान की रोपाई का महीना होता था- जैसे धरती हरे रंग का छाता लगा लेती थी। लेकिन मनुष्य के प्रकृति को जीतने की उत्कंठा और होड़ ने पूरी तस्वीर ही बदल दी। आलम यह कि जहाँ 20 मिलि॰ वर्षा होती थी वहाँ 500 मिलि॰ बारिश हो रही है और जहाँ बरसात न हो तो किसना खाना नहीं खाता, वहाँ सूखा पड़ा है। सूरत यह कि गुजरात के सौराष्ट्र में बाढ़ और जल-प्लावन का संकट है तो वहीं उत्तर प्रदेश के 20 जिलों को वहाँ की सरकार सूखा घोषित कर चुकी है। मौसम विज्ञानियों कि मानें तो मौसम के इस नये मिजाज़ को समझने की ज़रूरत है और यह मान लेने की ज़रूरत है कि जलवायु में 180 डिग्री का बदलाव आ चुका है। जितनी जल्दी समझेंगे, उतनी जल्दी शायद हम इस संकट से उबर पायेंगे।

इसीलिए हमने भी मौसम के जानकारों की मानने की सोची और इतनी विडम्बनाओं के बावज़ूद भी पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का बारिश अंक लेकर हम आपके सामने उपस्थित हैं, जिसमें बारिश, सूखा और इससे जुड़ीं संवेदनाओं की 22 फुहारें हैं। इस बार के कवि सम्मेलन को हमारी इंजीनियर और इस कार्यक्रम की डेवलपर खुश्बू ने इसमें वीडियो का रंग भरा है। पूरे कार्यक्रम का स्लाइड शो बनाया है ताकि इसे केवल सुना ही नहीं, देखा भी जा सके। दृश्य-श्रव्य के इस युग में आवाज़ बिना चेहरे के अधूरी है। यह एक प्रयोग है जिसमें सजीव वीडियो का सुख तो नहीं है, फिर भी शुरूआत हो जाने का सुख है, संतोष है।

जब संचालिका रश्मि प्रभा ने हमें वीडियो बनाने का प्रस्ताव दिया तब हमें यह बहुत मुश्किल लगा। वो शायद इसलिए कि भारत में अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नेट स्पीड इतनी कम होती है कि 10 मिनट का ऑडियो सुनना भी मुश्किल होता है, ऐसे में 60 मिनिट का वीडियो देखना खासा मुश्किल है। लेकिन उन्होंने कहा कि जमाना तकनीक का है और खुश्बू नये तकनीकी औज़ारों से फाइल साइज़ को इतना छोटा रखेंगी कि श्रोताओं को कोई परेशानी नहीं होगी। अब तो यह आप ही बतायेंगे कि हमारे इस प्रयोग से आप कितने खुश हैं। अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें कि हम इसमें किस तरह का बदलाव लायें।

वीडियो-


(कृपया इसे 10-15 मिनिट तक बफर हो जाने दें, फिर दुबारा प्ले करें)

यदि वीडियो देखने में परेशानी महसूस कर रहे हैं तो कृपया नीचे के प्लेयर से ऑडियो सुनें



प्रतिभागी कवि-सरस्वती प्रसाद, दीपाली पन्त तिवारी, रेणु सिन्हा, मंजुश्री, नीलम प्रभा, शेफाली पाण्डेय, कविता राठी, प्रीती मेहता, विनीता श्रीवास्तव, संगीता स्वरुप, कुसुम शर्मा, दिपाली 'आब' (कृति), कुलदीप अंजुम, संत शर्मा, शिखा वार्ष्णेय, ललित मोहन त्रिवेदी, रजिया अकबर मिर्जा, मुकेश कुमार पाण्डेय, शन्नो अग्रवाल, अम्बरीश श्रीवास्तव, महेंद्र भटनागर और नित्या शेफाली

संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इसे सुविधानुसार देखना-सुनना चाहते हैं तो कृपया नीचे के लिंकों से डाउनलोड करें-
वीडियोOGG क्वालिटीwmv मूल क्वालिटीMPEG 512kbps
ऑडियोWMAMP3




आप भी इस कवि सम्मेलन का हिस्सा बनें

1॰ अपनी साफ आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7.अगस्त अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 20 अगस्त 2009
8. अगस्त अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 30 अगस्त 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 13. Month: July 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

Sunday, July 26, 2009

जब दिल से दिल टकराता है... दिलीप का अंदाज़ और रफी साहब की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 152

ब रफ़ी साहब के गीतों पर दस चेहरों की अदायगी की बात हो, तो एक अभिनेता जिनके ज़िक्र के बग़ैर चर्चा अधूरी रह जायेगी, वो हैं अभिनय के शहंशाह दिलीप कुमार साहब। रफ़ी साहब ने एक से एक बढ़कर गीत गाये हैं दिलीप साहब के लिये, लेकिन दिलीप साहब जब फ़िल्मों में आये थे तब रफ़ी साहब मुख्य रूप से उनका प्लेबैक नहीं किया करते थे। अरुण कुमार ने पहली बार दिलीप कुमार का पार्श्वगायन किया था उनकी पहली फ़िल्म 'ज्वार भाटा' में। उसके बाद तलत महमूद बने दिलीप साहब की आवाज़ और कई मशहूर गीत बनें जैसे कि 'दाग़', 'आरज़ू', 'बाबुल', 'तराना', 'संगदिल', 'शिकस्त', 'फ़ूटपाथ', इत्यादि फ़िल्मों में। तलत साहब के साथ साथ मुकेश ने भी कई फ़िल्मों में दिलीप कुमार के लिये गाया जैसे कि 'मधुमती', 'यहूदी' वगेरह। लेकिन जो आवाज़ दिलीप साहब पर सब से ज़्यादा जचीं, वो थी मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़। रफ़ी साहब ने उनके लिए इतने सारे मशहूर गीत गाये हैं कि अगर उसकी फ़ेहरिस्त लिखने बैठें तो उलझ कर रह जायेंगे। बस इतना कहेंगे कि दिलीप साहब पर फ़िल्माया रफ़ी साहब के जिस गीत को हमने चुना है वह है फ़िल्म 'संघर्ष' का, जिसे लिखा है शक़ील बदायूनी ने और संगीत नौशाद साहब का। इन चारों के संगम से बने गीतों में फ़िल्म 'संघर्ष' के अलावा 'कोहिनूर', 'आन', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'गंगा जमुना', 'लीडर', 'दिल दिया दर्द लिया', 'राम और श्याम', और 'आदमी' जैसी फ़िल्मों के गीत संगीत ने अपने समय में ख़ासी धूम मचाई। यूं तो फ़िल्म 'संघर्ष' का "मेरे पैरों में घुंगरू बंधा दे" गीत सब से ज़्यादा प्रचलित है, लेकिन हम आप को इस फ़िल्म का इससे भी ख़ूबसूरत गीत सुनवा रहे हैं। भले ही इस गीत को बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया, लेकिन उससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता। अच्छा गीत हमेशा अच्छा ही रहता है। "जब दिल से दिल टकराता है, मत पूछिये क्या हो जाता है", जी हाँ, यही रचना आज पेश-ए-ख़िदमत है। रफ़ी साहब के देहांत पर दिलीप कुमार ने विविध भारती को दिये अपने शोक संदेश में कहा था - "रफ़ी साहब को ना कोई घमंड था, ना अहंकार, कभी भी नाराज़ नहीं होते थे, और ना कभी उनके बारे में मैने ऐसी कोई बात सुनी। उनका नाम मौसिक़ी की तारीख़ में जगमगाता रहेगा।"

क्यूंकि दिलीप कुमार के साथ साथ नौशाद साहब भी इस गीत से जुड़े हुए हैं और नौशाद साहब और रफ़ी साहब का भी एक लम्बा साथ रहा, तो क्यों न नौशाद साहब की उन बातों पर एक नज़र दौड़ा लिया जाये जो उन्होने अपने इस अज़िज़ गुलुकार के लिये कहे थे। विविध भारती के 'संगीत के सितारे' कार्यक्रम में नौशाद साहब ने रफ़ी साहब की तारीफ़ कुछ इस तरह से की थी - "एक फ़नकार को जो अहसासात होने चाहिये, वो रफ़ी साहब में भरपूर था। एक गीत था राग मधुमंती पर। गाना रिकार्ड होने के बाद रफ़ी साहब ने उसे सुना और बार बार सुनते रहे। बोले कि 'शोरगुल से हट कर यह गाना सितना सुकून दे रहा है!' मैने कहा कि 'पहले यह बताइये कि आप पैसे कितने लोगे?' उन्होने कहा कि 'इसके पैसे नहीं चाहिये, सुकून पैसे से नहीं मिलता है।' उनकी तारीफ़ मैं कहाँ तक बयान करूँ?" दोस्तों, एक बार और नौशाद साहब विविध भारती के 'नौशाद-नामा' कार्यक्रम में रफ़ी साहब के बारे में कुछ बातें कहे थे जो इस तरह से हैं - "जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आये तो दूसरा विश्व युद्ध ख़तम होने की कगार पर था। मुझे साल याद नहीं है। उस वक़्त प्रोड्युसरों को कम से कम एक 'वार प्रोपागंडा फ़िल्म' बनानी ही पड़ती थी। रफ़ी साहब मेरे पास आये लखनऊ से मेरे वालिद साहब से एक सिफ़ारिशी ख़त लिखवाकर। छोटा सा तम्बुरा हाथ में लिये खड़े थे मेरे सामने। मैने उनसे पूछा कि क्या उन्होने किसी से संगीत की तालीम ली है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ साहब से शास्त्रीय संगीत सीखा है। उस्ताद बरकत अली ख़ाँ साहब, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ साहब के छोटे भाई हैं। मैने उनसे कहा कि अभी मेरे पास कोई गीत नहीं है, लेकिन एक कोरस गीत है जिसमें वो अगर चाहे तो चंद लाइनें गा सकते हैं। श्याम, जी. एम. दुर्रनी और कुछ और लोग भी उसमें गा रहे थे। और वह गीत था "हिंदुस्ताँ के हम हैं हिंदुस्ताँ हमारा", फ़िल्म 'पहले आप'। रफ़ी साहब ने दो लाइनें गाये और उन्हे १० रुपय मिला।" तो दोस्तों, यह था रफ़ी साहब के करीयर का पहला पहला गीत जिसे नौशाद साहब ने उनसे गवाया था सन् १९४४ के आसपास। वैसे श्यामसुंदर के संगीत निर्देशन में पंजाबी फ़िल्म 'गुल बलोच' में रफ़ी साहब ने पहली बार गीत गाया था, और इन्ही के संगीत में सन् १९४४ में ही हिंदी फ़िल्म 'गाँव की गोरी' में भी रफ़ी साहब ने गाया था। इसमें थोड़ा सा मतभेद रहा है कि 'पहले आप' का गीत या फिर 'गाँव की गोरी' का गीत, कौन सा गीत रफ़ी साहब का गाया पहला गीत था। ख़ैर, इन सब बातों को छोड़ कर सुनते हैं मोहम्मद रफ़ी, दिलीप कुमार, शक़ील बदायूनी और नौशाद साहब को सलाम करते हुए आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. रफी साहब का गाया एक दर्द भरा नगमा.
2. कलाकार हैं -"सुनील दत्त".
3. एक अंतरा शुरू होता है इन शब्दों से -"कौन कहता है..."

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
पहली न न... दूसरी...न न आखिरकार तीसरी कोशिश में स्वप्न जी ने सही जवाब लपक ही लिया. शरद जी ने हल्का सा हिंट भी दिया "संघर्ष" का नाम देकर. खैर बधाई आप ४२ अंकों पर आ चुकी हैं. मनु जी ने सही कहा...वाकई बहुत खूबसूरत है इस गीत के बोल और धुन भी और स्वप्न जी आपकी पैरोडी बहुत बढ़िया लगी....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, July 25, 2009

दीवाना मुझसा नहीं इस अम्बर के नीचे...रफी साहब के किया दावा शम्मी कपूर के लिए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 151

"मस्ती में छेड़ के तराना कोई दिल का, आज लुटायेगा ख़ज़ाना कोई दिल का"। जी हाँ दोस्तों, तैयार हो जाइए उस ख़ज़ाने से निकलने वाले तरानों के साथ बहने के लिए जिस ख़ज़ाने को हम और आप मोहम्मद रफ़ी के नाम से जानते हैं। आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु हो रहा है रफ़ी साहब को समर्पित दस विशेषांकों की एक ख़ासम-ख़ास पेशकश - "दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी"। जैसा कि शीर्षक से ही प्रतीत हो रहा है कि ये दस गानें दस अलग अलग नायकों पर फ़िल्माये हुए होंगे। रफ़ी साहब के अलग अलग अंदाज़-ए-बयाँ को इस शृंखला में क़ैद करने के लिए हमने नायकों के तराजू को इसलिए चुना क्योंकि रफ़ी साहब अपनी आवाज़ से अभिनय ही तो करते थे। हर नायक के स्टाइल और मैनरिज़्म को अच्छी तरह से जज्ब कर उनका पार्श्व गायन किया करते थे, और यही वजह है कि चाहे परदे पर दिलीप कुमार हो या धर्मेन्द्र, भारत भूषण हो या जीतेन्द्र, रफ़ी साहब की आवाज़ हर एक नायक को उसकी आवाज़ बना लेती थी। तो दोस्तों, आज से लेकर अगले दस दिनों तक हर रोज़ सुनिये रफ़ी साहब की आवाज़ लेकिन अलग अलग नायकों को दी हुई। यूं तो रफ़ी साहब ने अपने समय के लगभग सभी छोटे बड़े नायकों के लिए प्लेबैक किया है, लेकिन जिस नायक का नाम सब से पहले ज़हन में आता है वो हैं हमारे शम्मी कपूर साहब। जिस तरह से मुकेश और राज कपूर की आवाज़ें एक दूसरे का पर्याय बन गये थे, ठीक उसी तरह रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की आवाज़ें भी आपस में इस क़दर जुड़ी हुई हैं कि इन्हे एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। चंद गीतों को छोड़कर शम्मी साहब के लगभग सभी गीतों को रफ़ी साहब ने ही गाया है और इसलिए दस चेहरों में से पहला चेहरा हमने चुना है शम्मी कपूर का। सब से पहले रफ़ी साहब को शम्मी कपूर के लिए गवाने का श्रेय मेरे ख़याल से संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को जानी चाहिए क्योंकि उन्होने रफ़ी साहब और शमशाद बेग़म से १९५३ की फ़िल्म 'रेल का डिब्बा' में एक युगल गीत गवाया था "ला दे मोहे बालमा आसमानी चूड़ियाँ", जो शम्मी कपूर और मधुबाला पर फ़िल्माया गया था। उसके बाद शम्मी कपूर और रफ़ी साहब की जोड़ी को सही मायने में आज़माया संगीतकार ओ. पी. नय्यर और शंकर जयकिशन ने। लेकिन आज हम शम्मी-रफ़ी के जोड़ी के जिस गीत को लेकर उपस्थित हुए हैं वो इनमें से किसी संगीतकार का नहीं, बल्कि राहुल देव बर्मन का स्वरबद्ध किया हुआ है। १९६५ की फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' पंचम की पहली कामयाब फ़िल्म मानी जाती है, जिसमे रफ़ी साहब और आशा भोंसले ने कुछ ऐसे धमाकेदार गानें गाये हैं कि आज ये गानें सदाबहार गीतों की फ़ेहरिस्त में अपना नाम दर्ज करवा चुकी है।

'तीसरी मंज़िल' नासिर हुसैन की फ़िल्म थी जिसमें शम्मी कपूर की नायिका थीं आशा पारेख। नासिर हुसैन की हर फ़िल्म का संगीत ख़ास हुआ करता था और यह फ़िल्म भी उन्ही में से एक थी। इस फ़िल्म के जिस गीत को हम आज यहाँ पेश कर रहे हैं उसे सुनने से पहले इस गीत से जुड़ी वो बातें जान लीजिये जो ख़ुद राहुल देव बर्मन ने विविध भारती के विशेष जयमाला कार्यक्रम के तहत कहा था - "मेरी दूसरी बड़ी पिक्चर थी 'तीसरी मंज़िल', उसके प्रोड्युसर डिरेक्टर ने जब हमको साइन किया तो उन्होने कहा कि 'देखो भाई, हमारे साथ एक और आदमी है जिनका नाम है शम्मी कपूर, उनको तुमको गाना सुनाना पड़ेगा और उनको 'फ़्लोर' भी करना पड़ेगा'। तो एक दिन मैं उनके पास गाने की 'सिटिंग' में बैठा, और मैने बोला कि 'देखिये, एक लोक गीत बनाया है, जिसके बोल हैं "ए कांछा मलई सुनको तारा खासई देयोना", इतना गाया तो उन्होने कहा कि, दूसरा लाइन, मुझे गाने नहीं दिया, और उन्होने कहा गा कर "जो तारा मात्र....."। जी हाँ दोस्तों, नेपाली लोक गीत की धुन पर आधारित यह गीत है "दीवाना मुझसा नहीं इस अम्बर के नीचे", जिसे आप ने कई कई बार सुना होगा और आज फिर एक बार सुनने जा रहे हैं हमारे साथ। अरे अरे अरे, इससे पहले कि आप गाने की लिंक पर क्लिक करें, क्या आप नहीं जानना चाहेंगे शम्मी कपूर के उद्‍गार अपने चहेते गायक के बारे में। शम्मी कपूर की ये बातें हमे प्राप्त हुई विविध भारती पर प्रसारित रफ़ी साहब को समर्पित 'विशेष मनचाहे गीत' कार्यक्रम के सौजन्य से जो प्रसारित हुआ था ३१ जुलाई २००५ को। शम्मी जी कहते हैं, "रफ़ी साहब का 'रेंज' बहुत बढ़िया और 'वास्ट' था। अलग अलग 'हीरोज़' के लिए अलग अलग 'स्टाइल' में गाते थे। मेरे लिए भी एक अलग 'स्टाइल' था। मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई 'तुमसा नहीं देखा' के एक गाने की 'रिकॉर्डिंग' पर। वो मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मैं पहुँचा तो मुझसे पूछने लगे कि गाने में कैसी हरकत करनी है?' मैं उनसे कहता था कि 'यहाँ पे मैं ऐसा हरकत करूँगा, अगर आप इस जगह ऐसा गायेंगे तो अच्छा रहेगा', और वो वैसा ही कर देते। एक गाना था फ़िल्म 'कश्मीर की कली' में "तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे बनाया", मैं चाहता था कि इस गाने के एंड में लाइन रिपीट होती रहे, और मैं गाते गाते अंत में पानी में गिर पड़ूँ। जब मैने यह बात बतायी तो रफ़ी साहब को तो पसंद आयी पर नय्यर साहब ने इंकार कर दिया यह कहकर कि गाना ख़ामख़ा लम्बा हो जायेगा। अंत में रफ़ी साहब ने कहा कि 'गाना मैं गाऊँगा, आप लोगों को तक़लीफ़ क्यों हो रही है?' और इस तरह से रफ़ी साहब की वजह से मेरी वो ख़्वाहिश पूरी हुई थी। हम लोग कभी कभी रात को एक साथ बैठकर गाना गाते। शंकर, जयकिशन, रोशन, रफ़ी साहब, और मैं, रात ११/१२ बजे बैठ जाते और हम सब क्लासिकल म्युज़िक गाते, मैं भी गाता, बहुत ही हसीन घड़ियाँ थे वो सब!" तो दोस्तों, उन हसीन लम्हों और उस सुरीले ज़माने को याद और सलाम करते हुए अब आप को सुनवाते हैं 'तीसरी मंज़िल' फ़िल्म से "दीवाना मुझसा नहीं...", सुनिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. रफी साहब का गाया एक संजीदा प्रेम गीत.
2. कलाकार हैं -"दिलीप कुमार".
3. मुखड़े की अंतिम पंक्ति में शब्द है -"पसीना".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी मुबारक हो आखिरकार आपने खाता खोल ही लिया...२ अंकों के लिए बधाई...दिलीप जी वाह कायल होना पड़ेगा आपकी कवितामयी अभिव्यक्ति के लिए, और तहे दिल से शुक्रिया इतना मान देने के लिए. स्वप्न जी, पराग जी, मनु जी, शमिख फ़राज़ जी, शरद जी, सुमित जी, मंजू जी, संगीता जी, तनहा जी आप सब से ही तो रोशन है महफिलें. बहुत से नियमित श्रोता भी हैं जो अक्सर टिपण्णी के माध्यम से कभी सामने नहीं आते जैसे अर्चना जी. शैलेश जी और अनुराग जी आप सब के सहयोग के तारीफ करना शब्दों के परे है. दिलीप जी और स्वप्न मंजूषा जी आप दोनों ने इतने मधुर गीत सुनाये कि बस मज़ा आ गया. पराग जी आपके सवाल का जवाब उसी आलेख में है, एक बार फिर साफ़ कर दें -
१. ओल्ड इस गोल्ड को फरमाईशी नहीं बनाया गया है. चूँकि ओल्ड इस गोल्ड रोज प्रसारित होता है तो इसके माध्यम से हमारे श्रोता अपनी फरमाईश यहाँ रख सकते हैं. पर आलेख आपने hindyugm@gmail.com पर भेजना है. चुने हुए आलेख और गीत "रविवार सुबह की कॉफी" कार्यक्रम में सुनवाये जायेंगे न कि ओल्ड इस गोल्ड में. तो यहाँ कोई सीमा नहीं है किसी भी दशक के गीत की. ओल्ड इस गोल्ड के लिए आप निश्चिंत रहिये यहाँ हम ७० के दशक से आगे कभी नहीं बढ़ेंगे. :)
२. आपने सही कहा १९४० से १९५० के बहुत से अच्छे गीत हैं पर हमने ५० से इसलिए शुरू किया कि यदि इतने पुराने गीत हमारे संकलन में उपलब्ध न हों तो हमारे श्रोता निराश हो सकते हैं पर इसे कोई पत्थर की लकीर न मानें यदि आप ५०-१०० शब्दों में अपनी कोई ख़ास बात किसी ४० के दशक के गीत के विषय में लिख कर भेज सकें तो हमारी पूरी कोशिश रहेगी कि हम कहीं से भी उस गीत गीत को ढूंढकर आपकी नज़र करें. वैसे मूल आलेख में भी हमने सुधार कर दिया है.
खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सुनो कहानी: आँखें - स'आदत हसन 'मंटो'

मंटो की "आँखें"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में उर्दू और हिंदी प्रसिद्ध के साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क की एक छोटी कहानी "ज्ञानी" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं सआदत हसन मंटो की "आँखें", जिसको स्वर दिया है "किस से कहें" वाले अमिताभ मीत ने। इससे पहले आप अमिताभ मीत की आवाज़ में सआदत हसन मंटो की "कसौटी" और अनुराग शर्मा की आवाज़ में मंटो की अमर कहानी टोबा टेक सिंह और एक लघुकथा सुन चुके हैं।

"आँखें" का कुल प्रसारण समय ११ मिनट और २३ सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था।
~ सआदत हसन मंटो (१९१२-१९५५)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

मुझे उसकी आँखें बहुत पसंद थीं
(मंटो की "आँखें" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
VBR MP3Ogg Vorbis


पाठकों की सुविधा के लिए इस कहानी में प्रयुक्त कुछ अल्प-प्रचलित शब्दों का अर्थ नीचे दिया जा रहा है:
तीमारदारी = रोगी की सेवा
पैहम = निरंतर, लगातार
इसरार = (यहाँ) कहने पे
मानिन्द = तरह
बेहिस = जिसमें एहसास न हो
इन्फ़िरादी = अद्वितीय
रद्दे-अमल = प्रतिक्रिया
मुतवज्जेह = आकर्षित
क़रीबुल्मर्ग = मरणासन्न
तुन्द = तेज़, तीव्र
निशस्त = (यहाँ) सीट
बायस /बाइस = कारण
क़त'अन = कदापि, हरगिज़
जसारत = हिम्मत
मज़ामहत = हस्तक्षेप, रोकटोक

#Thirty first Story, Aankhen: Sa'adat Hasan Manto/Hindi Audio Book/2009/24. Voice: Amitabh Meet

Friday, July 24, 2009

जब ओल्ड इस गोल्ड के श्रोताओं ने सुनाये सुजॉय को अपनी पसंद के गीत- 150 वें एपिसोड का जश्न है आज की शाम

२० फरवरी २००९ को आवाज़ पर शुरू हुई एक शृंखला, जिसका नाम रखा गया ओल्ड इस गोल्ड. सुजॉय चट्टर्जी विविध भारती ग्रुप के सबसे सक्रिय सदस्य थे, यही माध्यम था उनसे परिचय का. फिर एक बार वो दिल्ली आये उन्होंने अपने ग्रुप के सभी मित्रों को मिलने के लिए बुलाया. उस दिन युग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी जी उनसे मिले. उसके अगले दिन मैं सुजॉय से व्यक्तिगत रूप से मिला, उनके पास रेडियो प्रोग्राम्स का एक ऐसा खजाना मौजूद था जिस पर किसी की भी नज़र ललचा जाए, तब से यही जेहन में दौड़ता रहा कि किस तरह सुजोय के इस खजाने को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाए, तभी अचानक ओल्ड इस गोल्ड का आईडिया क्लिक किया. २० फरवरी का दिन क्यों चुना गया इसकी भी एक ख़ास वजह थी, यहाँ थोडा सा व्यक्तिगत हो गया था मैं....यही वो दिन था जब मेरी सबसे प्रिय पूजनीय नानी माँ दुनिया को विदा कह गयी थी, मुझे लगा क्यों ना इस शृंखला को उन्हीं की यादों को समर्पित किया जाए. खैर जब सुजॉय से पहले पहल इस बारे में बात की तो सुजॉय तो क्या मैं और आवाज़ की टीम भी इसकी सफलता को लेकर संशय में थे, और फिर रोज एक नया गीत डालना, क्या हम ये सब नियमित रूप से कर पायेंगें ? पर जब सुजॉय ने मेरे चुने पहले १० गीतों का आलेख भेजा तो कम से कम मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि हाँ ये संभव है और शुरू हो गया सफ़र पुराने सदाबहार गीतों को सुनने और उनके बारे में विस्तार से चर्चा करने का.

धीरे धीरे कारवाँ बढता गया, नए नए प्रयोग हुए और इस पूरी प्रक्रिया का श्रोताओं ने और आवाज़ की संचालन टीम ने जम कर आनंद लिया. १०० एपिसोड पूरे करने के बाद हमने की ख़ास मुलाकात सुजॉय से. लीजिये आगे बढ़ने से पहले एक बार फिर इस बातचीत का आनंद लें आप भी (पढिये एक मुलाकात सुजॉय से). पिछले १५० दिनों से सुजॉय बिने रुके हमें एक से बढ़कर एक गीत सुनवा रहे हैं तो हमने सोचा कि क्यों आज हम श्रोताओं के साथ मिलकर सुजॉय जी को कुछ सुनाएँ. ओल्ड इस गोल्ड के दो नियमित श्रोताओं ने जो खुद गायन भी करते रहे हैं पिछले कई सालों से, चुने हैं सुजॉय द्वारा अब तक प्रस्तुत १५० गीतों में से दो गीत और उन्हें खुद अपनी आवाज़ से सजा कर ये कलाकार रोशन करने वाले हैं आज की महफिल. सुजॉय की अद्भुत प्रतिभा और मेहनत के नाम आज के शाम की पहली शमा रोशन कर रही हैं ओल्ड इस गोल्ड की बेहद नियमित श्रोता जिन्हें हम प्रोग्राम का "लाइव वायर" भी कह सकते हैं, जी हाँ आपने सही पहचाना स्वप्न मंजूषा शैल "अदा" जी....जो पेश कर रही है ओल्ड इस गोल्ड की १२६ वीं महफिल में बजा गीत "बेकरार दिल तू गाये जा...". सुनिए और आवाज़ की इस मधुरता में डूब जाईये -



और अब सुनिए आवाज़ के एक अहम् घटक दिलीप कवठेकर साहब की आवाज़ में ओल्ड इस गोल्ड की १४८ वीं महफिल से एक ऐसा नगमा जो आज कई दशकों बाद भी उतना ही जवाँ, उतना ही तारो-ताजा है. दिलीप जी की खासियत ये है कि स्टेज में ये किसी ख़ास गायक के गीत ही नहीं गाते, बल्कि अपनी खुद की आवाज़ में मुक्तलिफ़ गायकों के गीत चुन कर प्रस्तुत करते हैं. प्रस्तुत गीत में भी आप दिलीप जी की आवाज़ के मूल तत्वों को महसूस कर पायेंगें. तो सुजॉय, पूरी ओल्ड इस गोल्ड टीम और सभी श्रोताओं के नाम पेश है दिलीप जी का गाया ये तराना -



चलिए अब बारी है एक जरूरी घोषणा की. हर शाम हम ओल्ड इस गोल्ड पर गीत के साथ साथ अगले गीत से जुडी एक पहेली भी पूछते हैं ऐसा इसलिए रखा गया ताकि हम इसे "इंटरएक्टिव" बना सकें. पर हमारे कुछ श्रोताओं ने सुझाव दिया कि अक्सर लोग पहेली की धुन में मूल गीत पर चर्चा करने से चूक जाते हैं और ऐसे श्रोता जिनकी जानकारी पुराने गीतों को लेकर उतनी अच्छी नहीं है उनके लिए जुड़ने का कोई माध्यम नहीं रह जाता. इसी समस्या के समाधान के लिए आज हम जरूरी घोषणा करने जा रहे है. अब से आप पहेली सुलझाने के साथ साथ अपनी फरमाईश का कोई गीत भी हमसे बजवाने को कह सकते हैं.

जी हाँ, किसी भी एपिसोड में टिप्पणी के रूप में आप अपनी पसंद के किसी गीत की फरमाईश रख सकते हैं. आप अपने किसी मित्र /साथी से भी अपनी फरमाईश रखने को कह सकते हैं. आपकी फरमाईश पूरी हो इसके लिए कुछ शर्तें होंगीं जो इस प्रकार हैं -

१. आप वही गीत अपनी पसदं के लिए चुन सकते हैं जिनके साथ आपके जीवन का कोई पल, कोई मोड़, कुछ यादें जुडी हों, गीत के साथ साथ आपको अपनी उन ख़ास यादों और पलों को हम सब के साथ बाँटना पड़ेगा ५०-१०० शब्दों में. आपको अपना ये अनुभव हिंदी में लिख कर hindyugm@gmail.com पर भेजना होगा. हिंदी में लिखने के लिए आप यहाँ से मदद ले सकते हैं. फिर भी यदि समस्या हो तो आप रोमन में लिख कर भेज सकते हैं.

२. आपकी पसदं का गीत आपके अनुभव के साथ "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला में सुनवाये जायेंगें. यूं तो हमारी पूरी कोशिश रहेगी कि आपकी पसदं का वो ख़ास गीत हम दुनिया को सुनाएँ पर किसी कारणवश यदि तमाम कोशिशों के बावजूद वो गीत हमें उपलब्ध नहीं हो पाता तो आप निराश हुए बिना दुबारा कोशिश अवश्य कीजिएगा.

३. आप अपने किसी "ख़ास" के लिए भी कोई गीत समर्पित कर सकते हैं पर यहाँ भी यह जरूरी होगा कि उस ख़ास व्यक्ति के साथ जो आपके अनुभव रहे हैं उससे किसी न किसी रूप में वो गीत जुडा हुआ होना चाहिए.

४. आप ४० के दशक से सन् २००० तक आये किसी भी गीत की फरमाईश कर सकते हैं, अर्थात जरूरी नहीं कि आप किसी पुराने गीत को ही चुनें हाँ पर गीत मधुर हो तो अच्छा.

तो दोस्तों, आने वाली ४ तारिख को भाई बहन रिश्ते का पवित्र त्यौहार रक्षा बंधन है. क्यों न हम अपने इस आयोजन की शुरुआत इसी शुभ त्यौहार पर बने गीतों से करें. अपने भाई या बहन के साथ के आपके अनुभव और उससे जुडा कोई ख़ास गीत की फरमाईश आज ही लिख भेजिए हमें.

ओल्ड इस गोल्ड की अगली कड़ी लेकर एक बार फिर से सुजॉय जी उपस्थित होंगें कल शाम ६ से ७ के बीच. तब तक मैं सजीव सारथी लेता हूँ आपसे इजाज़त. नमस्कार.

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी..... एक फ़रमाईश जो पहुँची कफ़ील आज़र तक

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३२

ज महफ़िल-ए-गज़ल की ३२वीं कड़ी है और वादे के अनुसार हम फ़रमाईश की पहली गज़ल/नज़्म लेकर हाज़िर हैं। जिन लोगों को फ़रमाईश वाली बात पता नहीं, उनके लिए हम पिछली बार के पोस्ट पर की गई टिप्पणी वापस यहाँ पेस्ट किए दे रहे हैं। पिछली बार "शामिख" जी ने यह सवाल उठाया था तो हमारा जवाब कुछ यूँ था: हमने २५वें से २९वें एपिसोड के बीच प्रश्नों का एक सिलसिला चलाया था। उन पहेलियों/प्रश्नों का जिन्होंने भी सही जवाब दिया, उन्हें हमने अंकों से नवाज़ा। इस तरह पाँच एपिसोडों के अंकों को मिलाने से हमें दो विजेता मिले - शरद साहब और दिशा जी। हमने वादा किया था कि जो भी विजेता होगा वो हमसे ५ गज़लों की फ़रमाईश कर सकता है, जिनमें से हम किन्हीं भी ३ गज़लों की फ़रमाईश पूरी करेंगे। इस तरह चूँकि दो विजेता हैं इसलिए हम फ़रमाईश की ६ गज़लों/नज़्मों को ३२वें से ४२वें एपिसोड के बीच पेश करेंगे। तो लीजिए हम हाज़िर हैं अपनी पहली पेशकश के साथ....अहा! अपनी नहीं, "शरद" जी की पहली पेशकश के साथ। आज की नज़्म की फ़रमाईश शरद जी ने हीं की थी। वैसे "दिशा" जी को हम याद दिलाना चाहेंगे कि उनकी फ़रमाईशों की फ़ेहरिश्त अभी तक हम तक पहुँची नहीं है। इसलिए कृप्या वे शीघ्रता दिखाएँ। चलिए अब बढते हैं नज़्म की ओर। इस नज़्म की खासियत यह है कि इसे अमूमन सभी लोग सुन चुके हैं और लगभग सभी को यह पता है कि इसे "जगजीत सिंह" जी ने गाया है। लेकिन चूँकि आप "महफ़िल-ए-गज़ल" के मुखातिब हैं तो आपको यह भी मालूम होगा कि हम आसानी से हासिल होने वाली चीज तो आपके सामने लाते नहीं। जी हाँ! हम आज अपनी इस महफ़िल में "जगजीत सिंह" की बात नहीं करेंगे। यह इसलिए नहीं है कि हमारी उनसे कुछ ठनी हुई है, बल्कि इस लिए हैं क्योंकि हमने पुरानी लगभग तीन कड़ियों में इनकी बातें की थी। यूँ तो जगजीत सिंह एक ऐसे शख्सियत हैं, जिन पर बिना रूके कई सारे आलेख लिखे जा सकते हैं, लेकिन कभी-कभार उन्हें भी याद कर लेना चाहिए जिन्हें दुनिया उतना भाव नहीं देती जितने के वे हक़दार होते हैं। यहाँ हमारा इशारा उन शायरों की तरफ़ है, जो खुद तो गुमनामी के अंधेरों में कहीं गुम हो गए लेकिन उनकी गज़लों/नज़्मों को गाकर कई सारे फ़नकार बुलंदियों के सातवें आसमान तक पहुँच गए। यही सोचकर हमने यह फ़ैसला लिया कि क्यों न आज की महफ़िल को हम नज़्मकार के हवाले कर दें।

बात कुछ संजीदा है, लेकिन मेरे अनुसार इस बात को कभी न कभी तो उठाया हीं जाना चाहिए। बहुत दिनों से मेरे जहन में यह बात थी, लेकिन ढूँढते-ढूँढते मुझे "पवन झा" (गुलज़ार साहब के शायद सबसे बड़े प्रशंसक) का एक आलेख मिला जिसमें उन्होंने "निदा फ़ाज़ली" के कुछ अल्फ़ाज़ पेश किए थे। निदा फ़ाज़ली कहते हैं: एक शायर मुझे अक्सर बांद्रा में एक ईरानी होटल के बाहर फुटपाथ पर, शंभू पान वाले की दुकान के पास खड़े नज़र आते थे। पहली मुलाकात में ख़ूबसूरत चेहरे के जवान इंसान थे। कुछ दिन बाद मिले, तो बिखरे-बिखरे परेशान थे। तीसरी बार कई महीनों के बाद नज़र आए, तो वह जानदार होते हुए बेजान थे; उनके शहर लखनऊ की शान थी न शरीर और आंखों में पहले जैसी पहचान थी। उस वक्त वह अनूप जलोटा के लिए भजनों का एक कामयाब एलबम लिख चुके थे। उस एलबम से आवाज़ ने लाखों कमाए, लेकिन शब्दों ने उनकी बेवक्त मृत्यु तक, फुटपाथ पर ही बिस्तर बिछाए, ज़रूरतों में आते-जाते लोगों के सामने हाथ फैलाए--

गीत बहुत सुंदर है लेकिन सच-सच कहना यार
पिछले हफ्ते बिन भोजन के सोए कितनी बार।

शास्त्रीनगर के एक क़ब्रिस्तान में साहिर, जांनिसार और राही के साथ, अपने युग की हसीन हीरोइन मधुबाला और ख़ूबसूरत आवाज़ के गायक मुहम्मद रफ़ी भी आराम कर रहे हैं। लेकिन दुनिया की भागदौड़ से दूर इस आराम के स्थान में बाज़ार अपने तराजू-बाट लेकर घुस आया है। बाज़ार ने मधुबाला के चेहरे की कीमत ज्यादा लगाई और उसकी क़ब्र संगमरमर की बनाई। मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ का भाव भी अच्छा लगाया, और उनकी क़ब्र को ग्रेनाइट से सजाया। साहिर, जांनिसार और राही के पास न चेहरा था, न आवांज वे सिर्फ अल्फ़ाज़ थे और अल्फ़ाज़ की कीमत सबसे कम लगाई गई, इसीलिए उनको गहरी नींद से जगाकर उन्हीं के अंतिम घरों में दूसरों के लिए जगह बनाई गई। अब साहिर के साथ और भी कई दूसरे उनके तंग मकान में रहते हैं। जांनिसार भी ग़ैरज़रूरी मेहमानों की मौजूदगी का अज़ाब सहते हैं और आधा गांव वाले राही भी बाज़ार के बहाव में इधर-उधर बहते हैं। शायद बाज़ार की इसी हठधर्मी को देखकर लेखिका इस्मत चुग़ताई और शायर नून मीम राशिद ने, अपनी वसीयत में खुद को दफ़नाने के बजाए, जलाए जाने की ख़्वाहिश की थी। पंडित नेहरू के जमाने में, इलाहाबाद में एक कवि था। कई वर्षों से उसके सर पर आसमान की छत थी और उसका नाम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला था। निराला जी की लाइनें हैं-

दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूं आज जो नहीं कही।


इसी कड़ी में वे आज के नज़्मकार का ज़िक्र ले आते हैं: जगजीत सिंह और पंकज उधास विश्व भर में आदर से सुने जाने वाले ग़ज़ल गायकों में हैं। जगजीत सिंह ग़ज़ल गायन से लाखों कमाते हैं और रेस कोर्स में आज घोड़े दौड़ाते हैं। मशहूर नज़्म 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी' के शायर कफ़ील आज़र, ग़रीबी में मज़ार बन कर दिल्ली के एक क़ब्रिस्तान में भूले-भटके परिचितों को रूलाते हैं। पंकज उधास जिनकी ग़ज़लें गा कर, मुंबई के सबसे पॉश इलाके में अपनी किस्मत को आईना दिखाते हैं, उनके लिए ग़ज़लें लिखने वाले मुमताज़ राशिद को माहिम दरगाह में एक कमरे के मकान से लोखंडवाला के डेढ़ कमरे वाले मकान तक आते-आते 35 साल लग जाते हैं। इस तरह "निदा फ़ाज़ली" साहब ने शायरों के दर्द को अपनी आवाज़ दी है। शायरों की अजनबियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमें जगजीत सिंह के बारे में सब कुछ पता है,लेकिन "कफ़ील आज़र" के बारे में कुछ भी जानकारी ढूँढने से भी नहीं मिलती। इनका कब जन्म हुआ,इनकी परवरिश कहाँ हुई, इन्होंने कितनी सारी गज़लें/नज़्में लिखीं, इसका ब्योरा शायद हीं किसी के पास हो। बमुश्किल मुझे इतना पता चल सका है कि दिनांक २७ नवंबर २००३ को अमरोहा में इन्होंने अपनी अंतिम साँसें लीं। इतिहास के पन्नों को कुरेदने इस बात का ज़िक्र मिलता है कि "कमाल अमरोही" की सदाबहार प्रस्तुति "पाकीज़ा" के ये "असिसटेंट डायरेक्टर" रह चुके हैं। इन्होंने कुछ फिल्मों और एलबमों के लिए गाने भी लिखे, जिनमें प्रमुख हैं: फिल्म "कर्त्तव्य" में "मेरा दिल लेके चल दिये", "दूरी ना रहे कोई", "छैला बाबू तू कैसा दिलदार", फिल्म "एक हसीना दो दीवाने" से "दो क़दम तुम भी चलो", फिल्म "काँच की दीवार" से "अईयो ना मारो", "ना इधर के रहे", "बिछड़ गए हैं", "अरी ओ सखी", "जलवों की हमारे", एलबम "चोर दरवाज़ा" से "तुम जहाँ जाएगो मुझको भी वहीं", एलबम "द जीनियस आफ़ तलत महमूद" से "बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी"। जी हाँ, जगजीत सिंह से पहले तलत महमूद ने भी इस नज़्म को अपनी आवाज़ दी थी। अब चूँकि इससे ज्यादा इनके बारे में कहीं कुछ दर्ज नहीं है, इसलिए अच्छा है कि इनका लिखा एक शेर हीं देख लिया जाए:

मोम के रिश्ते हैं गर्मी से पिघल जायेंगे
धूप के शहर में 'आज़र' ये तमाशा न करो|


रिश्ते तो नहीं पिघले,लेकिन ’आज़र’ साहब वो तमाशा करके चले गए जिससे आए दिनों सुनने वालों के दिल पिघलते रहते हैं। हम तो यही दुआ करेंगे कि वह बात जो हमने आज यहाँ निकाली है, ज़रूर हीं दूर तलक जाए और आने वाले दिनों में शायरों को भी वही रूतबा हासिल हो जो गायकों और संगीतकारों को है। आमीन! चलिए अब आज की नज़्म का नज़ारा करते हैं। सुनिए और महसूस कीजिए कि ’आज़र’ साहब ने अपनी "प्रेमिका" के बहाने से कितनी गूढ बात कही है:

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशां क्यूं हो
उगलियां उठेंगी सुखे हुए बालों की तरफ
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ
चूड़ियों पर भी कई तन्ज़ किये जायेंगे
कांपते हाथों पे भी फिकरे कसे जायेंगे

लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों मे मेरा ज़िक्र भी ले आयेंगे
उनकी बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तासुर से समझ जायेंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

ऊंची इमारतों से ___ मेरा घिर गया,
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए...

आपके विकल्प हैं -
a) समान, b) मकान, c) मचान, d) जहान

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"परेशां" और शेर कुछ यूं था -

फ़ल्सफ़े इश्क़ में पेश आये सवालों की तरह
हम परेशां ही रहे अपने ख़यालों की तरह...

इस शब्द को सबसे पहले पकड़ा दिशा जी ने। दिशा जी का शेर गौर फरमाएं -

हर कोइ है परेशाँ हर कोइ है हैरान
कौन लाया है यह नफरत का तूफान
किसने बदल दी आबोहवा वतन की
टुकड़ों में बाँट दिया सारा हिन्दुस्तान।

बड़ी हीं गूढ बात कही है आपने। सच में आखिर कौन है जो हमारे इस अमन-पसंद वतन को खुश नहीं देख सकता।

शामिख फ़राज़ साहब कुछ देर तक "परेशां" और "पशेमां" के बीच पशोपेश में दिखे। लेकिन आखिरकार उन्होंने सही शब्द का हीं चुनाव किया। फ़राज़ साहब ने ना सिर्फ़ "परेशां" पर एक शेर पेश किया बल्कि हमें वो गज़ल भी सुनाई जिससे पिछली बार का शेर लिया गया था। फ़राज़ साहब का बहुत-बहुत शुक्रिया। तो पेश है वो शेर जिसे फ़राज़ साहब ने जनाब क़तील शिफ़ाई की एक गज़ल से लिया है:

परेशा रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ
सुक़ूत-ए-मर्ग ता'री है, सितारो तुम तो सो जाओ।

मंजु जी भी स्वरचित शेर के साथ महफ़िल में तशरीफ़ लाईं। उनका शेर कुछ यूँ था:

परेशाँ रहती हूं उससे सवालों की तरह
इंतजार रहता है उसका जवाबों की तरह।

क्या मंजू जी, यहाँ भी सवालों का हीं ज़िक्र। लगता है कि सवालों और महफ़िल-ए-गज़ल में कोई गहरा नाता है :)

सुमित जी की अदा भी काबिल-ए-तारीफ़ है। शेर की जगह पर रफ़ी साहब के एक गाने की याद दिला दी और शेर सुनाया भी तो तबाही और हवालों वाला। अब तो आप हवालों का मतलब जान गए होंगे।

और सबसे ज्यादा जिनकी अदा हमें चकित करती है, उन महानुभाव का नाम है "मनु जी"। इन्हें सही जवाब से कोई लेना-देना हीं नहीं है, जवाब में भी सवाल दाग के चल दिए और शेर सुनाया भी तो "सवालों" वाला हीं। भाई साहब अगर परेशां जवाब सही लगा तो ये क्यों लिखा की "परेशा/पशेमान जो भी हो".... कहीं आपके लिए हीं तो ये पंक्ति नहीं लिखी गई थी - "अपनी धुन में रहता हूँ।" :)

चलिए इन्हीं बातों के साथ आज की महफ़िल की शम्मा बुझाई जाए। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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