Thursday, June 28, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 3


मैंने देखी पहली फिल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ के दूसरे अंक में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, अपने सम्पादक सजीव सारथी का संस्मरण। अपने पहले अंक में ही हमने घोषित किया था कि ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल की प्रविष्टियाँ गैरप्रतियोगी वर्ग में होंगी, अर्थात प्रतियोगिता में इन प्रविष्टियों का मूल्यांकन नहीं किया जाएगा। परन्तु जब आपकी प्रविष्टियों का सिलसिला शुरू होगा तब हमारे निर्णायक मण्डल के सदस्य उनका मूल्यांकन करेंगे। तो आइए, आज सजीव सारथी की देखी पहली फिल्म 'शोले' के संस्मरण का आनन्द लेते हैं।

चार साल का था जब दिल्ली आया। यहाँ पापा के पास एक रेडियो हुआ करता था, जर्मन मेड, जिसने मेरा परिचय फिल्म संगीत से करवाया। उन दिनों घर में टी.वी. नहीं था। वास्तव में पूरे मोहल्ले में ही कुछ गिने-चुने घरों में ही ये राजसी ठाठ उपलब्ध था और दूरदर्शन से मात्र रविवार को प्रसारित होने वाली फिल्मों और बुधवार शाम को टेलीकास्ट होने वाले चित्रगीत को देखने के लिए इन घरों में पूरे मोहल्ले के बच्चे जमा हो जाया करते थे। पर पापा ने हमें इज़ाज़त नहीं दी थी, किसी के घर जाने की, तो मन मसोस कर रह जाते थे। हाँ, बायस्कोप वाला आता था तो एक या दो पैसे देकर तस्वीरें देखने की अनुमति अवश्य मिल जाती थी।

उन दिनों हम दिल्ली में इण्डियागेट के पास मानसिंह रोड के सरकारी आवास में रहते थे। जहाँ से “स्टेडियम” और “रेसकोर्स” थियेटर घर से नजदीक थे। वास्तव में ये आम आदमियों की सुविधा के लिए बने सस्ते थियेटर थे जहाँ बड़े सिनेमाघरों से निकलने के बाद फिल्म लगती थी और बेहद कम दामों में टिकट मिलते ये। वर्ष १९७८ की बात है, “शोले” नाम की ‘मील का पत्थर’ फिल्म, जो करीब दो साल पहले रिलीज हुई होगी। बड़े-बड़े थियटरों में धूम मचाने के बाद आखिरकार स्टेडियम में प्रदर्शित हुई और पापा मुझे और मम्मी को बड़े शान से ये फिल्म दिखाने ले गए। मम्मी बताती है कि मैं जो कभी पाँच मिनट भी एक जगह चैन से नहीं बैठता था, पूरी तीन-साढ़े तीन घण्टे की फिल्म के दौरान एकटक स्क्रीन को देखता रहा और जरा भी नहीं हिला। वैसे तो चार साल का बच्चा कहाँ सब कुछ अच्छे से समझ पाता होगा। पर मुझे याद है, करीब 10 साल बाद मैंने ये फिल्म दुबारा वी.सी.आर. पर देखी और मुझे कोई भी दृश्य ऐसा नहीं लगा जैसे पहली बार देख रहा हूँ। कहने का तात्पर्य ये है कि “शोले” दृश्य दर दृश्य, संवाद दर संवाद मेरे नन्हें हृदय में समां गई और मुझे इल्म भी नहीं हुआ।
अपने माता-पिता के साथ बालक सजीव 

कहते हैं कि बचपन में देखी तस्वीरें जो आपके जेहन में बस जाए, उनसे आपके भविष्य की संवेदनाएँ प्रतिबिम्बित होती रहती है। हो सकता है कि कहीं न कहीं जय और वीरू की दोस्ती ने मुझे दोस्ती का महत्व समझाया हो (आज भी मैं अपने बचपन के सभी यारों के सम्पर्क में हूँ), कटे हाथों वाले ठाकुर के जीवट ने मुझे मेरी शारीरिक अक्षमताओं पर विजय पाने की राह दिखाई हो, गब्बर सिंह के बुरे अंजाम ने अच्छे-बुरे का फर्क समझाया हो या फिर खामोश विधवा बनी ठाकुर की बहु ने मुझे जीवन का एक अनदेखा पहलू दिखाया हो, कह नहीं सकता कि किन रूपों में इस फिल्म ने मेरे अन्तर्मन को छुआ होगा, पर यकीनन अपनी देखी इस पहली फिल्म का मुझ पर गहरा असर हुआ है, इस बात से इनकार नहीं कर सकता।

मम्मी बताती है कि फिल्म देखने के बाद जब हम घर आये तो मैं बहुत उदास लग रहा था और जय की मौत के बारे में सोचकर रोना आ रहा था। मम्मी के पूछने पर मैंने बताया कि कितना अच्छा आदमी था, बेचारा मर गया। यह सुन कर पापा-मम्मी खूब हँसे थे। तब मुझे पापा ने समझाया कि ये मात्र फिल्म थी और जय के किरदार को निभाने वाले अमिताभ बच्चन जिन्दा हैं, पर मुझे यकीन नहीं हुआ। जब मैं बार-बार मनाने पर भी नहीं माना तो कुछ एक-दो हफ्ते के बाद पापा मुझे अमिताभ बच्चन की फिल्म “दोस्ताना” दिखाने ले गए, जो मेरे जीवन की दूसरी देखी हुई फिल्म बनी, ताकि मुझे अमिताभ को देख कर तसल्ली हो जाए कि वो मरे नहीं, जिंदा हैं।

स्टेडियम और रेसकोर्स के इन थियटरों में मैंने बहुत सी फ़िल्में देखी और सच कहूँ तो एक-एक फिल्म दिलो-जेहन में आज भी बसी हुई है। ‘शोले’ फिल्म से जो सिलसिला शुरू हुआ वह राम बलराम, कातिलों के कातिल, याराना, लव स्टोरी, नौकर बीवी का, तीसरी आँख, प्रेमरोग से लेकर नगीना तक जारी रहा। स्टेडियम और रेसकोर्स का साथ टूटा, “क़यामत से क़यामत तक” पर आकर, जब पहली बार पापा-मम्मी से अलग, दोस्तों के साथ फिल्म देखी, कनॉट प्लेस के रीगल सिनेमा पर। इसके बाद कभी स्टेडियम या रेसकोर्स पर जाना नहीं हुआ। मुझे पता नहीं ये सिनेमाघर अब मौजूद है या नहीं। जहाँ तक मेरा ख़याल है चूँकि ये दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण और महँगे इलाकों में बसे थे, इन्हें बंद करके सरकारी दफ्तरों में बदल दिया गया है। पर इन सिनेमाघरों से जुडी यादों को अपनी देखी पहली फिल्म “शोले” के बहाने आप सब के साथ बांटना आज भी सुखद लग रहा है। दिल्ली के पुराने चार्म को सलाम।

मित्रों, अब आप भी आनन्द लीजिए, सजीव सारथी की देखी पहली फिल्म ‘शोले’ का वह गीत का, जो उन्हें बेहद पसन्द है। सुनिए- मन्ना डे और किशोर कुमार के स्वरों में, आनन्द बक्शी का लिखा और राहुलदेव बर्मन का संगीतबद्ध किया यह गीत।

फिल्म – शोले : ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे...’ : मन्ना डे, किशोर कुमार



हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख हमे मेल करें।

आलेख – सजीव सारथी
प्रस्तुति – कृष्णमोहन मिश्र
   

6 comments:

Sujoy Chatterjee said...

bahut badhiya lagaa. aur aapke bachpan ki tasveer bhi. mere papa ke paas bhi aisa hi ek cycle huya karta tha.

Sajeev said...

thanks sujoy, haan ham log same age group ke hain to kaafi kuch ek jaisa hoga hamare anubhavon men bhi :)

Sajeev said...

thanks sujoy, haan ham log same age group ke hain to kaafi kuch ek jaisa hoga hamare anubhavon men bhi :)

रंजू भाटिया said...

बहुत बेहतरीन :) बढ़िया रही यह यादो की कड़ी सजीव जी

Smart Indian said...

एक नन्हे बच्चे के इम्प्रेशंस, बहुत सुन्दर!

सुनीता शानू said...

वाह क्या बात है सीधे ही शोले देख आये और वो भी चार साल की उम्र में:) हमसे तो आप ही अच्छे रहे हहह यहाँ तो इतनी बड़ी उम्र में फ़िल्म का नाम लेना ही समझो डांट खाना था। अच्छा लगा आपका पहली फ़िल्म देखने का संसमरण। बधाई सजीव।

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