Saturday, April 3, 2010

अपलम चपलम चपलाई रे....गुदगुदाते शब्द मधुर संगीत और मंगेशकर बहनों की जुगलबंदी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 393/2010/93

ज़ोहराबाई -शमशाद बेग़म और सुरैय्या - उमा देवी की जोड़ियों के बाद 'सखी सहेली' की तीसरी कड़ी में आज हम जिन दो गायिकाओं को लेकर उपस्थित हुए हैं, वो एक ऐसे परिवार से ताल्लुख़ रखती हैं जिस परिवार का नाम फ़िल्म संगीत के आकाश में सूरज की तरह चमक रहा है। जी हाँ, मंगेशकर परिवार। जो परम्परा स्व: दीनानाथ मंगेशकर ने शुरु की थी, उस परम्परा को उनके बेटे बेटियों, लता, आशा, उषा, मीना, हृदयनाथ, आदिनाथ, ने ना केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उसे उस मुकाम तक भी पहुँचाया कि फ़िल्म संगीत के इतिहास में उनके परिवार का नाम स्वर्णाक्षरों से दर्ज हो गया। आज इसी मंगेशकर परिवार की दो बहनों, लता और उषा की आवाज़ों में प्रस्तुत है एक बड़ा ही नटखट, चंचल और चुलबुला सा गीत सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा १९५५ की फ़िल्म 'आज़ाद' का वही सदाबहार गीत "अपलम चपलम"। कहा जाता है कि फ़िल्म 'आज़ाद' के निर्माता एस. एम. एस. नायडू ने पहले संगीतकार नौशाद को इस फ़िल्म के संगीत का भार देना चाहा, पर उन्होने नौशाद साहब के सामने शर्त रख दी कि एक महीने के अंदर सभी ९ गीत तय्यार चाहिए। नौशाद साहब ने यह शर्त मंज़ूर नहीं की। उनके बाद कोई भी संगीतकार इस चैलेंज को स्वीकार करने का साहस नहीं किया। आख़िरकार सी. रामचन्द्र ने चुनौती स्वीकारा और सच में उन्होने एक महीने के अंदर सभी गानें रिकार्ड करके ना केवल सब को चकित किया, बल्कि सारे के सारे गानें लोकप्रियता की बुलंदी तक भी पहुँचे। इस फ़िल्म से जुड़ी हुई एक और दिलचस्प बात भी आपको बताता चलूँ। 'दाग़', 'संगदिल', 'फ़ूटपाथ, और 'देवदास' जैसी दुखांत वाली फ़िल्में करने के बाद दिलीप कुमार मानसिक तौर से बिमार हो चले थे, और मानसिक अवसाद उन्हे घेरने लगी थी। ऐसे में उनके डॊक्टर ने उन्हे इस तरह की फ़िल्में करने से मना किया। जब नायडू साहब ने दिलीप साहब को 'आज़ाद' में एक बहुत ही अलग किस्म का सुपरहीरो का किरदार निभाने का अवसर दिया, तो धीरे धीरे वो फिर एक बार मानसिक तौर से चुस्त दुरुस्त हो गए।

लता जी और उषा जी ने इस फ़िल्म में दो हिट युगल गीत गाए, एक तो आज का प्रस्तुत गीत है, और दूसरा गाना था पंजाबी रंग का "ओ बलिए, चल चलिए, आ चलें वहाँ, दिल मिले जहाँ"। दोस्तों, भले ही लता जी और आशा जी के संबंध को लेकर हमेशा से लोगों में उत्सुकता रही है, लेकिन लता जी और उषा जी के बीच कभी कोई ऐसी वैसी बात नहीं सुनी गई। बल्कि लता जी और साथ उषा जी हमेशा साथ में रहती हैं। हाल के कुछ वर्षों में लता जी जिस किसी भी फ़ंक्शन में जाती हैं, उषा जी उनके साथ ही रहती हैं। उषा जी जब विविध भारती पर 'जयमाला' कार्यक्रम पेश करने आईं थीं, उसमें उन्होने लाता जी और आशा जी के सम्मान में बहुत सी बातें कीं थीं। आइए आज उसी कार्यक्रम के एक अंश को यहाँ पढ़ें, जिसमें उषा जी बता रही हैं लता जी के बारे में। "बचपन से ही मैं लता दीदी के साथ रिकार्डिंग् पर जाया करती थी। उस दौर में फ़िल्म के अलावा रिकार्ड के लिए अलग से दोबारा गाना पड़ता था। 'कठपुतली' फ़िल्म के एक गाने की रिकार्डिंग् दोपहर २ बजे तक चलती रही। बहुत गरमी थी, बजाने वाले भी गरमी से तड़प रहे थे और गाना बार बार रीटेक हो रहा था। लता दीदी २०-२५ बार गाने के बाद बेहोश हो कर गिर पड़ीं। फिर वो ठीक भी हो गईं, लेकिन इस हादसे से इतना ज़रूर अच्छा हुआ कि उस रिकार्डिंग् स्टुडियो में एयर कंडिशनर लगवा दिया गया। लता दीदी के बारे में कोई क्या कह सकता है! दुनिया जानती है कि ऐसी आवाज़ एक बार ही जनम लेती है। ऐसी आवाज़ जिसे सुन कर मन को सुकून और शांति मिलती है!" और अब दोस्तों, लता जी और उषा की शरारती अंदाज़ का नमूना, फ़िल्म 'आज़ाद' के इस मचलते, थिरकते गीत में, आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि उषा मंगेशकर ने शास्त्रीय नृत्य की तालीम भी ली थी, और गायन के अलावा उन्हे चित्रकारी का भी बहुत शौक रहा है।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"धूल", गीतकार बताएं -३ अंक.
2. गीता दत्त के साथ किस गायिका ने इस भजन में अपनी आवाज़ मिलायी है- २ अंक.
3. लीला चिटनिस के साथ कौन सी नायिका ने परदे पर निभाया है इस गीत को-२ अंक.
4. संगीतकार कौन है फिल्म के -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह वाह सब ने जबरदस्त वापसी की है इस बार. इंदु जी आपको ३ अंक और शरद जी, पदम जी और अनीता जी को २- २ अंकों की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सुनो कहानी: चार बेटे - हरिशंकर परसाई

सुनो कहानी: चार बेटे - हरिशंकर परसाई
'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा लिखित रचना "मैं एक भारतीय" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्य "चार बेटे", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

"चार बेटे" का कुल प्रसारण समय मात्र 8 मिनट 44 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

गृहस्थ धर्म की एक ज़रूरी रस्म पत्नी को पीटने की भी होती है।
(हरिशंकर परसाई के व्यंग्य "चार बेटे" से एक अंश)


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VBR MP3
#67th Story, Char Bete: Harishankar Parsai/Hindi Audio Book/2010/12. Voice: Anurag Sharma

Friday, April 2, 2010

बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से...सुरैया और उमा देवी के युगल स्वरों में ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 392/2010/92

'सखी सहेली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। महिला युगल गीतों की इस शृंखला में कल आप ने ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म का गाया एक बच्चों वाला गाना सुना था। आज हमने जिन दो गायिकाओं को चुना है वे हैं सुरैय्या और उमा देवी। बहुत ही दुर्लभ जोड़ी है, और इस जोड़ी की याद आते ही हमें झट से याद आती है १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का वही सुरीला गीत, याद है ना "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से, जिस दिन से मेरा चांद छुपा मेरी नज़र से"। बहुत दिनों से आपने यह गीत नहीं सुना होगा, है ना? तो चलिए आज उन पुरानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा कीजिए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत से जिसकी तर्ज़ बनाई थी नौशाद अली ने। फ़िल्म 'दर्द' का निर्माण व निर्देशन किया था अब्दुल रशीद कारदार ने, जिन्हे हम ए. आर. कारदार के नाम से बेहतर जानते हैं। श्याम, नुसरत, मुअव्वर सुल्ताना, सुरैय्या, बद्री प्रसाद, हुस्न बानो, प्रतिमा देवी प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म से ही शक़ील और नौशाद की जोड़ी शुरु हुई थी। इस फ़िल्म के कुछ गीत उमा देवी ने गाए, कुछ सुरैय्या ने, और शमशाद बेग़म की भी आवाज़ थी इस फ़िल्म में। मैं पूरी यक़ीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन जितना मैंने जाना है कि इस फ़िल्म में किसी पुरुष गायक की आवाज़ नहीं थी। इस फ़िल्म की जब भी बात चलती है तो सब से पहले उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ" गीत ज़हन में आता है। इस गीत को हमने कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं पर केन्द्रित शृंखला 'हमारी याद आएगी' में हमने सुनवाया था। इस गीत का फ़िल्मांकन मुनव्वर सुल्तना पर हुआ था। अब क्योंकि इस फ़िल्म में सुरैय्या भी थीं, तो ज़ाहिर है कि उन पर फ़िल्माए गीत उन्होने ही गाए होंगे। आज का प्रस्तुत युगल गीत मुनव्वर सुल्ताना और सुरैय्या पर फ़िल्माया हुआ है, और ऐसा लगता है कि प्रेम त्रिकोण की कहानी रही होगी यह फ़िल्म, और ये दोनों नायिकाएँ अपने अपने दिल की बातें गीत के शक्ल में बयाँ कर रही हैं, लेकिन एक ही पुरुष के लिए। पहला और तीसरा अंतरा उमा देवी ने गाया है जब कि दूसरा अंतरा सुरैय्या की आवाज़ में है। हैरत की बात है कि इन दोनों की आवाज़ों में बहुत ज़्यादा कंट्रास्ट सुनाई नहीं देता इस गीत में। इस गीत की अदायगी जितनी प्यारी है, उतने ही सुंदर हैं शक़ील साहब के बोल, और नौशाद साहब ने भी क्या धुन बनाई है। गाने का जो मूल रीदम है, वह बंगाल के कीर्तन शैली की तरह सुनाई देता है।

१९९१ में उमा देवी विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और सुरैय्या के साथ उनके गाए हुए इस गीत को बजाया भी था और इसके बारे में बताया भी था। पेश है उस कार्यक्रम का वह अंश: "मेरे सज्जनों, मैं तुम्हे थोड़ी सी आप बीती सुनाती हूँ। मशहूर हीरोइन सुरैय्या, फ़िल्म स्टार सुरैय्या, हाय हाय हाय हाय, सुरैय्या के साथ मैंने फ़िल्म 'दर्द' का यह गाना गाया था। आप लोग ख़ूब सुनते हैं यह गाना। उसमें मैं भी उनके साथ खड़ी होकर, बिल्कुल उनसे लिपटी खड़ी गा रही थी, "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से"। इसमे हम दोनों ने अपने अपने गाने की अदायगी की थी, ज़रा सुनिए तो..." और इस गीत के ख़त्म होते ही उमा जी कहती हैं, "क्यों, अच्छा लगा ना? मैं आपको अच्छी लगती हूँ ना? आप भी मुझे बड़े अच्छे लगते हैं। अरे, अगर आप यहीं सामने खड़े होते तो तुम्हे गले से चिपड चिपड कर जाने ही नहीं देती।" दोस्तों, क्योंकि उमा देवी उसके बाद टुनटुन बन चुकी थीं, इसलिए विविध भारती के उस 'जयमाला' कार्यक्रम में उनकी बातों का अंदाज़ टुनटुन जैसा था और जो गानें उन्होने सुनवाए, वो उमा देवी ने सुनवाए। बहुत ही प्रतिभाशाली अदाकारा थीं वो। भली ही गायन में बहुत दूर तक नहीं पहुँचीं, लेकिन अपने हास्य अभिनय से न जाने कितने हज़ारों लाखों लोगों की होठों पर मुस्कान बिखेरा है उन्होने। और किसी के चेहरे पर मुस्कान खिलाने से बेहतर और कोई दूसरी इबादत नहीं हो सकती। दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि हमने केवल उमा देवी के बारे में ही बातें कीं, और सुरैय्या को भूल गए। हम वादा करते हैं कि इसके बाद जिस किसी भी दिन सुरैय्या जी का गाया हुआ कोई गीत सुनवाएँगे, उस दिन उनके जीवन से जुड़ी कुछ और बातें आप तक ज़रूर पहुँचाएँगे, वैसे उनसे जुड़ी बहुत सारी बातें हम पहले भी बता चुके हैं। और क्यों कि आज अभी आप बेताब होंगे इस बेताबी भरे गीत को सुनने के लिए, इसलिए हम आज यहीं रुक जाते हैं, सुनिए यह प्यारा सा गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि युं तो लोग यही जानते हैं कि उमा देवी को पहली बार नौशाद साहब ने फ़िल्म 'दर्द' में गवाया था, लेकिन हक़ीक़त यह है कि १९४६ में उमा देवी ने 'वामिक़ अज़रा' नामक एक फ़िल्म में गीत गाया था जिसके संगीतकर थे ए.आर. क़ुरेशी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"दुनिया", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिका बहनों ने गाया है इसे, एक लता है दूसरी का नाम बताएं- २ अंक.
3. निर्माता एस. एम. एस. नायडू की इस फिल्म के संगीतकार बताएं -२ अंक.
4. इस नटखट मस्ती भरी गीत के गीतकार कौन हैं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
क्या बात सब के सब चूके इस बार, पर शरद जी ने फिल्म का नाम सही बताया है, २ अंक जरूर मिलेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ...नए संगीत के तीसरे सत्र की शुरूआत, नजीर बनारसी के कलाम और रफीक की आवाज़ से

Season 3 of new Music, Song # 01

दोस्तो, कहते है किसी काम को अगर फिर से शुरू करना हो, तो उसे वहीं से शुरू करना चाहिए जहाँ पर उसे छोड़ा गया था. आज आवाज़ के लिए ख़ास दिन है. 29 दिसंबर को हमने जिस सम्मानजनक रूप से नए संगीत को दूसरे सत्र को अलविदा कहा था, उसी नायाब अंदाज़ में आज हम स्वागत करने जा रहे हैं नए संगीत के तीसरे सत्र का. हमने आपको छोड़ा था रफीक भाई की सुरीली आवाज़ पर महकती एक ग़ज़ल पर, तो आज एक बार फिर संगीत के नए उभरते हुए योद्धाओं के आगमन का बिगुल बजाया जा रहा हैं उसी दमदार मखमली आवाज़ से. जी हाँ दोस्तों, सीज़न 3 आरंभ हो रहा है नजीर बनारसी के कलाम और रफीक शेख की जादू भरी अदायगी के साथ. रफीक हमारे पिछले सत्र के विजेता रहे हैं जिनकी 3 ग़ज़लें हमारे टॉप 10 गीतों में शामिल रहीं, और जिन्हें आवाज़ की तरफ से 6000 रूपए का नकद पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था, इस बार भी रफीक इस शानदार ग़ज़ल के साथ अपनी जबरदस्त शुरूआत करने जा रहे हैं नए सत्र में। नजीर बनारसी की ये ग़ज़ल उन्हें उनके एक मित्र के माध्यम से प्राप्त हुई है, नजीर साहब वो उस्ताद शायर हैं जिनके बोलों को जगजीत सिंह और अन्य नामी फनकारों ने कई-कई बार अपने स्वरों से सजाया है, याद कीजिये "कभी खामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे..." या फिर "एक दीवाने को ये आये हैं समझाने..." जैसी उत्कृष्ट ग़ज़लें. दुर्भाग्यवश नजीर साहब के बारे बहुत अधिक जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं, हम गुजारिश करेंगें कि यदि आप में से कोई श्रोता उनके बारे कोई जानकारी हमें दे सकतें हैं तो अवश्य दें. हालाँकि ये ग़ज़ल उनकी अनुमति के बिना ही संगीतबद्ध हो कर यहाँ प्रसारित हो रही है, पर हमें पूरा यकीन है कि इस ग़ज़ल को सुनने के बाद नजीर साहब या उनके चाहने वालों को इस गुस्ताखी पर शिकायत की बजाय ख़ुशी अधिक होगी। तो पेश है दोस्तों, ये ग़ज़ल "एक रात में ...."

ग़ज़ल के बोल -

एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ,
मुफलिस का दीया हूँ मगर आंधी से लड़ा हूँ.

वो आईना हूँ कभी कमरे में सजा था,
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ.

मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया,
सिर्फ इसलिए कतरा हूँ, समुन्दर से जुदा हूँ.

दुनिया से निराली है 'नजीर' अपनी कहानी,
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ.




मेकिंग ऑफ़ "एक रात में..." - रफीक शेख (गायक/संगीतकार) के शब्दों में
मुझे ये ग़ज़ल रफीक सागर जी , जो रजा हसन के पिताजी हैं, उन्होंने दी थी. ये इतनी प्यारी ग़ज़ल है और बहुत ही सीधी भाषा में है जो सबको समझ में आएगी, इसके हर शेर ऐसा है कि सबको लगता है कि बस मेरी ही कहानी बोली जा रही है. कामियाबी पाना इतना आसान नहीं है, फिर भी जब हम किसी कामियाब इंसान को देखते हैं तो बड़ी आसानी से कहते हैं, कि 'भाई साहब आपके तो मजे हैं, गाडी बंगला सब कुछ है आपके पास', मगर हम ये नहीं जानते हैं कि उन चीजों को हासिल करने के लिए उस शख्स को क्या क्या करना पड़ा होगा....उसी को शायर इस अंदाज़ में कहता है कि "एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ, मुफलिस का दिया हूँ मगर आंधी से लड़ा हूँ...". इस ग़ज़ल का हर शेर लाजावाब तो है ही, मगर जो मक्ता है उसका क्या कहना...बड़ी सीधी भाषा में शायर कहता है कि "दुनिया से निराली है 'नजीर' अपनी कहानी, अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ...", उम्मीद करता हूँ कि आप सब को ये पेशकश पसंद आएगी...."



रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।

Gazhal - Ek Raat Men...
Vocal - Rafique Sheikh
Music - Rafique Sheikh
Lyrics - Nazeer Banarasi


Song # 01, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

इस गीत का प्लेयर फेसबुक/ऑरकुट/ब्लॉग/वेबसाइट पर लगाइए

Thursday, April 1, 2010

उड़न खटोले पर उड़ जाऊं.....बचपन के प्यार को अभिव्यक्त करता एक खूबसूरत युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 391/2010/91

युगल गीतों की जब हम बात करते हैं, तो साधारणत: हमारा इशारा पुरुष-महिला युगल गीतों की तरफ़ ही होता है। मेरा मतलब है वो युगल गीत जिनमें एक आवाज़ गायक की है और दूसरी आवाज़ किसी गायिका की। लेकिन जब भी युगल गीतों में ऐसे मौके आए हैं कि जिनमें दोनों आवाज़ें या तो पुरुष हैं या फिर दोनों महिला स्वर हैं, ऐसे में ये गानें कुछ अलग हट के, या युं कहें कि ख़ास बन जाते हैं। आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं पार्श्वगायिकाओं के गाए हुए युगल गीतों, यानी कि 'फ़ीमेल डुएट्स' पर आधारित हमारी लघु शृंखला 'सखी सहेली'। इस शूंखला में हम १० फ़ीमेल डुएट्स सुनेंगे, यानी कि १० अलग अलग गायिकाओं की जोड़ी के गाए गीतों का आनंद हम उठा सकेंगे। ४० से लेकर ७० के दशक तक की ये जोड़ियाँ हैं जिन्हे हम शामिल कर रहे हैं, और हमारा विश्वास है कि इन सुमधुर गीतों का आप खुले दिल से स्वागत करेंगे। तो आइए शुरुआत की जाए इस शूंखला की। पहली जोड़ी के रूप में हमने एक ऐसी जोड़ी को चुना है जिनमें आवाज़ें दो ऐसी गायिकाओं की हैं जो ४० और ५० के दशकों में अपनी वज़नदार और नैज़ल आवाज़ों की वजह से जाने जाते रहे। ४० का दशक इस तरह की वज़नदार आवाज़ों का दशक था और उस दशक में कई इस तरह की आवाजें सुनाई दीं। तो साहब, आज जिन दो आवाज़ों को हम आज शामिल कर रहे हैं वो हैं ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म। युं तो इन दोनों ने साथ साथ कई युगल गीत गाए हैं, लेकिन मेरे ख़याल से इस जोड़ी का जो सब से मशहूर गीत रहा है वह है फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का, और जिसके बोल हैं "उड़न खटोले पे उड़ जाऊँ, तेरे हाथ ना आऊँ"। दो बाल कलाकारों पर फ़िल्माया हुआ यह गाना है। १९४६ की यह फ़िल्म, तनवीर नक़वी का गीत और नौशाद अली का संगीत। युं तो इस फ़िल्म के दो और गीत हम आप तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पहुँचा चुके हैं, और फ़िल्म की तमाम बातें भी कह चुके हैं, इसलिए क्यों ना आज कुछ और बातें की जाए!

पार्श्वगायिकाओं की इस जोड़ी की अगर हम बात करें तो शम्शाद बेग़म जी के बारे में तो आप सभी को तमाम बातें मालूम होंगी, लेकिन बहुत कम ही ऐसे लोग होंगे जिन्हे ज़ोहराबाई अम्बालेवाली के बारे में अधिक जानकारी हो। इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना आज के इस अंक के बहाने हम ज़ोहराबाई से आपका परिचय करवाएँ! 'ज़ोहरा जान ऒफ़ अम्बाला' नाम से सन् १९३७-३८ में ऒल इण्डिया रेडियो के दिल्ली, लाहौर, पेशावर केन्द्रों से गायन जीवन प्रारम्भ करने वाली ज़ोहराबाई से सन् १९३८ में संगीतकार अनिल बिस्वास ने सब से पहले सागर मूवीटोन कृत 'ग्रामोफ़ोन सिंगर' फ़िल्म के लिए गीत गवाया था। उसके बाद 'हम तुम और वह ('३८), 'बहूरानी' ('४०), 'हिम्मत' ('४१), 'रिटर्ण ऒफ़ तूफ़ान मेल' ('४२), 'तलाश' ('४३), 'विजयलक्ष्मी' ('४३) आदि फ़िल्मों में गीत गाए, लेकिन उन्हे असली कामयाबी जिस फ़िल्म से मिली, वह फ़िल्म थी 'रतन'। इस फ़िल्म का "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके" गीत सब से ज़्यादा कामयाब रहा, जिसे हमने आपको इसी महफ़िल में भी सुनवाया था। नौशाद साहब ने 'रतन' के बाद भी अपनी कई फ़िल्मों में ज़ोहराबाई से गानें गवाए जैसे कि 'जीवन' ('४४), 'पहले आप' ('४४), 'सन्यासी' ('४५), 'अनमोल घड़ी' ('४६), 'एलान' ('४७), 'नाटक' ('४७) और 'मेला' ('४८)। हरमंदिर सिंह 'हमराज़' के प्रसिद्ध 'गीत कोश' के मुताबिक ज़ोहराबाई ने ४० के दशक में कुल १२२९ गीत गाए हैं। इस दशक के अधिकाँश ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स पर गीत गाने वाले पार्श्वगायकों के सही दिए जाने के बजाए पात्र का नाम दिए जाने की प्रथा लागू थी। अत: अनुमान है कि ज़ोहराबाई ने लगभग १५०० गीत गाए होंगे। उनके गाए गीतों की अनुमानित संख्या उन सभी पार्श्वगायिकाओं के गाए गीतों से अधिक हैं जो उस समय मशहूर थीं। दोस्तों, ये तमाम जानकारियाँ हमने बटोरी है 'लिस्नर्स बुलेटिन' अंक ८१ से, जो प्रकाशित हुआ था मई १९९० में। आप को यह भी बता दें कि ज़ोहराबी का २१ फ़रवरी १९९० को ६८ वर्ष की आयु में बम्बई में निधन हो गया था। तो चलिए दोस्तों, ज़ोहराबाई और शमशाद बेग़म के साथ साथ हम भी उड़न खटोले की सैर पे निकलते हैं और सुनते हैं यह यादगार गीत जो हमें याद दिलाती है उस पुराने दौर की जब ऐसी वज़नदार और नैज़ल आवाज़ वाली गायिकाओं का राज था।



क्या आप जानते हैं...
कि १९५३ की फ़िल्म 'तीन बत्ती चार रास्ते' के एक सहगान में जब ज़ोहराबाई अम्बालेवाली को केवल एकाध लाइन गाने का अवसर दिया गया तो उन्होने फ़िल्म जगत से सन्यास लेने में ही भलाई समझी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"चाँद", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिकाओं ने जिन्होंने इस गीत को गाया है सुरैया और _____, बताएं कौन हैं ये- २ अंक.
3. ए आर कारदार निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं-२ अंक.
4. नौशाब साहब का था संगीत, गीतकार बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी, पाबला जी, इंदु जी, और पदम् जी को बधाई.....अवध जी आपका अंदाजा एकदम सही है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, March 31, 2010

चिट्टी आई है वतन से....अपने वतन या घर से दूर रह रहे हर इंसान के मन को गहरे छू जाता है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 390/2010/90

नंद बक्शी पर केन्द्रित लघु शृंखला 'मैं शायर तो नहीं' के अंतिम कड़ी पर हम आज आ पहुँचे हैं। आज जो गीत हम आप को सुनवा रहे हैं, उसका ज़िक्र छेड़ने से पहले आइए आपको बक्शी साहब के अंतिम दिनों का हाल बताते हैं। अप्रैल २००१ में एक हार्ट सर्जरी के दौरान उन्हे एक बैक्टेरियल इन्फ़ेक्शन हो गई, जो उनके पूरे शरीर में फैल गई। इस वजह से एक एक कर उनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया। अत्यधिक पान, सिगरेट और तम्बाकू सेवन की वजह से उनका शरीर पूरी तरह से कमज़ोर हो चुका था। बक्शी साहब ने अपने आख़िरी हफ़्तों में इस बात का अफ़सोस भी ज़ाहिर किया था कि काश गीत लेखन के लिए उन्होने इन सब चीज़ों का सहारा ना लिया होता! उन्होने ४ अप्रैल २००१ को अपने दोस्त सुभाष घई साहब के साथ एक सिगरेट पी थी, और वादा किया था कि यही उनकी अंतिम सिगरेट होगी, पर वे वादा रख ना सके और इसके बाद भी सिगरेट पीते रहे। जीवन के अंतिम ७ महीने वे अस्पताल में ही रहे, और उन्हे इस बात से बेहद दुख हुआ था कि उनके ज़्यादातर नए पुराने निर्माता, दोस्त, टेक्नीशियन, संगीतकार और गायक, जिनके साथ उन्होने दशकों तक काम किया, उनसे मिलने अस्पताल नहीं आए। ७१ वर्ष की आयु में आनंद बक्शी ने मुंबई के नानावती अस्पताल में ३० मार्च २००२ के दिन दम तोड़ दिया। उनके करीबी मित्रों का यह रवैया शायद बक्शी साहब ने बरसों पहले ही अपने उस गीत में लिखा डाला था कि "नफ़रत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में ख़ुश रहना मेरे यार, इस झूठ की नगरी से तोड़ के नाता जा प्यारे, अमर रहे तेरा प्यार"।

गीतकार आनंद बक्शी के सीधे सरल गीत इतने असरदार हैं कि श्रोताओं के दिलों पर एक अमिट छाप छोड़े बिना नहीं रहते। ज़रा याद कीजिए पंकज उधास का गाया फ़िल्म 'नाम' का वह गाना जिसे जब भी सुना जाए तो आँखों में पानी भर ही आता हैं। इस गीत में बक्शी साहब ने अपने वतन और अपने घर की अहमियत लोगों को समझाने की कोशिश की है। अपने घर परिवार की अहमियत क्या होती है, यह उनसे बेहतर भला कौन जाने जिन्होने अपने सपनों को साकार करने के लिए घर से भाग आए थे! आज हम फ़िल्म 'नाम' के इसी कालजयी गीत को सुनने जा रहे हैं "चिट्ठी आई है वतन से", जिसके संगीतकार हैं लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। कुछ कुछ इसी अंदाज़ पर बक्शी साहब ने 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' फ़िल्म में "घर आजा परदेसी तेरा देस बुलाए रे" गीत लिखा था, जिसे भी काफ़ी मकबूलियत हासिल हुई थी। वक़्त बदला, फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के वो सारे संगीतकार एक एक कर बिछड़ते चले गए। इस बदलते दौर और बदलते मिज़ाज को बख़ूबी अपनाया गीतकार आनंद बक्शी ने और नए माहौल और नए संगीतकारों के साथ भी उनकी ट्युनिंग् क़ाबिल-ए-तारीफ़ रही। नदीम श्रवण, ए. आर. रहमान, अनु मलिक, उत्तम सिंह, जतिन ललित जैसे संगीतकारों की धुनों को लोकप्रिय बोलों से संवारा है बक्शी साहब ने। आज बक्शी साहब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हमारे साथ हैं उनकी जादूई क़लम से निकले हुए बेशुमार और बेमिसाल नग़में जिनकी गूंज युगों युगों तक सुनाई देती रहेगी। आज मुझे बक्शी साहब के लिखे एक गीत के बोल याद आ रहे हैं - "फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं, मगर पतझड़ में जो फूल मुर्झा जाते हैं, वो बहारों के आने से खिलते नहीं, कुछ लोग एक रोज़ जो बिछड़ जाते हैं, वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं, उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम, वो फिर नही आते, वो फिर नहीं आते"। इसी के साथ 'मैं शायर तो नहीं' शृंखला को समाप्त करने की दीजिए हमें इजाज़त, और आप सुनिए फ़िल्म 'नाम' से "चिट्टी आई है वतन से"। वाकई ऐसा गीत लिख कर कोई भी गीतकार फक्र से मर सकता है.



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी जब अपने अंतिम दिनों में अस्पताल में थे, तब अस्पताल का एक स्वीपर ने उनकी बहुत सेवा की थी। जब बक्शी साहब की बेटी ने उस स्वीपर को टिप देनी चाही ताकि वो बक्शी साहब की तरफ़ और ज़्यादा ध्यान दे, तो उस स्वीपर ने टिप लेने से ये कहकर इंकार कर दिया कि वो यूँहीं अपने गुरु की सेवा कर खुश है

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"हाथ", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिकाओं का गाया युगल गीत है ये इनमें से एक हैं शमशाद बेगम, दूसरी गायिका का नाम बताएं - ३ अंक.
3. १९४६ में आई इस फिल्म के संगीतकार कौन है -२ अंक.
4. दो बाल कलकारों पर फिल्माए इस गीत कि किसने लिखा है -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
अवध जी आप २ अंक दूर हैं अर्ध शतक से, और अनीता जी भी बस २ अंक दूर हैं डबल फिगर से. इंदु जी ३ अंक कमा कर शरद जी के करीब पहुँचने की कोशिश में हैं तो पदम सिंह जी आपसे कैसे भूल हो गयी कल. चलिए ये भी हिस्सा है खेल का...अरे पूर्वी जी...कहाँ थे आप इतने दिनों....सच मानिये आपकी कमी हमें बहुत खली....चलिए अब आये हैं तो कुछ दिन रुक के जाईयेगा :),आनंद लीजिए कल से नयी शृंखला का

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था.. हामिद अली खां के बहाने से मीर को याद किया ग़ालिब ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७७

ज की महफ़िल बाकी महफ़िलों से अलहदा है, क्योंकि आज हम "ग़ालिब" के बारे में कुछ नया नहीं बताने जा रहे..बल्कि माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए (क्योंकि पिछली छह महफ़िलों से हम ग़ालिब की लाचारियाँ हीं बयाँ कर रहे हैं) "बाला दुबे" का लिखा एक व्यंग्य "ग़ालिब बंबई मे" आप सबों के सामने पेश करने जा रहे हैं। अब आप सोचेंगे कि हमें लीक से हटने की क्या जरूरत आन पड़ी। तो दोस्तों, व्यंग्य पेश करने के पीछे हमारा मकसद बस मज़ाकिया माहौल बनाना नहीं है, बल्कि हम इस व्यंग्य के माध्यम से यह दर्शाना चाहते हैं कि आजकल कविताओं और फिल्मी-गानों की कैसी हालत हो गई है.. लोग मक़बूल होने के लिए क्या कुछ नहीं लिख रहे. और जो लिखा जाना चाहिए, जिससे साहित्य में चार-चाँद लगते, उसे किस तरह तिलांजलि दी जा रही है। हमें यकीन है कि आपको महफ़िल में आया यह बदलाव नागवार नहीं गुजरेगा.. तो हाज़िर है यह व्यंग्य: (साभार: कादंबिनी)

दो चार दोस्तों के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब स्वर्ग में दूध की नहर के किनारे शराबे तहूर (स्वर्ग में पी जाने वाली मदिरा) की चुस्कियाँ ले रहे थे कि एक ताज़ा–ताज़ा मरा बंबइया फ़िल्मी शायर उनके रू-ब-रू आया, झुक कर सलाम वालेकुम किया और दोजानू हो कर अदब से बैठ गया। मिर्ज़ा ने पूछा, 'आपकी तारीफ़?' बंबइया शायर बोला, 'हुज़ूर मैं एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी शायर हूँ। उस दिन मैं बंबई के धोबी तालाब से आ रहा था कि एक शराबी प्रोडयूसर ने मुझे अपनी मारुति से कुचल डाला।'

ग़ालिब बोले, 'मुबारिक हो मियाँ जो बहिश्त नसीब हुआ वर्ना आधे से ज़्यादा फ़िल्म वाले तो जहन्नुम रसीद हो जाते हैं। ख़ैर, मुझे कैसे याद फ़रमाया।'
बंबइया शायर बोला, 'हुज़ूर, आप तो आजकल वाकई ग़ालिब हो रहे हैं। क़रीब तीस साल पहले आप पर फ़िल्म बनी थी जो खूब चली और आजकल आप 'सीरियलाइज़्ड' हो रहे हैं।' मिर्ज़ा ग़ालिब समझे नहीं। पास बैठे दिल्ली के एक फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर के मुंशी ने उन्हें टीवी के सीरियल की जानकारी दी।

मिर्ज़ा गहरी साँस छोड़ कर बोले, 'चलो कम से कम मरने के बाद तो मेरी किस्मत जागी, मियाँ। वर्ना जब तक हम दिल्ली में रहे कर्ज़ से लदे रहे, खुशहाली को तरसे और कभी इसकी लल्लो–चप्पो की तो कभी उसकी ठोड़ी पर हाथ लगाया।'
'अरे हुज़ूर, अब तो जिधर देखो आप ही आप महक रहे है,' बंबइया शायर बोला। फिर फ़िल्मी शायर ने अपनी फ्रेंच कट दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, 'अगर हुज़ूर किसी तरह खुदा से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर बंबई जा पहुँचें तो बस यह समझ लीजे कि सोने से लद कर वापस आएँ। मेरी तो बड़ी तमन्ना है कि आप दो चार फ़िल्मों में 'लिरिक' तो लिख ही डालें।' आस पास बैठे चापलूसों ने भी उसकी बात बड़ी की ओर न जाने कौन-सा फ़ितूर मिर्ज़ा के सर पर चढ़ा कि वे तैयार हो गए।

दूसरे दिन बाकायदा अल्ला मियाँ के यहाँ मिर्ज़ा और उनके तरफ़दार जा पहुँचे और कह–सुन कर उन्होंने अल्ला मियाँ को पटा लिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि मिर्ज़ा ग़ालिब को तीस दिन की 'अंडर लीव' मय टीए डीए के दे दी गई और वे 'बहिश्त एअरलाइन' में बैठ कर बंबई के हवाई अड्‌डे पर जा उतरे।
°°°
बंबइया शायर ने उन्हें सारे अते–पते, और ठिकानों का जायज़ा दे ही रखा था, लिहाज़ा मिर्ज़ा ग़ालिब टैक्सी पकड़कर 'हिंदुस्तान स्टूडियोज़' आ पहुँचे। अंदर जाकर उन्होंने भीमजी भाई डायरेक्टर को उस स्वर्गवासी बंबइये शायर का ख़त दिया। भीम जी भाई उन्हें देखते ही अपने चमचे कांति भाई से बोल, क्या नसीरूद्दीन शाह का कांट्रैक्ट कैंसिल हो गया, कांतिभाई। ये नया बागड़ू मिर्ज़ाग़ालिब के मेकअप में कैसे?

कांतिभाई ने अपने चश्मे से झाँक कर देखा और बोले, 'वैसे मेकअप आप अच्छा किया है पट्‌ठे का। रहमान भाई ने किया लगता है। पर ये इधर कैसे आ गया? मिर्जा ग़ालिब का शूटिंग तो गुलज़ार भाई कर रहा है।'
तभी मिर्ज़ा ग़ालिब बोले, 'सहिबान, मैं एक्टिंग करने नहीं आया हूँ। मैं ही असली मिर्ज़ा गालिब हूँ, मैं तो फ़िल्म में शायरी करने आया हूँ जिसे शायद आप लोग 'लिरिक' कहते हैं।'
भीम जी भाई बोले, 'अच्छा, तो तुम लिरिक लिखते है।'
मिर्ज़ा बोले, 'जी हाँ।'

भीम जी भाई न फ़ौरन ही अपने असिस्टेंट मानिक जी को बुलाया और हिदायत दी, 'अरे सुनो मानिक जी भाई। इसे ज़रा परखो। 'लिरिक' लिखता है।' मानिक जी भाई ने ग़ालिब को घूर कर देखा और कहा, 'आओ मेरे साथ।'
मानिक जी ग़ालिब को बड़े हाल में ले गए जहाँ आधा दर्जन पिछलग्गुए तुकबंद बैठे थे। मानिक जी बोले, 'पहले सिचुएशन समझ लो।'
मिर्ज़ा बोले, 'इसके क्या मानी, जनाब।'
मानिक जी बोले, 'पहले हालात समझ लो और फिर उसी मुताबिक लिखना है। हाँ तो, हीरोइन हीरो से रूठी हुई बरगद के पेड़ के नीचे मुँह फुलाए बैठी है। उधर से हीरो आता है सीने पर हाथ रख कर कहता है कि तूने अपने नज़रिये की तलवार से मेरे दिल में घाव कर दिया है। अब इस सिचुएशन को ध्यान में रखते हुए लिख डालो एक गीत।'
मिर्ज़ा ग़ालिब ने काग़ज़ पर लिखना शुरू किया और पाँच मिनट बाद बोले, सुनिए हज़रत, नहीं ज़रियते राहत ज़राहते पैकां
यह ज़ख्मे तेग है जिसको कि दिलकुशा कहिए
नहीं निगार को उल्फ़त, न हो, निगार तो है
रवानिए रविशो मस्तिए अदा कहिए

मिर्ज़ा की इस लिरिक को सुनते ही मानिक जी भाई का ख़ास चमचा पीरूभाई दारूवाला बोला, 'बौस, ये तो पश्तो में गीत लिखता है। मेरे पल्ले में तो कुछ पड़ा नहीं, तुम्हारे भेजे में क्या घुसा काय?'
मानिक जी बौखला कर बोले, 'ना जाने कहाँ से चले आते हैं फ़िल्मों में। देखो मियाँ इस तरह ऊल-जलूल लिरिक लिख कर हमें क्या एक करोड़ की फ़िल्म पिटवानी है।'
पर हुज़ूर, मिर्ज़ा बोले, 'मैं आपको अच्छे पाए की शायरी सुना रहा हूँ।'

ये पाए की शायरी है या चौपाये की, मानिक जी लाल पीले होकर बोले, 'तुमसे पहले भी एक पायेदार शायर आया था–क्या नाम था उसका – हाँ, याद आया,जोश। वह भी तुम्हारे माफ़िक लंतरानी बकता था और जब उसकी अकल ठिकाने आई तब ठीक-ठीक लिखने लगा था।'
पीरूजी दारूवाला बोला, 'उसका वह गाना कितना हिट गया था बौस– हाय, हाय। क्या लिखा था ज़ालिम ने, मेरे जुबना का देखो उभार ओ पापी।'
ग़ालिब बोले, 'क्या आप जोश मलीहाबादी के बारे में कह रहे है? वो तो अच्छा ख़ासा कलाम पढ़ता था। वह भला ऐसा लिखेगा।'
'अरे हाँ, हाँ। उसी जोश का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ,' मानिक जी भाई बोला, 'बंबई की हवा लगते ही वह रोगनजोश बन गया था।'
तभी पीरूभाई बोले, 'देखो भाई, हमारा टाइम ख़राब मत करो। हमें कायदे के गीत चाहिए। ठहरो तुम्हें कुछ नमूने सुनाता हूँ।'
पीरूभाई दारूवाला ने पास खड़े म्यूज़िक डायरेक्टर बहरामजी महरबानजी को इशारा किया। तभी आर्केस्ट्रा शुरू हो गया। पहले तो आर्केस्ट्रा ने किसी ताज़ा अमरीकन फ़िल्म से चुराई हुई विलायती धुन को तोड़ मरोड़ कर ऐसा बजाया कि वह 'एंगलोइंडियन' धुन बन गई। उसके बाद हीरो उठा और कूल्हे मटका–मटका कर डांस करने लगा। हीरोइन भी बनावटी ग़ुस्से में उससे छिटक–छिटक कर दूर भागती हुई नखरे दिखाने लगी। तभी माइक पर खड़े सिंगर ने गाना शूरू कर दिया – तेरे डैडी ने दिया मुझे परमिट तुझे फँसाने का
इश्क का नया अंदाज़ देखकर ग़ालिब बोले, 'अस्तग़फरूल्ला, क्या आजकल हिंदुस्तान में वालिद अपने बरखुरदार को इस तरह लड़कियाँ फँसाने की राय देते हैं?'
पीरूभाई बोले, 'मियाँ वो दिन गए जब ख़लील खाँ फाख़्ते उड़ाते थे। हिंदुस्तान में तरक्की हम लोगों की बदौलत हुई है। हमारी ही बदौलत आज बाप बेटे शाम को एक साथ बैठ कर विस्की की चुस्की लेते हैं। होटलों में साथ-साथ लड़कियों के संग डिस्को करते है।'
मानिक जी भाई बोले, 'इसे ज़रा चलत की चीज़ सुनाओ, पीरूभाई।'
पीरूभाई ने फिर म्यूज़िक डायरेक्टर को इशारा किया और आर्केस्ट्रा भनभना उठा। ले जाएगे ले जाएगे, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे'
ग़ालिब गड़बड़ा गए। 'क्या आजकल शादी के मौके पर ऐसे गीत गाए जाते हैं?'
पीरूभाई बोले, 'मियाँ, गीत तो छोड़ो, बारात में दूल्हे का बाप और जो कोई भी घर का बड़ा बूढ़ा ज़िंदा हो, वह तक सड़क पर वह डांस दिखाता है कि अच्छे-अच्छे कत्थक कान पर हाथ लगा लें। अरे मर्दों की छोड़ो दूल्हे की दो मनी अम्मा भी सड़क पर ऐसे नाचती है जैसे रीछ। देखो नमूना।'
और मिर्ज़ा को आधुनिक भारतीय विवाह उत्सव का दृश्य दिखलाया गया, जिसमें दूल्हे के अब्बा–अम्मी दादा–दादी बिला वजह और बेताले होकर कूल्हे मटका-मटकाकर उलटी सीधी धमाचौकड़ी करने लगे।

मिर्ज़ा बोले, 'ऐसा नाच तो हमने सन सत्तावन के गदर से पहले बल्लीमारान के धोबियों की बारात में देखा था।'
पीरूभाई दारूवाला खिसियाकर बोले, 'ऐसी की तैसी में गए बल्लीमारान के धोबी मियाँ। आजकल तो घर-घर में यह डिस्को फलफूल रहा है। तभी मुस्कराते हुए मानिक भाई ने कहा, 'अरे, ज़रा पुरानी चाल की चीज़ भी सुनाओ।'
अबकी बार हीरोइन ने लहंगा फरिया पहन कर विशुद्ध उत्तर परदेशिया लोकनृत्य शैली की झलक दिखलाई और वैसे ही हाव–भाव करने लगी। तभी माइक पर किरनबेन गाने लगीं, झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में गीत ख़त्म होते ही मानिक भाई बोले, इसे कहते हैं लिरिक और म्यूज़िक का ब्लेंडिंग। इसके मुकाबले में लिखो तो जानें। बेमानी बक–बक में क्या रखा है।'
यह सुनकर ग़ालिब का चेहरा लाल हो गया। सहसा वे बांगो–पांगो और उसके बगल में बैठे ढोल वाले से ज़ोर से बोले—
तू ढोल बजा भई ढोल बजा।
यह महफ़िल नामाक़ूलों की।
लाहौल विला, लाहौल विला।

उनकी इस लिरिक की चाल को बांगो वाले ने फौरन ही बाँध लिया और उधर आर्केस्ट्रा भी गनगना उठा। मानिक जी भाई और पीरू भाई की बाँछें खिल गईं और वे सब मग्न होकर बक़ौल ग़ालिब 'धोबिया–नृत्य' करने लगे। और जब उनकी संगीत तंद्रा टूटी तो मानिक भाई बोले, वाह, वाह क्या बात पैदा की है ग़ालिब भाई।
पर तब तक ग़ालिब कुकुरमुत्ता हो और स्टूडियो से रफूचक्कर हो कर बहिश्त एअर लाइन की रिटर्न फ्लाइट का टिकट लेकर अपनी सीट पर बैठे बुदबुदा रहे थे —

न सत्ताईस की तमन्ना न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी न सही।

सच कहूँ तो इस व्यंग्य को पढने के बाद हीं मुझे मालूम हुआ कि "माननीय जोश मलीहाबादी" ने भी चालू किस्म के गाने लिखे थे.. मैं जोश साहब का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ/था, लेकिन अब समझ नहीं आ रहा कि मैं कितना सही हूँ/था और कितना गलत!! आखिर इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है.. परिस्थितियाँ या फिर शायरों की बदली हुई मानसिकता। आप अपने दिल पर हाथ रखके इस प्रश्न का जवाब ढूँढने की कोशिश कीजिएगा। मुझे यकीन है कि जिस दिन हमें इस प्रश्न का जवाब मिलेगा, उसी दिन हमारे साहित्य/हमारे गीत सुरक्षित हाथों में लौट आएँगे। खैर.. हमारी गज़लें तो "ग़ालिब" के हाथों में सुरक्षित हैं और इसका प्रमाण ग़ालिब के ये दो शेर हैं। मुलाहज़ा फ़रमाईयेगा:

ज़िन्दगी यूँ भी गुज़र ही जाती
क्यों तेरा राहगुज़र याद आया

मैंने मजनूं पे लड़कपन में 'असद'
संग उठाया था कि सर याद आया


ग़ालिब की बातें हो गई, दो(या फिर तीन?) शेर भी हो गएँ, अब क्यों न हम ग़ालिब के हवाले से "ग़ालिब के गुरू" मीर तक़ी "मीर" को याद कर लें। "कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था" - इन पंक्तियों से ग़ालिब ने अपने गुरू को जो श्रद्धांजलि दी है, उसकी मिसाल देने में कई तहरीरें कम पड़ जाएँगी। इसलिए अच्छा होगा कि हम खुद से कुछ न कहें और "हामिद अली खां" साहब को हीं ग़ालिब की रूह उकेरने का मौका दे दें। तो पेश है "उस्ताद" की आवाज़ में "ग़ालिब" की "शिकायतों और इबादतों" से भरी यह गज़ल। हमारा दावा है कि आप इसे सुनकर भाव-विभोर हुए बिना रह न पाएँगे:

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइसे-ताख़ीर भी था
आप आते थे, मगर कोई अनाँगीर भी था

तुम से बेजा है मुझे अपनी _____ का गिला
इसमें कुछ शाइबा-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर भी था

तू मुझे भूल गया हो, तो पता बतला दूँ
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख़चीर भी था

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो "ग़ालिब"
कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "कायल" और शेर कुछ यूँ था-

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

गज़ल से गुजरकर इस शेर को सबसे पहले पहचाना "तपन" जी ने, लेकिन पिछली बार की हीं तरह इस बार भी सही जवाब देने के बावजूद पहला प्रवेशी विजयी नहीं हो सका,क्योंकि इस महफ़िल में शेर के बिना आना अपशगुन माना जाता है :) इस वज़ह से "शरद" जी इस बार भी "शान-ए-महफ़िल" बने। शरद जी, आपने महफ़िल में ये शेर पेश किए:

हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत, इसे सज़ा न कहो ...
मैं वाकीयात की ज़ंजीर का नही कायल
मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला न कहो ... (राहत इन्दौरी)

सीमा जी, आपके इन शेरों के क्या कहने! नख-शिख हैं चमत्कृत बिन गहने!!

शिकवा-ए-शौक करे क्या कोई उस शोख़ से जो
साफ़ कायल भी नहीं, साफ़ मुकरता भी नहीं (फ़िराक़ गोरखपुरी )

हम तो अब भी हैं उसी तन्हा-रवी के कायल
दोस्त बन जाते हैं कुछ लोग सफ़र में खुद ही (नोमान शौक़ )

सुमित जी, हमें खुशी है कि हम किसी न किसी तरह से आपकी ज़िदगी का हिस्सा बन गए हैं.. आपको एफ़ एम की कमी नहीं खलती और आप जैसे शुभचिंतकों के कारण हमें "इश्क-ए-बेरहम" की कमी नहीं खलती :)

मंजु जी, मेरा मन आपकी इन पंक्तियों का कायल हो गया:

जब से तुम मेरे दिल में उतरे हो ,
मेरा शहर दीवानगी का कायल हो गया .

अवनींद्र जी, आपको पढकर ऐसा नहीं लगता कि किसी नौसिखिये को पढ रहा हूँ। आपमें वह माद्दा है, जो अच्छे शायरों में नज़र आता है, बस इसे निखारिये। ये रहे आपके शेर:

मेरे महबूब मैं तेरा कायल तो बहुत था
पर अफ़सोस.., मैं तेरे काबिल ना हो सका

कौन कहता है कायल हूँ मैं मैखाने का
सूरत -ऐ -साकी ने दीवाना बना रखा है
घूमता रहता है वो शमा के इर्द गिर्द बेबस
या खुदा किस मिटटी से परवाना बना रखा है (क्या बात है.....शुभान-अल्लाह!)

शन्नो जी और नीलम जी, महफ़िल को खुशगवार बनाए रखने के लिए आप दोनों का तह-ए-दिल से शुक्रिया। अपनी यह उपस्थिति इसी तरह बनाए रखिएगा।

आसमां की ऊंचाइयों के कायल हुये हैं
जमीं पर कदम जिनके पड़ते नहीं हैं. (शन्नो जी, कमाल है.. थोड़ी-सी चूक होती और मेरी नज़रों से आपका यह शेर चूक जाता..फिर मैं अफ़सोस हीं करता रह जाता.. बड़ी हीं गूढ बात कहीं है आपने)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, March 30, 2010

सोलह बरस की बाली उमर को सलाम....और सलाम उन शब्दों के शिल्पकार को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 389/2010/89

'मैंशायर तो नहीं' शृंखला में आनंद बक्शी साहब के लिखे गीतों का सिलसिला जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज ३० मार्च है। आज ही के दिन सन् २००२ को आनंद बक्शी साहब इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ गए थे। और अपने पीछे छोड़ गए असंख्य लोकप्रिय गीत जो दुनिया की फ़िज़ाओं में हर रोज़ गूँज रहे है। ऐसा लगता ही नहीं कि बक्शी साहब हमारे बीच नहीं हैं। सच भी तो यही है कि कलाकार कभी नही मरता, अपनी कला के ज़रिए वो अमर हो जाता है। इस शृंखला में अब तक आपने कुल ८ गीत सुनें, जिनमें से तीन ६० के दशक के थे और पाँच गानें ७० के दशक के थे। सच भी यही है कि ७० के दशक में बक्शी साहब ने सब से ज़्यादा हिट गीत लिखे। ८० के दशक में भी उनके कलम की जादूगरी जारी रही। तो आज से अगले दो अंकों में हम आपको दो गीत ८० के दशक से चुन कर सुनवाएँगे। आज एक ऐसी फ़िल्म के गीत की बारी जिस फ़िल्म के गीतों ने ८० के दशक के शुरु शुरु में तहलका मचा दिया था। लता मंगेशकर और एस. पी. बालासुब्रह्मण्यम मुख्य रूप से इस फ़िल्म के गीतों का गाया, और संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। 'एक दूजे के लिए', जी हाँ, १९८१ की इस फ़िल्म के "तेरे मेरे बीच में" गीत के लिए बक्शी साहब को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। आज हम इसी फ़िल्म का गीत सुनेंगे, लेकिन यह गीत नहीं, बल्कि शायद इससे भी बेहतर एक गीत, जिसे मुख्य रूप से तो लता जी ने ही गाया है, लेकिन शुरुआती बोल अनुप जलोटा की आवाज़ में है। "सोलह बरस की बाली उमर को सलाम, मैं प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम"। यह गीत बक्शी साहब के पसंदीदा गीतों में से एक है, और कहने की ज़रूरत नहीं कि यह मेरा बक्शी साहब का लिखा सब से पसंदीदा गीत रहा है। इस गीत की खासियत ही यह है कि जैसे जैसे गीत को सुनते जाते हैं, इसके बोलों में बहते चले जाते हैं। एक शब्द से दूसरे शब्द, दूसरे से तीसरे में। एक धारा की तरह है यह गीत जिसमें एक बार बह निकले तो अंजाम तक पहुँच कर ही होश वापस आता है। एक जुनून है इस गीत में, और साथ ही साथ आध्यात्मिकता भी है। पैशन और स्पिरिचुयलिटी। प्यार का पक्ष लेकर ज़माने से एक तरह की बग़ावत करता है यह गीत। हर उस शख़्स, या चीज़, यहाँ तक कि वक़्त को भी सलाम करता है यह गीत जिसने भी प्यार की रवायत को आगे बढ़ाया। जुदाई करवाने वाले वक़्त का भी शुक्रिया अदा किया जा रहा है क्योंकि यह भी प्यार का ही एक पक्ष है। यह एक ऐसा गीत है कि जिसका एक एक शब्द हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले पेश है इस गीत के पूरे बोल:

कोशिश करके देख ले दरिया सारे नदियाँ सारी,
दिल की लगी नहीं बुझती, बुझती है हर चिंगारी।

सोलह बरस की बाली उमर को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।

दुनिया में सब से पहले जिसने यह दिल दिया,
दुनिया के सब से पहले दिलबर को सलाम,
दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया,
दिल तक पहुँचने वाली डगर को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।
जिसमें जवान होकर बदनाम हम हुए,
उस शहर उस गली उस घर को सलाम,
जिसने हमें मिलाया जिसने जुदा किया,
उस वक़्त उस घड़ी उस गजर को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।
मिलते रहें यहाँ हम ये है यहाँ लिखा,
इस लिखावट की ज़ेर-ओ-ज़बर को सलाम,
साहिल की रेत पर युं लहरा उठा ये दिल,
सागर में उठने वाली हर लहर को सलाम,
इन मस्त गहरी गहरी आँखों की झील में,
जिसने हमें डुबोया उस भँवर को सलाम,
घुंघट को छोड़ कर जो सर से सरक गई,
ऐसी निगोड़ी धानी चुनर को सलाम,
उल्फ़त के दुश्मनों ने कोशिश हज़ार की,
फिर भी नहीं झुकी जो उस नज़र को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।

दोस्तों, इन शब्दों को पढ़ने के बाद आप भी मेरी यह बात ज़रूर मानेंगे कि आनंद बक्शी काव्य के किसी एक रंग के अधीन रह कर गीतों की रचना नहीं की। वो एक स्वतंत्र गीतकार थे। रुमानी गीत हो या ग़ज़ल, देश प्रेम का गीत हो या फिर कोई और रंग, आनंद बक्शी की कोई सीमा नहीं थी। और इस प्रस्तुत गीत में तो उन्होने कमाल ही कर दिया है। बक्शी साहब यह ज़रूर मानते थे कि एक गीतकार को दिल से एक शायर होना चाहिए और वो वही थे, विचारों से शायर और शब्दों से गीतकार। उन्होने सदा यह कामयाब संतुलन बनाकर गीत लिखने की नई मिसाल पैदा की। वो बड़ी से बड़ी बात को इस सहजता से अपने गीतों में कह जाते थे कि इन पंक्तियों को किसी अन्य शब्दों से बदलना असंभव हो जाता था। इस बात का आज के प्रस्तुत गीत से बढ़कर और क्या उदाहरण हो सकता है भला! तो आइए अब इस जुनूनी गीत को सुना जाए। लता जी के स्वर ने क्या ख़ूब न्याय किया है बक्शी साहब के बोलों का, और एल.पी की धुन और ऒर्केस्टेशन है जैसे सोने पे सुहागा। आँखें मूंद कर इस गीत को सुनिएगा, और गीत के ख़त्म होने के बाद जब आप अपनी आँखें खोलेंगे कि उन्हे नम पाएँगे। यक़ीन मानिए... चलते चलते आनंद बक्शी साहब को उनकी पुण्यतिथि पर 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम स्मृति सुमन अर्पित करते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी के नाती आदित्य दत्त ने जब फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में क़दम रखा तो उन्होने अपनी फ़िल्म का शीर्षक रखा 'आशिक़ बनाया आपने', जो कि प्रेरीत था बक्शी साहब के लिखे फ़िल्म 'कर्ज़' के गीत एक गीत से-"दर्द-ए-दिल दर्द-ए-जिगर दिल में जगाया आपने, पहले तो मैं शायर था आशिक़ बनाया आपने"।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरे में शब्द आता है -"शमशान", गीत बताएं -३ अंक.
2. ये गीत इस गायक के जीवन का शायद सबसे हिट गीत रहा, गायक कौन हैं- २ अंक.
3. इस फिल्म के निर्देशक का नाम बताएं -२ अंक.
4. संगीतकार जोड़ी है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की, फिल्म में दो नायक हैं, नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
सब विजेताओं को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, March 29, 2010

अब के सजन सावन में....बरसेंगे गीत ऐसे सुहाने, बख्शी साहब की कलम के

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 388/2010/88

नंद बक्शी साहब की बस यही सब से बड़ी खासियत रही कि जब जिस सिचुयशन के लिए उनसे गीत लिखने को कहा गया, उस पर पूरा पूरा न्याय करते हुए ना केवल उन्होने गीत लिखे बल्कि गीत को मक़बूल कर के भी दिखाया। आम सिचुयशनों से हट के जब भी कोई इस तरह की सिचुयशन आई, बक्शी साहब ने हर बार कमाल कर दिखाया। अब फ़िल्म 'चुपके चुपके' का ही वह गीत ले लीजिए, "अब के सजन सावन में, आग लगेगी बदन में"। इस फ़िल्म की कहानी से तो आप सभी वाकीफ़ हैं, और आए दिन टी.वी पे यह फ़िल्म दिखाई जाती रहती है। तो इस गाने के सिचुयशन से भी आप वाकीफ़ होंगे। एक तरफ़ नायिका (शर्मीला) के परिवार वाले उनसे एक पारिवारिक पार्टी में गीत गानें का अनुरोध करते हैं। दूसरी तरफ़ कमरे के बाहर, दरवाज़े के पीछे छुप कर ड्राइवर बने शर्मीला के पति (धर्मेन्द्र) भी इंतज़ार में है अपनी पत्नी से गीत सुनने के लिए। सिर्फ़ शर्मीला को ही पता है कि कमरे के बाहर धर्मेन्द्र खड़े हैं। तो इस सिचुयशन पर एक ऐसे गीत की ज़रूरत है कि जिसमें पार्टी में मौजूद लोगों का भी मनोरंजन हो जाए और शर्मीला अपने दिल की बात धर्मेन्द्र तक पहुँचा भी सके। यह एक हास्य रस से भरी फ़िल्म थी, इसलिए इस गीत में भी चुलबुलापन और नटखटपन की आवश्यक्ता थी। ऐसे में गीतकार आनंद बक्शी साहब की कलम चल पड़ी और देखिये क्या ख़ूब गीत लेकर आए। क्योंकि कहानी में नायक और नायिका का मिलन संभव नहीं हो पा रहा (नायक के ड्राइवर रूप धारण करने की वजह से), ऐसे में सावन के महीने में जो व्याकुलता दिल में जागने वाली है, उसी तरफ़ इशारा किया गया है। "तेरे मेरे प्यार का यह साल बुरा होगा, जब बहार आएगी तो हाल बुरा होगा, रात भर जलाएगी ये मस्त मस्त पवन, सजन मिल ना सकेंगे दो मन एक ही आंगन में"। लता मंगेशकर की आवाज़ ने जुदाई के दर्द को बड़े ही शरारत भरे अंदाज़ में क्या ख़ूब उभारा है और सचिन देव बर्मन के संगीत के तो क्या कहने। बंगाल के लोक धुन पर आधारित यह गीत दिल को जहाँ एक तरफ़ गुदगुदा जाती है, उतना ही सुकून भी देती है। वैसे इस फ़िल्म के दूसरे सभी गानें भी बेहद ख़ूबसूरत हैं, जैसे कि लता जी का ही गाया "चुपके चुपके चल री पुरवईया", लता-मुकेश का गाया "बाग़ों में कैसे ये फूल खिलते हैं" और रफ़ी-किशोर का गाया "सा रे गा मा"। तो आज 'मैं शायर तो नहीं' शृंखला में बक्शी साहब के लिखे "अब के सजन सावन में" की बारी।

क्योंकि आज आनंद बक्शी साहब के बोल सज रहे हैं लता जी के होठों पर, तो चलिए आज जान लेते हैं कि बक्शी साहब का क्या कहना है सुरों की मलिका के बारे में- "लता मंगेशकर का नाम किसी तारुफ़ का मोहताज नहीं, लेकिन जी चाहता है कि कुछ कहूँ। इतना ही कहूँगा कि हम सब ख़ुशक़िस्मत हैं कि हमारे बीच लता मंगेशकर जैसी आर्टिस्ट मौजूद हैं। उनकी आवाज़ को सुनकर जी करता है कि अच्छे अच्छे गीत लिखें और धुनें बनाएँ। वो कभी कभी पूछती हैं कि ये लफ़्ज़ कैसे कहना है, तो मैं उनसे कहता हूँ कि आप जैसे कहेंगी, वैसा ही ये कहा जाएगा! पंजाबी लफ़्ज़ भी वो इतना ख़ूबसूरत बोलती हैं कि ऐसा लगता है जैसे कोई पंजाबी लड़की हों।" देखा दोस्तों आपने कि लता जी की आवाज़ भी गीतकारों और संगीतकारों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी हैं। और आनंद बक्शी साहब का यह बड़प्पन ही कहना पड़ेगा कि ख़ुद इतने बड़े गीतकार होते हुए भी यह श्रेय उन्होने लता जी को दिया। यही बड़प्पन और विनम्रता तो इंसान को सफलता की बुलंदी तक पहुँचाता है, ठीक वैसे ही जैसे बक्शी साहब पहुँचे हैं। तो आइए सुनते हैं लता जी, सचिन दा और बक्शी साहब की तिकड़ी का यह सदाबहार गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने अंत तक सुभाष घई निर्देशित सभी १३ फ़िल्मों के गीत लिखे। पहली फ़िल्म थी 'गौतम गोविंदा' (१०७९) और अंतिम फ़िल्म थी 'यादें' (२००१)

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत के शुरूआती दो मिसरों में कहीं ये शब्द आता है -"चिंगारी", गीत बताएं -३ अंक.
2. इस गीत में लता का साथ दिया है एक ऐसे गायक ने जो भजन गायन के लिए अधिक जाने जाते हैं, कौन हैं ये- २ अंक.
3. इस फिल्म के अन्य गीत के लिए बख्शी साहब को फिल्म फेयर मिला था, फिल्म बताएं-२ अंक.
4. इस प्रेम कहानी के नायक नायिका कौन थे -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपकी चोरी पकड़ी गयी....खैर ३ अंक हम आपको अवश्य देंगें, साथ में अनीता जी और पाबला जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

विंटेज रहमान, ठन्डे शंकर, और सक्रिय शांतनु हैं आज के टी एस टी मेनू में

ताज़ा सुर ताल १३/२०१०

सजीव- 'ताज़ा सुर ताल' में आज एक नहीं बल्कि तीन तीन फ़िल्मो के गीत गूंजेंगे जो हाल ही में प्रदर्शित हुईं हैं। ये तीनों फ़िल्में एक दूसरे से बिल्कुल अलग है, एक दूजे से बिल्कुल जुदा है। सुजॊय, तुम्हे याद है एक दौर ऐसा था जब ए. आर. रहमान नए नए हिंदी फ़िल्मी दुनिया में आए थे और उस दौर में दक्षिण के कई फ़िल्मों को हिंदी में डब किया जा रहा था जिनमें रहमान का संगीत था।

सुजॊय - हाँ, जैसे कि 'हम से है मुक़ाबला', 'दुनिया दिलवालों की', 'रोजा' और बहुत सी ऐसी फ़िल्में जिन्हे हिंदी में डब किया गया था। इन फ़िल्मों के गानें ऒर्जिनली तमिल होने की वजह से इन्ही धुनों पर हिंदी के बोल लिखना भी एक चैलेंज हुआ करता था।

सजीव - हाँ, और यह काम उन दिनों भली भाँती कर लिया करते थे गीतकार पी.के. मिश्रा। ख़ैर, वह दौर तो गुज़र चुका है, लेकिन हाल में रहमान की धुनों वाली एक और मशहूर तमिल फ़िल्म को हिंदी में डब किया गया है। यह फ़िल्म है 'शिवाजी दि बॊस'।

सुजॊय - सजीव, मुझे याद है २००७ के जून महीने में मैं अपने काम के सिलसिले में चेन्नई गया हुआ था, उन दिनों यह तमिल फ़िल्म वहाँ रिलीज़ हुई थी। मुझे अब भी याद है रजनीकांत के बड़े बड़े पोस्टर्स पूरे शहर भर में छाए हुए थे।

सजीव - बिल्कुल ठीक, १५ जून २००७ को यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, और इसका हिंदी वर्ज़न रिलीज़ हुआ है ८ जनवरी २०१० को। वी.एम प्रोडक्शन्स निर्मित व एस. शंकर निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे रजनीकांत, श्रिया सरन, सुमन, विवेक, रघुवरण प्रमुख। ए. आर. रहमान ने न केवल फ़िल्म के गाने स्वरबद्ध किए बल्कि पार्श्व संगीत भी तैयार किया।

सुजॊय - तो सजीव, बात संगीत के चल पड़ी है तो आगे बढ़ने से पहले अपने श्रोताओं को सुनवा देते हैं इस फ़िल्म से एक गीत। इस गीत को सुनते हुए हिंदी प्रांत के श्रोताओं को एक अंदाज़ा हो जाएगा दक्षिण में चल रहे संगीत के बारे में। इसे गाया है ब्लाज़, रैग्ज़, तन्वी, सुरेश पीटर ने। इस गीत के तमिल वर्ज़न को विजय ने लिखा था।

गीत - स्टाइल


सुजॊय - 'शिवाजी दि बॊस' फ़िल्म एक सुप्रतिष्ठित सॊफ़्टवेयर सिस्टेम आर्किटेक्ट शिवाजी के इर्द गिर्द घूमती है, जो हाल ही में भारत लौटा है अमेरीका में अपना कार्य समाप्त कर। उसका सपना है कि भारत आकर वो इस समाज को मुफ़्त चिकित्सा व शिक्षा दिलवाए। लेकिन उसे यहाँ पर कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अब उसके पास अपने तरीके से इस करप्ट सिस्टेम का मुकाबला करना है। यही है इस फ़िल्म की मूल कहानी। इस फ़िल्म को उस समय तक का सब से महँगी फ़िल्म मानी गई जो ६० करोड़ की राशी में बनी थी, और इस फ़िल्म ने १०० करोड़ के उपर का व्यापार किया, यानी कि ४० करोड़ का मुनाफ़ा।

सजीव - अब इसी फ़िल्म का एक और गीत सुन लेते हैं जिसे हरिहरण और मधुश्री ने गाया है। मधुश्री ने युं तो बहुत कम फ़िल्मों में गाया हैं, लेकिन जितने भी गीत गाये हैं उनमें से ज़्यादातर ए. आर. रहमान के गानें हैं। यह गीत है "वाह जी वाह जी वाह जी, मेरा जीवन है शिवाजी"। इसका तमिल संस्करण भी इन्ही गायकों की आवाज़ों में है और उसे लिखा था वैरामुथु ने।

सुजॊय - गीत सुनने से पहले आपको बता दें कि २००८ में इस फ़िल्म को फ़िल्मफ़ेयर-दक्षिण अवार्ड्स में बहुत सारे पुरस्कार मिले। तमाम और पुरस्कारों के अलावा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और ए. आर. रहमान को सर्वश्रेष्ठ संगीतकर का पुरस्कार मिला था।

गीत - वाह जी वाह जी



सजीव - अब हम आते हैं आज की दूसरी फ़िल्म पर। 'कार्तिक कॊलिंग् कार्तिक'। इस फ़िल्म के रिलीज़ से पहले जिस तरह की उम्मीदें इससे की जा रहीं थीं, शायद उतनी यह फ़िल्म खरी नहीं उतरी और सिनेमाघरों से जल्दी ही यह फ़िल्म उतर गई। जहाँ तक संगीत का सवाल है, इस फ़िल्म के कम से कम दो गीतों ने लोगों के दिलों को ज़रूर छुआ।

सुजॊय - और इनमें से एक गीत ने लोगों के दिलों को ही नहीं, बल्कि कदमों को ज़रूर छुआ। जब शंकर अहसान लॊय का संगीत हो और जावेद अख़्तर के गीत हों, तो गानें अच्छे बनेंगे ही। तो सजीव, क्योंकि आज हम इस फ़िल्म का एक ही गीत सुनेंगे, इसलिए क्यों ना हम उसी गीत को यहाँ बजाएँ जो सब से ज़्यादा हिट रहा.

सजीव - बिल्कुल, "उफ़ तेरी अदा", यह गीत इन दिनों काफ़ी बज रहा है। शंकर महादेवन, अलिज़ा मेन्डोन्सा और साथियों की आवाज़ें हैं इस गाने में। मेरा ख़याल है कि गीत के बोलों पर ज़्यादा ध्यान ना देकर इसकी रिदम के साथ झूमना चाहिए, तभी इसे ज़्यादा एंजॊय किया जा सकेगा।

गीत - उफ़ तेरी अदा


सुजॊय - और अब आज की तीसरी व अंतिम फ़िल्म की बारी। यह फ़िल्म भी प्रदर्शित हो चुकी है, 'वेल डन अब्बा'। श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक के फ़िल्म की और उनके फ़िल्मों के संगीत की भूमिका देने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। उनकी शुरुआती फ़िल्मों का संगीत देखिए और आज के दौर में बनी उनकी फ़िल्मों का संगीत, कितना फ़र्क आ गया है, लेकिन समानांतर सिनेमा का जो उनका स्टाइल है, वह उन्होने बरकरार रखा है।'ज़ुबेदा' और 'बोस दि फ़ॊरगोटेन हीरो' में उन्होने रहमान का संगीत लिया था, फिर उसके बाद वो मुड़ गए शान्तनु मोइत्र की तरफ़ जिनके साथ उन्होने इससे पहले 'वेलकम टू सज्जनपुर' में काम किया था। और अब ये दोनों साथ में फिर एक बार आए हैं 'वेल डन अब्बा' में।

सजीव - शान्तनु मोइत्र और उनके गीतकार जोड़ीदार स्वानंद किरकिरे का काम हमेशा ही उत्कृष्ट होता है। बहुत कम फ़िल्में करते हैं ये दोनों लेकिन हर एक फ़िल्म के गानें बहुत ख़ास हुआ करते हैं चाहे फ़िल्म चले या ना चले। '३ इडियट्स' की अपार सफलता के बाद अब ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गीतों से भी लोग उमीदें ज़रूर लगाएँगे, लेकिन लोगों को यह भी याद रखना होगा कि '३ इडियट्स' एक व्यावसायिक फ़िल्म थी और 'वेल डन अब्बा' एक पैरलेल फ़िल्म है। इनका आपस में तुलना करना निरर्थक है।

सुजॊय - 'वेल डन अब्बा' के मुख्य कलाकार हैं बोमन इरानी, मिनिशा लाम्बा, रवि किशन और सोनाली। स्वानंद किरकिरे के अलावा अशोक मिश्र और इला अरुण ने भी इसमें गीत लिखे हैं। तो चलिए पहला गीत सुनते हैं इला अरुण और डैनियल जॊर्ज की आवाज़ों में "मेरी बन्नो होशियार"। यह एक शादी वाला गाना है और इसमें बोल भी गुदगुदाने वाले हैं।

सजीव - और पार्श्व में जो तेलुगू के शब्द आते है, उनसे भी गीत में एक ख़ास बात आ गई है। अच्छा सुजॊय इस गीत को सुनो और सुनने के बाद बताओ कि तुम्हे इस गीत से कौन सी पुरानी फ़िल्मी गीत की याद आई।

गीत - मेरी बन्नो होशियार


सुजॊय - सजीव, मुझे लगता है कि इस गीत की धुन मिलती जुलती है 'दो आँखें बारह हाथ' फ़िल्म में लता जी के गाए गीत "स‍इयां झूठों का बड़ा सरताज निकला" से। दरअसल क्या है कि इस तरह के उत्तर भारत के शादी वाले गीतों की धुन लगभग एक जैसी ही होती है जो लम्बे समय से चली आ रही है। धुन वही है लेकिन बोल बदलते जाते हैं। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि किसी तरह की 'ट्युन लिफ़्टिंग्' हुई है, बस यही कह सकते हैं कि इसे एक पारम्परिक धुन मान लें।

सजीव - ठीक कहा। और अब एक सुफ़ी शैली में बना गीत राघव और राजा हसन की आवाज़ में। रियल्टी शो से उभरे राजा हसन को आजकल मौके मिलने लगे हैं, हो सकता है कि धीरे धीरे वो सीढियाँ चढ़ते जाएँगे। यह गीत है "रहीमन इश्क का धागा रे, कबहूँ ना चटकाना रे"। रहीम के दोहों पर आधारित यह गीत सुनते हुए आपको अपने बचपन की याद ज़रूर आ जाएगी जब हिंदी के पाठ्यक्रम में रहीम और कबीर जैसे संतों के दोहों के पाठ हुआ करते थे।

सुजॊय - और इन दोहों में जीवन दर्शन के उपदेशों को कितनी ख़ूबसूरती के साथ प्रकृति से उदाहरण लेकर समझाया गया है। याद है फ़िल्म 'अखियों के झरोखों से' फ़िल्म में भी इसी तरह का एक दोहावलि गीत था जिसमें एक प्रतियोगिता में नायक और नायिका दोहों से एक दूसरे का मुकाबला करते हैं। उस गीत में पहला दोहा था "बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले बोल, रहीमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल"।

सजीव - और पता है 'अखियों के झरोखों से' के उस दोहावलि में भी इस दोहे का शुमार किया गया था, यानी कि "रहीमन इश्क का धागा रे..."। सचमुच, ये दोहे सुनकर बहुत सुकून मिलता है, और 'वेल डन अब्बा' के इस गीत में भी वही बात है। सुनते हैं।

गीत - रहीमन इश्क का धागा


"शिवाजी दा बॉस" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बोलों पर बिना ध्यान दिए यदि विंटेज रहमान को एक बार फिर सुनना चाहते हैं तो अल्बम खरीद लाईये. ये रहमान का वो अंदाज़ है जहाँ संगीत धुनों पर खुल कर बरसता है, हिंदी फिल्मों में रहमान बेहद संयम बरतते हैं साजों के चुनाव आदि के मामले में, यहाँ मेचुरिटी नज़र आती है, पर इस तरह की तमिल फिल्मों में जहाँ उन्हें बस "धाकड" संगीत देना होता है, वो लौट आते हैं अपने पुराने अंदाज़ में, ये वही अंदाज़ है.

"कार्तिक कौल्लिंग कार्तिक" के संगीत को आवाज़ रेटिंग **१/२
गीतकार संगीतकार की ये वो टीम है जिसने संगीत की दुनिया को एक से एक गीत दिए हैं, पर विडम्बना देखिये ये जोड़ी अब अपना चार्म खोती सी दिखाई दे रही है. नएपन् का सतत अभाव.

"वेल डन अब्बा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
अल्बम के लिहाज से न सही पर फिल्म की पठकथा के अनुरूप नज़र पड़ता है ये संगीत. यहाँ भी कोई नयापन नहीं है, पर गीत मधुर जरूर लगते हैं

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ३७- शिवाजी दि बॊस' ए.वी.एम की फ़िल्म थी। बताइए ए.वी.एम की पहली हिंदी फ़िल्म कौन सी थी और किस साल प्रदर्शित हुई थी?

TST ट्रिविया # ३८- एक ऐसा साल था जिस साल फ़िल्मफ़ेयर के अन्तर्गत जतिन ललित को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला था, और उसी साल ए. आर. रहमान को फ़िल्मफ़ेयर का आर. डी. बर्मन अवार्ड मिला था। बताइए वह कौन साल था और जतिन ललित और रहमान को किन किन फ़िल्मों के लिए ये पुरस्कार मिले थे?

TST ट्रिविया # ३९- रहीम का वह कौन सा दोहा है जिसमें बिगड़ी बात फिर ना बन पाने की बात कही गई है?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछली बार अल्बम के चयन को लेकर कुछ बात छिड़ी, देखिये हमारा काम नयी अल्बोम के संगीत के बारे में जानकारी देना है ये तो श्रोता ही बतायेंगें कि वो कितने सार्थक हैं. मुनीश जी और तन्हा जी आप दोनों के विचारों का हम स्वागत करते हैं. सीमा जी केवल एक ही जवाब. चलिए अन्य दो जवाब हम दिए देते हैं.
जिन ३ गीतों में हमने समानता पूछी थी उन तीनों गीतों के संगीतकार महिला हैं और उनकी आवाज़ भी इन गीतों में शामिल है। पहला गीत सरस्वती देवी का है (फ़िल्म" अछूत कन्या), दूसरा गीत उषा खन्ना (फ़िल्म: बिन फेरे हम तेरे)।
दिबाकर बनर्जी का टीवी सीरियल था 'नॊट ए नाइस मैन टू नो'.

Sunday, March 28, 2010

आदमी जो कहता है आदमी जो सुनता है....जिंदगी भर पीछा करते हैं कुछ ऐसे गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 387/2010/87

'मैंशायर तो नहीं' - गीतकार आनंद बक्शी पर केन्द्रित इस लघु शृंखला में आज जिस गीत की बारी है वह एक दार्शनिक गीत है। इस जॉनर के गानें भी बक्शी साहब ने क्या ख़ूब लिखे हैं। कुछ की याद दिलाएँ? "ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुकाम, वो फिर नहीं आते", "आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है", "दो रंग दुनिया के और दो रास्ते", "इक बंजारा गाए जीवन के गीत सुनाए", "गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है, चलना ही ज़िंदगी है चलती ही जा रही है", "ये जीवन है, इस जीवन का, यही है रंग रूप", "दिए जलते हैं फूल खिलते हैं, बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं", और भी न जाने कितने ऐसे गीत हैं जिनमें ज़िंदगी के फलसफे को समेटा था बक्शी साहब ने। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म 'मजबूर' से "आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है, ज़िंदगी भर वो सदाएँ पीछा करती हैं"। बहुत ही असरदार गीत है और यह एक ऐसा गीत है जिसके साथ हर आदमी अपनी ज़िंदगी को जोड़ सकता है। क्या ख़ूब कहा है बक्शी साहब ने कि "कोई भी हो हर ख़्वाब तो सच्चा नहीं होता, बहुत ज़्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता, कभी दामन छुड़ाना हो तो मुश्किल हो, प्यार के रिश्ते टूटें तो, प्यार के रस्ते छूटें तो, रास्ते में फिर वफ़ाएँ पीछा करती हैं"। ग़ौर कीजिए कि कैसी बोलचाल वाली भाषा है, लेकिन कितना असरदार! और किशोर दा की वज़नदार और भावपूर्ण आवाज़ ने गीत को एक अलग ही दर्जा प्रदान किया है। फ़िल्म 'मजबूर' के संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। यह फ़िल्म बनी थी १९७४ में, रवि टंडन का निर्देशन था, अमिताभ बच्चन, परवीन बाबी, फ़रीदा जलाल और प्राण मुख्य कलाकार थे इस फ़िल्म में। कहानी कुछ इस प्रकार थी कि रवि खन्ना अपने अपाहिज बहन, छोटे भाई और विधवा माँ के साथ रहता है। एक दिन उसे पता चलता है कि उसे ब्रेन ट्युमर है और उसके पास केवल ६ महीने का ही समय है। ऐसे में अपनी माँ और भाई-बहन के भविष्य के बारे में सोचते हुए वो एक क़त्ल का इलज़ाम अपने सर ले लेता है जिसके बदले उसे भारी रकम मिलती है अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए। लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर होता है। क्या होता है आगे चलकर, आप में से बहुतों को पता होगा, ना हो तो कभी इस फ़िल्म को ज़रूर देखिएगा।

आनंद बक्शी एक ऐसे गीतकार रहे जिन्होने अनेक कलाकारों को उनका पहला हिट गीत दिया उनके पहले ही फ़िल्म में, जैसे कि सनी देओल, जैकी श्रोफ़, कमल हसन, कुमार गौरव, रजनीकांत, राखी, डिम्पल कपाडिया, ऋषी कपूर, अमृता सिंह, अमृता अरोड़ा, उदय चोपड़ा, जिम्मी शेरगिल, जया प्रदा, मनिषा कोयराला, विवेक मुशरन, महिमा चौधरी, नम्रता शिरोडकर, अर्जुन रामपाल, तब्बु, संजय दत्त, ज़ीनत अमान और मीनाक्षी शेशाद्री। सिर्फ़ अभिनेता ही नहीं, बहुत सारे गायकों ने भी अपना पहला ब्रेकिंग् गीत बक्शी साहब का ही लिखा हुआ गाया। इनमें शामिल हैं शैलेन्द्र सिंह, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ती, एस. पी. बालासुब्रह्मण्यम, सुखविंदर सिंह, तलत अज़ीज़, रूप कुमार राठोड़। 'आराधना' के गीतों से किशोर कुमार का एक नया स्टाइल ही आ गया, और रफ़ी साहब का भी कमबैक हुई 'अमर अक्बर ऐंथनी' और 'धरमवीर' जैसी फ़िल्मों के साथ। दोस्तों, क्योंकि आज आनंद बक्शी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की तिकड़ी का गीत बज रहा है, तो क्यो ना प्यारेलाल जी से की गई मुलाक़ात से एक अंश निकाल कर यहाँ पेश किया जाए। यह मुलाक़ात की थी विविध भारती के कमल शर्मा जी ने 'उजाले उनकी यादों के' सीरीज़ के लिए।

प्र: आनंद बक्शी साहब के साथ में आपका एक बहुत अलग तरह का, बहुत अच्छा...
उ: बहुत!
प्र: उनकी ट्युनिंग् थी आपकी...
उ: और उनका क्या था कि जैसे लक्ष्मी जी, या जो भी प्रोड्युसर हैं, उनको अगर कुछ चेंज करवाना हो, मतलब मैं ऐसे बता रहा हूँ, क्योंकि कुछ भी चेंज करने को कहो तो 'अरे बहुत अच्छा है, तुम लोग समझते नहीं, ये लो लाइफ़ बन गई तुम लोगों की', ऐसा, तो कुछ भी चेंज करना हो तो मुझे बोलते थे। तो हम साथ में आते थे गाड़ी मे बान्द्रा से, तो 'बक्शी जी, ऐसे बात कह रहे थे', 'अच्छा मैं समझ गया, क्या चेंज करना है बता, क्या लाइन है बता'।
प्र: गाड़ी में बैठ के?
उ: हाँ, गाड़ी में बैठ के, जैसा बोल देता था वैसा लिख देते थे, और वहाँ पहुँच कर, 'लक्ष्मी, चल लिख ले'। तो ऐसा, मतलब, काम करने का, मतलब, अजीब था। कमाल के थे।




क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी को पान खाने की ज़बरदस्त आदत थी, और निधन से ६-७ महीने पहले भी दिन में कम से कम २५ पान चबा जाते थे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"आँगन" गीत बताएं -३ अंक.
2. एक मल्टी स्टारर फिल्म थी ये पर व्यावसायिक फार्मूला फिल्मों से हट कर हल्की फुल्की गुदगुदाने वाली, नाम बताएं - २ अंक.
3. कौन थे संगीत निर्देशक -२ अंक.
4. लता की आवाज़ में सजा ये छेड छाड वाला गीत किस अभिनेत्री ने निभाया है परदे पर -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
पाबला जी आपने खबर देकर मन खुश किया है, यदि लेखिका प्रतिभा कटियार से आप वाकिफ हों या यदि आज वो इस एपिसोड को पढ़ रही हों तो उन्हें हम शुक्रिया कहना चाहेंगे जिस खूबसूरत अंदाज़ में उन्होंने आवाज़ के अंदाज़ का बयां किया पढ़ कर हमारा हौंसला दुगना हुआ है. साथ ही शरद जी, अनुपम जी, इंदु जी सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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