Saturday, March 13, 2010

सुनो कहानी: डिप्टी कलेक्टर - हरिशंकर परसाई

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने उर्दू और हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क लिखित रचना "चारा काटने की मशीन" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्य "डिप्टी कलेक्टर", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।
"डिप्टी कलेक्टर" का कुल प्रसारण समय मात्र 3 मिनट 45 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

यह धांधली देख कर दूसरे अखबार ने चेतावनी छापी- "नक्कालों से सावधान।"
(हरिशंकर परसाई के व्यंग्य "डिप्टी कलेक्टर" से एक अंश)


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#64th Story, Deputy Collector: Harishankar Parsai/Hindi Audio Book/2010/9. Voice: Anurag Sharma

न जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ...कि कुछ गीत कभी दिलो-जेहन से उतरते ही नहीं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 372/2010/72

लीग से हट के फ़िल्मों की बात करें तो ऐसी फ़िल्मों में बासु चटर्जी का योगदान उल्लेखनीय रहा है। मध्यम वर्गीय परिवारों की छोटी छोटी ख़ुशियों, तक़लीफ़ों और उनकी ज़िंदगियों को असरदार तरीके से प्रस्तुत करने में बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी का अच्छा ख़ासा नाम रहा है। आज हम '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में जिस फ़िल्म क गीत सुनेंगे, उसे बी. आर. चोपड़ा ने बनायी थी और बासु दा का निर्देशन था। यह फ़िल्म थी १९७५ की 'छोटी सी बात'। याद है ना आपको अमोल पालेकर की वो भोली अदाएँ, और साथ में विद्या सिंहा और अशोक कुमार। क्या कहा, याद नहीं? चलिए हम आपको इस फ़िल्म की थोड़ी भूमिका बता देते हैं। अरुण (अमोल पालेकर) एक शर्मीला क़िस्म का लड़का, जो बम्बई में अकाउंटैण्ट का काम करता है, प्रभा (विद्या सिंहा) नाम की लड़की से इश्क़ लड़ाने के सपने देखा करता है। लेकिन वह कभी प्रभा से अपनी दिल की बात नहीं कह पाता। उधर नागेश (असरानी) अरुण को उकसाता है कि वह 'रोमांस स्पेशियलिस्ट' जुलियस नागेन्द्रनाथ (अशोक कुमार) से प्रेम शास्त्र की तालीम ले प्रभा को हासिल करने के लिए। इस तरह से हास्यप्रद मोड़ों से गुज़रती हुई कहानी आगे बढ़ती है। इस तरह के भोले भाले हास्य किरदर अमोल पालेकर बख़ूबी निभाते थे। 'गोलमाल' एक और ऐसी फ़िल्म थी। ख़ैर, आज तो 'छोटी सी बात' की बारी है। तो आइए आज इस फ़िल्म से सुना जाए लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म का शीर्षक गीत, "न जाने क्यो होता है यह ज़िंदगी के साथ, अचानक यह मन किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद छोटी छोटी सी बात"। हमें उम्मीद ही नहीं, पूरा यक़ीन है कि आपको भी यह गीत उतना ही पसंद होगा जितना कि मुझे और सजीव जी को है। सलिल चौधरी का संगीत और योगेश की गीत रचना। दोस्तों, फ़िल्म 'आनंद' का गीत सुनवाते हुए हमने यह ज़िक्र किया था कि योगेश ऐसे गीतकार रहे हैं जिन्होने अपने गीतों में शुद्ध हिंदी भाषा का बहुत ही सुंदरता से प्रयोग किया, जो सुनने में अत्यंत कर्णप्रिय बन पड़े। और आज का गीत भी उन्ही में से एक है। युं तो योगेश जी ने कई संगीतकारों के साथ काम किया पर सब से ज़्यादा काम उन्होने संगीतकार सलिल चौधरी के साथ किया, और ऐसा किया कि हर गीत अमर हो गया।

दोस्तों, बात जब योगेश साहब की छिड़ ही चुकी है तो क्यों ना उन्ही के बारे में कुछ और बातें की जाए। विविध भारती के एक मुलाक़ात में योगेश जी ने अपने जीवन का हाल सुनाया था, तो चलिए उन्ही की ज़ुबानी जान लें उनके शुरुआती दिनों का हाल। "मेरे पिताजी की मृत्यु के बाद मुझे लखनऊ छोड़ना पड़ा। हमारे एक आत्मीय संबम्धी बम्बई में फ़िल्म लाइन में थे, सोचा कि कहीं ना कहीं लगा देंगे, पर ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। बल्कि मेरा एक दोस्त जो मेरे साथ क्लास-५ से साथ में है, वह मेरे साथ बम्बई आ गया। उसी ने मुझसे कहा कि तुम्हे फ़िल्म-लाइन में ही जाना है। यहाँ आकर पहले ३ सालों तक तो भटकते रहे। ३ सालों तक कई संगीतकारों से 'कल आइए परसों आइए' ही सुनता रहा। ऐसे करते करते एक दिन रोबिन बनर्जी ने मुझे बुलाया और कहा कि एक लो बजट फ़िल्म है, जिसके लिए मैं गानें बना रहा हूँ। एक साल तक हम गानें बनाते रहे और गानें स्टॊक होते गए। तो जब 'सखी रॊबिन' फ़िल्म के लिए निर्माता ने गानें मँगवाए, एक ही दिन में ६ गानें उन्हे पसंद आ गए क्योंकि गानें हमारे पास स्टॊक में ही थे, और हर गाने के लिए २५ रुपय मिले।" तो इस तरह से शुरु हुई थी योगेश जी की फ़िल्मी यात्रा। आज के प्रस्तुत गीत के संगीत के बारे में यही कह सकते हैं कि सलिल दा ने इस तरह का वेस्टर्ण रीदम कई गीतों में इस्तेमाल किया है, एक तरफ़ गीत के बोल भारतीय शास्त्रीय संगीत के आधार पर खड़े हैं, लेकिन जो रीदम है, या ऒर्केस्ट्रेशन है उसमें लाइट वेस्टर्ण म्युज़िक सुनाई देता है। भारतीय और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत, दोनों में ही माहिर थे सलिल दा। तो दोस्तों, आइए अब गीत का आनंद उठाया जाए योगेश जी कहे इन शब्दों के साथ कि "मेरे गीत गाते रहना, मेरे गीत गुनगुनाते रहना, मैं अगर भूल भी जाऊँ गीतों का सफ़र, तुम मुझे याद दिलाते रहना"!



क्या आप जानते हैं...
कि श्याम सागर के संगीत निर्देशन में मन्ना डे के ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम 'मयूरपंखी सपने' में योगेश ने दो गीत लिखे थे। श्याम सागर द्वारा स्वरबद्ध सुमन कल्याणपुर की ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम 'स्वर बहार' के लिए योगेश ने ३ गीत लिखे थे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखडा शुरू होता है इस शब्द से -"तुम्हें", गीत पहचानें -३ अंक.
2. गुलज़ार साहब का ही लिखा हुआ है ये गीत भी, गायिका का नाम बताएं- २ अंक.
3. संगीतकार कौन हैं -२ अंक.
4. जरीना वहाब पर फिल्माए इस गीत की फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ३ अंक मिले आपको, इंदु जी और अवध जी जवाब लेकर आये, चौथा जवाब सुबह ९.३० तक नहीं मिला मुझे क्यों ?
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, March 12, 2010

फिर वही रात है ख्वाब की....किशोर की जादुई आवाज़ में ढला एक काव्यात्मक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 371/2010/71

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ३७१-वीं कड़ी में हम सभी श्रोताओं व पाठकों का हार्दिक स्वागत करते हैं। मित्रों, हमारी मुख्य धारा की हिंदी फ़िल्मों की आत्मा लगभग एक ही तरह की होती है, जिसे हम आम भाषा में फ़ॊरमुला फ़िल्में भी कहते हैं। नायक, नायिका, और खलनायक के इर्द-गिर्द घूमने वाली फ़िल्में ही संख्या में सब से ज़्यादा हैं, और इस तरह का आधार व्यावसायिक तौर पर फ़िल्म की सफलता की चाबी का काम करता है। लेकिन समय समय पर हमारे प्रतिभाशाली फ़िल्मकारों ने बहुत सी ऐसी फ़िल्में भी बनाई हैं जिनकी कहानी, जिनका पार्श्व, बिल्कुल अलग है, लीग से बिल्कुल हट के है। ये फ़िल्में हो सकता है कि बॊक्स ऒफ़िस पर अपना छाप न छोड़ सकी हो, लेकिन अच्छे फ़िल्मों के क़द्रदान इन फ़िल्मों को याद रखा करते हैं। इन फ़िल्मों को समानांतर सिनेमा या आम भाषा में पैरलेल सिनेमा कहा जाता है। इनमें से कई फ़िल्में ऐसी हैं जिनके गीत संगीत में भी अनूठापन है, जो साधारण फ़िल्मी गीतों से अलग सुनाई देते हैं। फ़िल्म के ना चलने से इनमें से कुछ गीतों की तरफ़ लोगों का कम ही ध्यान गया, लेकिन कुछ गानें ऐसे भी हुए जो बेहद मक़बूल हुए और आज भी रेडियो या टीवी पर अक्सर सुनाई दे जाते हैं। ऐसे ही कु्छ लीग से बाहर की फ़िल्मों के कुछ चर्चित और कुछ कमचर्चित गीतों को लेकर हम आज से शुरु कर रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला '१० गीत समानांतर सिनेमा के'। तो आज इसकी शुरुआत करते हैं घर से। मेरा मतलब है फ़िल्म 'घर' के एक गीत से, "फिर वही रात है, रात है ख़्वाब की"। किशोर कुमार की आवाज़ में इस गीत को आप ने कई कई बार सुना होगा, लेकिन चाहे कितनी भी बार इसे सुन लें, हर बार सुन कर अच्छा ही लगता है। और क्यों ना लगे, जब गुलज़ार साहब के बोलों पर पंचम का संगीत हो, और उस पर किशोर दा की दिलकश आवाज़! "मासूम सी नींद में जब कोई सपना चले, हमको बुला लेना तुम पलकों के परदे तले"। जब इस तरह के शब्द हों, तो गीत खुद ब ख़ुद ही एक अलग मुक़ाम बना लेता है, क्यों!

फ़िल्म 'घर' आई थी सन् १९७८ में एन.एन. सिप्पी प्रोडक्शन्स के बैनर तले। विनोद मेहरा और रेखा अभिनीत इस फ़िल्म के निर्देशक थे मानिक चटर्जी और लेखक थे दिनेश ठाकुर। दिनेश थाकुर को इस फ़िल्म के लिए उस साल के सर्वश्रेष्ठ कहानी का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। और रेखा का नाम सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामांकित हुआ था। क्योंकि हम लीग से हटके फ़िल्मों के गानें सुन रहे हैं, तो ऐसे में फ़िल्म की कहनी से आपका परिचय करवाना थोड़ा जरूरी हो जाता है। कहानी कुछ इस तरह की है कि नवविवाहित जोड़ी विकास (विनोद मेहरा) और आरती (रेखा) अपने नए फ़्लैट में रहने लगते हैं और उनकी ज़िंदगी बड़े प्यार से गुज़र रही होती है। एक रात दोनों थिएटर में फ़िल्म देख कर लौटते वक़्त टैक्सी के ना मिलने से पैदल ही घर वापस आ रहे होते हैं। ऐसे में चार गुंडे उन्हे घेर लेते हैं, विकास को पीट कर बेहोश कर देते हैं और आरती को उठाकर ले जाते हैं। होश आने पर विकास अपने आप को अस्पताल में पाता है, और आरती, जिसका सामूहिक बलात्कार हो चुका होता है, उसका भी उसी अस्पतल में इलाज हो रहा होता है। यह घटना अगले ही दिन सभी समाचार पत्रों, रेडियो और टीवी पर आ जाती है, पूरे शहर में बवाल मच जाता है, नेता लोग अपने अपने राजनैतिक फ़ायदे के लिए इस पर राजनीति शुरु कर देते हैं। ऐसे में विकास को लगता है कि वह समाज में अलग थलग पड़ गया है। आरती भी मानसिक तौर पर असंतुलित हो जाती है और हर पुरुष को शक़ की नज़र से देखती है। विकास और आरती के संबम्ध से वह मिठास, वह प्यार ग़ायब हो जाता है। फ़िल्म का क्या अंत होता है, यह तो आप ख़ुद ही कभी देखिएगा। दोस्तों, आजकल का जो माहौल है, जो समाज है, इस तरह की घटना किसी भी आम आदमी के साथ कहीं भी कभी भी घट सकती है। ऐसे में यह फ़िल्म बड़ी ही सार्थक बन जाती है, और आज के दौर में तो और भी ज़्यादा। ख़ैर, अब हम आते हैं फ़िल्म के गीतों पर। इस फ़िल्म में कुल पाँच गानें हैं और सभी के सभी सुपर हिट। लता की आवाज़ में "आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे" और "तेरे बिना जिया जाए ना", लता-किशोर की आवाज़ में "आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज़ हैं", आशा-रफ़ी का गाया "बोतल से एक बात चली है", तथा आज का प्रस्तुत गीत। आइए अब गीत सुना जाए, और दोस्तों, गीत के बोलों पर ग़ौर ज़रूर कीजिएगा क्योंकि भई यह गुलज़ार साहब की रचना है, बोलों के तह तक पहुँचने के लिए दिमाग पर थोड़ा ज़ोर तो लगाना ही पड़ेगा! है ना!



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार और राहुल देव बर्मन की साथ साथ पहली फ़िल्म थी सन् १९७२ की फ़िल्म 'परिचय'

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरा खतम होता है इस शब्द पर -"महल", गीत बताएं -३ अंक.
2. बासु चट्टर्जी के निर्देशन में बनी इस फिल्म का नाम बताएं.
3. गीतकार बताएं इस गीत के-२ अंक.
4. अपने उत्कृष्ट संगीत के लिए जाने जाने वाले इस संगीतकार का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
गीत पहचाना शरद जी ने तो अन्य सभी भी सही जवाब लेकर उपस्थित हुए, बधाई
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, March 11, 2010

सुनो सजना पपीहे ने कहा सबसे पुकार के....सम्हल जाओ चमन वालो कि आये दिन बहार के

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 370/2010/70

पिछले नौ दिनों से आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आनंद ले रहे हैं इस रंगीन मौसम का, बसंत ऋतु का, फागुन के महीने का, होली के रंगों का, सब के सब गीत संगीत के माध्यम से। आज हम आ पहुँचे हैं इस रंगीन लघु शृंखला की अंतिम कड़ी पर। 'गीत रंगीले' की अंतिम कड़ी के लिए हमने चुना है लता मंगेशकर की आवाज़ में आनंद बक्शी की गीत रचना। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत में यह है फ़िल्म 'आए दिन बहार के' का शीर्षक गीत, "सुनो सजना पपीहे ने कहा सब से पुकार के, संभल जाओ चमन वालों, के आए दिन बहार के"। फ़िल्म का शीर्षक जितना रंगीला है, बक्शी साहब ने क्या ख़ूब न्याय किया है इस शीर्षक पर लिखे इस गीत के साथ! शीर्षक की अगर बात करें तो आपको सब से पहले तो यह बताना पड़ेगा कि यह जे. ओम प्रकाश साहब की फ़िल्म थी और उन्होने इस तरह के शीर्षकों का बार बार इस्तेमाल अपनी फ़िल्मों के लिए किया है। १९५९ में उनकी पहली फ़िल्म 'चाचा ज़िंदाबाद' आई थी। बस यही एक फ़िल्म थी जिसका शीर्षक 'अ' से या अंग्रेज़ी के 'ए' अक्षर से शुरु नहीं हुआ था। लेकिन इसके बाद उन्होने जितने भी फ़िल्में बनाई, वो सब 'ए' से शुरु हुए। १९६१ में 'आस का पंछी', और १९६४ में 'आई मिलन की बेला' की कामयाबी के बाद तो उन्होने जैसे इस तरह के फ़िल्मों की कतार ही खड़ी कर दी। १९६६ में आई 'आए दिन बहार के' और फिर एक बार फ़िल्म हिट हुई। धर्मेन्द्र और आशा पारेख इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे। उसके बाद 'आया सावन झूम के', 'आँखों आँखों में', 'आप की क़सम', 'अपनापन', 'आशा', 'अर्पण', 'आख़िर क्यों?', 'आप के साथ', 'अग्नि', और 'अफ़साना दिलवालों का' जैसी फ़िल्में उन्होने बनाई। इन नामों को पढ़कर आपको पता चल गया होगा कि जे. ओम प्रकाश साहब की फ़िल्मों का संगीत कितना कामयाब रहा है, क्योंकि ये जितनी भी फ़िल्में हैं, उनके गानें बेहद मक़बूल हुए थे, जिन्हे आज भी लोग सुनते हैं, गुनगुनाते हैं।

फ़िल्म 'आए दिन बहार के' का प्रस्तुत शीर्षक गीत का फ़िल्मांकन भी बहुत सुंदर तरीक़े से हुआ है। जैसा इस गीत के बोल हैं, मूड है, वैसा ही वातावरण के नज़ारे दिखाई देते हैं पर्दे पर। रंग बिरंगे फूलोँ की डालियाँ, भँवरें, झील का मंज़र, हरी भरी वादियाँ, उपर खुला नीला आसमान, उनमें सफ़ेद बादलों की टोलियाँ, प्रकृति के ये नज़ारे दिल को इस तरह से छू लेते हैं कि गीत के आख़िरी अंतरे में कहा गया है कि "ऐसा समा जो देखा राही भी राह भूले, के जी चाहा यहीं रख दें उमर सारी गुज़ार के, संभल जाओ चमन वालों के आए दिन बहार के"। शास्त्रीय संगीत पर आधारित यह गीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के स्वरबद्ध किए उन सुरीली रचनाओं में से हैं जिनमें उन्होने शास्त्रीय संगीत को आधार बनाया था। इस गीत को लक्ष्मीकांत जी ने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में भी बजाया था १९७० में। दोस्तों, इस गीत का आधार भले ही शास्त्रीय हो, लेकिन क्या आपको पता है कि यह दरअसल राग पहाड़ी पर आधारित है। यानी कि शास्त्रीयता के साथ साथ लोक रंग भी मिला हुआ है। आपको एल-पी के स्वरबद्ध कुछ राग पहाड़ी के गीतों की याद दिलाई जाए? ये हैं कुछ ऐसे गीत -
सलामत रहो (पारसमणि)
जाने वालों ज़रा मुड़के देखो मुझे (दोस्ती)
चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे (दोस्ती)
सावन का महीना पवन करे सोर (मिलन)
ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं (इज़्ज़त), आदि।

और दोस्तों, अब इस गीत को सुनिए, और रंग रंगीले गीतों की इस शृंखला को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिए। हमारी आप सभी के लिए यही शुभकामना है कि आपके जीवन में भी ख़ुशियों के, सफलताओं के, शांति के रंग हमेशा घुलते रहे, आपके साभी सात रंगों वाले सपने पूरे हों, यही हमारी ईश्वर से प्रार्थना है।

दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' ने आज ३७० अंक पूरे कर लिए है। 'आवाज़' के इस स्तंभ के बारे में आप अपनी राय, अपने उदगार, अपने सुझाव, अपनी शिकायतें हमें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें। आप अपने पसंद के गीतों की तरफ़ भी हमारा ध्यान आकृष्ट करवा सकते हैं इसी पते पर। अगर आप में से कोई इस स्तंभ के लिए आलेख लिखना चाहते हों, तो आप हमसे इसी पते पर सम्पर्क करें। जिस तरह का सहयोग आपका अब तक रहा है, वै्सा ही सहयोग बनाए रखें, और इस ई-मेल पते के माध्यम से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को बेहतर से बेहतरीन बनाने में हमारा सहयोग करते रहें। धन्यवाद!



क्या आप जानते हैं...
कि लता मंगेशकर ने ११ मार्च १९७४ में विदेश में पहली बार, लंदन के ऐल्बर्ट हॊल में अपना गायन प्रस्तुत किया था। पहला गीत उन्होने गाया था फ़िल्म 'हम दोनों' का "अल्लाह तेरो नाम", और अंतिम गाना उन्होने गाया था "ऐ मेरे वतन के लोगों"।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"मासूम", गीत बताएं -३ अंक.
2. यूं तो इस फिल्म के सभी गीत खूब लिखे हैं इस गीतकार ने पर इस गीत के तो कहने ही क्या, गीतकार बताएं-२ अंक.
3. संगीतकार कौन हैं इस गीत के-२ अंक.
4. विनोद मेहरा पर फिल्माए इस गीत को किसने आवाज़ से संवारा है -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
हम समझ गए इंदु जी कि क्यों आपने २ अंकों वाला सवाल चुना, इतनी सारी बातें भी तो करनी थी न, वैसे सच बताएं तो आपकी मीठी मीठी बातों की हमें आदत हो गयी है बहरहाल शरद जी ५० का आंकड़ा पार कर चुके हैं, देखते हैं १०० तक पहुँचने वाले भी वो पहले हो पाते हैं या नहीं
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, March 10, 2010

पुरवा सुहानी आई रे...थिरक उठते है बरबस ही कदम इस गीत की थाप सुनकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 369/2010/69

'गीत रंगीले' शृंखला की नौवीं कड़ी के लिए आज हमने जिस गीत को चुना है, उसमें त्योहार की धूम भी है, गाँव वालों की मस्ती भी है, लेकिन साथ ही साथ देश भक्ति की भावना भी छुपी हुई है। और क्यों ना हो जब भारत कुमार, यानी कि हमारे मनोज कुमार जी की फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' का गाना हो, तो देश भक्ति के भाव तो आने ही थे! आइए आज सुनें इसी फ़िल्म से "पूर्वा सुहानी आई रे"। लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मनहर और साथियों की आवाज़ें हैं, गीत लिखा है संतोष आनंद ने और संगीतकार हैं कल्याणजी-आनंदजी। गीत फ़िल्माया गया है मनोज कुमार, विनोद खन्ना, भारती और सायरा बानो पर। आइए आज गीतकार व कवि संतोष आनंद जी की कुछ बातें की जाए! दोस्तों, कभी कभी सफलता दबे पाँव आने के बजाए दरवाज़े पर दस्तक देकर आती है। मूलत: हिंदी के जाने माने कवि संतोष आनंद को फ़िल्मी गीतकार बनने पर ऐसा ही अनुभव हुआ होगा! कम से कम गीत लिख कर ज़्यादा नाम और इनाम पाने वाले गीतकारों में शुमार होता है संतोष आनंद का। मनोज कुमार ने 'पूरब और पश्चिम' में उनसे सब से पहले फ़िल्मी गीत लिखवाया था "पूर्वा सुहानी आई रे"। यह गीत उनके जीवन में ऐसे सुगंधित और शीतल पुरवा की तरह आई कि वो तो शोहरत की ऊँचाइयों तक पहुँचे ही, सुनने वाले भी झूम उठे। इसके बाद बनी फ़िल्म 'शोर' और संतोष आनंद ने चटखारे लेते हुए लिखा "ज़रा सा उसको छुआ तो उसने मचा दिया शोर"। इस गीत ने बहुत शोर मचाया, हालाँकि इसी फ़िल्म में उन्होने एक गम्भीर दार्शनिक गीत भी लिखा था जो आज तक उतना ही लोकप्रिय है जितना उस समय हुआ था। जी हाँ, "एक प्यार का नग़मा है, मौजों की रवानी है, ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है"।संतोष आनंद जी संबंधित और भी कई बातें हम आगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी रखेंगे।

'पूरब और पश्चिम' १९७० की मनोज कुमार निर्मित, निर्देशित व अभिनीत फ़िल्म थी। मूल कहानी श्रीमति शशि गोस्वामी की थी, जिसे फ़िल्म के लिए लिखा मनोज कुमार ने। इस फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, सायरा बानो, प्राण, भारती, निरुपा रॊय, कामिनी कौशल, विनोद खन्ना, राजेन्द्र नाथ आदि। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कमल शर्मा ने आनंदजी भाई से फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' के संगीत से जुड़ा सवाल पूछा था, ख़ास कर आज के इस गीत को बजाने से पहले, तो भला यहाँ पर उस बातचीत के अंश को पेश करने से बेहतर और क्या होगा!

प्र: जैसे 'पूरब और पश्चिम', जैसा आप ने ज़िक्र किया, उसमें दो शब्द ही अपने आप में सारी बातें कह देता है। एक तरफ़ पूरब की बात है, दूसरी तरफ़ पश्चिम की बात है, कल्चर डिफ़रेण्ट हैं, उस पूरी तसवीर को संगीत में खड़ा करना और उसको सपोर्ट देना चैलेंजिंग् तो रहा ही होगा?

उ: चलेंजिंग् तो रहता है लेकिन साथ में एक इंट्रेस्टिंग् भी रहता है, इसलिए कि म्युज़िक डिरेक्टर को एक घराने में नहीं रहना पड़ता है, यह होता है न कि मैं इस घराने से हूँ, ऐसा नहीं है, यहाँ पे वेस्टर्ण म्युज़िक भी देना है, इंडियन म्युज़िक भी देना है, हिंदुस्तान के इतने सारे फ़ोक हैं अलग अलग, उन फ़ोक को भी आपको इस्तेमाल करना पड़ेगा, क्योंकि जैसा सिचुयशन आएगा, वैसा आपको गाना देना पड़ेगा, उसका सब का स्टडी तो करना पड़ेगा। उसके लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार रहूँगा, आपके यहाँ एक प्रोग्राम है जिसमें पुराने, गाँव के गानें आते हैं, क्या है वह?

प्र: 'लोक संगीत'।
उ: 'लोक संगीत'। इसको मैं बहुत सुनता रहा हूँ, यहाँ पे मादल क्यों बज रहा है, यहाँ पे यह क्यों बज रहा है, वो चीज़ें मुझपे बहुत हावी होती रही है, क्योंकि शुरु से मेरी यह जिज्ञासा रही है कि यह ऐसा क्यों है? कि यहाँ मादल क्यों बजाई जाती है। हिमाचल में अगर गाना हो रहा है तो फ़ास्ट गाना नहीं होगा क्योंकि उपर हाइ ऒल्टिट्युड पे साँस नहीं मिलती, तो वहाँ पे आपको स्लो ही नंबर देना पड़ेगा। अगर पंजाब है तो वहँ पे प्लैट्यू है तो आप धनधनाके, खुल के डांस कर सकते हैं। सौराष्ट्र में आप जाएँगे तो वहाँ पे कृष्ण, उषा, जो लेके आए थे, वो आपको मिलेगा, वहाँ का डांडिया एक अलग होता है, यहाँ पे ये अलग होता है, तो ये सारी चीज़ें अगर आप सीखते जाएँ, सीखने का आनंद भी आता है, और इन चीज़ों को काम में डालते हैं तो काम आसान भी हो जाता है।

दोस्तों, इन्ही शब्दों के साथ उस प्रोग्राम में बजाया गया था "पुरवा सुहानी आई रे", तो चलिए हम भी झूम उठते हैं इस गीत के साथ। गीत के शुरुआती बोलों पर ग़ौर कीजिएगा दोस्तों, "कहीं ना ऐसी सुबह देखी जैसे बालक की मुस्कान, या फिर दूर कहीं नींद में हल्की सी मुरली की तान, गुरुबानी गुरुद्वारे में, तो मस्जिद से उठती आज़ान, आत्मा और परमात्मा मिले जहाँ, यही है वह स्थान।" कितने उत्कृष्ट शब्दों में संतोष आनंद जी ने इस देश की महिमा का वर्णन किया है न! आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि गीतकार संतोष आनंद को फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के गीत "मैं ना भूलूँगा" के लिये उस साल के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। और इसी फ़िल्म के उनके लिखे गीत "और नहीं बस और नहीं" के लिए गायक महेन्द्र कपूर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"पुकार", गीत बताएं -३ अंक.
2. एक निर्देशक जिनकी सभी फ़िल्में अंग्रेजी के "ए" अक्षर से शुरू होती है, केवल पहली फिल्म को छोडकर, ये उन्हीं की फिल्म का गीत है, उनका नाम बताएं -२ अंक.
3. गीत के गीतकार कौन हैं -२ अंक.
4. धमेन्द्र इस फिल्म के नायक थे, नायिका का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
आज सभी ने जम कर भाग लिए और अंक भी पाए, इंदु जी मुझे भी (सजीव) आपकी बात ठीक लग रही है, सुजॉय जी अपना पक्ष रखेंगें :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक.. उस्ताद बरकत अली खान की आवाज़ में इश्क की इन्तहा बताई ग़ालिब ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७४

क्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,
तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।
तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,
अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।

सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,
अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।
उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,
यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।

जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,
उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।
आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,
मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।

जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,
उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।
ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,
उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।

ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,
कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,
मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।

यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,
हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।
गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,
हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं ।

"जश्न-ए-ग़ालिब" नाम की यह नज़्म उर्दू के जानेमाने शायर "साहिर लुधियानवी" की है। यह नज़्म उन्होंने १९६८ में लिखी थी। गौरतलब है कि १९६८ में हीं तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की देखरेख में एक समिति बनाई गई थी, जिसने यह निर्णय लिया था कि ग़ालिब की मृत्यु के सौ साल होने के उपलक्ष्य में अगले साल यानि कि १९६९ में एक ग़ालिब मेमोरियल की स्थापना की जाए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को उस समिति की अध्यक्षा और फ़खरूद्दीन अली अहमद (जो कि १९७४ में देश के राष्ट्रपति बने) को उस समिति का सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। समिति के प्रयासों के बाद १९६९ में तो नहीं लेकिन १९७१ में ग़ालिब इन्स्टीच्युट (ऐवान-ए-ग़ालिब) की स्थापना की गई जिसका उद्धाटन श्रीमती इंदिरा गाँधी ने किया था। इन्स्टीच्युट बन तो गया लेकिन लोगों को इसकी याद साल में एक या दो बार हीं आती है। बशीर बद्र साहब लिखते हैं कि यह इन्स्टीच्युट जिस उद्देश्य से बनाया गया था, वह उद्देश्य कहीं भी फ़लित होता नहीं दीखता... हाँ कभी-कभार मुशायरों का आयोजन हो जाता है, लेकिन उन मुशायरों का रंग शायराना होने से ज़्यादा बेमतलब के चमक-धमक से पुता दिखता है। "साहिर" साहब को इसी बात का अंदेशा था। तभी तो वो कहते हैं कि अगर ग़ालिब को याद करना हीं था तो इसमें २१ साल क्यों लगे। २१ साल तक किसी को यह याद नहीं रहा कि ग़ालिब उर्दू के सर्वश्रेष्ठ (अगर मीर को ध्यान में न रखा जाए क्योंकि ग़ालिब खुद को मीर से बहुत नीचे मानते थे) थे, हैं और रहेंगे, फिर उन्हें नवाज़नें में इतनी देर क्यों। यह महज़ एक खानापूर्ति तो नहीं। तभी तो वो कहते हैं कि पहले जिन गलियों में ग़ालिब बसते थे, वहाँ अब उर्दू कहाँ और फिर उर्दू को मारकर उर्दू के शायर को पहचानना कहाँ की समझदारी है, कहाँ का इंसाफ़ है। कहीं यह मुस्लिम कौम को खुश करने की एक सियासती चाल तो नहीं। साहिर का यह गुस्सा कितना जायज है, यह तो वही जानते हैं (या शायद हम भी जानते हैं, लेकिन खुलकर सामने आना नहीं चाहते), लेकिन इतना तो सच है हीं कि "ग़ालिब हो या गाँधी, इन्हें मारने वाले भी हम हीं हैं और पूजने वाले भी हम हीं हैं।"

साहिर ने तो बस उर्दू की बात की है, लेकिन आज जो हालात हैं उसमें हिन्दी की दुर्दशा भी कुछ कम नहीं। आज की अवाम अगर उर्दू के किसी शब्द का अर्थ न जाने तो यह कहा जा सकता है कि उर्दू अब स्कूलों में उतनी पढाई नहीं जाती, जितनी आजादी के वक्त या पहले पढी-पढाई जाती थी, लेकिन अगर किसी को हिन्दी का कोई शब्द मालूम न हो तो इसे आप क्या कहिएगा। कहने को हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है(वैसे कई लोग यह बात नहीं मानते, लेकिन दिल में सभी जानते हैं) लेकिन ऐसे कई सारे लोग हैं जो हिन्दी को रोमन लिपि में हीं पढ पाते है, देवनागरी पढने में उन्हें अपनी पिछली सात पुश्तें याद आ जाती हैं। तो कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज इस देश में इसी देश की भाषाएँ (हिन्दी, उर्दू...) नकारी जाने लगी हैं, जो किसी भी भाषा के साहित्य और साहित्यकारों के लिए एक शाप के समान है। चलिए ग़ालिब और साहिर के बहाने हमने कई घावों को कुरेदा, कई ज़ख्मों को महसूस किया.. अब हम ज़रा ग़ालिब के इजारबंद की बात कर लें वो भी उर्दू के जानेमाने शायर निदा फ़ाज़ली के शब्दों में।

ग़ालिब म्यूज़ियम से निकलकर पुरानी दिल्ली की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रकर मैं बल्लीमारान में सहमी सिमटी उस हवेली में पहुँच गया जहाँ ग़ालिब आते हुए बुढ़ापे में गई हुई जवानी का मातम कर रहे थे. इस हवेली के बाहर अंग्रेज़ दिल्ली के गली-कूचों में १८५७ का खूनी रंग भर रहे थे. ग़ालिब का शेर है -

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ दुश्मन आसमाँ अपना


हवेली के बाहर के फाटक पर लगी लोहे की बड़ी सी कुंडी खड़खड़ाती है. ग़ालिब अंदर से बाहर आते हैं तो सामने अंग्रेज़ सिपाहियों की एक टोली नज़र आती है. ग़ालिब के सिर पर अनोखी सी टोपी, बदन पर कढ़ा हुआ चोगा और इसमें से झूलते हुए ख़ूबसूरत इज़ारबंद
को देखकर टोली के सरदार ने टूटी फूटी हिंदुस्तानी में पूछा, “तुमका नाम क्या होता?”
ग़ालिब - “मिर्जा असदुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ़ नौश.”
अंग्रेज़ -“तुम लाल किला में जाता होता था?”
ग़ालिब-“जाता था मगर-जब बुलाया जाता था.”
अंग्रेज़-“क्यों जाता होता था?”
ग़ालिब- “अपनी शायरी सुनाने- उनकी गज़ल बनाने.”
अंग्रेज़- “यू मीन तुम पोएट होता है?”
ग़ालिब- “होता नहीं, हूँ भी.”
अंग्रेज़- “तुम का रिलीजन कौन सा होता है?”
ग़ालिब- “आधा मुसलमान.”
अंग्रेज़- “व्हाट! आधा मुसलमान क्या होता है?”
ग़ालिब- “जो शराब पीता है लेकिन सुअर नहीं खाता.”
ग़ालिब की मज़ाकिया आदत ने उन्हें बचा लिया.

मैंने देखा उस रात सोने से पहले उन्होंने अपने इज़ारबंद में कई गाठें लगाई थीं. ग़ालिब की आदत थी जब रात को शेर सोचते थे तो लिखते नहीं थे. जब शेर मुकम्मल हो जाता था तो इज़ारबंद में एक गाँठ लगा देते थे. सुबह जाग कर इन गाठों को खोलते जाते थे और इस तरह याद करके शेरों को डायरी में लिखते जाते थे.

इज़ारबंद से ग़ालिब का रिश्ता अजीब शायराना था. इज़ारबंद दो फारसी शब्दों से बना हुआ एक लफ्ज़ है. इसमें इज़ार का अर्थ जामा होता है और बंद यानी बाँधने वाली रस्सी. औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे। ये इज़ारबंद आज की तरह अंदर उड़स कर छुपाए नहीं जाते थे. ये छुपाने के लिए नहीं होते थे. पुरुषों के कुर्तों या महिलाओं के ग़रारों से बाहर लटकाकर दिखाने के लिए होते थे. पुरानी शायरी में ख़ासतौर से नवाबी लखनऊ में प्रेमिकाओं की लाल चूड़ियाँ, पायल, नथनी और बुंदों की तरह इज़ारबंद भी सौंदर्य के बयान में शामिल होता था। ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे।

ग़ालिब की बात हो गई और ग़ालिब के इज़ारबंद की भी। अब हम ग़ालिब के चंद शेरों पर नज़र दौड़ा लेते हैं:

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इन्तज़ार नहीं है

तू ने क़सम मयकशी की खाई है "ग़ालिब"
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है


ग़ालिब के इन शेरों के बाद अब वक्त है आज की गज़ल से रूबरू होने का। इस गज़ल को उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब के छोटे भाई और आज के दौर के महान फ़नकार गुलाम अली के गुरू उस्ताद बरकत अली खां साहब ने गाया है। बरकत अली साहब का जन्म १९०७ में हुआ था और १९६३ में जहां-ए-फ़ानी से उनकी रूख्सती हुई। उन्होंने ग़ालिब को बहुत गाया है। आज की यह गज़ल उनकी इसी बेमिसाल गायकी का एक प्रमाण है। बरकत साहब के बारे में फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी तो मुहूर्त है ग़ालिब के शब्दों और बरकत साहब की आवाज़ में गोते लगाने का। तो तैयार हैं ना आप? :

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक

हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक

पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की ____
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्म'अ हर रंग में जलती है सहर होने तक




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफ़िल में मैं गैर-हाज़िर था और सजीव जी आवाज़ के हीं दूसरे कामों में व्यस्त थे, इसलिए महफ़िल में नियमानुसार पिछली महफ़िल के साथी पेश नहीं हो सका। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। इस महफ़िल से मैं वापस आ चुका हूँ और इस कारण हर चीज ढर्रे पर वापस आ गई है। तो लुत्फ़ लें पिछली महफ़िल की टिप्पणियों का।

पिछली महफिल का सही शब्द था "आस्ताँ" और शेर कुछ यूँ था-

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की सीमा जी ने। सीमा जी आपने ये सारे बेश-कीमती शेर पेश किए:

हर आस्ताँ पे अपनी जबीने-वफ़ा न रख
दिल एक आईना है इसे जा-ब-जा न रख (लाल चंद प्रार्थी 'चाँद' कुल्लुवी )

वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-ए-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यों हो (ग़ालिब)

कोई जबीं न तेरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्द पे अएतमाद् करे
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि तुझ को याद आये (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ )

शरद जी, आपके ये दोनों शेर कमाल के हैं। ख्वातीन-ओ-हज़रात गौर फ़रमाएँगे:

शऊरे सजदा नहीं है मुझको तो मेरे सजदों की लाज रखना ।
ये सर तेरे आस्ताँ से पहले किसी के आगे झुका नहीं है । (शायर पता नहीं)

मै तेरे आस्ताँ के सामने से क्यों गुज़रूँ
जब नहीं सीढियाँ , तू छत पे कैसे आएगी।

निर्मला जी, दिनेश जी, सतीश जी, अरविंद जी... आप सभी का इस महफ़िल में तह-ए-दिल से स्वागत है। उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारी महफ़िल पसंद आई होगी इसलिए इल्तज़ा करता हूँ कि आगे भी अपनी उपस्थिति बनाए रखिएगा। एक बात और.. हमारी महफ़िल में खाली हाथ नहीं आते.... मतलब कि एकाध शेर की नवाजिश तो करनी हीं होगी। क्या कहते हैं आप? :)

शन्नो जी.. सुमित जी और नीलम जी आपके जिम्मा हैं। इनमें से कोई भी गैर-हाज़िर रहा तो आपकी हीं खबर ली जाएगी :) चलिए इस बार सुमित जी आ गए हैं, अब दूसरे यानि कि नीलम जी की फ़िक्र कीजिए। बातों-बातों में आपकी पंक्तियाँ तो भूल हीं गया:

ना वो हर चमन का फूल थी
ना वो किसी रास्ते का धूल थी
ना थी वीराने में कोई आस्ताँ
वो थी गुजर गयी एक दास्ताँ। (स्वरचित.. मैने कुछ बदलाव किए हैं, जो मुझे सही लगे :) )

शामिख जी, आखिरकार आप को हमारी महफ़िल की याद आ हीं गई। चलिए कोई बात नहीं.. देर आयद दुरूस्त आयद। ये रहे आपके शेर:

ता अर्ज़-ए-शौक़ में न रहे बन्दगी की लाग
इक सज्दा चाहता हूँ तेरी आस्तां से दूर (फ़ानी बदायूँनी)

शाख़ पर खून-ऐ-गुल रवाँ है वही,
शोखी-ऐ-रंग-गुलिस्तान है वही,
सर वही है तो आस्तां है वही (अनाम)

सुमित जी, महफ़िल में आते रहिएगा नहीं तो शन्नो जी की छड़ी चल जाएगी.. हा हा हा। यह रहा आपका शेर:

फिर क्यूँ तलाश करे कोई और आस्ताँ,
वो खुशनसीब जिसको तेरा आस्ताँ मिले। (अनाम)

अवनींद्र जी, हमें पता नहीं था कि आप इस कदर कमाल लिखते हैं। आपके ये दोनों दो-शेर (चार पंक्तियाँ) खुद हीं इस बात के गवाह हैं:

मेरे कांधे से अपना हाथ उठा ले ऐ दोस्त
इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊंगा ......!!
मेरी आस्तां से तुम चुप चाप गुजर जाना
हाल जो पूछ लिया मेरा तो मर जाऊंगा ( स्वरचित )

रूह से लिपटे हुए सितम उठ्ठे
आँखों में लिए जलन उठ्ठे
ओढ़ के आबरू पे कफ़न उठ्ठे
यूँ तेरी आस्तां से हम उठ्ठे (स्वरचित )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, March 9, 2010

आई झूम के बसंत....आज झूमिए बसंत की इन संगीतमयी बयारों में सब गम भूल कर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 368/2010/68

संत ऋतु की धूम जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर और इन दिनों आप सुन रहे हैं इस स्तंभ के अन्तर्गत लघु शृंखला 'गीत रंगीले'। आज जिस गीत की बारी है वह एक ऐसा गीत है जिसे बजाए बिना अगर हम इस शृंखला को समाप्त कर देंगे तो यह शृंखला एक तरह से अधूरी ही रह जाएगी। बसंत के आने की ख़ुशी को जिस धूम धाम से इस गीत में सजाया गया है, यह गीत जैसे बसंत पंचमी के दिन बजने वाला सब से ख़ास गीत बना हुआ है आज तक। "आई झूम के बसंत झूमो संग संग में"। फ़िल्म 'उपकार' के लिए इस गीत की रचना की थी गीतकार इंदीवर और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी ने। युं तो ऐसे गीतों में दो मुख्य गायकों के साथ साथ गुमनाम कोरस का सहारा लिया जाता है, लेकिन इस गीत की खासियत है कि बहुत सारी मुख्य आवाज़ें हैं और कुछ अभिनेताओं की आवाज़ें भी ली गई हैं। इस गीत में आप आवाज़ें सुन पाएँगे मन्ना डे, आशा भोसले, शमशाद बेग़म, मोहम्मद रफ़ी, महेन्द्र कपूर, सुंदर, शम्मी की। कल्याणजी-आनंदजी ने कई अभिनेताओं को गवाया है, यही बात जब विविध भारती पर आनंदजी से पूछा गया था तब उनका जवाब था - "इत्तेफ़ाक़ देखिए, शुरु शुर में पहले ऐक्टर ही गाया करते थे। एक ज़माना वह था जो गा सकता था वही हीरो बन सकता था। तो वो एक ट्रेण्ड सी चलाने की कोशिश कि जब जब होता था, जैसे राईटर जितना अच्छा गा सकता है, अपने शब्दों को इम्पॊर्टैन्स दे सकता है, म्युज़िक डिरेक्टर नहीं दे सकता। जितना म्युज़िक डिरेक्टर दे सकता है, कई बार सिंगर नहीं दे सकता। एक्स्प्रेशन-वाइज़, सब कुछ गाएँगे, अच्छा करेंगे, लेकिन ऐसा होता है कि वह सैटिस्फ़ैक्शन कभी कभी नहीं मिलता है कि जो हम चाहते थे वह नहीं हुआ। तो यह हमने कोशिश की जैसे कि बहुत से सिंगरों से गवाया, कुछ कुछ लाइनें ऐक्टर्स से गवाए, बहुत से कॊमेडी ऐक्टर्स ने गानें गाए, लेकिन बेसिकली जो पूरे गानें गाए वो अमिताभ बच्चन जी थे, "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। दादामुनि अशोक कुमार जी ने 'कंगन' फ़िल्म में "प्रभुजी मेरे अवगुण चित ना धरो" गाया। हेमा मालिनी ने 'हाथ की सफ़ाई में गाया "पीनेवालों को..."। 'चमेली की शादी' का टाइटल म्युज़िक अनिल कपूर ने गाया, महमूद ने 'वरदान' में गाया। 'महावीरा' में राजकुमार जी ने संवाद बोले सलमा आग़ा के साथ। रूना लैला ने गाया था फ़िल्म 'एक से बढ़कर एक' में।"

इसी इंटरव्यू में आगे आनंदजी ने ख़ास इस गीत का ज़िक्र करते हुए कहा - "सुंदर जी से गवाया था 'उपकार' में "हम तो हीरे हैं अनमोल, हमको मिट्टी में ना तोल"। और शम्मी जी भी थीं, सब से गवाया। सब से गवाया, बहुत से चरित्र थे और डायरेक्टर भी साथ में थे, मनोज जी, तो उन्होने भी हिम्मत की कि एक एक लाइन सब से क्यों नहीं गवाएँ! इसमें एक चार्म भी है कि नैचरल लगता है, हर कोई आदमी सुर में होता भी नहीं है न, लेकिन वह, ऐसा ही रखो तो और भी अच्छा लगता है कभी कभी। जैसे बच्चा एक तुतला बोलता है तो कितना प्यारा लगता है, बड़ा कोई बोले तो अच्छा नहीं लगेगा। शुरु शुरु में बीवी अच्छी लगती है, बाद में उसकी मिठास भी चली जाती है, माफ़ करना बहनों :)!" तो दोस्तों, आनंदजी के इन्ही शब्दों के साथ आज के आलेख को विराम देते हुए आइए सुनते हैं, अजी सुनते हैं क्या, बल्कि युं कहना चाहिए कि आइए झूम उठते हैं, नाच उठते हैं इस कालजयी बसंती समूह गीत के संग, "आई झूम के बसंत"!



क्या आप जानते हैं...
कि वर्ष १९९२ में पद्मविभूषण के लिए चुना गया था स्व: वी. शान्ताराम को। पद्मभूषण के लिए नौशाद, तलत महमूद, बी. सरोजा देवी, गिरीश कारनाड, और हरि प्रसाद चौरसिया को चुना गया था। और पद्मश्री के लिए चुना गया था आशा पारेख, मनोज कुमार, जया बच्चन, और कल्याणजी-आनंदजी को

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत के मुखड़े में शब्द है "ताल", गीत बताएं -३ अंक.
2. श्रीमति शशि गोस्वामी की मूल कहानी पर आधारित इस फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.
3. इस बेहद खूबसूरत गीत के गीतकार का लिखा ये पहला गीत था, उनका नाम बताएं-२ अंक.
4. लता और महेंद्र कपूर के साथ एक और गायक ने अपनी आवाज़ मिलायी थी इस गीत में उनका नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी और पदम जी ने ३-३ अंकों को अपनी झोली में डाला तो अवध जी और शरद जी भी २-२ अंक कमाने में कामियाब रहे, पारुल आपको गीत पसंद आया, इसे अपनी आवाज़ में गाकर भेजिए कभी :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गुनगुनाते लम्हे में अमृता-इमरोज़ के प्यार की दास्तां

अभी कुछ दिन पहले आपने मशहूर चित्रकार इमरोज़ का विशेष इंटरव्यू पढ़ा जिसे आप सबके लिए लाया था रश्मि प्रभा ने। इस बार के 'गुनगुनाते लम्हे' में भी रश्मि प्रभा गीतों के माध्यम से अमृता-इमरोज़ की अमर प्रेम-कहानी लेकर आई हैं। बिना किसी विशेष भूमिका के हम आपको सुनवा रहे हैं 'प्यार की दास्ताँ'-



'गुनगुनाते लम्हे' टीम
आवाज़/एंकरिंग/कहानीतकनीक
Rashmi PrabhaKhushboo
रश्मि प्रभाखुश्बू



आप भी चाहें तो भेज सकते हैं कहानी लिखकर गीतों के साथ, जिसे देंगी रश्मि प्रभा अपनी आवाज़! जिस कहानी पर मिलेगी शाबाशी (टिप्पणी) सबसे ज्यादा उनको मिलेगा पुरस्कार हर माह के अंत में 500 / नगद राशि।

हाँ यदि आप चाहें खुद अपनी आवाज़ में कहानी सुनाना, तो भी आपका स्वागत है....


1) कहानी मौलिक हो।
2) कहानी के साथ अपना फोटो भी ईमेल करें।
3) कहानी के शब्द और गीत जोड़कर समय 35-40 मिनट से अधिक न हो, गीतों की संख्या 7 से अधिक न हो।।
4) आप गीतों की सूची और साथ में उनका mp3 भी भेजें।
5) ऊपर्युक्त सामग्री podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल करें।

Monday, March 8, 2010

आज मधुबातास डोले...भरत व्यास रचित इस गीत के क्या कहने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 367/2010/67

गीत रंगीले' शृंखला की सातवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, इन दिनों हर बातें कर रहे हैं बसंत ऋतु की, फागुन के महीने की, रंगों की, फूलों की, महकती हवाओं की, पीले सरसों के खेतों की। इसी मूड को बरक़रार रखते हुए आज हमने एक ऐसा सुरीला नग़मा चुना है जिसके बोल जितने उत्कृष्ट हैं, उसका संगीत भी उतना ही सुमधुर है। लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में यह है फ़िल्म 'स्त्री' का युगल गीत "आज मधुबातास डोले"। जब शुद्ध हिंदी में लिखे गीतों की बात चलती है, तो ऐसे गीतकारों में भरत व्यास का नाम शुरुआती नामों में ही शामिल किया जाता है। शुरु शुरु में फ़िल्मी गीतों में उर्दू का ज़्यादा चलन था। ऐसे में भरत ब्यास ने अपनी अलग पहचान बनाई और हिंदी का दामन थामा। कविता के ढंग में कुछ ऐसे गीत लिखे कि सुननेवाले मोहित हुए बिना नहीं रह पाए। आज का यह गीत भी एक ऐसा ही उत्कृष्टतम गीतों में से एक है। संगीत की बात करें तो सी. रामचन्द्र ने इस फ़िल्म में संगीत दिया था और शास्त्रीय संगीत की ऐसी छटा उन्होने इस फ़िल्म के गीतों में बिखेरी कि जैसे बसंत ऋतु को एक नया ही रूप दे दिया। "बसंत है आया रंगीला" और आज का प्रस्तुत गीत "आज मधुबातास डोले" इस फ़िल्म के दो ऐसे गीत हैं। इनके अलावा लता जी का गाया "ओ निर्दयी प्रीतम", और महेन्द्र कपूर का गाया "कौन हो तुम" गीत काफ़ी मशहूर हुए थे। 'नवरंग' फ़िल्म के गीतों की कामयाबी के बाद वी. शान्ताराम और सी. रामचन्द्र ने महेन्द्र कपूर को फिर एक बार इस फ़िल्म में मौका दिया और महेन्द्र कपूर ने फिर एक बार उनके उम्मीदों पर खरे उतरे। १९६१ में राजकमल कलामंदिर के बैनर तले निर्मित वी. शान्ताराम की इस फ़ैंटसी फ़िल्म में अभिनय किया था ख़ुद वी. शन्ताराम ने, और उनके साथ थे संध्या, राजश्री, केशवराव दाते और बाबूराव पेढंरकर प्रमुख।

दोस्तों, क्योंकि आज मधुबातास की बात हो रही है, तो क्यों ना इस अलबेले मौसम के नाम एक कविता की जाए जिसे लिखा है चेतन प्रकाश 'चेतन' ने, और जिसे हमने इंतरनेट पर किसी ब्लॊग में पढ़ा। सोचा कि क्यों ना आपके साथ भी इसे बांटा जाए! शीर्षक है 'आया ऋतुराज बसंत है'।

"ऋतुराज बसंत है
नभ में शोभयमान
चौदहवीं का चांद
तारे खिले हैं
अनंत ब्रह्मांड में
बौराई है धरा
ख़ुशी का उसकी अब
नहीं कोई अंत है
आया ऋतुराज बसंत है।

कुद्रत ने लुटाई है
इकट्ठी की हुई दौलत
सफ़ेद मोतियों की छटा
पत्ती पत्ती बिखराई है
सरसों के फूल हैं
हरियाली के गलिचे हैं
चौतरफ़ा प्रकृति में
आमंत्रण ही आमंत्रण है
आया ऋतुराज बसंत है।

है चिकनी चांदनी का असर
खेत खेत चल निकले
रतनारे पतनाले हैं
चुप के आधी रात के
झरना झम जह्म तोड़ रहा
जोड़ रहा दो दिलों के तार
बंदिशेंझरें नेहा के गात
पोर पोर में उसके राग अनंत हैं
आया ऋतुराज बसंत है।

फूल फूल चांदनी पसरी है
मंद पवन कान में फुसफुसा रहा
गेंदा भी हाँ में हाँ मिला रहा
नीरवता में कोई गुनगुना रहा
बासंती राग, लगाए तन बदन में आग
शायद याद कोई भूली बिसरी है
पूर्वाई मे ये टीस उभरी है
चांद हँसे और सुरभीत दिग दिगंत है
आया ऋतुराज बसंत है।

तो चलिए, हम भी इस मद मंद पवन के साथ डोलें और सुनें "आज मधुबातास डोले"।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र ने कोल्हापुर में १९३५ में सम्राट सिनेटोन कृत मराठी में निर्मित 'नागानंद' में नायक का अभिनय किया था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. इस गीत के लिए कोई शब्द का सूत्र नहीं देंगें, देशभक्ति फिल्मों के लिए मशहूर अभिनेता/निर्देशक की इस अमर फिल्म के इस गीत को आप खुद पहचानिए-३ अंक.
2. गायक, गायिकाओं की पूरी फ़ौज है इस समूह गीत में, एक अभिनेता की भी आवाज़ है बताएं उनका नाम-3 अंक.
3. बसन्त उत्सव के लिए ख़ास बने इस गीत को किसने लिखा है-२ अंक.
4. किस संगीतकार जोड़ी ने इस मदमस्त गीत को रचा है -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
अवध जी चूके तो इंदु जी ने मौका झपट लिया, शरद जी भी सही जवाब लाये और पदम सिंह जी ने भी दो अंक कमाए, बधाई सभी विजेताओं को
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

एम एम क्रीम लौटे हैं एक बार फिर अपने अलग अंदाज़ के संगीत के साथ "लाहौर" में

ताज़ा सुर ताल १०/२०१०

सजीव - सभी को वेरी गुड मॊरनिंग् और 'ताज़ा सुर ताल' के एक और अंक में हम सभी का स्वागत करते हैं। सुजॊय, पिछले दो हफ़्तों में हमने ग़ैर फ़िल्म संगीत का रुख़ किया था, आज हम वापस आ रहे हैं एक आनेवाली फ़िल्म के गीतों और उनसे जुड़ी कुछ बातों को लेकर।

सुजॊय - सजीव, इससे पहले कि आप आज की फ़िल्म का नाम बताएँ, जैसे कि इस साल के दो महीने गुज़र चुके हैं, तो 'माइ नेम इज़ ख़ान' के अलावा किसी भी फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस पर कोई जादू नहीं चला पायी है। आलम ऐसा है कि जनवरी के महीने में रिलीज़ होने बाद 'चांस पे डांस' सिनेमाघरों से उतरकर इतनी जल्दी ही टीवी के पर्दे पर आ रही है। देखना है कि 'अतिथि तुम कब जाओगे' और 'रोड मूवी' क्या कमाल दिखाती है इस हफ़्ते! वैसे इन फ़िल्मों के संगीत में ज़्यादा कुछ नया नहीं है, शायद इसीलिए 'टी. एस. टी' में इन्हे जगह न मिली हो!

सजीव - बिल्कुल! तो चलो अब बात करें आज की फ़िल्म 'लाहौर' की। यह एक ऐसी फ़िल्म है जो हमारे यहाँ तो अगले हफ़्ते रिलीज़ होगी, लेकिन पिछले साल इस फ़िल्म को इटली के 'सालेण्टो इंटरनैशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल' में कई पुरस्कार मिले। संजय पूरन सिंह चौहान की यह फ़िल्म है, और जैसा कि नाम से ही लोग अंदाज़ा लगा लेंगे कि इस फ़िल्म का भारत - पाक़िस्तान के रिश्ते से ज़रूर कोई रिश्ता होगा। यह सच है कि यह फ़िल्म भारत पाकिस्तान के बीच भाइचारा को बढ़ाने की तरफ़ एक प्रयास है, लेकिन इसे व्यक्त किया गया है किक्-बॊक्सिंग् खेल के माध्यम से जो इन दो देशों के बीच खेली जाती है।

सुजॊय - यह वाक़ई हैरानी में डाल देनेवाली बात है कि क्रिकेट और हॊकी जैसे लोकप्रिय खेलों के रहते हुए किक्-बॊक्सिंग् को क्यों चुना गया है!

सजीव - तभी तो यह फ़िल्म अलग है। और एक और वजह से यह फ़िल्म अलग है, और वह यह कि इसमें संगीत दिया है एम. एम. क्रीम और पीयूष मिश्रा ने।

सुजॊय - एम. एम. क्रीम ने बहुत कम काम हिंदी में किया है, लेकिन जितनी भी फ़िल्मों में उन्होने काम किया है, उन सभी के गानें बेहद सुरीले और कामयाब रहे हैं। अब देखना है कि इस फ़िल्म के गीतों को जनता कैसे ग्रहण करती है। एम. एम. क्रीम और 'लाहौर' की बातों को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत "अब ये काफ़िला"।

गीत - अब ये काफ़िला...ab ye kaafila (lahaur)


सजीव - इस गीत में आवाज़ें थीं के.के, कार्तिक और ख़ुद एम. एम. क्रीम की। गीत को शुरु करते हैं क्रीम साहब "ज़मीन छोड़ भर आसमाँ बाहों में, परवाज़ कर नई दिशाओं में" बोलों के साथ। फिर उसके बाद मुखड़ा शुरु करते हैं कार्तिक "अब ये काफ़िला फ़लक पे जाएगा, सफ़र मंज़िल का ये जो तय जाएगा, सुनहरे हर्फ़ में वो लिखा जाएगा". और उसके बाद के.के और कार्तिक अंग्रेज़ी शब्द "listen carefully move your feet" बात में और ज़्यादा दम डाल देती है। कुल मिलाकर यह एक दार्शनिक गीत है, जिसमें ज़िंदगी के सफ़र को बिना रुके लगातार चलते रहने की सलाह दी गई है।

सुजॊय - वैसे तो इस तरह के उपदेशात्मक गानें बहुत सारे बनें हैं, लेकिन इस गीत का अंदाज़-ए-बयाँ, इसका संगीत संयोजन और ऐटिट्युड बिल्कुल नया है, और मेरा ख़याल है कि आज की पीढ़ी यह गीत हाथों हाथ ग्रहण करेंगे। गीतकार का इस गीत में उतना ही योगदान है जितना क्रीम साहब का है।

सजीव - अच्छा, हम इस गीत से पहले बात कर रहे थे कि इस फ़िल्म में किक्-बॊक्सिंग् का सहारा क्यों लिया गया है। इस फ़िल्म में सौरभ शुक्ला ने अभिनय किया है, जो कि ख़ुद एक बड़े निर्देशक भी हैं। तो उन्होने कहा है कि "चौहान किसी भी खेल को चुन सकता था। लेकिन क्योंकि उनका व्यक्तिगत झुकाव किक्-बॊक्सिंग् की तरफ़ है और उन्हे इस खेल की बारिकियों का पता है, शायद इसी वजह से उन्होने इस खेल को चुना अपनी फ़िल्म के लिए। वो कोई ऐसा खेल नहीं चुनना चाहते थे जिसमें उनकी जानकारी १००% नहीं हो। अगर वो वैसा करते तो शायद फ़िल्म के साथ न्याय नहीं कर पाते।"

सुजॊय - यह बहुत अच्छी बात आप ने बताई, एक अच्छे फ़नकार और एक प्रोफ़ेशनल फ़िल्मकार की यही निशानी होती है कि वो जो कुछ भी करे पूरे परफ़ेक्शन के साथ करे। देखते हैं कि उनकी इस मेहनत और लगन का जनता क्या मोल चुकाती है!

सजीव - ख़ैर, वह तो बाद की बात है, चलो अब सुनते हैं दूसरा गीत दलेर मेहंदी की आवाज़ में। यह भी पहले गीत की तरह सफ़र और मुसाफ़िर के ज़रिए ज़िंदगी के फ़लसफ़े का बयाँ करती है।

गीत - मुसाफ़िर है मुसाफ़िर...musafir (lahaur)


सुजॊय - इस गीत की खासियत मुझे यही लगी कि यह आमतौर पर दलेर मेहंदी का जौनर नहीं है। जिस तरह से उनके गाए गीतों से मस्ती, ख़ुशी और एक थिरकन छलकती है, यह गीत उसके बिल्कुल विपरीत है। केवल एक बार सुन कर शायद यह गीत आप के दिल पर छाप ना छोड़े, लेकिन गीत के बोलों को ध्यान से सुनने पर इसकी अहमियत का पता चलता है।

सजीव - और अब बारी है 'लाहौर' की टीम से आपका परिचय करवाने की। निर्माता विवेक खटकर की यह फ़िल्म है। कहानी व निर्देशन संजय पूरन सिंह चौहान की है। गीतकार और संगीतकार के अलावा पीयूष मिश्रा का इस फ़ि्ल्म के लेखन में भी योगदान है। फ़िल्म के मुख्य कलाकर हैं आनाहद, नफ़ीसा अली, सब्यसाची चक्रवर्ती, केली दोरजी, निर्मल पाण्डेय, मुकेश ऋषी, जीवा, प्रमोद मुथु, श्रद्धा निगम, फ़ारुख़ शेख़, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह और आशीष विद्यार्थी। एम. एम. क्रीम और पीयूष मिश्रा के संगीतकार होने की बात तो हम कर ही चुके हैं, पार्श्व संगीत वेइन शार्प का है।

सुजॊय - अच्छा, अब हम अगला गीत सुनेंगे, जो कि एक थिरकता हुआ नग़मा है शंकर महादेवन और शिल्पा रव की आवाज़ों में, "रंग दे रंग दे"। सजीव, यह गीत ऐसा एक गीत है कि जिसकी कल्पना हम दलेर मेहंदी की आवाज़ में कर सकते हैं। लेकिन एम. एम. क्रीम का निर्णय देखिए कि उन्होने पहला वाला ग़मज़दा गीत दलेर साहब से गवाया और इस गीत में उनकी आवाज़ नहीं ली।

सजीव - यही तो महान संगीतकार का लक्षण है कि प्रचलित लीग से हट के कुछ कर दिखाया जाए। लेकिन इस "रंग दे" गीत में नया कुछ सुनने में नहीं मिला।

सुजॊय - हाँ, और ऒर्केस्ट्रेशन में ही नहीं, गीत के बोलों और गायकी में भी 'रंग दे बसंती' के उस शीर्षक गीत की ही झलक मिलती है। इस गीत को लिखा है जुनैद वसी ने। मेरे ख़याल से तो यह एक बहुत ही ऐवरेज गीत है।

सजीव - चलो, गीत सुनवाते हैं अपने श्रोताओं को और उन्ही पर भी छोड़ते हैं इस गीत की रेटिंग्!

गीत - रंग दे रंग दे...rang de (lahaur)


सुजॊय - अब अगला गीत जो हम सुनेंगे उसे एम. एम. क्रीम ने अपनी एकल आवाज़ दी है। तो क्यों ना यहाँ पर क्रीम साहब की थोड़ी चर्चा की जाए!

सजीव - ज़रूर! मैं तो उनकी बात यहीं से शुरु करूँगा कि जब १९९४-९५ में महेश भट्ट की फ़िल्म 'क्रिमिनल' से उनका पदार्पण हुआ तो युं लगा कि मानो संगीत की दुनिया में एक ताज़ा हवा का झोंका आ गया हो। "तुम मिले दिल खिले" गीत की अपार सफलता के बाद फ़िल्म 'ज़ख़्म' के गीत "गली में आज चांद निकला" ने भी कमाल किया।

सुजॊय - "गली में आज चांद निकला" तो मेरे कॊलर ट्युन में एक लम्बे समय तक बजता रहा है, मेरा बहुत ही पसंदीदा गीतों में से एक है। अच्छा, एम. एम. क्रीम साहब का पूरा नाम शायद बहुत लोगों को मालूम ना हो, उनका असली और पूरा नाम है मरगथा मणि किरवानी। उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। वे कर्नाटक और चेन्नई में भी रह चुके हैं। उनके पिता शिव दत्त दक्षिण के जाने माने लेखक, चित्रकार और फ़िल्मकार रह चुके हैं। क्रीम साहब को बचपन से ही संगीत का शौक था। उन्होने कर्नाटकी और भारतीय शास्त्रीय संगीत में बाक़ायदा तालीम प्राप्त की।

सजीव - वैसे मूलत: वो एक वायलिन वादक हैं जिसका प्रमाण हमें मिलता है उनके संगीतबद्ध किए तमाम गीतों में। फ़िल्म 'सुर' में कम से कम दो ऐसे गीत हैं जो इस बात का प्रमाण है। ये गानें हैं "आ भी जा ऐ सुबह आ भी जा" और "कभी शम ढले तो मेरे दिल में आ जाना"। उन्होने दक्षिण के फ़िल्मी गीतों में कई सालों तक वायलिन वादक के रूप में काम किया और वे जाने माने संगीतकार चक्रवर्ती के सहायक भी रह चुके हैं।

सुजॊय - १९९० में रामोजी रा की फ़िल्म 'मारासो मरुथा' में क्रीम साहब ने पहली बार एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में काम किया। तब से लेकर आज तक उन्होने हिंदी और दक्षिण की सभी भाषाओं के गीतों को स्वरबद्ध किया है। फ़िल्म 'अन्ना मैया' के लिए उन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। दक्षिण के सफल संगीतकार होने के बावजूद उन्हे हिंदी से बेहद लगाव है। उनके पसंदीदा संगीतकार हैं राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, मदन मोहन और शंकर जयकिशन। उनकी वेस्टर्ण क्लासिकल म्युज़िक में गहरी दिलचस्पी रही है जो उनके गीतों में साज झलकता है।

सजीव - एम. एम. क्रीम की पहली हिंदी थी राम गोपाल वर्मा की 'द्रोही', जिसमें उन्होने दो गानें कॊम्पोज़ किए, बाक़ि गानें राहुल देव बर्मन के थे। उनकी पहली स्वतंत्र हिंदी फ़िल्म थी 'क्रिमिनल'। हालाँकि उन्होने बहुत कम हिंदी फ़िल्मों में संगीत दिया है, पर उनका हर एक गीत हिट साबित हुआ। 'क्रिमिनल' और 'ज़ख़्म' के अलावा 'सुर', 'इस रात की सुबह नहीं', 'जिस्म', 'साया', 'रोग', 'पहेली' जैसी फ़िल्मों में उनका उत्कृष्ट संगीत हमें सुनने को मिला। तो चलिए अब उन्ही के संगीत और उन्ही की आवाज़ में सुनते हैं फ़िल्म 'लाहौर' का चौथा गीत "साँवरे"।

सुजॊय - इस गीत में दर्द है और एम. एम. क्रीम ने क्या ख़ूब दर्दीले अंदाज़ में इसे गाया है और इसमें जान डाल दी है। कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है जिससे कि शब्दों की गहराई और भी बढ़ गई है। आइए सुना जाए।

गीत - साँवरे...saanvare (lahaur)


सजीव - इससे पहले कि हम आज का अंतिम गीत सुनें, आपको 'लाहौर' फ़िल्म की भूमिका बताना चाहेंगे। 'नैशनल इंडीयन किक्‍-बॊक्सिंग्' के लिए खिलाड़ियों की चुनाव प्रक्रिया चल रही है। एक मंत्री हैं जो चाहते हैं कि उनके फ़ेवरीट प्लेयर को चुना जाए, जब कि कोच चाहते हैं कि सब से योग्य खिलाड़ी को यह मौका मिले। दूसरी तरफ़, दो प्रतिभागी ऐसे हैं जिनमें से एक तो अपने बलबूते और योग्यता के आधार पर आगे बढ़ना चाहता है, जब कि दूसरे का अपने कनेक्शन्स् पर पूरा भरोसा है। ऐसे में अचानक क्वालालमपुर में भारत और पाक़िस्तान के बीच एक प्रतियोगिता की घोषणा हो जाती है। एक तरफ़ से धीरेन्द्र सिंह, जिन्हे मैन ऒफ़ स्टील कहा जाता है और जिन्हे इस खेल में अपने आप पर पूरा विश्वास है। उधर पाक़िस्तान की तरफ़ से हैं नूर मोहम्मद, जिन्हे इस तरह से तैयार किया गया है कि उन्हे लगता है कि विजय हर क़ीमत पर मिलनी चाहिए। लेकिन ज़िंदगी ने इन दोनों के लिए कुछ और ही सोच रखा है। एक के फ़ाउल प्ले की वजह से दूसरे की मृत्यु हो जाती है जब कि पूरी दुनिया चुपचाप इसका नज़ारा देखती है। क़िस्मत फिर एक बार इन दो देशों के दो खिलाड़ियों को आमने सामने लाती है। इनमें से एक खिलाड़ी वही है जिसकी वजह से पिछली बार दूसरे की मौत हुई थी। और दूसरा खिलाड़ी अपने देश की खोयी हुई इज़्ज़त को वापस हासिल करने के लिए जी जान लगाने को तैयार है। इस तरह से शुरु होती है प्रतिस्पर्धा की कहानी। और यही है 'लाहौर' फ़िल्म की मूल कहानी।

सुजॊय - और अब आज के अंतिम गीत की बारी। राहत फ़तेह अली ख़ान और शिल्पा राव की आवाज़ में "ओ रे बंदे"। सूफ़ी अंदाज़ की यह क़व्वाली है और इसके संगीतकार हैं पीयूष मिश्रा, जिन्होने इस फ़िल्म में केवल इसी गीत को कॊम्पोज़ किया है।

सजीव - पीयूष जो वैसे तो गीतकार के रूप में ही जाने जाते हैं, लेकिन हाल के कुछ सालों में वो संगीत भी दे रहे हैं, जैसे कि फ़िल्म 'गुलाल' में दिया था। रवीन्द्र जैन और प्रेम धवन की तरह पीयूष मिश्रा भी धीरे धीरे गीतकार और संगीतकार, दोनों ही विधाओं में महारथ हासिल कर लेंगे, ऐसा उनके गीतों को सुन कर लगता है।

सुजॊय - और इस बार इस गीत में राहत फ़तेह अली ख़ान ने ऊँचे नोट्स नहीं लगाए हैं, बल्कि बहुत ही कोमल अंदाज़ में इसे गाया है। इस गीत के बारे में ज़्यादा कुछ ना कह कर आइए सीधे इसे सुन लिया जाए।

गीत - ओ रे बंदे...o re bande (lahaur)


"लाहौर" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२
अब ये काफिला और मुसाफिर अल्बम के बेहतरीन गीत है, अन्य गीतों में वो प्रभाव नहीं है. एम् एम् क्रीम बहुत दिनों बाद लौटे हैं, पर हम सब जानते हैं कि वो किस स्तर के संगीतकार हैं, जाहिर है उनसे उम्मीदें भी अधिक रहती हैं, बहरहाल यदि फिल्म सफल रहती है तो संगीत भी सराहा जायेगा अन्यथा एक्स फेक्टर के अभाव में गिने चुने संगीत प्रेमियों तक ही सीमित रह जायेगा लाहौर का ये संगीत.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २८- मुल्क राज आनंद और संजय पूरन सिंह चौहान को आप किस समानता से जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # २९ पीयूष मिश्रा को सूरज बरजात्या की एक मशहूर फ़िल्म में बतौर नायक कास्ट करने के बारे में सोचा गया था। बाद में यह फ़िल्म सलमान ख़ान के पास चली गई और एक ब्लॊकबस्टर साबित हुई। बताइए वह फ़िल्म कौन सी थी?

TST ट्रिविया # ३० एम. एम. क्रीम की बहन भी एक संगातकारा हैं, उनका नाम बताइए।


TST ट्रिविया में अब तक -
निर्मला कपिला जी तो अक्सर महफ़िल में आती रहती हैं, विवेक रस्तोगी और एम् वर्मा जी पहली बार पधारे, उनका स्वागत. सीमा जी हर बार की तरफ जवाबों के साथ तत्पर मिली, बधाई

Sunday, March 7, 2010

छम छम नाचत आई बहार....एक ऐसा मधुर गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 366/2010/66

"एक बार फिर बसंत जवान हो गया,
जग सारा वृंदावन धाम हो गया,
आम बौराई रहा, सरसों भी फूल रहा,
खेत खलिहान शृंगार हो गया,
पिया के हाथ दुल्हन शृंगार कर रही,
आज धूप धरती से प्यार कर रही,
बल, सुंदरता के आगे बेकार हो गया,
सृष्टि पे यौवन का वार हो गया,
रात भी बसंती, प्रभात भी बसंती,
बसंती पिया का दीदार हो गया,
सोचा था फिर कभी प्यार ना करूँगा, पर
'अंजाना' बसंत पे निसार हो गया,
एक बार फिर बसंत जवान हो गया।"

अंजाना प्रेम ने अपनी इस कविता में बसंत की सुंदरता को शृंगार रस के साथ मिलाकर का बड़ा ही ख़ूबसूरत नज़ारा प्रस्तुत किया है। दोस्तों, इन दिनों आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं इस रंगीले मौसम को और भी ज़्यादा रंगीन बनानेवाले कुछ रंगीले गीत इस 'गीत रंगीले' शृंखला के अंतर्गत। आज प्रस्तुत है राग बहार पर आधारित लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म 'छाया' का गीत "छम छम नाचत आई बहार"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस गीत की तर्ज़ बनाई है सलिल चौधरी ने। १९६१ की यह फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त और आशा पारेख।

दोस्तों, उपर अभी हमने एक कविता से आपका परिचय करवाया, और तभी मुझे यह ख़याल आया कि आज का यह गीत भी किसी कविता से कम नहीं। इस गीत में बहार की इतनी सुंदरता के साथ वर्णन किया गया है, और हर दृष्टि से यह गीत इतना पर्फ़ेक्ट है कि इस गीत के बारे में कुछ भी कहने की आवश्यक्ता नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि इस गीत के बोल ही यहाँ पर प्रस्तुत कर दिए जाएँ। गीत तो आप सुनेंगे ही, लेकिन इन बोलों का आप कविता के रूप में भी आनंद ले सकते हैं।

"छम छम नाचत आई बहार,
पात पात ने ली अंगड़ाई,
झूम रही है डार डार,
छम छम नाचत आई बहार।

महक रही फुलवारी,
निखरी क्यारी क्यारी,
फूल फूल पर जोबन आया,
कली कली ने किया सिंगार,
छम छम नाचत आई बहार।

मन मतवारा डोले,
जाने क्या क्या बोले,
नई नवेली आशा जागी,
झूमत मनवा बार बार,
छम छम नाचत आई बहार।



क्या आप जानते हैं...
कि सलिल चौधरी ने कई टीवी धारावाहिकों के लिए शीर्षक गीत/संगीत तय्यार किया था, जिनमें चर्चित हैं 'दर्पण', 'कुरुक्षेत्र', 'चरित्रहीन' और 'अलग'।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"आज".गीत बताएं-३ अंक.
2. लता के साथ किस पुरुष गायक ने इस गीत में आवाज़ मिलायी है-२ अंक.
3. वी शांताराम निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.
4. शुद्ध हिंदी में रचे इस गीत के गीतकार कौन हैं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शाबाश अवध जी, अब आप इंदु जी से मात्र १ अंक पीछे हैं, शरद जी एकदम सही जवाब, इंदु जी, चलिए आपकी चीटिंग माफ, और आपकी खुशमिजाजी को एक बार फिर सलाम. पदम सिंह जी ने भी खाता खोला है नए संस्करण में बधाई...
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है, पर तेरे साथ....एक चित्रकार, एक कवि और इन सबसे भी बढ़कर मोहब्बत की जीती जागती मिसाल है इमरोज़ - एक खास मुलाकात

दोस्तों, कभी कभी कुछ विशेष व्यक्तियों से मिलना, बात करना जीवन भर याद रह जाने वाला एक अनुभव बन रह जाता है, अपना एक ऐसा ही अनुभव आज हम सब के साथ बांटने जा रही हैं, रश्मि प्रभा जी, तो बिना कुछ अधिक कहे हम रश्मि जी और उनके खास मेहमान को सौंपते हैं आपकी आँखों को, हमें यकीन है कि ये गुफ्तगू आपके लिए भी उतनी यादगार होने वाली है जितनी रेशमी जी के लिए थी...

आज मैं रश्मि प्रभा आपकी मुलाकात प्यार के जाने-माने स्तम्भ इमरोज़ से करवाने जा रही हूँ...
प्यार कभी दर्द, कभी ख़ुशी, कभी दूर, कभी पास के एहसास से गुजरता है. हर प्यार करनेवालों का यही रहा अफसाना.
पर इन अफसानों से अलग एक प्यार- जहाँ कोई गम, कोई दूरी नहीं हुई, कोई इर्ष्या नहीं उठी, बस एक विश्वास की लौ रोशन रही ...विश्वास - जिसका नाम है इमरोज़ !

अमृता के इमरोज़ या इमरोज़ की अमृता - जैसे भी कह लें, एक ही अर्थ है.

तो मिलाती हूँ आप सबों को इमरोज़ से.

“नमस्कार इमरोज़ जी,..........शुरू करें हम अपनी बातें ख़ास?..........शुरू करती हूँ बातें उम्र के उस मोड़ से जहाँ आप एक युवक थे...वहाँ चढ़ते सूरज सी महत्वाकांक्षाएं होंगी...”
कूची और कैनवास से आपकी मुलाकात कब हुई ?


इमरोज़ - बचपन मैंने पंछियों के साथ
तितलियों के साथ उड़कर देखा था
पर ख्यालों के साथ में
स्कूल में ड्राइंग कहीं भी नहीं थी
न प्राइमरी स्कूल में न हाई स्कूल में
पर मेरे हाथों में ड्राइंग थी
अपने आप आई हुई

मैं स्कूल की हर कॉपी पर
कुछ न कुछ बनाता रहता था
ब्रश के साथ मेरी मुलाकात
लाहौर के आर्ट स्कूल में हुई थी
आर्ट स्कूल में वाटर कलर के रंगों से
मैं तीन साल खूब खेला था
वो खेल अब भी जारी है...

कैनवस के साथ मेरी मुलाकात
ज़िन्दगी के स्कूल में हुई आर्टिस्ट होकर
जब रंगों से दोस्ती हुई अमृता से भी दोस्ती हो गई
कैनवस पर पहली पेंटिंग
मैंने अमृता के लिए ही बनाई थी.........

ख़्वाबों की लकीरों से परे अमृता कब कैनवस पर उतरीं ?

इमरोज़ - अमृता मेरे ख़्वाबों में नहीं आई
सीधी ज़िन्दगी में आ गई
वो बात और है
कि वो ख्वाब जैसी ज़िन्दगी है
उससे मिलकर मैं ज़िन्दगी को भी मिलता रहा
और साथ अपने आपको भी मिलता रहा
साथ मिलकर चलते चलते
अपने आप ज़िन्दगी राह भी होती रही
और मंजिल भी
एक दिन चलते चलते उसने पूछा
तेरा क्या ख्याल है
ज़िन्दगी सच है कि सपना
मैंने उसकी बोलती आँखों को देखकर कहा
ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है
पर तेरे साथ .....

उसके आने पर
मुझे लिखना आया
और उसको देख देख लिखा ...

तू अक्षर अक्षर कविता
और कविता कविता ज़िन्दगी ....
कभी कभी खूबसूरत ख्याल
खूबसूरत बदन भी धर लेते हैं ....

अमृता नज़्म बनकर आईं या ज़िन्दगी ?

इमरोज़ - अमृता ज़िन्दगी बनकर आई
और कविता बनकर मिली
एक खूबसूरत माहौल बनाकर
सुबह शाम करती रही
रसोई करती तो वो भी मज़े से करती
वो ज़िन्दगी के सपने देखती
और सपने उसकी नज्में लिखते .....

कैसा लगता है इमरोज़ जी जब आपको प्यार का स्तम्भ कहा जाता है ?

इमरोज़ - जिन्होंने ये कहा है मेरे बारे में
उन सब मेहरबान लोगों का
बहुत-बहुत शुक्रिया

आज की भागती ज़िन्दगी में आप क्या सोचते हैं? क्या महसूस करते हैं?

इमरोज़ - सुकून उसमें है जो आपके पास है
और जो मिला हुआ है
वो ज़िन्दगी का सुकून बन जाता है
पर जो भाग रहे हैं
वे बहुत कुछ चाहते हैं
बहुत कुछ
चाहत की दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती
ये ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है
खाना सेहत बनाता है
पर ज़रूरत से ज्यादा खाना
ज़हर भी बन जाता है

आपकी चित्रकला का मुख्य केंद्र अमृता प्रीतम के अलावा और क्या रहा ?

इमरोज़ - मैं रंगों से खेलता हूँ
और रंग मुझसे
रंगों से खेलते खेलते
मैं भी रंग हो जाता हूँ
कुछ बनने ना बनने से
बेफिक्र बेपरवाह
कभी कभी खेलते खेलते
कुछ अच्छा भी बन जाता है
वो ही अच्छा मेरी पेंटिंग बन जाती है
मैं अपने लिए अपने आपको
पेंट करता हूँ

लोगों को सोचकर
मैंने कभी कुछ नहीं बनाया
लोगों को सोचकर कभी भी पेंटिंग नहीं हो पाती

एक प्रेमी से अलग आपकी क्या सोच रही?

इमरोज़ - मेरी सोच....
किताबें पढ़ने से लिखना पढना आ जाता है
और ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
प्यार होने से प्यार का पता लगता है

सिंगलिंग्रों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है. सिंगलिंग्रों की लड़की जवान होकर जिसके साथ जी चाहें चल-फिर सकती हैं, दोस्ती कर सकती हैं और जब वो अपना मर्द चुन लेती हैं. एक दावत करती हैं, अपना मर्द चुनने की ख़ुशी में. अपने सारे दोस्तों को बुलाती हैं और सबसे कहती हैं कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई और उसका मनचाहा सबसे हाथ मिलाता है, फिर सब जश्न मानते हैं.

कुछ दिनों से ये दावत और ये जीने की दलेरी ये साफगोई मुझे बार बार याद आ रही है.
मेरे एक दोस्त को उम्र के आख़री पहर में मोहब्बत हो गई. एक सयानी उम्र की खूबसूरत औरत से, जो खूबसूरत कवि भी है, दोस्त आप भी मशहूर शायर है...मोहब्बत के बाद दोस्त की शायरी में एक खूबसूरती बढ़ने लगी है पर उसके घर की खूबसूरती कम होनी शुरू हो रही है !

जब किसी का घर से बाहर ध्यान लग जाता है, तो उसके घर का ध्यान टूट जाता है. वो पत्नी के पास बैठा भी, पत्नी के पास नहीं होता घर में होकर भी घर में नहीं होता अब घर भी घर नहीं लगता, पत्नी भी पत्नी नहीं लगती ! रिश्ता अपने आप छूट गया है, पर संस्कार नहीं छूंट रहे वो माना हुआ सयाना है , कॉलेज में फिलोसफी पढ़ाता रहा है - कई साल !

आस-पास के लोगों की मुश्किलें आसान कर देनेवाले को आज अपनी मुश्किल का हल मिलना मुश्किल हो गया है... ज़िन्दगी दूर खड़ी हैरान हो रही है !

मोहब्बत करनेवालों को जाने की राह नहीं नज़र आ रही ! राह तो सीधी है, पर संस्कारों के अँधेरे में नज़र नहीं आ रही! जब से पत्नी को मर्द की मोहब्बत का पता लगा है, वह हैरान तो है, मगर उदास नहीं !

पूछा सिर्फ हाजिर से जा सकता है, गैर हाजिर पति से क्या पूछना ? वह चुपचाप हालात को देख रही है और अपने अकेले हो जाने को मानकर अपने आपके साथ जीना सीख रही है !

मोहब्बत यह इलज़ाम कबूल नहीं करती कि वो घर तोडती है ! मोहब्बत ही घर बनाती है, ख्यालों से भी खूबसूरत घर... सच तो ये है कि मोहब्बत बगैर घर बनता ही नहीं.

पत्नी अब एक औरत है अपने आप की आप- जिम्मेदार और बदमुख्तियार चारों तरफ देखती है, घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है !कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी और एक अजीब ख़ामोशी भी ....वह सब बिखरा हुआ बहा देती है !

और चीजों को संवारती है, सजाती है और सिंग्लिरी लड़की की तरह एक दावत देने की तैयारी करती है !

मर्द को विदा करने के लिए और विदा लेने के लिए जा रहे मर्द की मर्जी का खाना बनाती है, मेज़ फूलों से सजाती है, सामने बैठकर खाना खिलाती है.... वो ऑंखें होते हुए भी ऑंखें नहीं मिलाता !

जाते वक़्त औरत ने पैरों को हाथ लगाने की बजाय मर्द से पहली बार हाथ मिलाया और कहा- पीछे मुड़कर न देखना, आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है और 'आज' में है, अपने आप का ख्याल रखना, मेरे फिकर अब मेरे हैं !

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है. पर आज ने रोज़ आना है ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी , आदर के साथ विदा लेने के लिए भी ....

अब बहुत कुछ बदल गया है , अब आपकी दिनचर्या क्या होती है ?

इमरोज़ - उसकी धूप में
और अपनी छाँव में बैठा
मैं अपनी फकीरी करता रहता हूँ ...
पता नहीं ये फकीरी मुझे ज़िन्दगी ने दी है
कि ज़िन्दगी देनेवाले ने...

अमृता जी के लिए क्या कहना चाहेंगे ?

इमरोज़ - सपना सपना होकर
औरत हुई
और अपने आपको
अपनी मर्जी का सोचा ...
फिक्र फिक्र होकर
कवि हुई
वारिस शाह को जगाया
और कहा- देख अपना पंजाब लहुलुहान ...
मोहब्बत मोहब्बत होकर
एक राबिया हुई
किसी से भी नफरत करने से
इनकार किया
और अपने वजूद से बताया
कि मोहब्बत किसी से भी नफरत नहीं करती

ज़िन्दगी ज़िन्दगी होकर
वो मनचाही हुई
मनचाहा लिखा भी
और मनचाहा जिया भी....
मैं अमृता पर
कितना भी बोल लूँ
अमृता अनलिखी रह जाती है ....

वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज़्म नज़र आती है

मैं उस अनलिखी नज़्म को
कई बार लिख चुका हूँ
वो फिर भी अनलिखी ही रह जाती है

हो सकता है
ये अनलिखी नज़्म
लिखने के लिए हो ही ना,

सिर्फ जीने के लिए ही है ....

जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?

इमरोज़ - हर जगह आदर
पहली तालीम होनी चाहिए
जो इस वक़्त कहीं नहीं
ना सोच में ना घर में ना ज़िन्दगी में
माँ बाप बच्चों के लिए आदर जानते ही नहीं
आदर करनेवाले माँ बाप हुकम कभी नहीं करते
स्कूलों में टीचर बच्चों के साथ
थप्पड़ों से गुस्से से
बच्चों का निरादर करते रहते हैं
आदर ना टीचरों में है ना किसी स्कूल के कोर्स में
आदर ज़िन्दगी का
एक खूबसूरत रंग भी है
हर मेल मिलाप हर रिश्ते का
लाजमी रंग और ज़रूरी अंग भी है
यहाँ तक कि
एक-दूसरे से विदा
होने के लिए भी आदर ज़रूरी है
और एक दूजे को विदा करने के लिए भी ज़रूरी ....
किसी को भी फूल देते वक़्त
कुछ खुशबू अपने हाथों को भी लगी रह जाती है ....
आदर रिश्तों की खुशबू है

आप तो आम लोगों से बिल्कुल अलग हैं, शांत,स्थिर ..... फिर भी जानना चाहूँगी क्या ज़िन्दगी में क्षणांश के लिए भी कोई शिकायत आपके मन को नहीं हुई?

इमरोज़ - एक छोटी सी शिकायत
जो बता सकते हैं
वो लोगों को क्यूँ नहीं बताते
कि पाप सोच करती है
जिस्म नहीं
गंगा जिस्म साफ़ करती है
सोच नहीं

शिकायत के लहजे में
कोई मुझसे पूछता है
कि मैं अपनी पेंटिंग पर
अपना नाम क्यूँ नहीं लिखता ?

मैंने कहा
मेरा नाम मेरी पेंटिंग का
हिस्सा नहीं बनता इसलिए......

वैसे किसी भी पेंटर का नाम
उसकी पेंटिंग का हिस्सा
कभी नहीं बना
जब कभी भी
मैंने शब्द तो बोले
पर अर्थ नहीं जिए

तब अपने आप से शिकायत होती रही है....

दूसरों से शिकायत करना
गुस्सा ही है
अपने से शिकायत अपनत्व

यह मुलाकात अविस्मरणीय, अद्भुत, ज्ञानवर्धक रही ........... इस मुलाकात के दरम्यान मैंने जाना इमरोज़ प्यार का स्तम्भ ही नहीं, हम जिसे खुदा कहते हैं, उसकी परछाईं हैं.......विदा लेने से पहले कुछ झलकियाँ देखिये उस घर की, जहाँ आज भी अमृता की खुशबू है, हर कमरे, हर दीवार, हर कोने में सशरीर न होते हुए भी अमृता मौजूद है, और मौजूद है इमरोज़ और उनकी बे-इन्तेहाई मोहब्बत.

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